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माँ की आख़िरी गुल्लक:

  • लेखक की तस्वीर: Ashok kumar Singh
    Ashok kumar Singh
  • 3 अग॰
  • 3 मिनट पठन

Hindi news-style poster: elderly woman with money jar, hospital team, young man comforting her, and memorial text about faith and care

जब रिश्तों ने बचा ली एक ज़िंदगी रिश्तों की सबसे बड़ी पूँजी प्रेम, विश्वास और इंसानियत है

✍️ लेखक: अशोक कुमार सिंहप्रकाशन: भारतार्थ ख़बर | प्रेरक कथाआज़मगढ़, उत्तर प्रदेश।

कहा जाता है कि धन से जीवन की सुविधाएँ खरीदी जा सकती हैं, लेकिन कठिन समय में इंसान को संभालने का काम केवल रिश्ते, विश्वास और इंसानियत ही करते हैं। प्रस्तुत है एक ऐसी प्रेरक कथा, जो हमें याद दिलाती है कि जीवन की सबसे बड़ी संपत्ति बैंक बैलेंस नहीं, बल्कि अपने लोगों का साथ और उनके दिलों में बसने वाला विश्वास है।


माँ की आख़िरी गुल्लक


शहर के एक बड़े सरकारी अस्पताल के बाहर लगभग सत्तर वर्षीय सरस्वती देवी एक पुरानी लोहे की गुल्लक को सीने से लगाए चुपचाप बैठी थीं। उनकी आँखों में चिंता, चेहरे पर बेबसी और मन में अपने इकलौते बेटे रवि की सलामती की प्रार्थना थी।


अस्पताल के भीतर रवि की हालत गंभीर थी। डॉक्टरों ने स्पष्ट शब्दों में कहा था—

"ऑपरेशन तुरंत करना होगा, नहीं तो देर हो जाएगी।"

ऑपरेशन के लिए दो लाख रुपये चाहिए थे। सरस्वती देवी अपनी दो बीघा ज़मीन बेच चुकी थीं, गहने गिरवी रख चुकी थीं, लेकिन फिर भी पचास हजार रुपये कम पड़ रहे थे।

वे बार-बार अपनी पुरानी गुल्लक को सहला रही थीं। तभी एक युवक ने उनकी उदासी देखी और पूछा—


"माँजी, क्या बात है? आप इतनी परेशान क्यों हैं?"

सरस्वती देवी ने भर्राए गले से कहा—


"बेटा, यह गुल्लक मेरे स्वर्गीय पति की आख़िरी निशानी है। उन्होंने कहा था कि इसे तभी खोलना, जब परिवार पर सबसे बड़ा संकट आए।"


युवक ने धीरे से गुल्लक तोड़ी।

उसमें कुछ सिक्के, कुछ पुराने नोट और एक पत्र निकला।

पत्र में लिखा था—

"सरस्वती, अगर यह गुल्लक कभी खुले तो समझना कि परिवार कठिन समय में है। इसमें बहुत धन नहीं होगा, लेकिन याद रखना— जब अपने साथ हों तो कोई भी इंसान गरीब नहीं होता। रिश्तों से कभी मुँह मत मोड़ना, क्योंकि कठिन समय में वही सबसे बड़ा सहारा बनते हैं।"

पत्र पढ़ते ही सरस्वती देवी की आँखों से आँसू बह निकले।

यह दृश्य देखकर अस्पताल में मौजूद लोग भी भावुक हो गए।

एक शिक्षक ने पाँच हजार रुपये दिए।

एक रिक्शा चालक ने अपनी सामर्थ्य के अनुसार दो हजार रुपये उनकी हथेली पर रख दिए।

एक नर्स ने अपनी एक दिन की तनख्वाह दे दी।

फल विक्रेता ने कहा—


"माँजी, पैसे कम हैं, लेकिन जब तक आप यहाँ हैं, भोजन मेरी ओर से रहेगा।"


कुछ ही देर में यह बात पूरे अस्पताल में फैल गई।

किसी ने सौ रुपये दिए, किसी ने पाँच सौ, किसी ने हजार।

सिर्फ दो घंटे के भीतर ऑपरेशन के लिए पूरी राशि इकट्ठी हो गई।

रवि का सफल ऑपरेशन हुआ।

जब वह स्वस्थ होकर बाहर आया और पूरी घटना सुनी, तो उसकी आँखें भर आईं।

उसने कहा—


"माँ, आज समझ आया कि इंसान की सबसे बड़ी दौलत पैसा नहीं, बल्कि रिश्ते, संस्कार और अच्छे कर्म हैं।"


उस दिन रवि ने प्रण लिया कि वह हर महीने अपनी आय का एक हिस्सा आर्थिक रूप से कमजोर मरीजों की सहायता में लगाएगा। समय बीतता गया।


कुछ वर्षों बाद उसी अस्पताल में 'सरस्वती सहायता कोष' की स्थापना हुई, जहाँ से हजारों जरूरतमंद मरीजों का निःशुल्क इलाज होने लगा। अस्पताल के मुख्य द्वार पर एक शिलालेख लगाया गया, जिस पर लिखा था—

"जिस घर में प्रेम और विश्वास की गुल्लक भरी होती है, वहाँ संकट अकेला नहीं आता; उसके साथ मदद करने वाले भी आ जाते हैं।"

आज भी उस शिलालेख को पढ़कर अनेक लोगों की आँखें नम हो जाती हैं।

भारतार्थ संदेश

धन जीवन की आवश्यकता है, लेकिन जीवन का आधार नहीं।

विश्वास, प्रेम, संवेदना और रिश्ते ही वह पूँजी हैं, जो हर कठिन समय में हमारा साथ निभाती है।

जो व्यक्ति निस्वार्थ भाव से दूसरों की सहायता करता है, समय आने पर पूरा समाज उसके साथ खड़ा दिखाई देता है।

"रिश्तों की गुल्लक में प्रेम और विश्वास जमा करते रहिए, क्योंकि कठिन समय में वही सबसे बड़ी पूँजी बनकर लौटता है।"

✍️ लेखक: अशोक कुमार सिंहप्रकाशक: भारतार्थ ख़बरटैग: प्रेरक कथा, पारिवारिक कहानी, जीवन दर्शन, इंसानियत, रिश्ते, समाज, प्रेरणा, भावनात्मक कहानी, सकारात्मक सोच, भारतार्थ ख़बर


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