धारावाहिक उपन्यास | मौन दान (भाग–03)
- Ashok kumar Singh

- 23 जुल॰
- 2 मिनट पठन

पहला नाम
एक नाम जिसने वर्षों पुरानी यादों के दरवाज़े खोल दिए...
नोट: "मौन दान" एक मौलिक काल्पनिक धारावाहिक उपन्यास है। इसके पात्र, घटनाएँ और स्थान साहित्यिक कल्पना पर आधारित हैं।
रामदीन के शब्द देर तक हवा में गूँजते रहे—
"सबसे पहले गलती मेरी थी..."
बरामदे में खड़े लोगों ने पहली बार किसी को शिवनारायण के लिए खुले मन से क्षमा माँगते देखा था।
दयानाथ त्रिपाठी ने संदूक का ढक्कन पूरी तरह बंद नहीं किया। उसे आधा खुला छोड़ते हुए उन्होंने कहा—
"सच कभी एक साथ सामने नहीं आता। उसकी भी अपनी गति होती है।"
उन्होंने लाल कपड़े की पोटली से एक पुरानी कॉपी निकाली। यह डायरी नहीं थी।
उसके पहले पन्ने पर केवल एक शब्द लिखा था—
"विश्वास"
न कोई नाम...
न कोई तारीख़...
सिर्फ़ एक वाक्य—
"जिस दिन किसी की मदद के बदले धन्यवाद सुनने की इच्छा मर जाती है, उसी दिन दान जन्म लेता है।"
पूरा बरामदा फिर शांत हो गया। दयानाथ ने अगला पन्ना खोला।
इस बार वहाँ केवल एक नाम लिखा था—
रामविलास
मास्टर रामविलास स्तब्ध रह गए।
"मैं...?"
दयानाथ ने धीरे से पूछा—
"क्या आपको 1989 की वह बरसात याद है?"
क्षण भर में रामविलास का मन पैंतीस वर्ष पीछे लौट गया।
लगातार बारिश...
बीमार पिता...
घर में अनाज नहीं...
और स्कूल की फीस जमा न होने के कारण पढ़ाई छूटने का डर।
उस रात उन्होंने अपनी माँ को पहली बार चुपचाप रोते देखा था।
लेकिन अगली सुबह घर के दरवाज़े पर एक पुराना लिफाफा मिला।
उसमें पूरी फीस रखी थी। कोई नाम नहीं। कोई परिचय नहीं।
सिर्फ़ एक पंक्ति—
"पढ़ाई मत छोड़ना। किसी दिन किसी और बच्चे को पढ़ा देना।"
वर्तमान में लौटते ही रामविलास की आँखें भर आईं।
उन्होंने काँपती आवाज़ में कहा—
"अगर उस दिन वह लिफाफा नहीं मिलता... तो मैं कभी शिक्षक नहीं बन पाता।"
दयानाथ ने कॉपी बंद करते हुए कहा—
"एक छोटी-सी मदद कई पीढ़ियों का भविष्य बदल सकती है।"
उसी समय तेज़ हवा का झोंका आया।
बरामदे के कोने में रखी एक पुरानी तस्वीर ज़मीन पर गिर पड़ी।
जमुना दादी ने तस्वीर उठाई।
कुछ पल उसे देखती रहीं...
फिर उनके होंठ काँप उठे—
"अरे... यह तो..."
दयानाथ उनकी ओर देखकर बोले—
"हाँ दादी... अब समय आ गया है कि गाँव उस परिवार को भी जाने, जिसे उसने कभी जानने की कोशिश ही नहीं की।"
बरामदे में फिर सन्नाटा छा गया।
लेकिन इस बार वह सन्नाटा आरोपों का नहीं...
एक नए सच की प्रतीक्षा का था।
आपने अगर इस पहले की कहानी नहीं पढ़ी तो पढ़ें
क्रमशः...
अगले भाग में पढ़िए:
_edited.jpg)



टिप्पणियां