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धारावाहिक उपन्यास | मौन दान (भाग–06)

  • लेखक की तस्वीर: Ashok kumar Singh
    Ashok kumar Singh
  • 27 जुल॰
  • 3 मिनट पठन
Sepia Hindi poster of villagers around an old chest; man offers a book, family photo, and text about money and relationships.

अजनबी की वापसी ✍️ लेखक: अशोक कुमार सिंह

नोट: "मौन दान" एक मौलिक काल्पनिक धारावाहिक उपन्यास है। इसके पात्र, घटनाएँ और स्थान साहित्यिक कल्पना पर आधारित हैं।

एक अजनबी की वापसी ने खोला शिवनारायण के जीवन का नया अध्याय

बरामदे में बैठे लोगों की निगाहें अब उसी अधेड़ व्यक्ति पर टिक गई थीं, जो धीरे-धीरे शिवनारायण के घर की ओर बढ़ रहा था।

उसकी उम्र लगभग साठ वर्ष रही होगी। धूप से तपा चेहरा, सफ़ेद होते बाल और हाथ में वर्षों पुराना चमड़े का बैग।

वह आँगन में पहुँचा।

कुछ क्षण तक चुपचाप शिवनारायण की अर्थी के सामने खड़ा रहा।

फिर सिर झुकाकर मौन श्रद्धांजलि दी।

बरामदे में गहरा सन्नाटा छा गया।

दयानाथ त्रिपाठी आगे बढ़े।

"आप...?"

अजनबी ने अपनी जेब से एक पुराना पहचान-पत्र निकाला।

"मेरा नाम रमेश पाठक है।"
"मैं पहले जिला अस्पताल में कम्पाउंडर था।"
"और शायद... इस गाँव में मुझे कोई नहीं पहचानता।"

दयानाथ ने गौर से उनका चेहरा देखा।

अचानक उनके चेहरे पर पहचान की झलक उभरी।

"रमेश...! क्या तुम वही हो?"

रमेश ने हल्की मुस्कान के साथ सिर झुका दिया।

"हाँ, दयानाथ जी... बहुत वर्षों बाद लौट पाया हूँ।"

गाँव वाले उत्सुक हो उठे।

सरपंच ने पूछा—

"आपका शिवनारायण जी से क्या संबंध था?"

रमेश ने गहरी साँस ली।

"रिश्ता खून का नहीं था..."
"...लेकिन मैं उनका सबसे बड़ा कर्ज़दार हूँ।"

यह सुनकर बरामदे में बैठे लोग एक-दूसरे की ओर देखने लगे।

रमेश ने अपना पुराना चमड़े का बैग खोला।

उसमें से एक पुरानी डायरी निकाली, जिसके पन्ने समय के साथ पीले पड़ चुके थे।

उन्होंने वह डायरी दयानाथ को सौंपते हुए कहा—

"यह मुझे शिवनारायण जी ने पंद्रह वर्ष पहले दी थी।"
"उन्होंने कहा था— यदि मैं कभी अपने गाँव लौट न सकूँ, तो इसे मेरी मृत्यु के बाद ही खोलना।"

दयानाथ ने सावधानी से डायरी खोली।

पहले पन्ने पर केवल एक वाक्य लिखा था—

"हर इंसान का एक ऐसा सच होता है, जिसे वह दुनिया से नहीं, स्वयं से छिपाता है।"

उन्होंने अगला पन्ना पलटा।

वहाँ एक अस्पताल का बिल रखा था।

मरीज़ का नाम—

रमेश पाठक।

जमा करने वाले का नाम—

रिक्त।

लेकिन अस्पताल की मुहर के पास दयानाथ की अपनी लिखावट थी—

"राशि प्राप्त।"

रमेश की आँखें भर आईं।

उन्होंने भर्राए स्वर में कहा—

"पंद्रह साल पहले मेरे दिल का ऑपरेशन होना था।"
"मेरे पास पैसे नहीं थे।"
"मैंने इलाज छोड़ने का निर्णय कर लिया था।"
"लेकिन अगले दिन डॉक्टर ने कहा— तुम्हारा पूरा खर्च जमा हो चुका है।"
"मैंने बहुत पूछा कि किसने मदद की..."
"लेकिन किसी ने नाम नहीं बताया।"

उन्होंने शिवनारायण की अर्थी की ओर देखा।

"दो साल बाद मुझे पता चला..."
"...वह इंसान शिवनारायण थे।"

बरामदे में बैठे कई लोगों ने अनायास अपने सिर झुका लिए।

रामदीन की आवाज़ भर्रा गई।

"हमने जिनके लिए कभी एक अच्छा शब्द नहीं कहा..."
"...वे चुपचाप सबके लिए जीते रहे।"

उसी समय दयानाथ की नज़र डायरी के अंतिम पन्ने पर गई।

वहाँ गाँव के बाहर स्थित पुराने आम के बाग़ का एक हाथ से बना नक्शा था।

नक्शे के नीचे केवल एक पंक्ति लिखी थी—

"यदि कभी सच अधूरा लगे, तो उस बरगद के पास आना... जहाँ मैंने पहली बार 'मौन दान' का संकल्प लिया था।"

दयानाथ ने नक्शा सबके सामने रखा।

जमुना दादी की आँखें फैल गईं।

"वह बरगद..."
"वहाँ तो वर्षों से कोई नहीं गया।"

दयानाथ ने दृढ़ स्वर में कहा—

"कल सुबह हम सब वहीं चलेंगे।"
"मुझे विश्वास है कि शिवनारायण ने अपनी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय वहीं हमारे लिए छोड़ रखा है।"

बरामदे में बैठे लोगों के चेहरों पर पहली बार केवल जिज्ञासा नहीं, सम्मान भी दिखाई दे रहा था।

अब वे किसी संदूक का रहस्य नहीं...

एक इंसान के पूरे जीवन का सच जानना चाहते थे।

और शायद...

यही शिवनारायण की सबसे बड़ी जीत थी।

क्रमशः...

अगले भाग में पढ़िए — "बरगद के नीचे"

जहाँ पहली बार सामने आएगा "मौन दान" के संकल्प का वास्तविक कारण और शिवनारायण के जीवन का सबसे बड़ा रहस्य।

केवल भारतार्थ ख़बर पर प्रकाशित धारावाहिक उपन्यास — मौन दान

सन्देश ; -

अगर आपने इस धारावाहिक उपन्यास के पिछले भाग को नहीं पढ़ा है तो पढ़ें,


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