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भारतार्थ – भारतीय राजनीति गहन विचार पर विशेष


बाढ़ के सैलाब में इंसान के पास पहुंचा हाथी, वायरल वीडियो ने खींचा लोगों का ध्यान
भारतार्थ खबर संवाददाता अशोक कुमार सिंह (Bhaarataarth.com) नई दिल्ली | 28 अगस्त 2026
सोशल मीडिया पर इन दिनों एक वीडियो तेजी से चर्चा में है, जिसमें तेज बहाव वाले बाढ़ के पानी के बीच एक हाथी एक व्यक्ति के बेहद करीब पहुंचता दिखाई दे रहा है। वीडियो में व्यक्ति पानी के तेज बहाव के बीच संघर्ष करता नजर आता है, जबकि हाथी उसके पास पहुंचकर उसे सहारा देता हुआ दिखाई देता है।
वीडियो में बाढ़ का पानी बेहद तेज नजर आ रहा है। इसी दौरान हाथी व्यक्ति की ओर बढ़ता है और वह व्यक्ति हाथी को पकड़न

Ashok kumar Singh
6 दिन पहले2 मिनट पठन


सही रास्ता
लेखक: अशोक कुमार सिंह "रिपोर्टर/मल्टीमीडिया' डायरेक्टर "भारतर्थ खबर' (बंगलुरु कर्नाटक)
एक छोटे से गाँव में विवेक नाम का युवक रहता था। वह मेहनती और समझदार था, लेकिन उसे हमेशा लगता था कि जीवन में आगे बढ़ने के लिए कोई ऐसा व्यक्ति होना चाहिए जो उसे सही दिशा दिखाए। वह अक्सर गाँव के बाहर बैठकर सोचता कि आखिर कुछ लोग कठिन परिस्थितियों के बावजूद सफल कैसे हो जाते हैं, जबकि कई लोग अवसर मिलने के बाद भी आगे नहीं बढ़ पाते।

Ashok kumar Singh
27 अग॰4 मिनट पठन


सूखी जमीन में उम्मीद
भारतार्थ खबर, Bhaarataarth.com लेखक: अशोक कुमार सिंह राजस्थान के एक छोटे से गांव केसरपुर की यह कहानी केवल एक किसान की मेहनत की कहानी नहीं, बल्कि विपरीत परिस्थितियों में उम्मीद, धैर्य और सामूहिक प्रयास की ताकत का संदेश देती है।
केसरपुर में गोविंद नाम का एक साधारण किसान रहता था। उसके पास थोड़ी जमीन, एक पुराना कुआं और मिट्टी से बना छोटा सा घर था। सीमित साधनों के बावजूद वह मेहनत और धैर्य के साथ जीवन जी रहा था। लेकिन एक वर्ष गांव में बारिश बेहद कम हुई। खेतों में दरारें पड़ गईं,

Ashok kumar Singh
26 अग॰3 मिनट पठन


गोस्वामी तुलसीदास का काव्य में परिवार प्रबोधन
डॉ. वीरमाराम पटेल लेखक एवं कवि, गुड़ामालानी, बालोतरा भारत की पहचान विश्व में परिवार व्यवस्था के कारण अनोखी है। परिवार हमारी सांस्कृतिक धरोहर है और वर्तमान में इसी धरोहर का आधार है महाकवि तुलसीदास के साहित्य में निहित परिवार भाव। उनके साहित्य में परिवार का आवरण केवल रक्त के रिश्ते से नहीं अपितु जड़-चेतन के प्रति परिवार भाव है। प्रभु श्री राम परिवार परिवेश को अगर आदर्श आमने तो आज वहीं भाव हमारे समाज के परिवारों का है लेकिन आज के परिवार बिखराव के दौर में है। प्रभु श्री का परिवार

धन्नाराम चौधरी
19 अग॰3 मिनट पठन


रिश्तों की महक, आख़िरी रोटी (अंतिम भाग)
जिस दिन आख़िरी रोटी माँ की थाली में पहुँची... उसी दिन उस घर में रिश्ते फिर से जीवित हो गए।
आँगन में सन्नाटा पसरा हुआ था।
तीनों बेटे अब भी अपनी माँ के सामने सिर झुकाए बैठे थे। किसी की हिम्मत नहीं हो रही थी कि उनकी आँखों में आँखें डाल सके।
सरस्वती देवी ने धीरे से अपने आँसू पोंछे।
फिर उसी ममता भरी आवाज़ में बोलीं—
"इतना मत रोओ बेटा... माँ अपने बच्चों के आँसू नहीं देख सकती।"
राघव ने काँपते हुए हाथों से माँ की खाली थाली उठाई।
उसने रसोई में जाकर वही आख़िरी रोटी उठाई, जिसे अम

Ashok kumar Singh
12 अग॰3 मिनट पठन


रिश्तों की महक आख़िरी रोटी (भाग–5)
माँ की खाली थाली... और तीन बेटों की आँखों से बहते वर्षों पुराने आँसू
गौरी के मासूम प्रश्न के बाद पूरे आँगन में ऐसा सन्नाटा छा गया, मानो समय अचानक ठहर गया हो।
सरस्वती देवी अब भी मुस्कुरा रही थीं।
उन्होंने आख़िरी रोटी के छोटे-छोटे टुकड़े किए और धीरे से कहा—
"लो बिटिया... इसे तुम लोग बाँटकर खा लो। मैं बाद में खा लूँगी।"
लेकिन इस बार उनकी आवाज़ में वही दृढ़ता नहीं थी, जो बरसों पहले हुआ करती थी।
राघव धीरे-धीरे उठा।
उसकी नज़र पहली बार माँ की थाली पर गई।
वहाँ... कोई रोटी नहीं

Ashok kumar Singh
11 अग॰3 मिनट पठन


रिश्तों की महक आख़िरी रोटी (भाग–4)
एक मासूम सवाल... जिसने तीन बेटों की ज़िंदगी का सबसे बड़ा सच सामने ला दिया।
आँगन में बिछी दरी पर पूरा परिवार एक साथ बैठा था। वर्षों बाद उस घर में फिर से हँसी सुनाई दे रही थी। पीतल की थालियाँ सजी थीं। मिट्टी के चूल्हे से उठती रोटियों की खुशबू पूरे घर में फैल रही थी।
सरस्वती देवी एक-एक करके सबकी थाली में गर्म रोटियाँ रख रही थीं।
पहले बड़े बेटे राघव की थाली...
फिर मोहन...
फिर सुरेश...
फिर बहुएँ...
फिर पोते-पोतियाँ...
हर बार रोटी रखते हुए उनके चेहरे पर वही संतोष था, जो केव

Ashok kumar Singh
10 अग॰3 मिनट पठन


रिश्तों की महक आख़िरी रोटी (भाग–3)
जब पूरा परिवार एक साथ बैठा... लेकिन एक थाली अब भी खाली थी।
बरईपुर गाँव का वह छोटा-सा घर वर्षों बाद फिर से चहल-पहल से भर गया था। आँगन में बच्चों की खिलखिलाहट गूँज रही थी। बहुएँ सामान समेट रही थीं और तीनों बेटे बरामदे में बैठकर शहर की बातें कर रहे थे।
उधर रसोई में अम्मा अकेली थीं।
मिट्टी के चूल्हे में जलती लकड़ियों की आँच तेज़ हो चुकी थी। तवे पर पहली रोटी फूली तो अम्मा के चेहरे पर मुस्कान भी खिल उठी।
उन्होंने धीरे से कहा—
"आज फिर मेरा घर, घर जैसा लग रहा है।"

Ashok kumar Singh
8 अग॰3 मिनट पठन


रिश्तों की महक "आख़िरी रोटी' (भाग–2)
दिल को छू लेने वाली मौलिक कहानियाँ लेखक: अशोक कुमार सिंह
क्या वर्षों बाद लौटे बेटे अब भी वही थे, जिन्हें कभी माँ अपने हाथों से कौर खिलाकर बड़ा करती थी?
बरईपुर गाँव की उस सुबह में जैसे वर्षों बाद फिर से उत्सव उतर आया था। सरस्वती देवी, जिन्हें पूरा गाँव "अम्मा" कहकर पुकारता था, सूरज निकलने से पहले ही जाग गई थीं। आज उनके तीनों बेटे अपने-अपने परिवार के साथ घर आने वाले थे।
उन्होंने सबसे पहले आँगन में झाड़ू लगाई। फिर गोबर और मिट्टी से आँगन लीपा। तुलसी चौरे पर जल चढ़ाया और हाथ

Ashok kumar Singh
8 अग॰3 मिनट पठन


रिश्तों की महक, 'आख़िरी रोटी" (भाग–1)
जब माँ अपने हिस्से की रोटी भी बच्चों के लिए छोड़ देती है, तब घर केवल मकान नहीं रहता—वह ममता का मंदिर बन जाता है।
उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में बसे एक छोटे-से गाँव बरईपुर की सुबह आज भी पक्षियों की चहचहाहट और मंदिर की घंटियों से जागती थी। गाँव के बीचों-बीच खड़ा बूढ़ा नीम का पेड़ न जाने कितनी पीढ़ियों का साक्षी था। उसी पेड़ से कुछ दूर मिट्टी और ईंटों से बना एक छोटा-सा घर था, जहाँ रहती थीं सरस्वती देवी, जिन्हें पूरा गाँव प्यार से "अम्मा" कहता था।
उम्र पचहत्तर वर्ष के पार पहुँच

Ashok kumar Singh
7 अग॰2 मिनट पठन


माँ की आख़िरी गुल्लक:
लेखक: अशोक कुमार सिंहप्रकाशन: भारतार्थ ख़बर | प्रेरक कथाआज़मगढ़, उत्तर प्रदेश।
कहा जाता है कि धन से जीवन की सुविधाएँ खरीदी जा सकती हैं, लेकिन कठिन समय में इंसान को संभालने का काम केवल रिश्ते, विश्वास और इंसानियत ही करते हैं। प्रस्तुत है एक ऐसी प्रेरक कथा, जो हमें याद दिलाती है कि जीवन की सबसे बड़ी संपत्ति बैंक बैलेंस नहीं, बल्कि अपने लोगों का साथ और उनके दिलों में बसने वाला विश्वास है।
माँ की आख़िरी गुल्लक
शहर के एक बड़े सरकारी अस्पताल के बाहर लगभग सत्तर वर्षीय सरस्वती

Ashok kumar Singh
3 अग॰3 मिनट पठन


रिश्तों की सबसे बड़ी दौलत
सेवा, संवेदना और इंसानियत का अनमोल संदेश✍️ लेखक: अशोक कुमार सिंह
बरसात की हल्की फुहारों के बीच गाँव के बस स्टैंड पर लगभग 70 वर्षीय रामस्वरूप जी अपनी पुरानी छतरी और दवाइयों का छोटा-सा पैकेट लिए बस की प्रतीक्षा कर रहे थे। तभी तेज़ रफ्तार से गुज़री एक बाइक ने सड़क पर भरा पानी उनके ऊपर उछाल दिया। उनके कपड़े भीग गए और वे असहाय होकर वहीं खड़े रह गए।
पास ही चाय की एक छोटी-सी दुकान चलाने वाला 16 वर्षीय मोहन यह दृश्य देखकर दौड़ पड़ा। उसने आदरपूर्वक रामस्वरूप जी को अपनी दुकान के भीतर

Ashok kumar Singh
2 अग॰3 मिनट पठन


धारावाहिक उपन्यास | मौन दान (भाग–11)
विरासत (अंतिम अध्याय) ✍️ लेखक: अशोक कुमार सिंह
क्या किसी इंसान की सबसे बड़ी पहचान उसका नाम होता है, या उसके विचार? पढ़िए "मौन दान" का भावपूर्ण समापन।
विशेष नोट: "मौन दान" एक मौलिक काल्पनिक धारावाहिक उपन्यास है। इसके पात्र, घटनाएँ और स्थान साहित्यिक कल्पना पर आधारित हैं।
पुराना पुस्तकालय खुला, एक विचार ने पूरे गाँव का भविष्य बदल दिया
सुबह की पहली किरणें पुराने प्राथमिक विद्यालय की टूटी हुई खिड़कियों से भीतर उतर रही थीं।
वर्षों से बंद पड़ा पुस्तकालय आज फिर खुलने वाला था।
माधव

Ashok kumar Singh
31 जुल॰3 मिनट पठन


धारावाहिक उपन्यास | मौन दान (भाग–10)
माधव के नाम अंतिम पत्र ✍️ लेखक: अशोक कुमार सिंह
क्या एक पिता का प्रेम शब्दों से बड़ा हो सकता है? पढ़िए "मौन दान" का सबसे भावुक अध्याय।
विशेष नोट: "मौन दान" एक मौलिक काल्पनिक धारावाहिक उपन्यास है। इसके पात्र, घटनाएँ और स्थान साहित्यिक कल्पना पर आधारित हैं।
वर्षों से सीलबंद पत्र खुला, पिता के मौन ने बेटे के जीवन को नई दिशा दे दी
शाम ढल चुकी थी।
पंचायत भवन के बरामदे में रखा पीतल का दीपक शांत लौ के साथ जल रहा था।
उसकी रोशनी के बीच एक सीलबंद लिफ़ाफ़ा मेज़ पर रखा था।
उसी लिफ़ाफ़े प

Ashok kumar Singh
31 जुल॰3 मिनट पठन


धारावाहिक उपन्यास | मौन दान (भाग–09)
बैंक का लॉकर ✍️ लेखक: अशोक कुमार सिंह
क्या एक बैंक लॉकर में केवल धन छिपा था, या जीवनभर की सबसे बड़ी विरासत? पढ़िए "मौन दान" का नौवाँ भाग।
विशेष नोट: "मौन दान" एक मौलिक काल्पनिक धारावाहिक उपन्यास है। इसके पात्र, घटनाएँ और स्थान साहित्यिक कल्पना पर आधारित हैं।
शहर के पुराने बैंक में खुला वर्षों पुराना लॉकर, सामने आई विश्वास की सबसे अनमोल विरासत
अगली सुबह सूरज की पहली किरणों के साथ ही दयानाथ त्रिपाठी, रमेश पाठक, सरपंच, रामदीन और मोहन शहर के लिए रवाना हुए।
पूरे रास्ते जीप में सन

Ashok kumar Singh
30 जुल॰3 मिनट पठन


धारावाहिक उपन्यास | मौन दान (भाग–08)
वसीयत से बड़ा उत्तराधिकार ✍️ लेखक: अशोक कुमार सिंह
नोट: "मौन दान" एक मौलिक काल्पनिक धारावाहिक उपन्यास है। इसके पात्र, घटनाएँ और स्थान साहित्यिक कल्पना पर आधारित हैं।
शिवनारायण की वसीयत ने बदली विरासत की परिभाषा, सामने आया सेवा का असली उत्तराधिकार
बरगद से लौटते समय पूरे गाँव में एक अजीब-सी खामोशी थी।
अब कोई भी शिवनारायण को "कंजूस" नहीं कह रहा था।
लेकिन हर मन में एक ही प्रश्न था—
"बीस साल पहले बनाया गया वह ट्रस्ट आखिर है क्या?"
जब सभी लोग पंचायत भवन पहुँचे, तब तक वहाँ एक सफ

Ashok kumar Singh
29 जुल॰3 मिनट पठन


धारावाहिक उपन्यास | मौन दान (भाग–07)
मोहरबंद बक्सा ✍️ लेखक: अशोक कुमार सिंह
नोट: "मौन दान" एक मौलिक काल्पनिक धारावाहिक उपन्यास है। इसके पात्र, घटनाएँ और स्थान साहित्यिक कल्पना पर आधारित हैं।
मोहरबंद बक्सा खुला, सामने आई एक डायरी... और कहानी ने लिया सबसे बड़ा मोड़
पंचायत भवन की पुरानी दीवार पर लगी घड़ी ने दोपहर के बारह बजाए।
लेकिन वहाँ मौजूद किसी व्यक्ति का ध्यान समय पर नहीं था।
सभी की निगाहें दयानाथ त्रिपाठी के हाथों में पकड़े उस छोटे-से मोहरबंद बक्से पर टिकी थीं।
सागौन की लकड़ी से बना वह पुराना बक्सा वर्ष

Ashok kumar Singh
28 जुल॰3 मिनट पठन


धारावाहिक उपन्यास | मौन दान (भाग–06)
अजनबी की वापसी ✍️ लेखक: अशोक कुमार सिंह
नोट: "मौन दान" एक मौलिक काल्पनिक धारावाहिक उपन्यास है। इसके पात्र, घटनाएँ और स्थान साहित्यिक कल्पना पर आधारित हैं।
एक अजनबी की वापसी ने खोला शिवनारायण के जीवन का नया अध्याय
बरामदे में बैठे लोगों की निगाहें अब उसी अधेड़ व्यक्ति पर टिक गई थीं, जो धीरे-धीरे शिवनारायण के घर की ओर बढ़ रहा था।
उसकी उम्र लगभग साठ वर्ष रही होगी। धूप से तपा चेहरा, सफ़ेद होते बाल और हाथ में वर्षों पुराना चमड़े का बैग।
वह आँगन में पहुँचा।
कुछ क्षण तक चुपचाप शिवना

Ashok kumar Singh
27 जुल॰3 मिनट पठन


धारावाहिक उपन्यास | मौन दान (भाग–05)
तीस वर्ष पुरानी बाढ़ का रहस्य फिर खुला, एक सरकारी पत्र ने बदल दी कहानी की दिशा
डाकिए के जाते ही पूरे बरामदे में फिर से सन्नाटा छा गया।
दयानाथ त्रिपाठी ने सरकारी लिफ़ाफ़े को सावधानी से खोला। कागज़ बिल्कुल नया था, लेकिन उसे पढ़ते ही उनके चेहरे पर वर्षों पुरानी यादों की परछाइयाँ उतर आईं।
सरपंच ने धीमे स्वर में पूछा—
"क्या बात है, वकील साहब?"
दयानाथ ने पत्र को मोड़ा और कुछ क्षण तक चुप रहे।
फिर बोले—"यह ज़िला प्रशासन की ओर से आया है। शिवनारायण जी के नाम दर्ज एक पुरानी सरकारी

Ashok kumar Singh
25 जुल॰3 मिनट पठन


धारावाहिक उपन्यास | मौन दान (भाग–04)
एक तस्वीर... जिसने शिवनारायण की पूरी कहानी बदल दी
बरामदे में फैला सन्नाटा अब भी वैसा ही था।
जमुना दादी की उँगलियाँ उस पुरानी तस्वीर को थामे हुए थीं।
उनकी आँखें तस्वीर पर थीं...
लेकिन मन जैसे पैंतीस वर्ष पीछे लौट चुका था।
दयानाथ ने धीरे से पूछा—
"पहचान लिया आपने?"
जमुना दादी ने गहरी साँस ली।
फिर तस्वीर में मुस्कुराती स्त्री की ओर इशारा करते हुए बोलीं—
"यह गौरी है... शिवनारायण की पत्नी।"

Ashok kumar Singh
24 जुल॰3 मिनट पठन
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