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शरीर से आत्मा तक: मनुष्य आखिर किस स्तर पर जी रहा है?

  • लेखक की तस्वीर: Ashok kumar Singh
    Ashok kumar Singh
  • 24 अग॰
  • 9 मिनट पठन
ध्यान में बैठा व्यक्ति, पहाड़ी पर आत्मा तक जाती सीढ़ी; शहर, तनाव और आत्मा का उजला दृश्य, जीवन/आत्मा पाठ।

लेखक: अशोक कुमार सिंह रिपोर्टर/मल्टीमीडिया डायरेक्टर भारतार्थ खबर (बंगलुरु कर्नाटक)

मनुष्य का पूरा जीवन एक प्रश्न के आसपास घूमता है—मैं कौन हूं? क्या मैं केवल यह शरीर हूं, जो जन्म लेता है, बढ़ता है, बूढ़ा होता है और एक दिन समाप्त हो जाता है? क्या मैं केवल यह मन हूं, जिसमें हर क्षण विचार, इच्छाएं, भय, क्रोध, प्रसन्नता और दुख आते-जाते रहते हैं? या इन सबके पीछे कोई ऐसी चेतना भी है, जो शरीर और मन दोनों को देखती है?

भारतीय आध्यात्मिक परंपरा सदियों से मनुष्य को इसी प्रश्न पर विचार करने के लिए प्रेरित करती रही है। इसका एक महत्वपूर्ण संदेश है कि मनुष्य को केवल शरीर के स्तर पर नहीं जीना चाहिए और न ही अपने अस्तित्व को केवल मन के उतार-चढ़ाव तक सीमित कर देना चाहिए। जीवन की गहराई को समझने के लिए चेतना अथवा आत्मबोध के स्तर तक पहुंचने का प्रयास आवश्यक है।

यह विचार शरीर को नकारने का संदेश नहीं देता। शरीर जीवन का महत्वपूर्ण साधन है। इसकी देखभाल करना हमारा कर्तव्य है। इसी प्रकार मन भी जीवन का आवश्यक हिस्सा है। लेकिन समस्या तब शुरू होती है, जब मनुष्य शरीर को ही अपना संपूर्ण अस्तित्व मान लेता है और मन में उठने वाले प्रत्येक विचार को अपना अंतिम सत्य समझने लगता है।

शरीर जरूरी है, लेकिन शरीर ही सब कुछ नहीं। हमारा शरीर प्रकृति का अद्भुत उपहार है। इसी शरीर के माध्यम से हम संसार को देखते हैं, सुनते हैं, अनुभव करते हैं, कार्य करते हैं और अपने संबंध निभाते हैं। इसलिए शरीर की उपेक्षा करना आध्यात्मिकता नहीं हो सकती।

लेकिन शरीर की देखभाल और शरीर के प्रति अत्यधिक आसक्ति में बहुत अंतर है। शरीर स्वस्थ रहे, स्वच्छ रहे और सक्षम रहे—यह आवश्यक है। लेकिन जब मनुष्य अपने पूरे जीवन का मूल्यांकन केवल अपने रूप, रंग, शक्ति, उम्र, सुंदरता और बाहरी आकर्षण के आधार पर करने लगता है, तब वह शरीर के स्तर पर बंधने लगता है।

आज का समाज इस समस्या को बहुत स्पष्ट रूप से दिखाता है। युवा दिखने की इच्छा, सुंदर दिखाई देने की चिंता, दूसरों से बेहतर दिखने की प्रतिस्पर्धा और सामाजिक स्वीकृति पाने की लगातार कोशिश मनुष्य को भीतर से बेचैन कर सकती है।

जिस शरीर पर मनुष्य इतना गर्व करता है, वही शरीर समय के साथ बदलता रहता है। बचपन का शरीर युवावस्था में बदलता है। युवावस्था का शरीर वृद्धावस्था की ओर जाता है। शक्ति धीरे-धीरे कम होती है। बाल सफेद होते हैं। त्वचा बदलती है। आंखों की रोशनी कम हो सकती है। शरीर रोगों से प्रभावित हो सकता है। प्रकृति का नियम परिवर्तन है।

यदि हमारी पहचान केवल शरीर से जुड़ी होगी, तो शरीर में होने वाला प्रत्येक परिवर्तन हमारे भीतर भय पैदा करेगा। यहीं से बुढ़ापे का भय, बीमारी का भय और मृत्यु का भय जन्म ले सकता है।

मृत्यु जीवन का सबसे बड़ा रहस्य है। मनुष्य मृत्यु को रोक नहीं सकता, लेकिन मृत्यु के विचार से डरता अवश्य है। इस भय का एक कारण यह भी है कि हम अपने अस्तित्व को शरीर से जोड़ लेते हैं। हमें लगता है कि शरीर समाप्त हुआ तो सब कुछ समाप्त हो गया।

आध्यात्मिक चिंतन इस प्रश्न को दूसरी दृष्टि से देखने का प्रयास करता है। वह कहता है कि शरीर परिवर्तनशील है, जबकि आत्मा या चेतना को शरीर से अलग समझने की परंपरा भारतीय दर्शन में बहुत पुरानी है। यहां आत्मा की अवधारणा को केवल धार्मिक विश्वास के रूप में नहीं, बल्कि आत्मचिंतन के विषय के रूप में भी देखा जा सकता है।

प्रश्न यह है कि यदि शरीर लगातार बदल रहा है, तो हमारे भीतर वह कौन-सा अनुभव है जो इन परिवर्तनों को देखता है? बचपन की तस्वीर देखकर हम कहते हैं—“यह मैं था।” युवावस्था की तस्वीर देखकर भी कहते हैं—“यह मैं था।” शरीर बदल गया, लेकिन ‘मैं’ की अनुभूति बनी रही। यही प्रश्न मनुष्य को आत्मचिंतन की ओर ले जाता है।

शरीर के स्तर से ऊपर उठने की बात करते समय दूसरा प्रश्न मन का है। मनुष्य अक्सर सोचता है कि वह अपने विचार ही है। लेकिन यदि हम थोड़ी देर शांत बैठें और अपने विचारों को देखें तो पता चलता है कि विचार लगातार बदल रहे हैं।

कुछ समय पहले हम प्रसन्न थे, फिर किसी बात ने दुखी कर दिया। कुछ देर बाद किसी समाचार ने क्रोधित कर दिया। थोड़ी देर बाद किसी प्रिय व्यक्ति से बात हुई तो मन फिर हल्का हो गया। यदि विचार लगातार बदल रहे हैं, तो क्या बदलते हुए विचार ही हमारा पूरा अस्तित्व हैं?

यहीं से साक्षी भाव की अवधारणा सामने आती है। साक्षी भाव का अर्थ है—अपने विचारों, भावनाओं और अनुभवों को बिना तुरंत उनके साथ बह जाने के देखना।

क्रोध आया तो यह देखना कि “मेरे भीतर क्रोध उठ रहा है।” भय आया तो देखना कि “मेरे भीतर भय की भावना है।” दुख आया तो समझना कि “मैं दुख का अनुभव कर रहा हूं।” इस दृष्टि में एक छोटा लेकिन महत्वपूर्ण अंतर पैदा होता है। हम यह नहीं कहते कि “मैं ही क्रोध हूं।” हम कहते हैं—“मेरे भीतर क्रोध उत्पन्न हुआ है।” यह अंतर मनुष्य को अपने विचारों का गुलाम बनने से बचाने की दिशा में एक कदम हो सकता है।

आध्यात्मिक जीवन का अर्थ यह नहीं है कि मन में कोई विचार नहीं आना चाहिए। मन का स्वभाव ही विचार करना है। कभी सकारात्मक विचार आएंगे, कभी नकारात्मक। कभी आत्मविश्वास होगा, कभी संदेह। कभी प्रेम होगा, कभी क्रोध। कभी उत्साह होगा, कभी निराशा।

समस्या विचारों के आने में नहीं है। समस्या तब होती है जब हम हर विचार को सत्य मान लेते हैं और उसके अनुसार तुरंत प्रतिक्रिया करने लगते हैं। यदि किसी ने हमें अपमानित किया और उसी क्षण हमने क्रोध में प्रतिक्रिया दे दी, तो संभव है कि बाद में हमें पछताना पड़े। लेकिन यदि हम कुछ क्षण रुककर अपने भीतर उठ रहे क्रोध को देख लें, तो प्रतिक्रिया और उत्तर के बीच एक छोटा-सा अंतर पैदा होता है। यही अंतर विवेक का स्थान बन सकता है।

आत्मा के स्तर पर जीने का अर्थ शरीर या मन को छोड़ देना नहीं है। इसका अर्थ यह समझना है कि शरीर मेरा साधन है, मन मेरा उपकरण है और मेरी चेतना इन दोनों के अनुभवों की साक्षी हो सकती है।

जैसे हम कार का उपयोग करते हैं, लेकिन स्वयं को कार नहीं मानते, उसी तरह आध्यात्मिक दृष्टि में शरीर को जीवन की यात्रा का साधन माना जा सकता है। नाव नदी पार कराने के लिए जरूरी है। इसलिए नाव की देखभाल करनी होगी। लेकिन नाव को ही अंतिम मंजिल मान लेना बुद्धिमानी नहीं होगी।

इसी प्रकार शरीर की देखभाल करें, मन को स्वस्थ रखें, संसार में अपने कर्तव्यों का पालन करें—लेकिन अपने अस्तित्व को केवल इन सीमाओं में बंद न कर दें।

मनुष्य सुख चाहता है। अच्छा भोजन, आरामदायक घर, धन, प्रतिष्ठा, मनोरंजन और सफलता—ये सभी जीवन में सुख दे सकते हैं। इनका अपना महत्व है। लेकिन इनसे मिलने वाला सुख सामान्यतः स्थायी नहीं होता।

आज जिस वस्तु को पाने के लिए हम बेचैन हैं, उसे पाने के कुछ समय बाद वही वस्तु सामान्य लगने लगती है। फिर मन किसी दूसरी वस्तु की इच्छा करने लगता है। एक इच्छा पूरी होती है, दूसरी पैदा हो जाती है।

मनुष्य सोचता है कि अगली उपलब्धि उसे स्थायी खुशी देगी। लेकिन अगली उपलब्धि आने के बाद फिर कोई नया लक्ष्य सामने खड़ा हो जाता है। इसका अर्थ यह नहीं कि लक्ष्य बनाना गलत है। समस्या तब है जब हमारी पूरी शांति केवल बाहरी उपलब्धियों पर निर्भर हो जाए।

मन की शांति, संतोष, प्रेम, करुणा, सेवा और आत्मबोध ऐसे अनुभव हैं जो बाहरी वस्तुओं से अलग प्रकार की संतुष्टि प्रदान कर सकते हैं।

इंद्रियों का स्वभाव अनुभव करना है। आंख सुंदर दृश्य देखना चाहती है। कान मधुर संगीत सुनना चाहते हैं। जीभ स्वाद चाहती है। शरीर आराम चाहता है। इन इच्छाओं में अपने आप कोई दोष नहीं है।

लेकिन जब इच्छाएं मनुष्य को नियंत्रित करने लगती हैं, तब समस्या पैदा होती है। एक वस्तु मिली तो दूसरी चाहिए। दूसरी मिली तो तीसरी चाहिए। तुलना बढ़ती जाती है और संतोष पीछे छूटता जाता है।

विज्ञापन आधारित आधुनिक जीवन ने इस प्रवृत्ति को और मजबूत किया है। हमें लगातार बताया जाता है कि हमारे पास कुछ कम है—बेहतर फोन चाहिए, बड़ा घर चाहिए, महंगी गाड़ी चाहिए, अधिक प्रसिद्धि चाहिए, बेहतर जीवनशैली चाहिए।

मनुष्य अपनी वास्तविक जरूरत और बाजार द्वारा पैदा की गई इच्छा के बीच अंतर करना भूल सकता है। आत्मचेतना का मार्ग इस अंतर को पहचानने की क्षमता विकसित करने का प्रयास है।

अनासक्ति शब्द को कई बार गलत समझा जाता है। अनासक्ति का अर्थ यह नहीं है कि मनुष्य अपने परिवार से प्रेम न करे, अपने काम को छोड़ दे या संसार से भाग जाए। अनासक्ति का अर्थ है—कर्तव्य निभाते हुए परिणाम और वस्तुओं के प्रति अत्यधिक मानसिक आसक्ति से मुक्त होने का प्रयास।

परिवार से प्रेम करें, लेकिन अधिकार की भावना इतनी न बढ़े कि प्रेम बंधन बन जाए। धन कमाएं, लेकिन धन को अपनी पहचान न बना लें। सफलता प्राप्त करें, लेकिन असफलता को अपनी संपूर्ण पहचान न बनने दें। सम्मान मिले तो विनम्र रहें और अपमान मिले तो आत्ममंथन करें। यही संतुलन जीवन को परिपक्व बनाता है।

मनुष्य जब संसार से विदा होता है, तब उसके साथ उसका पद, संपत्ति और बाहरी रूप नहीं जाता। पीछे रह जाते हैं उसके कर्म। लोग याद करते हैं कि उसने दूसरों के साथ कैसा व्यवहार किया। क्या उसने किसी जरूरतमंद की मदद की? क्या उसने अपने परिवार के साथ प्रेम से व्यवहार किया? क्या उसने किसी कमजोर व्यक्ति का शोषण किया या उसका हाथ थामा? क्या उसके कारण किसी के जीवन में आशा आई?

यही प्रश्न मनुष्य के जीवन को उसके बाहरी रूप से कहीं अधिक अर्थपूर्ण बनाते हैं। इसलिए आत्मा के स्तर पर जीने का एक महत्वपूर्ण अर्थ यह भी है कि हम अपने कर्मों को अधिक महत्व दें।

आत्मचेतना की यात्रा के लिए किसी बड़े आयोजन की आवश्यकता नहीं है। मनुष्य अपने दैनिक जीवन में कुछ मिनट मौन बैठकर शुरुआत कर सकता है। आंखें बंद करें। आराम से बैठें। अपनी सांसों को देखें। सांस भीतर जा रही है। सांस बाहर आ रही है। मन में विचार उठ रहे हैं। उन्हें रोकने की आवश्यकता नहीं। केवल उन्हें आते-जाते हुए देखने का प्रयास करें।

धीरे-धीरे मनुष्य अनुभव कर सकता है कि वह अपने विचारों को देख भी सकता है। यही साक्षी भाव की प्रारंभिक साधना हो सकती है। हालांकि ध्यान कोई जादुई प्रक्रिया नहीं है। मन को शांत होने में समय लग सकता है। लगातार अभ्यास और धैर्य आवश्यक है।

आज का मनुष्य शोर से घिरा हुआ है। मोबाइल की घंटियां, सोशल मीडिया की सूचनाएं, लगातार आती खबरें, मनोरंजन और बातचीत ने हमारे जीवन में बाहरी आवाजों की संख्या बढ़ा दी है। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण आवाज शायद भीतर की है, जिसे सुनने के लिए मौन चाहिए।

कुछ समय बिना मोबाइल, बिना टीवी और बिना किसी बाहरी मनोरंजन के स्वयं के साथ बैठना कठिन लग सकता है। यही कठिनाई बताती है कि हम अपने भीतर से कितने दूर हो गए हैं। मौन भागना नहीं है। मौन अपने भीतर लौटने का अवसर है।

यदि व्यक्ति अपने भीतर अधिक सजग होता है, तो उसका प्रभाव केवल उसके व्यक्तिगत जीवन तक सीमित नहीं रहता। जो व्यक्ति अपने क्रोध को पहचानना सीखता है, वह दूसरों पर कम क्रोध कर सकता है। जो व्यक्ति अपनी इच्छाओं को समझता है, वह दूसरों की वस्तुओं से कम ईर्ष्या कर सकता है। जो व्यक्ति अपने भीतर करुणा विकसित करता है, वह समाज में अधिक संवेदनशील व्यवहार कर सकता है।

इसलिए आत्मचेतना केवल व्यक्तिगत आध्यात्मिक यात्रा नहीं है। इसका सामाजिक महत्व भी है। यदि मनुष्य भीतर से संतुलित होगा, तो परिवार अधिक संतुलित हो सकते हैं। परिवार संतुलित होंगे तो समाज में तनाव कम हो सकता है।

आज मनुष्य के पास सुविधाएं पहले से कहीं अधिक हैं, लेकिन मानसिक बेचैनी भी कम नहीं हुई है। हमारे पास संचार के साधन हैं, लेकिन संवाद की कमी दिखाई देती है। हमारे पास मनोरंजन के अनेक साधन हैं, लेकिन भीतर का खालीपन कई बार बना रहता है। हमारे पास जानकारी बहुत है, लेकिन आत्मज्ञान की खोज अक्सर पीछे छूट जाती है।

ऐसे समय में शरीर, मन और आत्मचेतना के बीच अंतर को समझने की आवश्यकता और अधिक बढ़ जाती है। मनुष्य यदि हर समस्या का समाधान केवल बाहरी दुनिया में खोजता रहेगा, तो संभव है कि वह अपने भीतर मौजूद कई प्रश्नों से बचता रहे। कभी-कभी समाधान बाहर नहीं, भीतर की दृष्टि बदलने से आता है।

मानव जीवन को नदी में चलती नाव के समान समझना एक सुंदर प्रतीक है। शरीर नाव है। मन नाविक की तरह है। संसार नदी है। और जीवन का उद्देश्य केवल नाव को सजाते रहना नहीं, बल्कि यात्रा को अर्थपूर्ण बनाना है।

नाव की मरम्मत करनी होगी। उसे स्वच्छ रखना होगा। उसे सुरक्षित रखना होगा। लेकिन नाव को ही अपना अंतिम घर मान लेना यात्रा के उद्देश्य को भुला देना है। इसी प्रकार शरीर की देखभाल करें, मन को स्वस्थ रखें, संसार में अपने कर्तव्यों का पालन करें—लेकिन अपने अस्तित्व को केवल इन सीमाओं में बंद न कर दें।

मनुष्य का जीवन केवल जन्म से मृत्यु तक की शारीरिक यात्रा नहीं माना जा सकता। यह चेतना के विकास की यात्रा भी हो सकती है।

शरीर हमें संसार में कार्य करने की शक्ति देता है। मन हमें अनुभव, विचार और कल्पना देता है। लेकिन आत्मचेतना हमें यह प्रश्न पूछने की क्षमता देती है कि इन सबके पीछे हमारा वास्तविक स्वरूप क्या है।

शरीर को नकारना नहीं है। मन को दबाना नहीं है। संसार से भागना नहीं है। बल्कि शरीर की देखभाल करते हुए, मन को समझते हुए और अपने भीतर की चेतना के प्रति जागरूक होते हुए जीवन जीने का प्रयास करना है।

शायद यही वह यात्रा है जिसमें मनुष्य धीरे-धीरे बाहरी पहचान से भीतर की पहचान की ओर बढ़ता है। जब मनुष्य केवल अपने रूप को नहीं, अपने चरित्र को महत्व देता है; केवल अपनी इच्छाओं को नहीं, अपने कर्तव्यों को महत्व देता है; केवल अपने सुख को नहीं, दूसरों के सुख को भी महत्व देता है; और केवल अपनी उपलब्धियों को नहीं, अपने अस्तित्व के अर्थ को समझने का प्रयास करता है—तब उसके जीवन में एक गहरा परिवर्तन शुरू हो सकता है।

शरीर हमारा साधन है। मन हमारा माध्यम है। कर्म हमारी पहचान हैं। और आत्मचेतना वह प्रकाश है, जिसके माध्यम से हम स्वयं को समझने की यात्रा शुरू कर सकते हैं।

अंततः प्रश्न यह नहीं कि हमने जीवन में कितना पाया। प्रश्न यह है कि जो जीवन हमें मिला, उसे हमने कितनी जागरूकता, करुणा, प्रेम और सत्य के साथ जिया।

यही शरीर से आत्मा तक की यात्रा का सार है।

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