धारावाहिक उपन्यास मौन दान (भाग–01)
- Ashok kumar Singh

- 22 जुल॰
- 3 मिनट पठन

वह आदमी जिसे कोई समझ न सका लेखक: अशोक कुमार सिंह
नोट: "मौन दान" एक मौलिक काल्पनिक धारावाहिक उपन्यास है। इसके पात्र, घटनाएँ और स्थान साहित्यिक कल्पना पर आधारित हैं।
सावन की पहली बारिश के बाद... सावन की पहली बारिश थम चुकी थी।
भीगी मिट्टी की सोंधी महक पूरे गाँव में फैल गई थी। पीपल के पुराने पेड़ से टपकती पानी की बूँदें मानो समय की धीमी चाल का संगीत रच रही थीं। दूर मंदिर की घंटी बजी और उसके साथ ही गाँव की सुबह ने आँखें खोल दीं।
लेकिन उस दिन गाँव की हवा में एक अजीब-सी बेचैनी थी।
लोग अपने-अपने घरों के बाहर खड़े होकर एक ही दिशा में देख रहे थे—गाँव के अंतिम छोर पर बने उस पुराने मकान की ओर, जहाँ वर्षों से अकेले रहने वाले शिवनारायण रहते थे। सुबह सूरज निकलने से पहले ही एक खबर पूरे गाँव में फैल चुकी थी—
"शिवनारायण नहीं रहे।"
यह समाचार सुनकर गाँव में शोक से अधिक सन्नाटा था। कुछ चेहरे गंभीर थे, कुछ बिल्कुल निर्विकार।
चौपाल पर बैठे रामदीन ने लंबी साँस भरते हुए कहा—
"अजीब आदमी था... न किसी से हँसकर मिला, न किसी के सुख-दुःख में दिखाई दिया।"
पास बैठे हरिराम ने सहमति में सिर हिलाया।
"इतनी ज़मीन... इतना धन... लेकिन अपने ऊपर भी एक पैसा खर्च नहीं किया।"
एक युवक बोला—
"मरते दम तक वही पुराना कुर्ता पहनता रहा।"
बातों का सिलसिला बढ़ता गया।
किसी ने उसे कंजूस कहा।
किसी ने घमंडी।
किसी ने पत्थरदिल।
लेकिन उन्हीं आवाज़ों के बीच एक स्वर ऐसा भी था, जो अब तक शांत था।
वह थीं जमुना दादी।
उन्होंने धीमे लेकिन दृढ़ स्वर में कहा—
"बेटा... किसी इंसान का हिसाब उसके जीते-जी मत लगाना। कई लोग अपनी पूरी ज़िंदगी का उत्तर अपने जाने के बाद देते हैं।"
चौपाल पर कुछ क्षणों के लिए सन्नाटा छा गया।
उसी समय गाँव की पगडंडी पर धूल उड़ाती एक पुरानी जीप दिखाई दी।
जीप आकर शिवनारायण के घर के सामने रुकी।
उसमें से लगभग साठ वर्ष के एक सज्जन उतरे।
सफ़ेद धोती-कुर्ता, कंधे पर पुराना चमड़े का बैग और चेहरे पर गंभीर संतुलन।
उन्हें देखते ही किसी ने धीरे से कहा—
"अरे... ये तो शहर वाले वकील दयानाथ त्रिपाठी हैं!"
दयानाथ बिना कुछ बोले सीधे घर के भीतर चले गए।
कुछ देर बाद वे बाहर आए और शांत स्वर में बोले—
"शिवनारायण जी ने अपने निधन से पहले मेरे पास एक कानूनी निर्देश छोड़ा था।"
सभी लोग उत्सुकता से उनकी ओर देखने लगे।
उन्होंने अपने बैग से एक मोहरबंद लिफ़ाफ़ा निकाला।
उस पर शिवनारायण की साफ़ लिखावट थी—
"मेरे अंतिम संस्कार से पहले, पूरे गाँव की उपस्थिति में मेरा पुराना संदूक खोला जाए। उसके बिना मेरी अंतिम यात्रा शुरू न की जाए।"
यह पढ़ते ही पूरे गाँव में कानाफूसी शुरू हो गई।
"संदूक?"
"क्या उसमें सोना-चाँदी है?"
"या कोई वसीयत?"
दयानाथ ने किसी प्रश्न का उत्तर नहीं दिया।
उन्होंने केवल इतना कहा—
"इस संदूक में उनके जीवन का वह सच छिपा है, जिसे जाने बिना लोग उन्हें कभी समझ नहीं पाएँगे।"
बरामदे के अँधेरे कोने में रखा वर्षों पुराना सागौन का संदूक अब सबकी निगाहों का केंद्र बन चुका था।
उस पर जंग लगा भारी ताला लटका था।
कमरे में ऐसी खामोशी थी कि छत से टपकती पानी की बूँदों की आवाज़ भी साफ़ सुनाई दे रही थी।
दयानाथ ने अपनी जेब से एक छोटी-सी पीतल की चाबी निकाली...
उन्होंने धीरे-धीरे संदूक की ओर कदम बढ़ाए...
और पूरे गाँव की साँसें जैसे एक साथ थम गईं।
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क्रमशः...
अगला भाग: बंद संदूक और पहली दरार केवल भारतार्थ ख़बर पर।
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