top of page
भारतार्थ-logo

चुनमुनियाँ - कहानी

  • लेखक की तस्वीर: Ashok kumar Singh
    Ashok kumar Singh
  • 23 अग॰
  • 9 मिनट पठन
चुनमुनियां पोस्टर में शास्त्रीय नृत्यांगना, नीचे लेखक ललबहादुर चौरसिया ‘लाल’ का पोर्ट्रेट और नाम लिखा है।

लेखक — लालबहादुर चौरसिया ‘लाल’, 23 अगस्त 2026 आजमगढ़ | रात के करीब आठ बजे थे। घर के बाहर से आती नाच की आवाज और भीतर बर्तनों की खटर-पटर से अचानक मेरी नींद खुल गई। दूर से ढोल-मजीरे की आवाज कानों में साफ सुनाई दे रही थी। घर में लगभग सभी लोग जाग रहे थे।

मैंने बरामदे में देखा तो चाचा जी कपड़े पहनकर कहीं जाने की तैयारी में थे। बाहर दरवाजे पर उनका एक मित्र भी उनका इंतजार कर रहा था।

मैंने पूछा—

“चाचा जी, कहीं जा रहे हो क्या?” वे बनावटी गुस्से में बोले— नहीं तो!” मैंने फिर कहा— “चाचा जी, आप क्यों झूठ बोल रहे हो? मैं जानता हूं, आप नाच देखने जा रहे हो।”वे इस बार थोड़ा गरजे—“जा तो रहा हूं, क्यों? क्या बात है?” मैंने बालहठ करते हुए कहा—“मैं भी आपके साथ नाच देखने चलूंगा।”

चाचा जी ने आंखें तरेरते हुए कहा—“नहीं, बिल्कुल नहीं। सो जा, नहीं तो कान के नीचे दो चांटे जड़ दूंगा।”

इतना कहकर चाचा जी अपने मित्र के साथ चले गए। उनका यह व्यवहार मेरे बालमन को भीतर तक चोट कर गया। मेरी आंखें छलछला उठीं। कंठ भी शांत नहीं रह सका। मैं बिस्तर पर ही जोर-जोर से रोने लगा।

मेरा रोना सुनकर दादा जी आए। उन्होंने मुझे पुचकारते हुए पूछा— “क्या बात है बेटा गोलू? अभी सोए नहीं? क्यों रो रहे हो?” लेकिन मेरे ऊपर उनकी बातों का कोई असर नहीं हुआ। मेरे कानों में पड़ रही ढोल की थाप किसी मृगमरीचिका की तरह मुझे अपनी ओर खींच रही थी। ढोल जितनी तेज गति से बज रहा था, मेरा कंठ भी उतनी ही तीव्रता से रुलाई की ताल मिला रहा था। दादा जी ने फिर पूछा—“बेटा गोलू, क्यों रो रहे हो? क्या बात है? पेट तो नहीं दर्द कर रहा? ”मैं और जोर-जोर से रोने लगा। मेरा बालरुदन सुनकर दादी जी भी आ गईं। उन्होंने मुझे दादा जी की गोद से अपनी गोद में बैठाया और स्नेह से पूछा—“अरे मेरे राजा बेटा को क्या हो गया? बेटा क्यों रो रहा है?”दादी जी के मक्खन जैसे मीठे शब्दों ने मेरे अंतर्मन को और भावुक कर दिया। मैं उनसे लिपटकर सिसकने लगा और अपने रोने का कारण बता दिया। मेरी बात सुनते ही दादी ने पिताजी को आवाज लगाई। पिताजी आए।

दादी ने उन्हें आदेश दे दिया कि मुझे नाच दिखाकर लाया जाए। हालांकि हमारे पिताजी चाचा जी की तरह नाच देखने के शौकीन नहीं थे। उन्हें नाच-गाना बिल्कुल पसंद नहीं था। लेकिन दादी की बात मानने के अलावा उनके पास कोई रास्ता भी नहीं था। वे अनमने मन से मुझे लेकर उस स्थान पर पहुंच गए, जहां नाच हो रही थी। वहां उस रात चुनमुनियाँ का नाच था। चुनमुनियाँ का जलवा

पचगोईंया और नौटंकी नाच की दुनिया में चुनमुनियाँ का नाम बहुत प्रसिद्ध था। हृष्ट-पुष्ट कद-काठी, आकर्षक व्यक्तित्व, मोहक अदाएं और सजीले नैन-नक्श—उसे देखकर ऐसा लगता था मानो कोई अप्सरा स्वर्ग से उतरकर मंच पर आ गई हो। दस कोस के चारों ओर उसके नृत्य का डंका बजता था। कोई दूसरा नचनिया उसके सामने खड़ा होने की हिम्मत नहीं करता था। संपन्न घरों में विवाह और अन्य समारोहों में चुनमुनियाँ का नाच करवाना अपनी शान समझा जाता था। लेकिन चुनमुनियाँ कोई महिला नहीं थी।

वह एक पुरुष था। उसका वास्तविक नाम था—चुन्नू। हमारे गांव से सटे गांव का रहने वाला चुन्नू बेहद सादा और सरल इंसान था। पांच फुट का गोरा-चिट्टा युवक। घर की माली हालत खराब थी। पेट की आग ने उसे नृत्य की दुनिया में कदम रखने के लिए मजबूर कर दिया। सत्रह-अठारह वर्ष की उम्र में उसने नृत्य कला में अपनी किस्मत आजमाने का फैसला किया।

शुरुआत कठिन थी। लेकिन उसने मेहनत की। अभ्यास किया। धीरे-धीरे मंच पर पहचान बनाई। और देखते ही देखते चुन्नू, चुनमुनियाँ बन गया। शोहरत मिली। पैसा मिला। और लोगों का प्यार भी मिला। उसी चुनमुनियाँ का नाच देखने मैं उस रात पिताजी के साथ पहुंचा था। मेरी उम्र उस समय महज छह वर्ष थी। मुझे चुनमुनियाँ के नृत्य की कला से विशेष मतलब नहीं था। मेरे लिए तो ढोल, मजीरा, हारमोनियम, भीड़ और वहां का हो-हल्ला ही सबसे बड़ा आकर्षण था। वैवाहिक उत्सवों में बच्चों की अपनी अलग दुनिया होती है। उनके लिए रात देर तक जागना, भीड़ में घूमना और तरह-तरह की चीजें देखना अपने

आप में किसी उत्सव से कम नहीं होता।

नाच देखते-देखते रात करीब डेढ़ बज गई। निद्रा देवी अब मुझे अपनी गोद में लेने लगी थीं। मैं तिरपाल पर बैठे-बैठे ऊंघने लगा और एक बार तो गिर भी पड़ा। पिताजी ने मुझे संभाला।

फिर जब उन्हें लगा कि अब मैं नींद से नहीं बच पाऊंगा तो उन्होंने मुझे गोद में उठाया और घर ले आए।

उस रात मैं सो गया। लेकिन चुनमुनियाँ की छवि मेरे बालमन में कहीं गहरे उतर चुकी थी।

पंद्रह-सोलह साल बाद...समय बीतता गया। मई का महीना था। गांव में विवाह कार्यक्रमों की धूम थी। मैं बीकॉम की परीक्षा देकर इलाहाबाद से गांव आया हुआ था। पड़ोस में तिलक का कार्यक्रम था। गांव के मित्रों से पता चला कि उसी कार्यक्रम में आज चुनमुनियाँ का नाच होने वाला है। चुनमुनियाँ का नाम सुनते ही बचपन की यादें ताजा हो गईं। उसका नाच देखे लगभग पंद्रह-सोलह वर्ष बीत चुके थे। मन में फिर से चुनमुनियाँ को देखने की इच्छा जाग उठी। शाम हुई। स्टेज सज गया। वाद्य यंत्र तैयार हो गए। और फिर पर्दे के पीछे से घुंघरुओं की जोरदार आवाज सुनाई दी— छम... छम... छम...चुनमुनियाँ मंच पर दाखिल हुई। उसने वाद्य यंत्रों और दर्शकों का अभिवादन किया और जोरदार ठुमके के साथ नृत्य शुरू कर दिया। दर्शकों की भीड़ से वाह-वाह और सीटियों की आवाज उठने लगी। पूरा पंडाल गूंज उठा। एक ताल पर नाचने के बाद चुनमुनियाँ ने जोरदार घुमरी ली और अचानक रुक गई। अब बारी थी गाने के साथ नाचने की। चुनमुनियाँ का गायन भी बेहद कर्णप्रिय था।

गाना शुरू हुआ—“नजर लागी राजा तोरे बंगले पे...”और देखते ही देखते भीड़ में से नोटों की बरसात होने लगी। एक गीत समाप्त हुआ। फिर दूसरा। फिर तीसरा। गीत बदलते रहे और नोटों की बारिश होती रही।

चुनमुनियाँ बन चुका चुन्नू अब नृत्य कला में पूरी तरह दक्ष हो चुका था। उसकी गायकी भी अच्छी थी। आसपास के गांवों में आए दिन कहीं न कहीं उसके नाच का कार्यक्रम होता और लोग उसका आनंद लेने पहुंचते।

उस समय किसे पता था कि जिस कलाकार पर आज नोट बरस रहे हैं, एक दिन वही कलाकार अपनी जिंदगी के अंतिम पड़ाव पर एक-एक सहारे के लिए तरसेगा। जिंदगी आगे बढ़ती रही

गर्मी की छुट्टियां समाप्त हो गईं। परीक्षा का परिणाम आया और मुझे उच्च शिक्षा के लिए फिर गांव छोड़ना पड़ा।

बीकॉम के बाद एमकॉम किया। सीए की तैयारी की।

इसी दौरान चार्टर्ड अकाउंटेंट की नौकरी भी लग गई। नौकरी करते-करते साल बीतते गए।

गांव आना-जाना लगा रहा, लेकिन अब एक-दो दिन से ज्यादा गांव में रहना संभव नहीं होता था। समय अपनी गति से आगे बढ़ता रहा। मेरा विवाह हुआ। बच्चे हुए। बच्चे बड़े हुए। उनके विवाह हुए। पुत्रवधुएं घर आईं।

जिंदगी अपनी सामान्य गति से चलती रही। लेकिन समय ने बहुत कुछ बदल दिया था।

विजयदशमी का मेला एक बार विजयदशमी के पावन पर्व पर मैं गांव में ही था। पुत्रवधू के आग्रह पर मैं अपने पौत्र शिवांश को लेकर गांव का मेला देखने पहुंचा। मेले में कोई खास भीड़ नहीं थी। मेरी आंखों के सामने बार-बार बचपन के मेले की तस्वीर उभर रही थी। ओह! कितनी भीड़ हुआ करती थी!

कितना उल्लास! कितना अपनापन! अनगिनत दुकानें! हर तरफ चहल-पहल! लेकिन आज का दृश्य बिल्कुल बदल चुका था। चंद दुकानें थीं। चंद लोग थे। राम और रावण की वे कृत्रिम और रोमांचक लड़ाइयां दिखाई नहीं दे रही थीं। जगह-जगह दुर्गा पूजा के पंडाल थे। दुर्गा जी की प्रतिमाएं स्थापित थीं और उनके आसपास बज रहा डीजे कानों को चीर रहा था। कुछ बच्चे डीजे से निकलने वाले पॉप गीतों पर नाच रहे थे।

मैंने शिवांश को जलेबी, गुब्बारे, सीटियां, खिलौने आदि दिलाए और मेले से बाहर निकलने लगा।

तभी मेरी नजर एक वृद्ध पर पड़ी। वह एक लाठी के सहारे धीरे-धीरे मेले की ओर बढ़ रहा था।

उसकी आंखें गड्ढों में धंस चुकी थीं।

शरीर पर मांस नाममात्र का था। हड्डियों का ढांचा साफ दिखाई दे रहा था। झुलसी हुई त्वचा और धनुष जैसी झुकी कमर उसके बुढ़ापे की कहानी कह रही थी। मुंह में केवल दो-चार दांत ही बचे थे।

वह अपनी ही धुन में कुछ गुनगुनाता हुआ आगे बढ़ रहा था। जैसे ही वह मेरे करीब आया, मैंने जिज्ञासावश उसे रोक लिया। मैंने पूछा— “दादा, आपका घर कहां है?” उसने चेहरे को बड़ी मुश्किल से ऊपर उठाया और मुझे गौर से देखते हुए कहा— “बाबू, हमको नहीं पहचान रहे हो?” मैंने कहा—“नहीं दादा। हम यहां रहते नहीं हैं, इसलिए पूछ रहे हैं।”वह वृद्ध मुस्कुराया। फिर बोला—“अरे बाबू, मैं चुनमुनियाँ डांसर हूं।”मेरे पैरों तले जैसे जमीन खिसक गई। मेरे कानों में एक साथ घुंघरुओं की आवाज गूंज उठी— छम... छम... छम...मेरी आंखों के सामने वर्षों पुराना मंच घूम गया। वही चुनमुनियाँ! वही ठुमके! वही तालियां! वही सीटियां! वही नोटों की बरसात!

क्या यह सचमुच वही चुनमुनियाँ थी? वह आगे बोलता रहा— “क्या करूं बाबू, बुढ़ापा है ना। अब शरीर में वो बात कहां। लड़के अपने-अपने में मस्त हैं। पत्नी भी दो बरस पहले ही साथ छोड़ गई। क्या बताऊं बाबू... धीरे-धीरे समय काट रहा हूं।” मैं नि:शब्द था।

जिस कलाकार के एक ठुमके पर हजारों लोग झूम उठते थे, आज वही कलाकार एक लाठी के सहारे जीवन की आखिरी पगडंडी पर चल रहा था। जिसके नाच पर कभी नोटों की बारिश होती थी, आज उसके जीवन में अभाव की बारिश थी। जिसे देखने के लिए कभी लोगों का हुजूम उमड़ता था, आज वह भीड़ में भी अकेला था। तालियों से तन्हाई तक मेरा कलेजा धक से कर गया। मैं अतीत में चला गया। छह वर्ष का वह बच्चा याद आया, जो चाचा जी के साथ नाच देखने के लिए रोया था। वह रात याद आई। पिताजी की गोद याद आई। चुनमुनियाँ का नृत्य याद आया। फिर वह दूसरी रात याद आई जब मैंने बीकॉम की परीक्षा के बाद उसे मंच पर नाचते देखा था। नोटों की बरसात याद आई।

तालियों की गूंज याद आई। और अब सामने वही कलाकार खड़ा था। लेकिन सब कुछ बदल चुका था।

समय ने मंच छीन लिया था। शरीर ने साथ छोड़ दिया था। भीड़ गायब हो गई थी। तालियां खामोश हो चुकी थीं।

अब केवल लाठी थी और जीवन की लंबी थकान। उसी समय पौत्र शिवांश ने मेरा हाथ खींचा।

“दादाजी, घर चलो।” मैंने जेब से दो सौ रुपये का एक नोट निकाला और उस बुजुर्ग के हाथ में रख दिया।

उसने मेरी ओर देखा। उसकी आंखों में क्या था—आभार, बेबसी, पहचान या बीते दिनों की कोई स्मृति—मैं समझ नहीं सका। मैं शिवांश के साथ आगे बढ़ गया। लेकिन मेरा मन वहीं पीछे छूट गया था।

चुनमुनियाँ की कहानी यहीं खत्म नहीं होती उस दिन मेले से लौटते समय मेरे भीतर एक सवाल लगातार घूमता रहा—क्या हम अपने कलाकारों को केवल उनके चमकते दिनों तक ही याद रखते हैं? जब तक मंच पर रोशनी रहती है, हम तालियां बजाते हैं। जब तक शरीर में ताकत रहती है, हम उनके नृत्य का आनंद लेते हैं।

जब तक आवाज में मिठास रहती है, हम उन्हें बार-बार सुनते हैं। लेकिन जब उम्र ढल जाती है, जब घुंघरू उतर जाते हैं और मंच की रोशनी बुझ जाती है, तब क्या हम उन्हें याद रखते हैं? चुनमुनियाँ केवल एक नर्तक नहीं था। वह उस दौर की लोक संस्कृति का हिस्सा था।

उसने अपनी कला से न जाने कितने विवाह समारोहों को यादगार बनाया होगा। कितनी रातों को अपनी प्रस्तुति से लोगों का मनोरंजन किया होगा। कितने लोगों ने उसके नृत्य पर तालियां बजाई होंगी और कितनों ने उसके हाथों में रुपये रखे होंगे। लेकिन उम्र के अंतिम पड़ाव पर उसे सहारा देने वाला कोई नहीं था।

यह कहानी केवल चुन्नू या चुनमुनियाँ की कहानी नहीं है। यह उन तमाम लोक कलाकारों की कहानी है जो अपनी जवानी में हमारी खुशियों का हिस्सा बनते हैं और बुढ़ापे में समाज की स्मृतियों से बाहर हो जाते हैं।

वक्त की सबसे बड़ी सच्चाई समय किसी के लिए नहीं रुकता। जो आज जवान है, कल बूढ़ा होगा। जो आज मंच पर है, कल मंच से नीचे होगा।

जो आज दूसरों का मनोरंजन कर रहा है, कल उसे किसी के सहारे की जरूरत पड़ सकती है।

इसलिए किसी इंसान की कीमत उसके वर्तमान रूप से नहीं, उसके पूरे जीवन के योगदान से तय होनी चाहिए।

चुनमुनियाँ के ठुमकों पर बरसे नोट शायद उसके जीवन के अंतिम दिनों में उसके काम नहीं आए, लेकिन उन ठुमकों ने जिन लोगों को खुशी दी, क्या उनकी कोई जिम्मेदारी नहीं थी?

शायद यही इस कहानी का सबसे बड़ा सवाल है। और शायद यही समाज के सामने सबसे बड़ा आईना भी।

मेले से लौटते समय मेरे कानों में डीजे की तेज आवाज नहीं, बल्कि पुराने घुंघरुओं की धीमी-सी आवाज गूंज रही थी—छम... छम... छम...मैंने पीछे मुड़कर देखा। वह बूढ़ा चुनमुनियाँ अपनी लाठी के सहारे मेले की ओर बढ़ रहा था। कभी उसी के आने पर मेले में भीड़ उमड़ती थी। आज वह खुद भीड़ के बीच अपने लिए जगह तलाश रहा था। और मैं सोच रहा था—

तालियां खत्म हो जाती हैं, मंच खाली हो जाता है, रोशनी बुझ जाती है; लेकिन कलाकार का जीवन उसके बाद भी चलता रहता है। चुनमुनियाँ की कहानी हमें यही याद दिलाती है कि किसी कलाकार की कला का सम्मान केवल उसके प्रदर्शन के समय नहीं, बल्कि उसके जीवन के अंतिम पड़ाव तक होना चाहिए।

क्योंकि जिस समाज को अपने कलाकारों की जवानी याद रहती है, उसे उनके बुढ़ापे की चिंता भी करनी चाहिए। यही इंसानियत है।

यही संवेदना है। और शायद यही हमारी संस्कृति की असली पहचान भी।


✍️ लेखक: अशोक कुमार सिंह अन्य कहानी , मार्गदर्शन एवं प्रेरणादायी ज़रूर पढ़िए

रिश्तों-की-महक-आख-िरी-रोटी-भाग-1,रिश्तों-की-महक-आख-िरी-रोटी-भाग-2,रिश्तों-की-महक-आख-िरी-रोटी-भाग-3,रिश्तों-की-महक-आख-िरी-रोटी-भाग-4,रिश्तों-की-महक-आख-िरी-रोटी-भाग-5

कहानी माँ-की-आख-िरी-गुल्लक

कहानी रिश्तों-की-सबसे-बड-ी-द-लत

एक दिल दहलाने वाली कहानी धारावाहिक उपन्यास जरूर पढ़ि


नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में इन पोस्ट्स पर अपनी राय ज़रूर दें। आपका नज़रिया ही लोकतंत्र की ताकत है; देश के निर्माण में आपकी अहम भूमिका है।

सटीक, वैज्ञानिक और साहित्यिक खबरें पढ़ने के लिए 'भारतार्थ समाचार' से जुड़े रहें। अपना समर्थन दिखाएं—हमें लाइक, शेयर और फ़ॉलो करें—ताकि हर ज़रूरी अपडेट आपको सबसे पहले मिले।

ताज़ा खबरों के लिए "भारतार्थ खबर" के साथ बने रहें।

टिप्पणियां

5 स्टार में से 0 रेटिंग दी गई।
अभी तक कोई रेटिंग नहीं

रेटिंग जोड़ें
bottom of page