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पुस्तक समीक्षा - "काले अक्षर कविता और कवि" काव्य संग्रह

  • लेखक की तस्वीर: Ashok kumar Singh
    Ashok kumar Singh
  • 3 दिन पहले
  • 4 मिनट पठन
हिंदी पुस्तक कवर: वाणि अक्षर कविता और कवि, पवन तिवारी; सफेद पृष्ठभूमि पर कलम का चित्र।
भूरे चश्मे वाले पुरुष का स्टूडियो पोर्ट्रेट, मैरून कुर्ता पहने, हल्के ग्रे बैकग्राउंड पर शांत भाव।

समीक्षक - लालबहादुर चौरसिया 'लाल'

महामंत्री - विश्व हिंदी शोध एवं संवर्धन अकादमी, आज़मगढ़ इकाई

"वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजा होगा गान,

उमड़कर आँखों से चुपचाप बही होगी कविता अनजान।"


महाकवि सुमित्रानंदन पंत जी की इन पंक्तियों को जब मैं पढ़ता हूँ और इसकी गहराई में जाता हूँ, तो अनेक कवियों की छाया मेरे अंतःपटल पर अंकित हो उठती है। ऐसे कवि सिर्फ़ समाज के लिए अवतरित होते हैं। समाज की पीड़ा और आह्लाद उनकी कविताओं में निहित होता है। उन्हीं कवियों में एक हैं साहित्यकार श्री पवन तिवारी जी। "काले अक्षर कविता और कवि" उनका पहला काव्य संग्रह है।


कविता क्या है? कवि क्या है? इन शब्दों की परिभाषाएँ अनेक विद्वानों ने अपनी-अपनी क्षमता के अनुरूप दी हैं। कविता मन की सूक्ष्म अभिव्यक्ति है। कविता किसी कवि द्वारा की गई साहित्यिक साधना का वह प्रसाद है, जिसके ग्रहण करने से संपूर्ण जनमानस सुखद एवं तृप्ति की अनुभूति प्राप्त करता है। हाँ, एक बात तो सत्य है कि कविता के तीन मूल तत्त्व हैं, यदि कोई कविता इन तीनों मूल तत्त्वों से विरक्त है तो वह कविता कहलाने की हक़दार नहीं है। ये तीनों मूल तत्त्व हैं - लोक-रंजन, लोक-मंगल व लोक-रक्षण।


पवन तिवारी जी की पुस्तक "काले अक्षर कविता और कवि" सैंतीस विविध रंगों व भावों से अनुप्राणित कविताओं का एक अनूठा काव्य संग्रह है। पुस्तक की सभी रचनाएँ अतुकांत हैं। कविता में पीड़ा के साथ-साथ समाज की विभिन्न विद्रूपताओं को साहित्यकार पवन तिवारी जी ने पटल पर लाने का भरपूर प्रयास किया है। वास्तव में कविता पीड़ा से ही निकलती है, अभाव से निकलती है। परिस्थितियाँ जब विपरीत होती हैं तब कविता निकलती है। कहने का तात्पर्य यह नहीं है कि जो ग़रीब हो या जो अभाव से ग्रस्त हो, वही कविता लिखेगा। कविता लिखने के लिए हमें अपने मन को वहाँ तक पहुँचाना होगा, तब जाकर सच्ची कविता निकलेगी। सच्ची कविता को ही समाज अंगीकार करेगा। पुस्तक "काले अक्षर कविता और कवि" इन्हीं मनोभावों से अनुप्राणित है। कवि श्री पवन तिवारी जी ने अपनी पुस्तक में सिर्फ़ स्वयं से संवाद नहीं किया है। यह संवाद लाखों-करोड़ों लोगों का संवाद जान पड़ता है। यही कविता की सार्थकता है। पवन जी ने अनेक अनछुए पहलुओं पर अपनी लेखनी चलाई है।


पुस्तक की दूसरी कविता 'मरकर लिया भूख ने बदला' में मनुष्य और भूख का अंतर्द्वंद्व चिंतन करने पर मजबूर कर देता है। मनुष्य हो या कोई जीव, वह भूखा नहीं रह सकता। किंतु अभाव में, विपन्नता में जब उसे भोजन नहीं मिलता है तो उसके अंदर भूख का जन्म होता है। धीरे-धीरे भूख अपने चरम पर पहुँचती है, अर्थात जवान होती है और जब भोजन की पूर्ति नहीं होती है तो धीरे-धीरे मरने लगती है। भूख सिर्फ़ भोजन की ही नहीं होती। मान की भी होती है, पद की भी होती है, प्रतिष्ठा की भी होती है, धन की भी होती है। पवन जी ने भूख के माध्यम से बड़ा ही सूक्ष्म अवलोकन प्रस्तुत किया है -


"भूख ने देख लिया था,

मेरी मजबूरी की रसोई को,

शायद इसीलिए उसने साध ली थी,

चुप्पी,

उसे आदत पड़ गई थी,

भूख घुट-घुट कर मर रही थी,

अंदर ही अंदर।"


कविता 'अब मैं गाँव नहीं हूँ' में पवन तिवारी जी ने गाँव के बदलते स्वरूप का बड़ा ही हृदयस्पर्शी खाका खींचा है। गाँव के भौगोलिक एवं सांस्कृतिक बदलाव पर कवि स्वयं स्तब्ध हैं। कविता पढ़कर जिसने गाँव देखा है वह ज़रूर भावुक हो जाएगा। इस कविता में गाँव अपने हृदय के दर्द को चीख़-चीख़ कर बयाँ कर रहा है। एक बानगी देखें -


"मुझे शहर बनाने के नाम पर,

विकास के नाम पर,

लूटा गया।

मुझे पिछड़ा, गँवार कह कर,

दुत्कारा गया,

शहर बनने के सपने दिखाए गए,

हमारे खेतों-खलिहानों को,

उद्योगों के नाम पर हड़प लिया गया।"


बारिश का मौसम सभी को बड़ा ही मनोहारी लगता है, बड़ा ही सुहाना व सुखद होता है। बारिश तो सभी ने अवश्य देखी होगी। हज़ारों कवियों ने वर्षा ऋतु का वर्णन बड़े ही रोचक ढंग से किया है। कहा जाता है वर्षा ऋतु, नायक-नायिका के प्रेम में उद्दीपन का आधार प्रदान करती है। बरसात का मौसम पवन तिवारी जी ने भी देखा, लेकिन क्या देखा - बिल्कुल अलग। 'निर्दयी और बदसूरत बारिश' शीर्षक कविता में कवि ने एक असहाय, पत्थर काटने वाली, सड़क के किनारे झुग्गी-झोपड़ी में रात बिताने वाली अबला की व्यथा का चित्रण करते हुए लिखा है -


"टाट की छत से,

उसके चूल्हे और भात में,

बेरहमी से टपकी, नहीं बरसी थी,

नीचे भी,

ज़बरदस्ती घुस आई थी,

फटी चटाई पर और,

उस पर सोया था,

उसका दो साल का बेटा।"


कवि श्री पवन तिवारी जी ने 'मैंने भविष्य देखा' शीर्षक कविता में अपनी बेबाक़ लेखनी चलाई है और ऐसे भविष्य को देखा है कि जिसके एहसास मात्र से ही रोम-रोम कंपायमान हो उठता है। समाज के तीव्र गति से बदलते स्वरूप की ऐसी तस्वीर दिखाई गई है कि पढ़कर मन द्रवित हो उठता है -


"यहाँ अब पति-पत्नी नहीं होते,

विवाह शब्द भविष्य के लोग नहीं जानते,

स्त्रियों एवं पुरुषों में कोई भेद नहीं होता,

वे माँ नहीं बनतीं, बच्चे नहीं जनतीं।


मनुष्य हो गया है रोबोट,

और रोबोट मनुष्यता की ओर बढ़ रहा है,

मनुष्य, मनुष्य से आदमी और,

आदमी से रोबोट हो गया है।"


'तब लिखता हूँ कविता' शीर्षक के माध्यम से पवन जी समय का आवरण हटाकर समाज में फैली विभीषिका को बड़े ही आत्मीय ढंग से प्रस्तुत करते हैं -


"मैं क्यों लिखता हूँ,

तुम रोज़ पूछते हो,

सो सोचा आज तुम्हें बता दूँ,


एक श्रमिक को,

मज़दूरी के बदले मिलती हैं,

निःशुल्क भद्दी गालियाँ,

वह समझ नहीं पाता कि,

क्यों मिलीं उसे गालियाँ,

तड़प उठता है,

उसका रोम-रोम।"


पवन तिवारी जी के काव्य संग्रह की कविताएँ - 'आलोचना की खोज', 'सपने में गाँव', 'सबसे बड़ा दुख', 'कवि और पीड़ा', 'गाँव में नई दीवारें', 'काले अक्षर कविता और कवि', 'पेड़ अब नहीं हँसता', 'मैं तुम पर कविता क्यों नहीं लिखता' - शीर्षक के रूप में बड़ी ही हृदयस्पर्शी हैं। कविताओं में भाव, भाषा, शिल्प, कथ्य व प्रवाह बेजोड़ है। आर. के. पब्लिकेशन, मुंबई से प्रकाशित यह पुस्तक श्री पवन जी का शानदार काव्य संग्रह है। काव्य संग्रह प्रकाशन के साथ-साथ साहित्यकार श्री पवन तिवारी जी को हृदय से बहुत-बहुत शुभकामनाएँ। मेरा पूर्ण विश्वास है कि साहित्य जगत में यह पुस्तक "काले अक्षर कविता और कवि" एक कीर्तिमान स्थापित करेगी।


समीक्षक - लालबहादुर चौरसिया 'लाल'

महामंत्री - विश्व हिंदी शोध एवं संवर्धन अकादमी, आज़मगढ़ इकाई

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