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रिश्तों की महक, 'आख़िरी रोटी" (भाग–1)

  • लेखक की तस्वीर: Ashok kumar Singh
    Ashok kumar Singh
  • 7 अग॰
  • 2 मिनट पठन

अपडेट करने की तारीख: 8 अग॰

Poster with elderly woman cooking roti on a wood stove at sunset, Hindi text and a man’s portrait, warm village scene.

दिल को छू लेने वाली मौलिक कहानियाँ लेखक: अशोक कुमार सिंह


जब माँ अपने हिस्से की रोटी भी बच्चों के लिए छोड़ देती है, तब घर केवल मकान नहीं रहता—वह ममता का मंदिर बन जाता है।

उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में बसे एक छोटे-से गाँव बरईपुर की सुबह आज भी पक्षियों की चहचहाहट और मंदिर की घंटियों से जागती थी। गाँव के बीचों-बीच खड़ा बूढ़ा नीम का पेड़ न जाने कितनी पीढ़ियों का साक्षी था। उसी पेड़ से कुछ दूर मिट्टी और ईंटों से बना एक छोटा-सा घर था, जहाँ रहती थीं सरस्वती देवी, जिन्हें पूरा गाँव प्यार से "अम्मा" कहता था।

उम्र पचहत्तर वर्ष के पार पहुँच चुकी थी। कमर झुक गई थी, हाथ काँपने लगे थे, लेकिन चेहरे की ममता आज भी वैसी ही थी जैसी बरसों पहले थी। उनकी आँखों की रोशनी भले कम हो गई थी, पर अपने बच्चों के कदमों की आहट वे आज भी पहचान लेती थीं।

अम्मा के तीन बेटे थे—राघव, मोहन और सुरेश। तीनों पढ़-लिखकर शहरों में बस चुके थे। किसी के पास बड़ा बंगला था, किसी के पास कारोबार और किसी के पास ऊँची नौकरी। लेकिन जिस घर ने उन्हें चलना सिखाया था, वहाँ अब केवल अम्मा और उनकी यादें रह गई थीं।

गाँव वाले अक्सर कहते—

"अम्मा, अब शहर चली जाइए। वहाँ आराम रहेगा।"

अम्मा हर बार मुस्कुरा देतीं।

"जिस आँगन में मेरे बच्चों ने पहला कदम रखा, उसी आँगन में मेरी आख़िरी साँस भी निकले, इससे बड़ा सुख क्या होगा?"

यह कहते हुए उनकी नज़र बरामदे में पड़े उस पुराने लकड़ी के झूले पर टिक जाती, जिसे उनके स्वर्गीय पति रामनाथ ने अपने हाथों से बनाया था।

उस दिन दोपहर में डाकिया एक चिट्ठी देकर गया।

काँपते हाथों से अम्मा ने लिफ़ाफ़ा खोला।

चिट्ठी बड़े बेटे राघव की थी—

"अम्मा, इस रविवार हम तीनों भाई अपने-अपने परिवार के साथ गाँव आ रहे हैं। बहुत दिन हो गए, आपके हाथ की रोटी खाए।"

बस इतना पढ़ना था कि अम्मा की आँखों से खुशी के आँसू छलक पड़े।

उन्होंने उसी समय घर की सफ़ाई शुरू कर दी। आँगन लीपा, पुराने पीतल के बर्तन चमकाए और बरसों बाद मिट्टी के चूल्हे को फिर से सजाया।

उन्हें क्या पता था...

कि इसी चूल्हे पर सिकने वाली एक आख़िरी रोटी आने वाले कुछ घंटों में पूरे परिवार को आईना दिखाने वाली थी।

क्रमशः…

कल पढ़िए: क्या वर्षों बाद एक साथ बैठा परिवार सचमुच पहले जैसा था, या रिश्तों की गर्माहट कहीं खो चुकी थी?

✍️ लेखक: अशोक कुमार सिंह , प्रकाशक: भारतार्थ ख़बर . प्रेरक कथा, पारिवारिक कहानी, जीवन दर्शन, इंसानियत, रिश्ते, समाज, प्रेरणा, भावनात्मक कहानी, सकारात्मक सोच, भारतार्थ ख़बर


केवल भारतार्थ ख़बर पर प्रकाशित मौलिक धारावाहिक एउपन्यास — मौन दान

      एक दिल दहलाने वाली कहानी धारावाहिक उपन्यास जरूर पढ़ि

अगर आपने इस धारावाहिक उपन्यास के पिछले भाग को नहीं पढ़ा है तो पढ़ें,


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