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धारावाहिक उपन्यास | मौन दान (भाग–05)

  • Writer: Ashok kumar Singh
    Ashok kumar Singh
  • 2 days ago
  • 3 min read
Hindi poster of social reform: a man reads a letter by an old chest, with villagers behind, sepia tones, and bold Hindi text.

सरकारी पत्र✍️ लेखक: अशोक कुमार सिंह

नोट: "मौन दान" एक मौलिक काल्पनिक धारावाहिक उपन्यास है। इसके पात्र, घटनाएँ और स्थान साहित्यिक कल्पना पर आधारित हैं।

तीस वर्ष पुरानी बाढ़ का रहस्य फिर खुला, एक सरकारी पत्र ने बदल दी कहानी की दिशा

डाकिए के जाते ही पूरे बरामदे में फिर से सन्नाटा छा गया।

दयानाथ त्रिपाठी ने सरकारी लिफ़ाफ़े को सावधानी से खोला। कागज़ बिल्कुल नया था, लेकिन उसे पढ़ते ही उनके चेहरे पर वर्षों पुरानी यादों की परछाइयाँ उतर आईं।

सरपंच ने धीमे स्वर में पूछा—

"क्या बात है, वकील साहब?"

दयानाथ ने पत्र को मोड़ा और कुछ क्षण तक चुप रहे।

फिर बोले—

"यह ज़िला प्रशासन की ओर से आया है। शिवनारायण जी के नाम दर्ज एक पुरानी सरकारी फ़ाइल दोबारा खोली गई है।"

बरामदे में खड़े लोग एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।

रामदीन ने उत्सुकता से पूछा—

"कौन-सी फ़ाइल?"

दयानाथ ने गहरी साँस लेते हुए उत्तर दिया—

"आज से लगभग तीस वर्ष पहले आई भीषण बाढ़ की फ़ाइल।"

यह सुनते ही कई बुज़ुर्गों के चेहरे गंभीर हो गए।

वह बाढ़, जिसने गाँव की तस्वीर बदल दी थी।

रामदीन की आँखें फैल गईं।

"वही बाढ़... जिसमें कई घर बह गए थे?"

दयानाथ ने सिर हिलाया।

"हाँ... लेकिन उस घटना का एक सच आज तक किसी को पता नहीं था।"

उन्होंने संदूक से एक छोटी कपड़े की थैली निकाली।

उसमें नदी की मिट्टी से सना एक पुराना पीतल का सिक्का, एक टूटी हुई लकड़ी की सीटी और एक पहचान-पत्र रखा था।

पहचान-पत्र पर धुँधले अक्षरों में केवल इतना पढ़ा जा सकता था—

"स्वयंसेवी राहत दल"

सरपंच ने आश्चर्य से पूछा—

"क्या शिवनारायण राहत दल के सदस्य थे?"

दयानाथ ने शांत स्वर में कहा—

"हाँ... लेकिन उन्होंने कभी इसका ज़िक्र नहीं किया।"

जमुना दादी की आँखों में यादों की नमी उतर आई।

उन्होंने कहा—

"अब समझ में आया... उस बाढ़ के बाद कई परिवार अचानक कैसे संभल गए थे।"

दयानाथ ने थैली से एक मुड़ा हुआ कागज़ निकाला।

उस पर शिवनारायण की अपनी लिखावट थी।

उन्होंने पढ़ना शुरू किया—

"जिस दिन मैंने नदी से तीन बच्चों को बाहर निकाला, उसी दिन मैं अपने बेटे तक समय पर नहीं पहुँच सका। लोग कहते हैं कि मैंने दूसरों की जान बचाई, लेकिन मेरे भीतर का पिता आज तक खुद को माफ़ नहीं कर पाया।"

पूरा बरामदा मौन हो गया।

अब पहली बार लोगों को एहसास हुआ कि शिवनारायण की चुप्पी घमंड नहीं थी...

वह एक ऐसा घाव था, जो समय के साथ भी कभी नहीं भर सका।

रामविलास की आँखें नम हो गईं।

उन्होंने धीमे स्वर में पूछा—

"तो इसलिए... वे हर साल बाढ़ आने से पहले स्कूल में अनाज और दवाइयाँ भिजवाते थे?"

दयानाथ ने उत्तर दिया—

"हाँ। वे हर उस दर्द को रोकना चाहते थे, जिसे वे स्वयं नहीं रोक पाए थे।"

तभी बाहर साइकिल की घंटी सुनाई दी।

गाँव का चौकीदार तेज़ी से आँगन में पहुँचा।

"सरपंच जी... शहर से एक सज्जन आए हैं।"
"वे कहते हैं कि उन्हें शिवनारायण जी से मिलना था।"

सरपंच ने धीमे स्वर में कहा—

"उन्हें बता दो... शिवनारायण अब इस दुनिया में नहीं रहे।"

चौकीदार ने सिर झुका लिया।

फिर बोला—

"मैंने बताया था... लेकिन उन्होंने कहा—"
"मैं बहुत देर से आया हूँ... फिर भी मुझे उस संदूक तक ज़रूर ले चलिए। उसमें शायद मेरा भी अतीत बंद है।"

बरामदे में खड़े सभी लोगों की नज़र एक साथ दरवाज़े की ओर उठ गई।

दूर धूल भरी पगडंडी पर एक अधेड़ व्यक्ति धीरे-धीरे गाँव की ओर बढ़ रहा था।

उसके हाथ में पुराना चमड़े का बैग था...

और आँखों में वर्षों की तलाश।

क्रमशः...

अगले भाग में पढ़िए — "अजनबी की वापसी"

📚 केवल भारतार्थ ख़बर पर प्रकाशित धारावाहिक उपन्यास — मौन दान


अगर आप इसके पिछले भाग को नहीं पड़े हो तो अभी पढ़ें,


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