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धारावाहिक उपन्यास | मौन दान (भाग–04)

  • लेखक की तस्वीर: Ashok kumar Singh
    Ashok kumar Singh
  • 24 जुल॰
  • 3 मिनट पठन
Hindi book-cover poster for Dhara Vahik Upanyas Maan Dan, with a man reading a letter beside an open chest in a dim room.

तस्वीर में मुस्कुराती स्त्री ✍️ लेखक: अशोक कुमार सिंह

नोट: "मौन दान" एक मौलिक काल्पनिक धारावाहिक उपन्यास है। इसके पात्र, घटनाएँ और स्थान साहित्यिक कल्पना पर आधारित हैं।

एक तस्वीर... जिसने शिवनारायण की पूरी कहानी बदल दी

बरामदे में फैला सन्नाटा अब भी वैसा ही था।

जमुना दादी की उँगलियाँ उस पुरानी तस्वीर को थामे हुए थीं।

उनकी आँखें तस्वीर पर थीं...

लेकिन मन जैसे पैंतीस वर्ष पीछे लौट चुका था।

दयानाथ ने धीरे से पूछा—

"पहचान लिया आपने?"

जमुना दादी ने गहरी साँस ली।

फिर तस्वीर में मुस्कुराती स्त्री की ओर इशारा करते हुए बोलीं—

"यह गौरी है... शिवनारायण की पत्नी।"

भीड़ में खड़े कई युवाओं ने पहली बार यह नाम सुना।

उन्हें तो बस इतना पता था कि शिवनारायण हमेशा अकेले रहते थे।

जमुना दादी ने मुस्कुराते हुए कहा—

"जब गौरी इस गाँव में बहू बनकर आई थी, तब पूरे गाँव में उससे ज़्यादा हँसमुख लड़की कोई नहीं थी।"

किसी ने पूछा—

"और शिवनारायण?"

दादी मुस्कुराईं।

"वह तब भी कम बोलता था... लेकिन गौरी उसकी हर चुप्पी समझ लेती थी।"

फिर उन्होंने एक पुरानी घटना सुनाई।

सूखे का साल था।

कई घरों में चूल्हा तक नहीं जलता था।

एक शाम गौरी ने देखा कि शिवनारायण गेहूँ की बोरी लेकर घर से निकल रहे हैं।

उसने पूछा—

"कहाँ जा रहे हो?"

शिवनारायण ने शांत स्वर में उत्तर दिया—

"जहाँ इसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत है।"

गौरी ने फिर पूछा—

"लेकिन लोग जानेंगे कैसे कि मदद तुमने की है?"

शिवनारायण मुस्कुरा दिए।

"जिस भूखे के घर रोटी पहुँचेगी... उसे नाम नहीं, भोजन याद रहेगा।"

गौरी ने जाते-जाते बस इतना कहा—

"एक बात हमेशा याद रखना... दान कभी किसी का सिर झुकाकर मत देना।"

वह एक वाक्य शिवनारायण के जीवन का सिद्धांत बन गया।

वर्तमान में लौटते हुए जमुना दादी की आँखें भर आईं।

"गौरी चली गई... लेकिन उसके शब्द शिवा के साथ हमेशा रहे।"

दयानाथ ने संदूक से एक छोटा कपड़े का थैला निकाला।

उसमें एक पुरानी चाँदी की पायल और एक तह किया हुआ कागज़ था।

उन्होंने पढ़ा—

"यह गौरी की आख़िरी निशानी है। इसे बेचने का मन कई बार हुआ, लेकिन हर बार लगा कि यह मुझे याद दिलाती रहे कि दान में केवल धन नहीं, सम्मान भी दिया जाता है।"

जमुना दादी अब अपने आँसू नहीं रोक सकीं।

"शिवा ने गौरी को कभी भुलाया ही नहीं..."

तभी आँगन से एक बालक दौड़ता हुआ आया।

"सरपंच जी... डाकिया आया है!"

डाकिए के हाथ में शहर से आया एक पंजीकृत लिफ़ाफ़ा था।

उस पर लिखा था—

"अधिवक्ता दयानाथ त्रिपाठी के लिए — अत्यंत आवश्यक।"

दयानाथ ने पत्र खोला।

सरकारी मुहर लगी हुई थी।

पत्र पढ़ते ही उनके चेहरे का रंग बदल गया।

सरपंच ने घबराकर पूछा—

"क्या हुआ?"

दयानाथ ने पत्र मोड़ते हुए धीमे स्वर में कहा—

"जिस सच को हम वर्षों पुराना समझ रहे थे..."
"...वह शायद आज भी अधूरा है।"

बरामदे में फिर एक बार सन्नाटा उतर आया।

और कहानी ने एक नया मोड़ ले लिया।

क्रमशः...अगले भाग में पढ़िए:

"सरकारी पत्र"

केवल भारतार्थ ख़बर पर प्रकाशित धारावाहिक उपन्यास — मौन दान


अगर आप इस कहानी में कोई भाग नहीं पड़े हैं तो पढ़ें


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