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धारावाहिक उपन्यास | मौन दान (भाग–07)

  • लेखक की तस्वीर: Ashok kumar Singh
    Ashok kumar Singh
  • 28 जुल॰
  • 3 मिनट पठन
Hindi poster for Mohan Daan, chapter 07, showing villagers around an open chest with books, clock and rose; dark sepia mood.

मोहरबंद बक्सा ✍️ लेखक: अशोक कुमार सिंह

नोट: "मौन दान" एक मौलिक काल्पनिक धारावाहिक उपन्यास है। इसके पात्र, घटनाएँ और स्थान साहित्यिक कल्पना पर आधारित हैं।

मोहरबंद बक्सा खुला, सामने आई एक डायरी... और कहानी ने लिया सबसे बड़ा मोड़

पंचायत भवन की पुरानी दीवार पर लगी घड़ी ने दोपहर के बारह बजाए।

लेकिन वहाँ मौजूद किसी व्यक्ति का ध्यान समय पर नहीं था।

सभी की निगाहें दयानाथ त्रिपाठी के हाथों में पकड़े उस छोटे-से मोहरबंद बक्से पर टिकी थीं।

सागौन की लकड़ी से बना वह पुराना बक्सा वर्षों की यादों को अपने भीतर समेटे हुए था।

किनारों पर पीतल की पट्टियाँ और बीच में लाल मोम की टूटी हुई सील।

सील पर उभरे दो अक्षर—

"म. ग."

दयानाथ ने बक्से पर हाथ फेरा और धीमे स्वर में कहा—

"इस बक्से को खोलने की अनुमति मुझे बहुत पहले मिल गई थी..."
"लेकिन शिवनारायण ने कहा था— जब तक लोग मेरे कर्मों को सुनने न लगें, मेरे दर्द को मत खोलना।"

कमरे में बैठे सभी लोग मौन हो गए।

सरपंच ने विनम्र स्वर में पूछा—

"क्या अब समय आ गया है?"

दयानाथ ने गहरी साँस ली।

"हाँ... अब शायद गाँव सच सुनने के लिए तैयार है।"

उन्होंने सावधानी से मोम हटाई।

बक्से का ढक्कन धीरे-धीरे खुला।

अंदर केवल तीन चीज़ें थीं—

  • एक पुरानी जेब घड़ी,

  • एक सूखा हुआ गुलाब,

  • और भूरे रंग की चमड़े की जिल्द वाली डायरी।

दयानाथ ने डायरी उठाई।

पहले पन्ने पर बड़े अक्षरों में लिखा था—

"यह मेरी नहीं... मेरी अंतरात्मा की गवाही है।"

उन्होंने पहला पन्ना खोला।

स्याही धुंधली पड़ चुकी थी, लेकिन शब्द अब भी स्पष्ट थे।

उन्होंने पढ़ना शुरू किया—

"यदि यह डायरी पढ़ी जा रही है, तो समझिए कि मेरा मौन समाप्त हो चुका है। अब मेरे सच को छिपाने का कोई कारण नहीं बचा।"

उन्होंने अगला पन्ना पलटा।

उसमें लिखा था—

"आज से तीस वर्ष पहले मैं भी इस गाँव के हर युवक की तरह सपने देखता था। मेरे पास धन नहीं था, लेकिन उम्मीद बहुत थी। मुझे लगता था कि मेहनत करने वाला कभी हारता नहीं।"

कुछ क्षण रुककर उन्होंने आगे पढ़ा—

"फिर एक दिन मुझे समझ आया कि इंसान गरीबी से नहीं... अकेलेपन से टूटता है।"

इतना पढ़ते ही दयानाथ ने डायरी बंद कर दी। भीड़ में बेचैनी फैल गई।

कई आवाज़ें एक साथ उठीं—

"आगे पढ़िए..."
"आख़िर हुआ क्या था?"

दयानाथ ने शांत स्वर में कहा—

"नहीं... अभी नहीं।"
"पहले आपको एक ऐसे व्यक्ति से मिलना होगा, जिसके बिना यह कहानी अधूरी है।"

उसी समय पंचायत भवन के बाहर एक पुरानी मोटरसाइकिल आकर रुकी।

लगभग साठ वर्ष का एक साधारण व्यक्ति धीरे-धीरे भीतर आया।

सादा कुर्ता...

धूल से सने जूते...

और चेहरे पर वर्षों का बोझ।

दयानाथ उसे देखते ही खड़े हो गए।

"तुम आ गए... रघुवीर?"

पूरा पंचायत भवन आश्चर्य से भर उठा।

रघुवीर ने शिवनारायण की अर्थी के सामने सिर झुका दिया।

कुछ क्षण तक वह बोल नहीं पाया।

फिर भर्राई आवाज़ में कहा—

"मैं... इस गाँव का सबसे बड़ा अपराधी हूँ।"

पूरा हॉल सन्नाटे में डूब गया।

रघुवीर ने काँपते हुए आगे कहा—

"शिवनारायण ने मेरी एक ऐसी गलती छिपाई थी..."
"...जिसके कारण मुझे पूरी उम्र जेल में भी रहना पड़ सकता था।"

सरपंच ने तुरंत पूछा—

"कौन-सी गलती?"

रघुवीर ने आँखें बंद कर लीं।

"आज से अट्ठाईस साल पहले..."
"नदी किनारे एक दुर्घटना हुई थी..."
"और उसी एक घटना ने शिवनारायण की पूरी ज़िंदगी बदल दी।"

यह सुनते ही दयानाथ ने डायरी का अगला पन्ना खोला।

उस पर केवल एक पंक्ति लिखी थी—

"जिस दिन रघुवीर सच बोल देगा, उसी दिन लोग समझेंगे कि मौन दान केवल धन का नहीं... जीवन का भी हो सकता है।"

रघुवीर की आँखों से आँसू बह निकले।

वह शिवनारायण की अर्थी के पास घुटनों के बल बैठ गया।

धीरे से बोला—

"भाई... अब मैं और चुप नहीं रह सकता।"
"आज मैं सब बता दूँगा..."
"...उस दिन नदी किनारे वास्तव में क्या हुआ था।"

पंचायत भवन में बैठे हर व्यक्ति की धड़कन तेज़ हो चुकी थी।

जिस रहस्य की परछाईं अब तक केवल महसूस हो रही थी...

वह अब शब्दों में सामने आने वाली थी।


क्रमशः...

अगले भाग में पढ़िए — "नदी किनारे का सच"


जहाँ पहली बार उस घटना का खुलासा होगा जिसने शिवनारायण का जीवन हमेशा के लिए बदल दिया।

केवल भारतार्थ ख़बर पर प्रकाशित धारावाहिक उपन्यास — मौन दान


सन्देश ; - 

अगर आपने इस धारावाहिक उपन्यास के पिछले भाग को नहीं पढ़ा है तो पढ़ें,


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