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सूखी जमीन में उम्मीद

  • लेखक की तस्वीर: Ashok kumar Singh
    Ashok kumar Singh
  • 26 अग॰
  • 3 मिनट पठन
मरुस्थलीय कुएँ में दो पुरुष खुदाई कर रहे हैं, ऊपर लोग देख रहे हैं; पास ऊँट, गायें और पेड़, धूप भरा ग्रामीण दृश्य।

भारतार्थ खबर, Bhaarataarth.com लेखक: अशोक कुमार सिंह राजस्थान के एक छोटे से गांव केसरपुर की यह कहानी केवल एक किसान की मेहनत की कहानी नहीं, बल्कि विपरीत परिस्थितियों में उम्मीद, धैर्य और सामूहिक प्रयास की ताकत का संदेश देती है।


केसरपुर में गोविंद नाम का एक साधारण किसान रहता था। उसके पास थोड़ी जमीन, एक पुराना कुआं और मिट्टी से बना छोटा सा घर था। सीमित साधनों के बावजूद वह मेहनत और धैर्य के साथ जीवन जी रहा था। लेकिन एक वर्ष गांव में बारिश बेहद कम हुई। खेतों में दरारें पड़ गईं, तालाब सूख गया और कुओं का जलस्तर लगातार नीचे जाने लगा।


जल संकट बढ़ा तो गांव के कई परिवारों ने रोजी-रोटी के लिए शहर जाने का निर्णय लेना शुरू कर दिया। गोविंद का पड़ोसी मोहन भी परिवार सहित गांव छोड़ने की तैयारी में था। उसने गोविंद से कहा कि जब खेत और पानी दोनों साथ नहीं हैं तो गांव में रुकने का क्या फायदा।


गोविंद ने सूखी मिट्टी को हाथ में लेकर जवाब दिया कि मिट्टी कभी बेकार नहीं होती। कई बार परिस्थितियां इंसान की परीक्षा लेती हैं और उसी परीक्षा से उसकी वास्तविक क्षमता सामने आती है। उसका विश्वास था कि उम्मीद केवल अच्छे हालात में नहीं, बल्कि कठिन समय में हिम्मत बनाए रखने से पैदा होती है।


अगली सुबह गोविंद ने अपने खेत के एक कोने में खुदाई शुरू कर दी। ग्रामीणों ने उसका मजाक उड़ाया। किसी ने इसे व्यर्थ की मेहनत बताया तो किसी ने कहा कि सूखी जमीन में पानी तलाशना असंभव है। लेकिन गोविंद बिना किसी विवाद में पड़े सुबह से शाम तक फावड़ा चलाता रहा।


कई दिन बीत गए। पानी का कोई संकेत नहीं मिला। उसका बेटा अर्जुन भी निराश होकर पिता से काम छोड़ने के लिए कहने लगा। गोविंद ने उसे समझाया कि प्रयास छोड़ने से पहले यह देखना जरूरी है कि हमने पूरी कोशिश की है या केवल कठिनाई देखकर डर गए हैं।


इसके बाद अर्जुन भी पिता के साथ जुट गया। दोनों लगातार खुदाई करते रहे। आखिरकार एक सुबह फावड़े की चोट के साथ मिट्टी का रंग बदला। जमीन की एक परत नम थी। दोनों ने आगे खुदाई की तो धीरे-धीरे पानी रिसता हुआ दिखाई दिया।


जलस्रोत बहुत बड़ा नहीं था, लेकिन इतना जरूर था कि कुछ पौधों और परिवारों की आवश्यकताओं में मदद मिल सके। गोविंद ने इस पानी पर अपना अधिकार जताने के बजाय पूरे गांव को उसका उपयोग करने के लिए आमंत्रित किया।


मोहन भी वहां पहुंचा। उसने गोविंद से अपनी पुरानी बातों के लिए माफी मांगी। गोविंद ने उसे सहजता से कहा कि माफी की जरूरत नहीं है, लेकिन आगे से किसी व्यक्ति की मेहनत का मूल्यांकन उसकी सफलता आने से पहले नहीं करना चाहिए।


इस छोटे से जलस्रोत ने गांव की सोच में बड़ा बदलाव ला दिया। ग्रामीणों ने समझा कि केवल बारिश का इंतजार करना पर्याप्त नहीं है। उन्होंने मिलकर वर्षा जल संरक्षण की दिशा में काम शुरू किया। तालाब की सफाई की गई, जलसंग्रह के लिए गड्ढे बनाए गए, खेतों में मेड़बंदी की गई और पुराने कुओं की सफाई का अभियान शुरू हुआ।


अगली बारिश में ग्रामीणों ने पानी को बहकर बर्बाद होने देने के बजाय उसे खेतों और जलस्रोतों में सहेजा। कुछ महीनों बाद सूखी जमीन पर फिर हरियाली दिखाई देने लगी। जिस गांव से लोग पलायन करने की तैयारी कर रहे थे, वही गांव अपने संसाधनों को बचाने और भविष्य को मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ने लगा।


समय बीतने के साथ गोविंद वृद्ध हो गया, लेकिन उसका बेटा अर्जुन गांव के युवाओं के साथ जल संरक्षण के कार्यों में जुटा रहा। एक दिन गांव के विद्यालय में गोविंद को सम्मानित किया गया। वहां उसने बच्चों से कहा कि जीवन में कभी ऐसा समय आए जब रास्ते बंद दिखाई दें, तो घबराने के बजाय एक कदम आगे बढ़ाना चाहिए। संभव है कि जिस जगह केवल सूखी जमीन दिखाई दे रही हो, वहीं उम्मीद की पहली बूंद छिपी हो।


गोविंद की कहानी का सार केवल जमीन के नीचे पानी खोज लेना नहीं है। इसका वास्तविक संदेश यह है कि किसी भी संकट का सामना केवल शिकायतों से नहीं किया जा सकता। समाधान के लिए सामूहिक सोच, निरंतर प्रयास और धैर्य आवश्यक है।


आज जब जल संकट अनेक क्षेत्रों के लिए गंभीर चुनौती बनता जा रहा है, यह कहानी वर्षा जल संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग की ओर भी ध्यान आकर्षित करती है। पानी की हर बूंद को बचाना केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति की साझा जिम्मेदारी है।


संदेश: परिस्थितियां कठिन हो सकती हैं, संसाधन सीमित हो सकते हैं और परिणाम देर से मिल सकते हैं, लेकिन निरंतर प्रयास की शक्ति को कम नहीं आंका जा सकता। जहां निराशा अंत दिखाई देती है, वहीं से समाधान की शुरुआत भी संभव है। उम्मीद केवल प्रतीक्षा का नाम नहीं, बल्कि उसे सच करने के लिए उठाया गया पहला कदम है।

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