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रिश्तों की सबसे बड़ी दौलत

  • लेखक की तस्वीर: Ashok kumar Singh
    Ashok kumar Singh
  • 2 अग॰
  • 3 मिनट पठन
Hindi poster about humane relationships: tea stall elder and boy, rainy scenes, doctor and children, and author Ashok Kumar Singh.

सेवा, संवेदना और इंसानियत का अनमोल संदेश✍️ लेखक: अशोक कुमार सिंह

बरसात की हल्की फुहारों के बीच गाँव के बस स्टैंड पर लगभग 70 वर्षीय रामस्वरूप जी अपनी पुरानी छतरी और दवाइयों का छोटा-सा पैकेट लिए बस की प्रतीक्षा कर रहे थे। तभी तेज़ रफ्तार से गुज़री एक बाइक ने सड़क पर भरा पानी उनके ऊपर उछाल दिया। उनके कपड़े भीग गए और वे असहाय होकर वहीं खड़े रह गए।

पास ही चाय की एक छोटी-सी दुकान चलाने वाला 16 वर्षीय मोहन यह दृश्य देखकर दौड़ पड़ा। उसने आदरपूर्वक रामस्वरूप जी को अपनी दुकान के भीतर बैठाया, तौलिया दिया और बिना कुछ पूछे अदरक वाली गरम चाय बनाकर उनके सामने रख दी।


जब रामस्वरूप जी ने चाय के पैसे देने चाहे, तो मोहन मुस्कुराकर बोला, "बाबा, दादा से भी कोई पैसे लेता है क्या? मेरे पिता कहते थे कि बुज़ुर्गों की सेवा में कमाई नहीं, दुआ मिलती है।"


यह सुनकर रामस्वरूप जी की आँखें नम हो गईं। बातचीत के दौरान उन्होंने मोहन से उसके पिता के बारे में पूछा। कुछ पल चुप रहने के बाद मोहन बोला, "चार वर्ष पहले सड़क दुर्घटना में उनका निधन हो गया। उस दिन कई लोग तमाशा देखते रहे, लेकिन कोई उन्हें अस्पताल नहीं ले गया। तभी मैंने निश्चय किया कि मेरे सामने कोई भी ज़रूरतमंद होगा तो मैं उसे अपना समझकर मदद करूँगा।"


इसी बीच एक कार वहाँ रुकी। उसमें बैठे एक संपन्न व्यापारी ने मोहन से जल्दी चाय लाने को कहा। मोहन ने पहले रामस्वरूप जी को दवा खाने के लिए गरम पानी दिया और फिर व्यापारी की चाय तैयार की।


व्यापारी नाराज़ होकर बोला, "ग्राहक की कोई कीमत नहीं?"

मोहन ने विनम्रता से उत्तर दिया, "साहब, ग्राहक बाद में हैं, पहले इंसान हैं। ये मेरे बाबा जैसे हैं।"

व्यापारी चुप रह गया।


कुछ महीनों बाद उसी व्यापारी की फैक्ट्री में भीषण आग लग गई। करोड़ों रुपये का नुकसान हुआ और आर्थिक संकट गहरा गया। एक दिन उसी गाँव से गुजरते समय उसकी कार खराब हो गई। तेज़ बारिश शुरू हो चुकी थी।

वही सड़क... वही चाय की दुकान... और वही मोहन...


मोहन ने बिना किसी संकोच के उन्हें छाता दिया, पानी पिलाया और मैकेनिक बुलाकर उनकी सहायता की।

व्यापारी ने आश्चर्य से पूछा, "तुमने मुझे पहचान लिया था, फिर भी मेरी मदद क्यों की?"

मोहन मुस्कुराया और बोला, "मेरे पिता कहते थे कि इंसान का व्यवहार उसका परिचय होता है, सामने वाले का नहीं। अगर मैं भी आपके जैसा व्यवहार करूँ, तो मुझमें और आपमें क्या अंतर रहेगा?"

इन शब्दों ने व्यापारी का हृदय बदल दिया।


अगले ही दिन उसने गाँव के गरीब बच्चों की शिक्षा के लिए छात्रवृत्ति शुरू की, बुज़ुर्गों के लिए निःशुल्क स्वास्थ्य शिविर लगाने का निर्णय लिया और मोहन की पढ़ाई का पूरा खर्च अपने ऊपर ले लिया।


जब उसने यह बात मोहन को बताई, तो मोहन भावुक होकर बोला, "साहब, आपने मुझे कुछ नहीं दिया, बल्कि मेरे पिता का अधूरा सपना पूरा कर दिया।"


व्यापारी की आँखों से आँसू बह निकले। उसने कहा, "आज समझ आया कि असली दौलत बैंक के खाते में नहीं, लोगों के दिलों में जमा होती है।"


वर्षों बाद मोहन एक सफल डॉक्टर बना। उसने अपने अस्पताल के प्रवेश द्वार पर एक पंक्ति लिखवाई—

"यहाँ इलाज केवल शरीर का नहीं, रिश्तों और इंसानियत का भी होता है।"

आज भी उस गाँव के लोग गर्व से कहते हैं—


"जिस बच्चे ने निस्वार्थ सेवा करना सीखा, उसी ने पूरे समाज को इंसानियत का सच्चा अर्थ सिखा दिया।"


आज के समय में जब रिश्ते अक्सर स्वार्थ और लाभ-हानि के तराज़ू पर तौले जाने लगे हैं, यह कहानी हमें याद दिलाती है कि समाज की वास्तविक शक्ति धन नहीं, बल्कि संवेदनाएँ, सेवा और अपनापन हैं।

जो व्यक्ति निस्वार्थ भाव से दूसरों का हाथ थामता है, समय आने पर उसके लिए हजारों हाथ स्वयं उठ खड़े होते हैं। रिश्ते खरीदे नहीं जाते, उन्हें प्रेम, सम्मान और त्याग से निभाया जाता है।


संदेश


"इंसानियत से बड़ा कोई धर्म नहीं और रिश्तों से बड़ी कोई संपत्ति नहीं। जिस घर में त्याग, सम्मान और अपनापन बसता है, वहाँ सुख अपने आप रास्ता खोज लेता है।" ✍️ लेखक: अशोक कुमार सिंह


केवल भारतार्थ ख़बर पर प्रकाशित मौलिक धारावाहिक उपन्यास — मौन दान

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