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भारतार्थ – भारतीय राजनीति गहन विचार पर विशेष


सही रास्ता
लेखक: अशोक कुमार सिंह "रिपोर्टर/मल्टीमीडिया' डायरेक्टर "भारतर्थ खबर' (बंगलुरु कर्नाटक)
एक छोटे से गाँव में विवेक नाम का युवक रहता था। वह मेहनती और समझदार था, लेकिन उसे हमेशा लगता था कि जीवन में आगे बढ़ने के लिए कोई ऐसा व्यक्ति होना चाहिए जो उसे सही दिशा दिखाए। वह अक्सर गाँव के बाहर बैठकर सोचता कि आखिर कुछ लोग कठिन परिस्थितियों के बावजूद सफल कैसे हो जाते हैं, जबकि कई लोग अवसर मिलने के बाद भी आगे नहीं बढ़ पाते।

Ashok kumar Singh
27 अग॰4 मिनट पठन


रिश्तों की महक, आख़िरी रोटी (अंतिम भाग)
जिस दिन आख़िरी रोटी माँ की थाली में पहुँची... उसी दिन उस घर में रिश्ते फिर से जीवित हो गए।
आँगन में सन्नाटा पसरा हुआ था।
तीनों बेटे अब भी अपनी माँ के सामने सिर झुकाए बैठे थे। किसी की हिम्मत नहीं हो रही थी कि उनकी आँखों में आँखें डाल सके।
सरस्वती देवी ने धीरे से अपने आँसू पोंछे।
फिर उसी ममता भरी आवाज़ में बोलीं—
"इतना मत रोओ बेटा... माँ अपने बच्चों के आँसू नहीं देख सकती।"
राघव ने काँपते हुए हाथों से माँ की खाली थाली उठाई।
उसने रसोई में जाकर वही आख़िरी रोटी उठाई, जिसे अम

Ashok kumar Singh
12 अग॰3 मिनट पठन


रिश्तों की महक आख़िरी रोटी (भाग–5)
माँ की खाली थाली... और तीन बेटों की आँखों से बहते वर्षों पुराने आँसू
गौरी के मासूम प्रश्न के बाद पूरे आँगन में ऐसा सन्नाटा छा गया, मानो समय अचानक ठहर गया हो।
सरस्वती देवी अब भी मुस्कुरा रही थीं।
उन्होंने आख़िरी रोटी के छोटे-छोटे टुकड़े किए और धीरे से कहा—
"लो बिटिया... इसे तुम लोग बाँटकर खा लो। मैं बाद में खा लूँगी।"
लेकिन इस बार उनकी आवाज़ में वही दृढ़ता नहीं थी, जो बरसों पहले हुआ करती थी।
राघव धीरे-धीरे उठा।
उसकी नज़र पहली बार माँ की थाली पर गई।
वहाँ... कोई रोटी नहीं

Ashok kumar Singh
11 अग॰3 मिनट पठन


रिश्तों की महक आख़िरी रोटी (भाग–4)
एक मासूम सवाल... जिसने तीन बेटों की ज़िंदगी का सबसे बड़ा सच सामने ला दिया।
आँगन में बिछी दरी पर पूरा परिवार एक साथ बैठा था। वर्षों बाद उस घर में फिर से हँसी सुनाई दे रही थी। पीतल की थालियाँ सजी थीं। मिट्टी के चूल्हे से उठती रोटियों की खुशबू पूरे घर में फैल रही थी।
सरस्वती देवी एक-एक करके सबकी थाली में गर्म रोटियाँ रख रही थीं।
पहले बड़े बेटे राघव की थाली...
फिर मोहन...
फिर सुरेश...
फिर बहुएँ...
फिर पोते-पोतियाँ...
हर बार रोटी रखते हुए उनके चेहरे पर वही संतोष था, जो केव

Ashok kumar Singh
10 अग॰3 मिनट पठन


रिश्तों की महक आख़िरी रोटी (भाग–3)
जब पूरा परिवार एक साथ बैठा... लेकिन एक थाली अब भी खाली थी।
बरईपुर गाँव का वह छोटा-सा घर वर्षों बाद फिर से चहल-पहल से भर गया था। आँगन में बच्चों की खिलखिलाहट गूँज रही थी। बहुएँ सामान समेट रही थीं और तीनों बेटे बरामदे में बैठकर शहर की बातें कर रहे थे।
उधर रसोई में अम्मा अकेली थीं।
मिट्टी के चूल्हे में जलती लकड़ियों की आँच तेज़ हो चुकी थी। तवे पर पहली रोटी फूली तो अम्मा के चेहरे पर मुस्कान भी खिल उठी।
उन्होंने धीरे से कहा—
"आज फिर मेरा घर, घर जैसा लग रहा है।"

Ashok kumar Singh
8 अग॰3 मिनट पठन
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