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धारावाहिक उपन्यास | मौन दान (भाग–02)

  • Writer: Ashok kumar Singh
    Ashok kumar Singh
  • 2 days ago
  • 3 min read
Poster in Hindi shows an elderly man and woman talking in a village at sunset, with bold title and text about dignity and labor.

बंद संदूक और पहली दरार ✍️ लेखक: अशोक कुमार सिंह

नोट: "मौन दान" एक मौलिक काल्पनिक धारावाहिक उपन्यास है। इसके पात्र, घटनाएँ और स्थान साहित्यिक कल्पना पर आधारित हैं।

रहस्य की पहली परत खुली, लेकिन जवाबों से ज़्यादा सवाल सामने आए...

बरामदे में रखा सागौन का पुराना संदूक वर्षों की धूल से ढका था। उसके लोहे के कुंडों पर जंग की मोटी परत जम चुकी थी। ऐसा लगता था मानो उसने अपने भीतर केवल सामान नहीं, बल्कि समय को भी बंद कर रखा हो।

दयानाथ त्रिपाठी ने अपनी जेब से पीतल की पुरानी चाबी निकाली। कुछ क्षण तक वे उसे हथेली पर देखते रहे।

फिर धीमे स्वर में बोले—

"यह चाबी मुझे आज से पच्चीस वर्ष पहले मिली थी।"

गाँव वाले एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।

"पच्चीस साल पहले?"

सरपंच ने आश्चर्य से पूछा।

दयानाथ ने शांत स्वर में उत्तर दिया—

"शिवनारायण जी ने कहा था— 'जब मैं इस दुनिया में न रहूँ, तभी यह संदूक खोलना। उससे पहले कभी नहीं।'"

उन्होंने चाबी ताले में डाली। पुराना ताला पहले अड़ा रहा, फिर एक भारी आवाज़ के साथ खुल गया।

संदूक का ढक्कन धीरे-धीरे ऊपर उठा। सभी की निगाहें उसी पर टिक गईं।

हर किसी को उम्मीद थी कि भीतर सोना, ज़मीन के कागज़ या कोई बड़ी वसीयत मिलेगी। लेकिन अंदर जो था, उसने सभी को हैरान कर दिया। सबसे ऊपर एक साफ़ तह किया हुआ सफ़ेद गमछा रखा था।

उसके नीचे लाल कपड़े की एक छोटी पोटली।

कुछ पुरानी डायरियाँ।

एक लकड़ी का डिब्बा।

और सबसे नीचे कपड़े में लिपटी एक मिट्टी की गुल्लक।

हरिराम हल्की हँसी के साथ बोला—

"बस... यही था उनका ख़ज़ाना?"

कुछ लोग मुस्कुरा दिए।

लेकिन दयानाथ शांत रहे।

उन्होंने गमछा हटाया।

नीचे रखा एक कागज़ सबकी नज़र में आया।

उस पर बड़े अक्षरों में लिखा था—

"यदि तुम यह पढ़ रहे हो, तो समझो कि तुमने मुझे समझे बिना मेरे बारे में निर्णय ले लिया था।"

पूरा बरामदा फिर एक बार खामोश हो गया।

दयानाथ ने आगे पढ़ना शुरू किया—

"मेरे संदूक में धन नहीं मिलेगा।धन वहाँ है, जहाँ उसकी सबसे अधिक आवश्यकता थी।यहाँ केवल उसके प्रमाण हैं।"

रामदीन ने आश्चर्य से पूछा—

"प्रमाण? किस बात के?"

दयानाथ ने लाल पोटली खोली।

उसमें पुराने बैंक जमा-पर्चे, कुछ रसीदें और कई छोटे-छोटे कागज़ थे।

लेकिन हर पर्ची पर केवल संकेत लिखे थे—

  • पहली फ़सल

  • स्कूल की फीस

  • दवा

  • बेटी का विवाह

किसी का पूरा नाम नहीं। कोई पूरी तारीख़ नहीं। सब कुछ जैसे जानबूझकर अधूरा छोड़ा गया था।

उसी समय भीड़ में खड़े मास्टर रामविलास की नज़र एक रसीद पर पड़ी।

उन्होंने उसे हाथ में लिया।

उनके चेहरे का रंग बदल गया।

"यह... यह तो मेरे स्कूल की फीस की रसीद है..."

वे काँपती आवाज़ में बोले।

रसीद के पीछे नीली स्याही से एक पंक्ति लिखी थी—

"बच्चे को यह कभी मत बताना कि उसकी फीस किसने भरी। शिक्षा पर नाम नहीं, भविष्य लिखा जाना चाहिए।"

रामविलास की आँखें भर आईं।

उन्होंने धीमे स्वर में कहा—

"तो... वह बच्चा मैं था..."

बरामदे में खड़े लोग स्तब्ध रह गए। जिस व्यक्ति को उन्होंने जीवन भर कठोर और कंजूस समझा, वही किसी बच्चे की पढ़ाई का आधार बना था।

लेकिन रहस्य अभी बाकी था। दयानाथ ने संदूक के सबसे नीचे रखा लकड़ी का छोटा डिब्बा उठाया।

उस पर पीतल की पट्टी जड़ी थी। उसमें केवल तीन शब्द खुदे थे—

"अभी नहीं..."

सरपंच ने उत्सुकता से पूछा—

"इसे क्यों नहीं खोलते?"

दयानाथ ने गंभीर स्वर में कहा—

"शिवनारायण जी की इच्छा थी कि यह डिब्बा तभी खुले, जब इस गाँव का पहला व्यक्ति यह स्वीकार करे कि उसने उन्हें गलत समझा था।"

बरामदे में फिर सन्नाटा छा गया।

कोई कुछ बोल नहीं पाया।

तभी भीड़ के पीछे खड़े रामदीन ने अपनी लाठी ज़मीन पर टिकाई।

उनकी आवाज़ भर्रा गई।

"शायद... सबसे पहले वह आदमी मैं हूँ।"

और उसी क्षण...

वर्षों से बनी धारणाओं में पहली दरार पड़ गई।

क्रमशः...

अगले भाग में पढ़िए: "पहला नाम"

केवल भारतार्थ ख़बर पर प्रकाशित धारावाहिक उपन्यास — मौन दान.


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