रिश्तों की महक, आख़िरी रोटी (अंतिम भाग)
- Ashok kumar Singh

- 12 अग॰
- 3 मिनट पठन

दिल को छू लेने वाली मौलिक कहानियाँ ,लेखक: अशोक कुमार सिंह
आख़िरी रोटी (अंतिम भाग)
जिस दिन आख़िरी रोटी माँ की थाली में पहुँची... उसी दिन उस घर में रिश्ते फिर से जीवित हो गए।
आँगन में सन्नाटा पसरा हुआ था।
तीनों बेटे अब भी अपनी माँ के सामने सिर झुकाए बैठे थे। किसी की हिम्मत नहीं हो रही थी कि उनकी आँखों में आँखें डाल सके।
सरस्वती देवी ने धीरे से अपने आँसू पोंछे।
फिर उसी ममता भरी आवाज़ में बोलीं—
"इतना मत रोओ बेटा... माँ अपने बच्चों के आँसू नहीं देख सकती।"
राघव ने काँपते हुए हाथों से माँ की खाली थाली उठाई।
उसने रसोई में जाकर वही आख़िरी रोटी उठाई, जिसे अम्मा हमेशा की तरह किसी और के लिए बचाकर रखना चाहती थीं।
वह वापस आया...
और पहली बार...
उसने वह रोटी अपनी माँ की थाली में रख दी।
भर्राई हुई आवाज़ में बोला—
"अम्मा... आज यह रोटी आप खाएँगी। हम नहीं... पहले आप।"
मोहन भी उठ खड़ा हुआ।
उसने दाल की कटोरी माँ के सामने रख दी।
सुरेश ने पानी का गिलास भरकर उनके हाथों में दिया।
तीनों बहुएँ चुपचाप खड़ी थीं।
उनकी आँखों से भी आँसू बह रहे थे।
छोटी गौरी मुस्कुराते हुए दादी की गोद में बैठ गई।
उसने दोनों हाथों से रोटी का छोटा-सा टुकड़ा तोड़ा...
और दादी के मुँह तक ले जाकर बोली—
"दादी... अब आपकी बारी है।"
सरस्वती देवी ने काँपते हुए हाथों से गौरी का चेहरा सहलाया।
रोटी का वह पहला कौर उनके मुँह में गया...
लेकिन निगलने से पहले ही उनकी आँखों से आँसू छलक पड़े।
शायद...
वर्षों बाद...
उन्होंने पहली बार अपने हिस्से की रोटी बिना किसी चिंता के खाई थी।
आँगन में खड़े नीम के पेड़ से पत्तियाँ धीरे-धीरे झर रही थीं।
ऐसा लग रहा था...
मानो वर्षों से सूखा पड़ा वह घर फिर से हरियाली ओढ़ रहा हो।
भोजन समाप्त होने के बाद राघव ने सबके सामने एक निर्णय लिया।
"आज से यह घर कभी नहीं बिकेगा।"
मोहन ने कहा—
"हर महीने नहीं... हर पंद्रह दिन में पूरा परिवार यहीं आएगा।"
सुरेश ने माँ का हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा—
"अब आपको किसी का इंतज़ार नहीं करना पड़ेगा, अम्मा।"
सरस्वती देवी मुस्कुराईं।
उनकी मुस्कान में आज संतोष था।
उन्होंने धीरे से कहा—
"मुझे धन नहीं चाहिए बेटा... बस इतना याद रखना कि जिस दिन घर में माँ की थाली सबसे आखिर में लगने लगे, उसी दिन समझ लेना कि घर से सुख विदा होने लगा है।"
पूरा परिवार एक साथ उठकर माँ के चरणों में झुक गया।
बरामदे की दीवार पर टँगी रामनाथ जी की तस्वीर पर ढलते सूरज की किरण पड़ी।
ऐसा लगा...
मानो वह भी मुस्कुरा रहे हों।
उस शाम बरईपुर गाँव में किसी ने कोई उत्सव नहीं देखा...
लेकिन जिसने भी उस घर की ओर देखा...
उसे लगा—
आज एक परिवार फिर से जन्म ले चुका है।
जीवन संदेश
माँ कभी अपने लिए नहीं जीती।
वह अपने हिस्से की रोटी, अपनी नींद, अपने सपने और कभी-कभी पूरी ज़िंदगी भी बच्चों के नाम कर देती है।
इसलिए...
जब भी भोजन करें, एक बार मुड़कर ज़रूर पूछिए—
"माँ... आपने खाना खा लिया?"
हो सकता है...
यही एक प्रश्न किसी माँ के लिए दुनिया का सबसे बड़ा सम्मान बन जाए।
✍️ लेखक: अशोक कुमार सिंह
समाप्त
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भाग 6
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