रिश्तों की महक "आख़िरी रोटी' (भाग–2)
- Ashok kumar Singh

- 8 अग॰
- 3 मिनट पठन

दिल को छू लेने वाली मौलिक कहानियाँ लेखक: अशोक कुमार सिंह
क्या वर्षों बाद लौटे बेटे अब भी वही थे, जिन्हें कभी माँ अपने हाथों से कौर खिलाकर बड़ा करती थी?
बरईपुर गाँव की उस सुबह में जैसे वर्षों बाद फिर से उत्सव उतर आया था। सरस्वती देवी, जिन्हें पूरा गाँव "अम्मा" कहकर पुकारता था, सूरज निकलने से पहले ही जाग गई थीं। आज उनके तीनों बेटे अपने-अपने परिवार के साथ घर आने वाले थे।
उन्होंने सबसे पहले आँगन में झाड़ू लगाई। फिर गोबर और मिट्टी से आँगन लीपा। तुलसी चौरे पर जल चढ़ाया और हाथ जोड़कर बोलीं—
"हे ठाकुर जी! आज मेरे आँगन की रौनक लौटा देना।"
बरामदे में रखी पुरानी चारपाई की रस्सियाँ कस दी गईं। वर्षों से बंद पड़ा मिट्टी का चूल्हा साफ़ किया गया। पीतल की थालियाँ राख से माँजकर चमका दी गईं।
पास की पड़ोसन कमला चाची मुस्कुराते हुए बोलीं—
"अरी सरस्वती, इतनी तैयारी मत कर। शहर वाले बच्चे अब कहाँ चूल्हे की रोटी खाते हैं?"
अम्मा ने मुस्कुराकर जवाब दिया—
"रोटी का स्वाद आटे में नहीं होता बहन... माँ के हाथों में होता है।"
कमला चाची कुछ पल तक उन्हें देखती रहीं। उन्हें लगा जैसे यह वाक्य किसी किताब का नहीं, बल्कि एक माँ के पूरे जीवन का सार था।
दोपहर ढलने लगी।
गाँव की कच्ची सड़क पर धूल उड़ाती तीन बड़ी गाड़ियाँ धीरे-धीरे घर के सामने आकर रुकीं।
सबसे पहले बड़ा बेटा राघव उतरा। उसके पीछे उसकी पत्नी और दोनों बच्चे।
फिर मोहन और सबसे आखिर में सुरेश।
अम्मा की आँखें भर आईं।
उन्होंने बिना कुछ सोचे तीनों बेटों के सिर पर हाथ रख दिया।
"कैसे हो बेटा?"
राघव ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—
"ठीक हूँ अम्मा।"
मोहन ने घड़ी देखते हुए पूछा—
"खाना तैयार है न? हमें शाम तक वापस भी निकलना है।"
अम्मा ने एक पल के लिए उसकी ओर देखा, फिर मुस्कुरा दीं।
"हाँ बेटा... सब तैयार है।"
सबसे छोटा सुरेश चुपचाप घर के भीतर चला गया। उसकी नज़र दीवार पर टँगी बाबूजी की तस्वीर पर पड़ी। उसने कुछ पल तक तस्वीर को देखा, फिर नज़रें झुका लीं।
उधर पोते-पोतियाँ पूरे आँगन में दौड़ रहे थे। उन्हें गाँव का हर दृश्य नया लग रहा था।
अम्मा की सबसे छोटी पोती गौरी धीरे-धीरे रसोई तक पहुँच गई।
उसने मिट्टी के चूल्हे को हैरानी से देखा।
"दादी... क्या आप सचमुच इसी पर खाना बनाती हैं?"
अम्मा हँस पड़ीं।
"हाँ बिटिया... इसी चूल्हे की आग में तुम्हारे पापा बड़े हुए हैं।"
गौरी ने भोलेपन से पूछा—
"तो आज मैं भी आपके साथ रोटी बनाऊँगी।"
अम्मा ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—
"ज़रूर... लेकिन पहली रोटी बनाने से पहले हाथों में प्यार होना चाहिए। रोटी तो हर कोई बना लेता है।"
यह सुनकर गौरी खिलखिलाकर हँस पड़ी।
रसोई में आटा गूँथा जा चुका था। लकड़ियाँ सुलग रही थीं। तवे पर पहली रोटी पड़ने ही वाली थी।
अम्मा के चेहरे पर वर्षों बाद वैसी चमक थी, जैसी किसी माँ के चेहरे पर तब आती है जब उसका बिछड़ा परिवार एक साथ बैठने वाला हो।
लेकिन...
उन्हें क्या पता था कि आज इसी रसोई में एक ऐसी आख़िरी रोटी सिकेगी, जो वर्षों से बिखरते रिश्तों की सच्चाई सबके सामने रख देगी।
क्रमशः...
अगले भाग में पढ़िए:"जब पूरे परिवार की थाली भर गई... लेकिन एक थाली अब भी खाली थी।"
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भाग 6
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