सही रास्ता
- Ashok kumar Singh

- 27 अग॰
- 4 मिनट पठन

लेखक: अशोक कुमार सिंह "रिपोर्टर/मल्टीमीडिया' डायरेक्टर "भारतर्थ खबर' (बंगलुरु कर्नाटक)
एक छोटे से गाँव में विवेक नाम का युवक रहता था। वह मेहनती और समझदार था, लेकिन उसे हमेशा लगता था कि जीवन में आगे बढ़ने के लिए कोई ऐसा व्यक्ति होना चाहिए जो उसे सही दिशा दिखाए। वह अक्सर गाँव के बाहर बैठकर सोचता कि आखिर कुछ लोग कठिन परिस्थितियों के बावजूद सफल कैसे हो जाते हैं, जबकि कई लोग अवसर मिलने के बाद भी आगे नहीं बढ़ पाते।
एक दिन विवेक गाँव के बुजुर्ग और विद्वान माधव बाबा के पास पहुँचा। उसने कहा, “बाबा, मैं जीवन में कुछ बड़ा करना चाहता हूँ, लेकिन मुझे समझ नहीं आता कि सही रास्ता कौन-सा है।” माधव बाबा मुस्कुराए और बोले, “अगर सच में रास्ता जानना चाहते हो तो कल सुबह मेरे साथ चलना।”
अगली सुबह दोनों जंगल की ओर निकल पड़े। कुछ दूर जाने के बाद उन्हें तीन रास्ते दिखाई दिए। पहला रास्ता चौड़ा और सुंदर था। दूसरा रास्ता संकरा और कठिन था, लेकिन उस पर लोगों के पैरों के निशान दिखाई दे रहे थे। तीसरा रास्ता झाड़ियों से ढका हुआ था और लगभग दिखाई ही नहीं देता था।
विवेक ने कहा, “बाबा, पहला रास्ता सबसे अच्छा लगता है। इतना चौड़ा और सुंदर रास्ता है, जरूर सही होगा।” बाबा ने कुछ नहीं कहा और उसके साथ उसी रास्ते पर चल पड़े। थोड़ी दूर जाने के बाद रास्ता एक दलदल में जाकर समाप्त हो गया। विवेक परेशान हो गया। बाबा ने पूछा, “रास्ता सुंदर था?” विवेक ने कहा, “हाँ।” बाबा बोले, “लेकिन क्या वह तुम्हें मंजिल तक ले गया?” विवेक के पास कोई उत्तर नहीं था।
दोनों वापस लौटे और दूसरे रास्ते पर चलने लगे। रास्ता कठिन था। कहीं पत्थर थे, कहीं चढ़ाई थी और कई जगह उन्हें संभलकर आगे बढ़ना पड़ा। लेकिन कुछ दूर जाने के बाद उन्हें साफ पानी की एक नदी मिली। उसके किनारे हरे-भरे पेड़ थे। विवेक खुश हुआ, लेकिन बाबा ने कहा, “अभी सीख पूरी नहीं हुई है।”
इसके बाद दोनों तीसरे रास्ते के सामने पहुँचे। विवेक ने कहा, “यह तो रास्ता ही नहीं लगता।” माधव बाबा बोले, “कभी-कभी जीवन के सबसे अच्छे रास्ते शुरुआत में दिखाई नहीं देते। उन्हें खोजने और बनाने के लिए साहस चाहिए।”
विवेक ने झाड़ियाँ हटाईं और दोनों आगे बढ़े। रास्ता कठिन था, लेकिन कुछ समय बाद वे पहाड़ी की चोटी पर पहुँच गए। वहाँ से पूरा गाँव दिखाई दे रहा था। विवेक की आँखों में आश्चर्य था। बाबा ने पूछा, “अब बताओ, सबसे अच्छा रास्ता कौन-सा था?” विवेक ने कहा, “तीसरा रास्ता, क्योंकि वह कठिन था, लेकिन हमें सबसे ऊँची जगह तक ले गया।”
माधव बाबा मुस्कुराए और बोले, “यही जीवन की सबसे बड़ी सीख है। जो रास्ता आसान दिखाई देता है, वह हमेशा सही नहीं होता और जो रास्ता कठिन होता है, वह हमेशा गलत नहीं होता। जीवन में रास्ते की कठिनाई से ज्यादा महत्वपूर्ण उसकी दिशा होती है।”
विवेक ने पूछा, “लेकिन बाबा, सही दिशा कैसे पहचानी जाए?” बाबा ने कहा, “अपने निर्णय भीड़ को देखकर मत लेना। अपने उद्देश्य को समझो, अपनी क्षमता को पहचानो और निर्णय लेने से पहले उसके परिणामों के बारे में सोचो। अगर कभी गलती हो जाए तो उसे स्वीकार करो और रास्ता बदलने से मत डरो।”
उन्होंने आगे कहा, “ज्ञान केवल किताबें पढ़ने से नहीं मिलता। ज्ञान अनुभव से मिलता है, प्रश्न पूछने से मिलता है और अपनी गलतियों से सीखने से मिलता है। लेकिन ज्ञान की सबसे बड़ी पहचान तब होती है, जब इंसान अपने ज्ञान का उपयोग केवल अपने लिए नहीं, बल्कि दूसरों की मदद के लिए करता है।”
उस दिन विवेक गाँव वापस लौटा तो उसके सोचने का तरीका बदल चुका था। पहले वह अवसर का इंतजार करता था, अब वह अवसर खोजने लगा। पहले अपनी असफलता के लिए परिस्थितियों को दोष देता था, अब वह अपनी गलतियों की जिम्मेदारी लेने लगा। धीरे-धीरे उसने गाँव के बच्चों को पढ़ाना शुरू किया और जरूरतमंद बच्चों के लिए किताबें जुटाकर एक छोटी-सी पुस्तकालय भी बना दी।
कुछ वर्षों बाद वही विवेक गाँव के युवाओं का मार्गदर्शक बन गया। एक दिन एक बच्चा उसके पास आया और बोला, “गुरुजी, मुझे समझ नहीं आता कि बड़ा होकर क्या बनूँ।”
विवेक मुस्कुराया और बोला, “अभी यह तय करने की जल्दी मत करो कि तुम्हें क्या बनना है। पहले यह समझो कि तुम्हें कैसा इंसान बनना है। ईमानदार, मेहनती, जिम्मेदार और दूसरों के काम आने वाला इंसान बनोगे तो जीवन में सही दिशा अपने आप दिखाई देने लगेगी।”
बच्चे ने पूछा, “अगर मैंने गलत रास्ता चुन लिया तो?”
विवेक ने कहा, “तो वापस लौट आना। गलत रास्ते से लौटना असफलता नहीं है। गलत रास्ता पहचान लेने के बाद भी उसी पर चलते रहना असली असफलता है।”
उस दिन विवेक को समझ आया कि माधव बाबा ने उसे केवल एक रास्ता नहीं दिखाया था, बल्कि सोचने का तरीका सिखाया था। यही सच्चे मार्गदर्शन की पहचान है।
सीख: जीवन में सफलता केवल तेज चलने से नहीं मिलती, बल्कि सही दिशा में चलने से मिलती है। दूसरों की भीड़ का अनुसरण करने के बजाय अपने विवेक, अनुभव और उद्देश्य के आधार पर निर्णय लेना चाहिए। सच्चा मार्गदर्शक वह नहीं जो हमारे लिए रास्ता चुन दे, बल्कि वह है जो हमें इतना सक्षम बना दे कि हम स्वयं सही रास्ता चुन सकें।
✍️ लेखक: अशोक कुमार सिंह अन्य कहानी , मार्गदर्शन एवं प्रेरणादायी ज़रूर पढ़िए
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