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भारतार्थ – भारतीय राजनीति गहन विचार पर विशेष


रिश्तों की महक "आख़िरी रोटी' (भाग–2)
दिल को छू लेने वाली मौलिक कहानियाँ लेखक: अशोक कुमार सिंह
क्या वर्षों बाद लौटे बेटे अब भी वही थे, जिन्हें कभी माँ अपने हाथों से कौर खिलाकर बड़ा करती थी?
बरईपुर गाँव की उस सुबह में जैसे वर्षों बाद फिर से उत्सव उतर आया था। सरस्वती देवी, जिन्हें पूरा गाँव "अम्मा" कहकर पुकारता था, सूरज निकलने से पहले ही जाग गई थीं। आज उनके तीनों बेटे अपने-अपने परिवार के साथ घर आने वाले थे।
उन्होंने सबसे पहले आँगन में झाड़ू लगाई। फिर गोबर और मिट्टी से आँगन लीपा। तुलसी चौरे पर जल चढ़ाया और हाथ

Ashok kumar Singh
8 अग॰3 मिनट पठन


रिश्तों की महक, 'आख़िरी रोटी" (भाग–1)
जब माँ अपने हिस्से की रोटी भी बच्चों के लिए छोड़ देती है, तब घर केवल मकान नहीं रहता—वह ममता का मंदिर बन जाता है।
उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में बसे एक छोटे-से गाँव बरईपुर की सुबह आज भी पक्षियों की चहचहाहट और मंदिर की घंटियों से जागती थी। गाँव के बीचों-बीच खड़ा बूढ़ा नीम का पेड़ न जाने कितनी पीढ़ियों का साक्षी था। उसी पेड़ से कुछ दूर मिट्टी और ईंटों से बना एक छोटा-सा घर था, जहाँ रहती थीं सरस्वती देवी, जिन्हें पूरा गाँव प्यार से "अम्मा" कहता था।
उम्र पचहत्तर वर्ष के पार पहुँच

Ashok kumar Singh
7 अग॰2 मिनट पठन


माँ की आख़िरी गुल्लक:
लेखक: अशोक कुमार सिंहप्रकाशन: भारतार्थ ख़बर | प्रेरक कथाआज़मगढ़, उत्तर प्रदेश।
कहा जाता है कि धन से जीवन की सुविधाएँ खरीदी जा सकती हैं, लेकिन कठिन समय में इंसान को संभालने का काम केवल रिश्ते, विश्वास और इंसानियत ही करते हैं। प्रस्तुत है एक ऐसी प्रेरक कथा, जो हमें याद दिलाती है कि जीवन की सबसे बड़ी संपत्ति बैंक बैलेंस नहीं, बल्कि अपने लोगों का साथ और उनके दिलों में बसने वाला विश्वास है।
माँ की आख़िरी गुल्लक
शहर के एक बड़े सरकारी अस्पताल के बाहर लगभग सत्तर वर्षीय सरस्वती

Ashok kumar Singh
3 अग॰3 मिनट पठन


रिश्तों की सबसे बड़ी दौलत
सेवा, संवेदना और इंसानियत का अनमोल संदेश✍️ लेखक: अशोक कुमार सिंह
बरसात की हल्की फुहारों के बीच गाँव के बस स्टैंड पर लगभग 70 वर्षीय रामस्वरूप जी अपनी पुरानी छतरी और दवाइयों का छोटा-सा पैकेट लिए बस की प्रतीक्षा कर रहे थे। तभी तेज़ रफ्तार से गुज़री एक बाइक ने सड़क पर भरा पानी उनके ऊपर उछाल दिया। उनके कपड़े भीग गए और वे असहाय होकर वहीं खड़े रह गए।
पास ही चाय की एक छोटी-सी दुकान चलाने वाला 16 वर्षीय मोहन यह दृश्य देखकर दौड़ पड़ा। उसने आदरपूर्वक रामस्वरूप जी को अपनी दुकान के भीतर

Ashok kumar Singh
2 अग॰3 मिनट पठन


धारावाहिक उपन्यास | मौन दान (भाग–11)
विरासत (अंतिम अध्याय) ✍️ लेखक: अशोक कुमार सिंह
क्या किसी इंसान की सबसे बड़ी पहचान उसका नाम होता है, या उसके विचार? पढ़िए "मौन दान" का भावपूर्ण समापन।
विशेष नोट: "मौन दान" एक मौलिक काल्पनिक धारावाहिक उपन्यास है। इसके पात्र, घटनाएँ और स्थान साहित्यिक कल्पना पर आधारित हैं।
पुराना पुस्तकालय खुला, एक विचार ने पूरे गाँव का भविष्य बदल दिया
सुबह की पहली किरणें पुराने प्राथमिक विद्यालय की टूटी हुई खिड़कियों से भीतर उतर रही थीं।
वर्षों से बंद पड़ा पुस्तकालय आज फिर खुलने वाला था।
माधव

Ashok kumar Singh
31 जुल॰3 मिनट पठन


धारावाहिक उपन्यास | मौन दान (भाग–10)
माधव के नाम अंतिम पत्र ✍️ लेखक: अशोक कुमार सिंह
क्या एक पिता का प्रेम शब्दों से बड़ा हो सकता है? पढ़िए "मौन दान" का सबसे भावुक अध्याय।
विशेष नोट: "मौन दान" एक मौलिक काल्पनिक धारावाहिक उपन्यास है। इसके पात्र, घटनाएँ और स्थान साहित्यिक कल्पना पर आधारित हैं।
वर्षों से सीलबंद पत्र खुला, पिता के मौन ने बेटे के जीवन को नई दिशा दे दी
शाम ढल चुकी थी।
पंचायत भवन के बरामदे में रखा पीतल का दीपक शांत लौ के साथ जल रहा था।
उसकी रोशनी के बीच एक सीलबंद लिफ़ाफ़ा मेज़ पर रखा था।
उसी लिफ़ाफ़े प

Ashok kumar Singh
31 जुल॰3 मिनट पठन


धारावाहिक उपन्यास | मौन दान (भाग–09)
बैंक का लॉकर ✍️ लेखक: अशोक कुमार सिंह
क्या एक बैंक लॉकर में केवल धन छिपा था, या जीवनभर की सबसे बड़ी विरासत? पढ़िए "मौन दान" का नौवाँ भाग।
विशेष नोट: "मौन दान" एक मौलिक काल्पनिक धारावाहिक उपन्यास है। इसके पात्र, घटनाएँ और स्थान साहित्यिक कल्पना पर आधारित हैं।
शहर के पुराने बैंक में खुला वर्षों पुराना लॉकर, सामने आई विश्वास की सबसे अनमोल विरासत
अगली सुबह सूरज की पहली किरणों के साथ ही दयानाथ त्रिपाठी, रमेश पाठक, सरपंच, रामदीन और मोहन शहर के लिए रवाना हुए।
पूरे रास्ते जीप में सन

Ashok kumar Singh
30 जुल॰3 मिनट पठन


धारावाहिक उपन्यास | मौन दान (भाग–08)
वसीयत से बड़ा उत्तराधिकार ✍️ लेखक: अशोक कुमार सिंह
नोट: "मौन दान" एक मौलिक काल्पनिक धारावाहिक उपन्यास है। इसके पात्र, घटनाएँ और स्थान साहित्यिक कल्पना पर आधारित हैं।
शिवनारायण की वसीयत ने बदली विरासत की परिभाषा, सामने आया सेवा का असली उत्तराधिकार
बरगद से लौटते समय पूरे गाँव में एक अजीब-सी खामोशी थी।
अब कोई भी शिवनारायण को "कंजूस" नहीं कह रहा था।
लेकिन हर मन में एक ही प्रश्न था—
"बीस साल पहले बनाया गया वह ट्रस्ट आखिर है क्या?"
जब सभी लोग पंचायत भवन पहुँचे, तब तक वहाँ एक सफ

Ashok kumar Singh
29 जुल॰3 मिनट पठन


धारावाहिक उपन्यास | मौन दान (भाग–07)
मोहरबंद बक्सा ✍️ लेखक: अशोक कुमार सिंह
नोट: "मौन दान" एक मौलिक काल्पनिक धारावाहिक उपन्यास है। इसके पात्र, घटनाएँ और स्थान साहित्यिक कल्पना पर आधारित हैं।
मोहरबंद बक्सा खुला, सामने आई एक डायरी... और कहानी ने लिया सबसे बड़ा मोड़
पंचायत भवन की पुरानी दीवार पर लगी घड़ी ने दोपहर के बारह बजाए।
लेकिन वहाँ मौजूद किसी व्यक्ति का ध्यान समय पर नहीं था।
सभी की निगाहें दयानाथ त्रिपाठी के हाथों में पकड़े उस छोटे-से मोहरबंद बक्से पर टिकी थीं।
सागौन की लकड़ी से बना वह पुराना बक्सा वर्ष

Ashok kumar Singh
28 जुल॰3 मिनट पठन


धारावाहिक उपन्यास | मौन दान (भाग–06)
अजनबी की वापसी ✍️ लेखक: अशोक कुमार सिंह
नोट: "मौन दान" एक मौलिक काल्पनिक धारावाहिक उपन्यास है। इसके पात्र, घटनाएँ और स्थान साहित्यिक कल्पना पर आधारित हैं।
एक अजनबी की वापसी ने खोला शिवनारायण के जीवन का नया अध्याय
बरामदे में बैठे लोगों की निगाहें अब उसी अधेड़ व्यक्ति पर टिक गई थीं, जो धीरे-धीरे शिवनारायण के घर की ओर बढ़ रहा था।
उसकी उम्र लगभग साठ वर्ष रही होगी। धूप से तपा चेहरा, सफ़ेद होते बाल और हाथ में वर्षों पुराना चमड़े का बैग।
वह आँगन में पहुँचा।
कुछ क्षण तक चुपचाप शिवना

Ashok kumar Singh
27 जुल॰3 मिनट पठन


धारावाहिक उपन्यास | मौन दान (भाग–05)
तीस वर्ष पुरानी बाढ़ का रहस्य फिर खुला, एक सरकारी पत्र ने बदल दी कहानी की दिशा
डाकिए के जाते ही पूरे बरामदे में फिर से सन्नाटा छा गया।
दयानाथ त्रिपाठी ने सरकारी लिफ़ाफ़े को सावधानी से खोला। कागज़ बिल्कुल नया था, लेकिन उसे पढ़ते ही उनके चेहरे पर वर्षों पुरानी यादों की परछाइयाँ उतर आईं।
सरपंच ने धीमे स्वर में पूछा—
"क्या बात है, वकील साहब?"
दयानाथ ने पत्र को मोड़ा और कुछ क्षण तक चुप रहे।
फिर बोले—"यह ज़िला प्रशासन की ओर से आया है। शिवनारायण जी के नाम दर्ज एक पुरानी सरकारी

Ashok kumar Singh
25 जुल॰3 मिनट पठन


धारावाहिक उपन्यास | मौन दान (भाग–04)
एक तस्वीर... जिसने शिवनारायण की पूरी कहानी बदल दी
बरामदे में फैला सन्नाटा अब भी वैसा ही था।
जमुना दादी की उँगलियाँ उस पुरानी तस्वीर को थामे हुए थीं।
उनकी आँखें तस्वीर पर थीं...
लेकिन मन जैसे पैंतीस वर्ष पीछे लौट चुका था।
दयानाथ ने धीरे से पूछा—
"पहचान लिया आपने?"
जमुना दादी ने गहरी साँस ली।
फिर तस्वीर में मुस्कुराती स्त्री की ओर इशारा करते हुए बोलीं—
"यह गौरी है... शिवनारायण की पत्नी।"

Ashok kumar Singh
24 जुल॰3 मिनट पठन


धारावाहिक उपन्यास | मौन दान (भाग–03)
पहला नाम
एक नाम जिसने वर्षों पुरानी यादों के दरवाज़े खोल दिए...
नोट: "मौन दान" एक मौलिक काल्पनिक धारावाहिक उपन्यास है। इसके पात्र, घटनाएँ और स्थान साहित्यिक कल्पना पर आधारित हैं।
रामदीन के शब्द देर तक हवा में गूँजते रहे—
"सबसे पहले गलती मेरी थी..."
बरामदे में खड़े लोगों ने पहली बार किसी को शिवनारायण के लिए खुले मन से क्षमा माँगते देखा था।
दयानाथ त्रिपाठी ने संदूक का ढक्कन पूरी तरह बंद नहीं किया। उसे आधा खुला छोड़ते हुए उन्होंने कहा—

Ashok kumar Singh
23 जुल॰2 मिनट पठन


धारावाहिक उपन्यास | मौन दान (भाग–02)
रहस्य की पहली परत खुली, लेकिन जवाबों से ज़्यादा सवाल सामने आए...
बरामदे में रखा सागौन का पुराना संदूक वर्षों की धूल से ढका था। उसके लोहे के कुंडों पर जंग की मोटी परत जम चुकी थी। ऐसा लगता था मानो उसने अपने भीतर केवल सामान नहीं, बल्कि समय को भी बंद कर रखा हो।
दयानाथ त्रिपाठी ने अपनी जेब से पीतल की पुरानी चाबी निकाली। कुछ क्षण तक वे उसे हथेली पर देखते रहे।
फिर धीमे स्वर में बोले—

Ashok kumar Singh
22 जुल॰3 मिनट पठन


धारावाहिक उपन्यास मौन दान (भाग–01)
वह आदमी जिसे कोई समझ न सका लेखक: अशोक कुमार सिंह नोट: "मौन दान" एक मौलिक काल्पनिक धारावाहिक उपन्यास है। इसके पात्र, घटनाएँ और स्थान साहित्यिक कल्पना पर आधारित हैं। सावन की पहली बारिश के बाद... सावन की पहली बारिश थम चुकी थी। भीगी मिट्टी की सोंधी महक पूरे गाँव में फैल गई थी। पीपल के पुराने पेड़ से टपकती पानी की बूँदें मानो समय की धीमी चाल का संगीत रच रही थीं। दूर मंदिर की घंटी बजी और उसके साथ ही गाँव की सुबह ने आँखें खोल दीं। लेकिन उस दिन गाँव की हवा में एक अजीब-सी बेचैनी थी। ल

Ashok kumar Singh
22 जुल॰3 मिनट पठन


ईमानदारी की मिसाल: यात्री ने ट्रेन में मिले 50 हजार रुपये रेलवे पुलिस को सौंपे
गुतकल/यादगीर। आंध्रप्रदेश के गुतकल जंक्शन से शुरू हुई एक रेल यात्रा के दौरान एक यात्री ने अपनी ईमानदारी और जिम्मेदारी का परिचय देते हुए मानवता की मिसाल पेश की। गाड़ी संख्या 20953 चेन्नई–अहमदाबाद एक्सप्रेस में सफर कर रहे उम्मेदाराम चौधरी को उनकी सीट के नीचे लावारिस हालत में 50 हजार रुपये की नकदी मिली, जिसे उन्होंने बिना किसी लालच के रेलवे प्रशासन को सौंप दिया।

धन्ना राम चौधरी
30 मार्च2 मिनट पठन
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