top of page
भारतार्थ-logo

धारावाहिक उपन्यास | मौन दान (भाग–10)

  • लेखक की तस्वीर: Ashok kumar Singh
    Ashok kumar Singh
  • 31 जुल॰
  • 3 मिनट पठन
Hindi poster of a crying young man reading a letter by candlelight, with books, clock, key, and many Hindi text panels.

माधव के नाम अंतिम पत्र ✍️ लेखक: अशोक कुमार सिंह

क्या एक पिता का प्रेम शब्दों से बड़ा हो सकता है? पढ़िए "मौन दान" का सबसे भावुक अध्याय।


विशेष नोट: "मौन दान" एक मौलिक काल्पनिक धारावाहिक उपन्यास है। इसके पात्र, घटनाएँ और स्थान साहित्यिक कल्पना पर आधारित हैं।

वर्षों से सीलबंद पत्र खुला, पिता के मौन ने बेटे के जीवन को नई दिशा दे दी

शाम ढल चुकी थी।

पंचायत भवन के बरामदे में रखा पीतल का दीपक शांत लौ के साथ जल रहा था।

उसकी रोशनी के बीच एक सीलबंद लिफ़ाफ़ा मेज़ पर रखा था।

उसी लिफ़ाफ़े पर लिखा था—

"मेरे बेटे माधव के लिए।"

माधव कुछ क्षण तक उसे निहारता रहा।

उसके हाथ काँप रहे थे।

दयानाथ त्रिपाठी ने धीमे स्वर में कहा—

"इसे खोलने का अधिकार केवल तुम्हारा है।"

माधव ने काँपते हाथों से मुहर तोड़ी।

अंदर चार पन्नों का एक पत्र था।

उसने पहला पन्ना खोला।

शिवनारायण ने लिखा था—

"प्रिय माधव,
जब तुम यह पत्र पढ़ रहे होगे, तब मैं इस संसार में नहीं रहूँगा।
हो सकता है तुम मुझसे नाराज़ हो।
हो सकता है तुम मुझे पहचानते भी न हो।
और यह भी हो सकता है कि तुम मुझे कभी पिता मान ही न पाओ।
मैं तुम्हें दोष नहीं दूँगा... क्योंकि सबसे बड़ा दोषी मैं स्वयं हूँ।"

बरामदे में गहरा सन्नाटा छा गया।

माधव की आँखें नम हो चुकी थीं।

उसने आगे पढ़ना जारी रखा—

"जिस दिन नदी ने हमें अलग किया, उसी दिन मेरा जीवन दो हिस्सों में बँट गया।"
"एक हिस्सा दुनिया के सामने जीता रहा..."
"दूसरा हिस्सा हर दिन तुम्हें खोजता रहा।"

पत्र में आगे लिखा था—

"मैंने तुम्हें दूर से कई बार देखा।"
"तुम्हारे स्कूल का पहला दिन..."
"तुम्हारी पहली साइकिल..."
"तुम्हारी नौकरी..."
"तुम्हारी शादी..."
"हर खुशी देखी, लेकिन हर बार एक कदम आगे बढ़ाकर फिर रुक गया।"
"मुझे डर था कि कहीं मेरा सच तुम्हारे जीवन की शांति न छीन ले।"

माधव अब आँसू रोक नहीं पा रहा था।

बरामदे में बैठे लोगों की आँखें भी भर आई थीं।

पत्र में आगे लिखा था—

"तुम सोचोगे कि मैंने तुम्हें अपना नाम क्यों नहीं दिया।"
"बेटा... नाम देने से पहले मैंने तुम्हें जीवन देना चुना।"
"जिस परिवार ने तुम्हें अपनाया, उन्होंने कभी यह महसूस नहीं होने दिया कि तुम उनके अपने नहीं हो।"
"यदि मैं तुम्हें वापस ले आता, तो शायद चार ज़िंदगियाँ टूट जातीं।"
"मैंने अपना सुख खोया... लेकिन तुम्हारी मुस्कान बची रही।"
"आज भी मुझे अपने निर्णय पर गर्व नहीं... पर पछतावा भी नहीं।"

पत्र के अंतिम पन्ने पर शिवनारायण की तीन अंतिम इच्छाएँ लिखी थीं—

पहली इच्छा

"यदि कभी मेरे लिए रोना, तो केवल उतनी देर रोना जितनी देर किसी दीपक की लौ काँपती है। उसके बाद किसी ज़रूरतमंद के चेहरे पर मुस्कान लाने की कोशिश करना।"

दूसरी इच्छा

"मेरी कोई प्रतिमा मत बनवाना। यदि लोग मेरा नाम भूल जाएँ और मेरा विचार याद रखें, तो वही मेरी सबसे बड़ी जीत होगी।"

तीसरी और अंतिम इच्छा

"यदि कभी तुम मुझे सचमुच अपना पिता मानो, तो हर वर्ष कम-से-कम एक ऐसे बच्चे की पढ़ाई का खर्च उठाना, जिसके सपने केवल गरीबी की वजह से रुक रहे हों। उस दिन मुझे लगेगा कि मेरा जीवन अधूरा नहीं था।"

पत्र समाप्त हो चुका था।

बरामदे में केवल सिसकियों की आवाज़ सुनाई दे रही थी।

माधव धीरे-धीरे उठा।

वह शिवनारायण की तस्वीर के सामने पहुँचा।

कुछ पल तक निहारता रहा।

फिर भर्राए स्वर में बोला—

"बाबा... मैंने आपको बहुत देर से पाया..."
"...लेकिन अब कभी खोने नहीं दूँगा।"

उसने गाँव वालों की ओर देखा।

आँखों में आँसू थे, लेकिन आवाज़ दृढ़ थी।

"आज से इस गाँव में कोई बच्चा केवल पैसों की कमी के कारण पढ़ाई नहीं छोड़ेगा।"
"यह मेरी नहीं..."
"...मेरे पिता की पहली विरासत होगी।"

तभी दयानाथ ने अपने बैग से एक छोटी-सी पुरानी चाबी निकाली।

उन्होंने माधव के हाथों में रखते हुए कहा—

"शिवनारायण ने तुम्हारे लिए एक और जिम्मेदारी छोड़ी है।"
"यह किसी तिजोरी की नहीं..."
"...उस पुराने विद्यालय के बंद पुस्तकालय की चाबी है, जिसे उन्होंने वर्षों पहले अपने पैसों से बनवाया था।"

माधव ने चाबी को दोनों हाथों से थाम लिया।

उसे लगा...

आज पहली बार उसे कोई संपत्ति नहीं...

एक उत्तरदायित्व मिला है।

क्रमशः...


अगले और अंतिम भाग में पढ़िए — "विरासत"

क्या शिवनारायण का सपना पूरा होगा? क्या "मौन दान" एक व्यक्ति की कहानी से आगे बढ़कर पूरे गाँव का आंदोलन बन जाएगा?

केवल भारतार्थ ख़बर पर प्रकाशित मौलिक धारावाहिक उपन्यास — मौन दान


सन्देश ; - 

अगर आपने इस धारावाहिक उपन्यास के पिछले भाग को नहीं पढ़ा है तो पढ़ें,

नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में इन पोस्ट्स पर अपनी राय ज़रूर दें। आपका नज़रिया ही लोकतंत्र की ताकत है; देश के निर्माण में आपकी अहम भूमिका है।


सटीक, वैज्ञानिक और साहित्यिक खबरें पढ़ने के लिए 'भारतार्थ समाचार' से जुड़े रहें।

अपना समर्थन दिखाएं—हमें लाइक, शेयर और फ़ॉलो करें—ताकि हर ज़रूरी अपडेट आपको सबसे पहले मिले।

ताज़ा खबरों के लिए "भारतार्थ खबर" के साथ बने रहें।





टिप्पणियां

5 स्टार में से 0 रेटिंग दी गई।
अभी तक कोई रेटिंग नहीं

रेटिंग जोड़ें
bottom of page