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धारावाहिक उपन्यास | मौन दान (भाग–09)

  • लेखक की तस्वीर: Ashok kumar Singh
    Ashok kumar Singh
  • 30 जुल॰
  • 3 मिनट पठन

क्या एक बैंक लॉकर में केवल धन छिपा था, या जीवनभर की सबसे बड़ी विरासत? पढ़िए "मौन दान" का नौवाँ भाग।


Hindi infographic about inheritance, showing men and elders examining a bank locker with old letters, a map, and a key in a dark archive.

बैंक का लॉकर ✍️ लेखक: अशोक कुमार सिंह

विशेष नोट: "मौन दान" एक मौलिक काल्पनिक धारावाहिक उपन्यास है। इसके पात्र, घटनाएँ और स्थान साहित्यिक कल्पना पर आधारित हैं।

शहर के पुराने बैंक में खुला वर्षों पुराना लॉकर, सामने आई विश्वास की सबसे अनमोल विरासत

अगली सुबह सूरज की पहली किरणों के साथ ही दयानाथ त्रिपाठी, रमेश पाठक, सरपंच, रामदीन और मोहन शहर के लिए रवाना हुए।

पूरे रास्ते जीप में सन्नाटा पसरा रहा।

धान के खेत पीछे छूटते जा रहे थे, लेकिन सबके मन में केवल एक ही सवाल था—

आख़िर शिवनारायण के बैंक लॉकर में क्या छिपा है?

करीब दो घंटे बाद वे जनकल्याण सहकारी बैंक पहुँचे।

पुरानी इमारत की दीवारें मानो वर्षों का इतिहास अपने भीतर समेटे खड़ी थीं।

बैंक प्रबंधक ने दयानाथ का स्वागत करते हुए कहा—

"हम पिछले बीस वर्षों से इस दिन का इंतज़ार कर रहे थे।"

रजिस्टर पर हस्ताक्षर करने के बाद सभी लोग बैंक की भूमिगत तिजोरी तक पहुँचे।

मोटा लोहे का दरवाज़ा खुला।

सामने दर्जनों लॉकरों की कतार थी।

बैंक कर्मचारी एक छोटे-से लॉकर के सामने रुका।

उस पर पीतल की पट्टी लगी थी—

लॉकर संख्या – 108

दयानाथ ने काँपते हाथों से चाबी ताले में डाली।

एक हल्की-सी आवाज़ हुई...

और वर्षों से बंद लॉकर खुल गया।

भीतर मखमली कपड़े में लिपटी केवल तीन वस्तुएँ थीं—

  • एक पुरानी जेब-घड़ी,

  • एक कपड़े की थैली,

  • और भूरे रंग की मोटी डायरी।

सरपंच ने कपड़े की थैली खोली।

उसमें कुछ पुराने सिक्के, गौरी की दूसरी चाँदी की पायल और एक छोटी-सी लकड़ी की बाँसुरी रखी थी।

रामदीन ने आश्चर्य से पूछा—

"बस... इतनी ही विरासत?"

दयानाथ ने मुस्कुराकर कहा—

"जिसने जीवन भर साधारण रहकर असाधारण काम किए हों, उसकी विरासत भी साधारण दिखाई देती है।"

उन्होंने डायरी खोली।

पहले पन्ने पर लिखा था—

"यदि यह डायरी खुल गई है, तो समझो मेरा गाँव अब सच सुनने के लिए तैयार है।"

कुछ पन्ने आगे बढ़ते ही एक और पंक्ति सामने आई—

"लोग समझते रहे कि मैंने धन इकट्ठा किया। सच यह है कि मैंने केवल विश्वास जमा किया। धन खर्च होता है, विश्वास बढ़ता है।"

मोहन ध्यान से हर शब्द सुन रहा था।

उसने पूछा—

"क्या हर मदद का पूरा हिसाब इसमें लिखा है?"

दयानाथ ने मुस्कुराकर उत्तर दिया—

"नहीं। शिवनारायण मदद का हिसाब नहीं रखते थे।"

अगले पन्ने पर केवल एक सूची थी—

  • 27 छात्र

  • 14 विधवाएँ

  • 9 किसान

  • 5 अनाथ बच्चे

  • 3 छोटे व्यापारी

लेकिन किसी का नाम नहीं था।

सिर्फ़ कुछ छोटे-छोटे वाक्य—

"अब अपने पैरों पर खड़ा है।"
"अब मुस्कुराती है।"
"कर्ज़ से मुक्त।"
"पहली नौकरी मिली।"

रमेश पाठक की आँखें नम हो गईं।

उन्होंने भावुक होकर कहा—

"उन्होंने कभी यह नहीं लिखा कि कितना धन दिया..."
"उन्होंने केवल यह लिखा कि किसी की ज़िंदगी कहाँ बदल गई।"

उसी समय डायरी से एक मोड़ा हुआ कागज़ नीचे गिरा।

दयानाथ ने उसे उठाया।

उस पर लिखा था—

"यदि कभी गाँव मेरी याद में कुछ बनाना चाहे, तो पुस्तकालय बनाना... क्योंकि भूख एक समय की होती है, लेकिन अज्ञान कई पीढ़ियों की।"

पूरा कमरा कुछ पल के लिए मौन हो गया।

तभी मोहन ने दृढ़ स्वर में कहा—

"मैं शिक्षक बनूँगा... और उस पुस्तकालय में बच्चों को निःशुल्क पढ़ाऊँगा।"

दयानाथ ने उसकी ओर देखा।

उन्हें लगा...

शायद शिवनारायण की सबसे बड़ी विरासत अब किसी भवन में नहीं, बल्कि एक नई पीढ़ी के संकल्प में जन्म ले चुकी है।

इसी बीच बैंक प्रबंधक ने एक सीलबंद लिफ़ाफ़ा दयानाथ के हाथ में दिया।

उस पर स्पष्ट शब्दों में लिखा था—

"इसे केवल माधव के सामने खोला जाए।"

दयानाथ कुछ क्षण तक उस लिफ़ाफ़े को देखते रहे।

फिर उसे सावधानी से अपने बैग में रख लिया।

उन्हें समझ आ गया था—

कहानी अभी समाप्त नहीं हुई थी।

सबसे कठिन सच अब भी उसी सीलबंद लिफ़ाफ़े के भीतर उनका इंतज़ार कर रहा था।

क्रमशः...


अगले भाग में पढ़िए — "माधव के नाम अंतिम पत्र"

क्या उस सीलबंद लिफ़ाफ़े में शिवनारायण का अंतिम संदेश छिपा है? क्या माधव ही उनकी विरासत का असली उत्तराधिकारी बनेगा?

केवल भारतार्थ ख़बर पर प्रकाशित मौलिक धारावाहिक उपन्यास — मौन दान


सन्देश ; - 

अगर आपने इस धारावाहिक उपन्यास के पिछले भाग को नहीं पढ़ा है तो पढ़ें,

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