धारावाहिक उपन्यास | मौन दान (भाग–08)
- Ashok kumar Singh

- 29 जुल॰
- 3 मिनट पठन

वसीयत से बड़ा उत्तराधिकार ✍️ लेखक: अशोक कुमार सिंह
नोट: "मौन दान" एक मौलिक काल्पनिक धारावाहिक उपन्यास है। इसके पात्र, घटनाएँ और स्थान साहित्यिक कल्पना पर आधारित हैं।
शिवनारायण की वसीयत ने बदली विरासत की परिभाषा, सामने आया सेवा का असली उत्तराधिकार
बरगद से लौटते समय पूरे गाँव में एक अजीब-सी खामोशी थी।
अब कोई भी शिवनारायण को "कंजूस" नहीं कह रहा था।
लेकिन हर मन में एक ही प्रश्न था—
"बीस साल पहले बनाया गया वह ट्रस्ट आखिर है क्या?"
जब सभी लोग पंचायत भवन पहुँचे, तब तक वहाँ एक सफ़ेद जीप आकर रुक चुकी थी।
जीप के पास दो लोग महत्वपूर्ण फाइलें सँभाले खड़े थे।
उनमें से एक आगे बढ़ा और बोला—
"मेरा नाम अनिल सक्सेना है। मैं जनकल्याण सहकारी बैंक से आया हूँ।"
उन्होंने दयानाथ त्रिपाठी को एक मोटी फाइल सौंपते हुए कहा—
"शिवनारायण जी के निधन की सूचना मिलते ही हमें यह फाइल खोलने का निर्देश था।"
दयानाथ ने सावधानी से फाइल खोली।
सबसे ऊपर शिवनारायण के हस्ताक्षर थे।
उनके नीचे लिखा था—
"यह संपत्ति किसी व्यक्ति की नहीं... एक विचार की है।"
सरपंच ने उत्सुकता से पूछा—
"क्या इसमें उनकी ज़मीन-जायदाद का बँटवारा लिखा है?"
अनिल सक्सेना हल्का मुस्कुराए।
"नहीं..."
"यह ज़मीन बाँटने की नहीं... ज़िम्मेदारी बाँटने की वसीयत है।"
पूरा पंचायत भवन एक बार फिर शांत हो गया।
दयानाथ ने दस्तावेज़ पढ़ना शुरू किया—
"यदि मेरे बाद कोई पूछे कि मेरा उत्तराधिकारी कौन है, तो उससे कहना— जिसने बिना किसी स्वार्थ के किसी अजनबी का दुःख कम किया हो, वही मेरा वास्तविक उत्तराधिकारी है।"
इन शब्दों ने उपस्थित हर व्यक्ति को भीतर तक झकझोर दिया।
कई लोगों ने अनायास अपना सिर झुका लिया।
कुछ देर बाद अनिल सक्सेना ने फाइल से एक और दस्तावेज़ निकाला।
वह गाँव का हाथ से बनाया गया नक्शा था।
नक्शे पर पाँच स्थान लाल रंग से चिन्हित थे—
प्राथमिक विद्यालय
पुराना कुआँ
पंचायत भवन
स्वास्थ्य केंद्र
नदी का घाट
मास्टर रामविलास ने पूछा—
"इन पाँच स्थानों का क्या महत्व है?"
दयानाथ ने दस्तावेज़ पढ़ते हुए कहा—
"यहीं सबसे अधिक ज़रूरतमंद लोग आते हैं। यदि मेरी निधि का उपयोग करना, तो सबसे पहले इन्हीं स्थानों से शुरुआत करना।"
यह सुनते ही रमेश पाठक की आँखें भर आईं।
उन्होंने धीमे स्वर में कहा—
"अब समझ में आया..."
"उन्होंने कभी इमारतें बनाने की बात क्यों नहीं की।"
"वे इंसानों में निवेश करते थे... पत्थरों में नहीं।"
उसी समय पीछे बैठे एक युवक ने संकोच से हाथ उठाया।
वह था गाँव का स्नातक छात्र मोहन।
उसने पूछा—
"यदि यह ट्रस्ट सचमुच ज़रूरतमंदों के लिए है..."
"...तो क्या मैं भी इसमें सेवा कर सकता हूँ?"
दयानाथ पहली बार मुस्कुराए।
उन्होंने कहा—
"यही तो शिवनारायण चाहते थे।"
"यह ट्रस्ट किसी परिवार की विरासत नहीं..."
"...हर उस व्यक्ति की विरासत है, जो सेवा को सम्मान से बड़ा मानता है।"
इतने में अनिल सक्सेना ने फाइल से एक छोटी-सी पीतल की चाबी निकाली।
उस पर एक पट्टी लगी थी—
"कक्ष – 3"
सरपंच ने आश्चर्य से पूछा—
"यह किसकी चाबी है?"
अनिल ने उत्तर दिया—
"शहर के पुराने बैंक लॉकर की।"
"शिवनारायण जी का स्पष्ट निर्देश था कि यह लॉकर तभी खोला जाए, जब गाँव के लोग उनके जीवन का सच जान लें।"
दयानाथ ने चाबी अपनी हथेली में ली।
उन्हें लगा जैसे शिवनारायण मृत्यु के बाद भी एक अंतिम परीक्षा छोड़ गए हों।
उन्होंने उपस्थित सभी लोगों की ओर देखा और दृढ़ स्वर में कहा—
"कल सुबह हम शहर जाएँगे।"
"मुझे विश्वास है कि उस लॉकर में धन से कहीं अधिक मूल्यवान कोई सच हमारा इंतज़ार कर रहा है।"
बाहर फिर हल्की बारिश शुरू हो चुकी थी।
लेकिन इस बार किसी का ध्यान बारिश पर नहीं था।
सभी की निगाहें उस छोटी-सी चाबी पर टिकी थीं...
जो शायद शिवनारायण के जीवन का अंतिम बंद दरवाज़ा खोलने वाली थी।
क्रमशः...
अगले भाग में पढ़िए — "बैंक का लॉकर"
क्या बैंक लॉकर में छिपा है शिवनारायण के जीवन का अंतिम रहस्य? क्या उनकी सबसे बड़ी विरासत धन थी, या कोई ऐसा निर्णय जिसने पूरे गाँव का भविष्य बदल दिया?
केवल भारतार्थ ख़बर पर प्रकाशित धारावाहिक उपन्यास — मौन दान।
सन्देश ; -
अगर आपने इस धारावाहिक उपन्यास के पिछले भाग को नहीं पढ़ा है तो पढ़ें,
भाग 6
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