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भारतार्थ – भारतीय राजनीति गहन विचार पर विशेष


पुस्तक समीक्षा - "काले अक्षर कविता और कवि" काव्य संग्रह
समीक्षक - लालबहादुर चौरसिया 'लाल'
महामंत्री - विश्व हिंदी शोध एवं संवर्धन अकादमी, आज़मगढ़ इकाई
"वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजा होगा गान,
उमड़कर आँखों से चुपचाप बही होगी कविता अनजान।"
महाकवि सुमित्रानंदन पंत जी की इन पंक्तियों को जब मैं पढ़ता हूँ और इसकी गहराई में जाता हूँ, तो अनेक कवियों की छाया मेरे अंतःपटल पर अंकित हो उठती है। ऐसे कवि सिर्फ़ समाज के लिए अवतरित होते हैं। समाज की पीड़ा और आह्लाद उनकी कविताओं में निहित होता है। उन्हीं कवियों में एक हैं साहित्यकार श्री

Ashok kumar Singh
3 दिन पहले4 मिनट पठन


पुस्तक समीक्षा -"इंद्रधनु मन के"
समीक्षक -लालबहादुर चौरसिया लाल, कवि एवं साहित्यकार महामंत्री- विश्व हिंदी शोध एवं संवर्धन अकादमी आजमगढ़ इकाई "इंद्रधनु मन के" काव्य-संग्रह आजमगढ़ के वरिष्ठ एवं श्रेष्ठ साहित्यकार श्री हरिहर प्रसाद पाठक जी की लंबी काव्य-यात्रा का एक वृहद दस्तावेज है। सैनिक शिक्षा कोर में सूबेदार पद से सेवानिवृत्त श्री पाठक जी का रस-सिक्त हृदय रचनात्मकता से परिपूर्ण है। सामाजिक एवं प्रशासनिक भाग-दौड़ कभी उनकी रचनाशीलता पर अंकुश नहीं बन सकी। भारत-पाकिस्तान के बीच 1971 में हुए युद्ध के साक्षी श्र

Ashok kumar Singh
29 अग॰4 मिनट पठन


ज्ञान का पिटारा व मन का सुकून है "देखा जब स्वप्न सबेरे"----
पुस्तक समीक्षा - समीक्षक लालबहादुर चौरसिया लाल
'साहित्य' शब्दों का मकड़जाल नहीं वरन विचारों का एक विशाल मंथन है। साहित्यकार जब हृदय को अध्ययन,स्वविवेक व यथार्थ की मथनी से मथता है तो आए दिन नवीनतम साहित्य निकाल कर बाहर आते हैं। जो धरा धाम को युगों युगों तक अपनी स्वर्णिम आभा, मधुरिम पराग व मनहर सुगंध से भरते रहते हैं। हिंदी साहित्य की दो विधाए हैं। गद्य साहित्य व पद्य साहित्य। गद्य साहित्य की अनेकों शाखाएं हैं। उन्ही शाखाओं में एक शाखा है 'यात्रा वृत्त' । यात्रा वृत्त गद्य की

Ashok kumar Singh
27 अग॰5 मिनट पठन


चुनमुनियाँ - कहानी
लेखक — लालबहादुर चौरसिया ‘लाल’, 23 अगस्त 2026 आजमगढ़ | रात के करीब आठ बजे थे। घर के बाहर से आती नाच की आवाज और भीतर बर्तनों की खटर-पटर से अचानक मेरी नींद खुल गई। दूर से ढोल-मजीरे की आवाज कानों में साफ सुनाई दे रही थी। घर में लगभग सभी लोग जाग रहे थे।
मैंने बरामदे में देखा तो चाचा जी कपड़े पहनकर कहीं जाने की तैयारी में थे। बाहर दरवाजे पर उनका एक मित्र भी उनका इंतजार कर रहा था।
मैंने पूछा—
“चाचा जी, कहीं जा रहे हो क्या?” वे बनावटी गुस्से में बोले— नहीं तो!” मैंने फिर कहा— “चाचा

Ashok kumar Singh
23 अग॰9 मिनट पठन
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