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पुस्तक समीक्षा -"इंद्रधनु मन के"

  • लेखक की तस्वीर: Ashok kumar Singh
    Ashok kumar Singh
  • 29 अग॰
  • 4 मिनट पठन
नीले आकाश, इंद्रधनुष और झील में उड़ते पक्षियों वाला किताब कवर; शीर्षक इंद्रधनु मन के, हरिहर प्रसाद पाठक।
एक पुरुष का पासपोर्ट शैली का पोर्ट्रेट, चश्मा, मूंछें, लाल बंदगला कुर्ता, हल्की ग्रे पृष्ठभूमि, गंभीर भाव लालबहादुर चौरसिया लाल,

समीक्षक -लालबहादुर चौरसिया लाल, कवि एवं साहित्यकार महामंत्री- विश्व हिंदी शोध एवं संवर्धन अकादमी आजमगढ़ इकाई "इंद्रधनु मन के" काव्य-संग्रह आजमगढ़ के वरिष्ठ एवं श्रेष्ठ साहित्यकार श्री हरिहर प्रसाद पाठक जी की लंबी काव्य-यात्रा का एक वृहद दस्तावेज है। सैनिक शिक्षा कोर में सूबेदार पद से सेवानिवृत्त श्री पाठक जी का रस-सिक्त हृदय रचनात्मकता से परिपूर्ण है। सामाजिक एवं प्रशासनिक भाग-दौड़ कभी उनकी रचनाशीलता पर अंकुश नहीं बन सकी। भारत-पाकिस्तान के बीच 1971 में हुए युद्ध के साक्षी श्री पाठक आज अपने जीवन के 87वें वसंत की प्रतीक्षा में अपनी रचनाधर्मिता में मग्न हैं।

"इंद्रधनु मन के" श्री पाठक जी का पहला प्रकाशित काव्य-संग्रह है। इसका प्रकाशन संकल्प प्रकाशन, दिल्ली द्वारा सन् 2023 में किया गया। दो सौ चौंसठ पृष्ठीय यह पुस्तक सिर्फ कविताओं का संकलन नहीं, वरन् एक रचनाकार की किशोरावस्था से लेकर जीवन के उत्तरार्ध तक के अनुभवों को समेटे हुए है। श्री पाठक जी ने इस पुस्तक को अपनी अर्धांगिनी स्वर्गीया दुर्गावती देवी जी की पावन स्मृति को समर्पित कर उनके न रहने पर भी अपने साथ होने का अहसास दिलाया है।

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, डॉ. विश्वनाथ प्रसाद मिश्र, पंडित करुणापति त्रिपाठी जैसे नामचीन साहित्य-मनीषियों के अनुशंसा-पत्रों को शामिल करने से इस पुस्तक का साहित्यिक आभामंडल और भी दीप्त होता है। आजमगढ़ जनपद के साहित्य-पुरोधा प्रोफेसर प्रभुनाथ सिंह 'मयंक' द्वारा लिखा गया 'पूर्वाभास' हमें यह संग्रह पढ़ने के लिए सहज ही जिज्ञासु बना देता है। 'अपनी बात' शीर्षक के अंतर्गत श्री पाठक जी ने बहुत कुछ कह दिया है। लगभग 12 पृष्ठों में विस्तृत इस शीर्षक में उन्होंने अपने जीवन से जुड़ी तमाम घटनाओं का जिक्र किया है तथा कविता के उद्देश्यों पर विधिवत प्रकाश डाला है। इस काव्य-संग्रह का शुभारंभ ज्ञान-विज्ञान की अधिष्ठात्री माँ शारदे की वंदना से हुआ है।

कविवर पाठक जी को दीप, प्रकाश, भोर, बसंत इत्यादि बिंब बहुत प्रिय हैं। उन्होंने अपनी रचनाओं में सदैव आशावादी दृष्टिकोण को रेखांकित किया है। समाज को सचेत करने का कार्य एक आशावादी कवि ही कर सकता है। एक आशावादी व्यक्ति ही एक स्वस्थ समाज की स्थापना कर सकता है। श्री पाठक जी की कविताओं में मानवीयकरण की बेमिसाल झलक मिलती है।

जैसे एक कविता देखें -

सूरज ने हाथों से छू लिया पलाश-वन, धरती के आँगन में मधुबन हँसने लगा।

एक और कविता देखें -

जब छू देता रवि निज कर से, उषा के अरुण कपोल लोल।

खग-कुल के माधुरिम कलरव से नादित हो जाता है खगोल।।


कविवर हरिहर पाठक जी एक सेवानिवृत्त सैनिक होने के साथ-साथ एक श्रेष्ठ कवि भी हैं। आपकी कविताओं में एक सैनिक जैसा अनुशासन एवं संकल्प विद्यमान है। आज समाज में व्याप्त निराशा, स्वार्थ, भ्रष्टाचार और भ्रम के घने अंधकार की गोद में बैठकर कविवर पाठक जी स्वयं को एक जलते हुए दीप के रूप में देखते हैं और उनकी चाहत भी यही है कि सभी लोग एक दीपक की तरह जलें और घोर तम का दमन करें।

सघन तम की गोद में, मैं एक दीपक जल रहा हूँ। साथ मेरे कोटि-कोटि दिए जलें, मैं चाहता हूँ,

अलग हो तन, किंतु मन से मन मिले मैं चाहता हूँ।।


ये पंक्तियाँ पूरी पुस्तक एवं रचनाकार की मनःस्थिति की भाव-भूमि का वर्णन करने के लिए पर्याप्त हैं। समाज में जाति, धर्म, भाषा, प्रांत या किसी भी प्रकार का जो विखंडन विद्यमान है, कवि ने उस समस्त विखंडन को समाप्त होने की पुनीत इच्छा व्यक्त की है, जो मानवता के लिए हितकारी है।

अपनी कविताओं में श्री पाठक जी ने आजादी के जश्न, देश-प्रेम, राष्ट्रीय एकता और अखंडता को बनाए रखने के लिए लोगों से अपील भी की है और उसके परिणामों को भी व्याख्यायित किया है। श्री पाठक जी को किसी एक खास विधा या शैली में बाँधा नहीं जा सकता। आपकी रचनाओं में विरह-वेदना की टीस भी है, तो कहीं शृंगारिकता की तरलता है। कहीं नारी-सशक्तिकरण का शंखनाद करता हुआ मुक्तक है, तो कहीं ग्रामीण जीवन-शैली की दशा व दुर्दशा को परोसती हृदयस्पर्शी कविता। कहीं अतुकांत कविताओं का जखीरा है, तो कहीं मात्रिक छंदों की मर्यादा। कहीं भोजपुरी एवं ब्रजभाषा की मिठास है, कहीं दार्शनिक भाव का पुट है तो कहीं बाल मन को रिझाती बाल-कविताएँ।


कविवर हरिहर पाठक जी ने भारत की पराधीनता से उत्पन्न दुर्दशा को भी देखा है और स्वतंत्र भारत का उत्सव भी मनाया है। उन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम से वर्तमान समय के नेताओं को भी सचेत किया है। एक कविता देखें -

स्वाधीन देश के नेता, तुम आजादी को तुम क्या जानो,

धोती-कुर्ता-टोपी पहने, अपने को पहले पहचानो।

हिंदी की गौरव गाथा गाती यह कविता बहुत ही महत्वपूर्ण है -

हिंदी माथे का चंदन है मां के ललाट की बिंदी है।

भारत की संपर्की भाषा यदि है कोई तो हिंदी है।।


जब शृंगारिक रचनाओं पर कविवर पाठक जी की लेखनी चलती है तो लिखते हैं -

घूंघट पट खोलो आज प्रिये। मैं तुमको अंगीकार करूँ।।

मैं तेरे मन की मलय गंध, तुम मेरे मन की गंधवाह।

मैं तेरे मन का विमल श्रोत, तुम मेरे मन का हो प्रवाह।

तेरे कोमल संबंधों को कैसे न प्रिये स्वीकार करूँ।।


"इंद्रधनु मन के" पुस्तक में सचमुच इंद्रधनुष के सप्तरंगी रंग विद्यमान हैं। बाल-कविताओं के साथ-साथ प्रौढ़ मुक्तकों की लड़ियों और दोहों से सुसज्जित यह संग्रह पठनीय है। पुस्तक के उत्तरार्ध में पृष्ठ संख्या 225 से 259 तक श्री पाठक जी ने हिंदी साहित्य जगत के सिरमौर कवियों के जीवन व उनकी रचनाओं का काव्यात्मक उल्लेख किया है, जो प्रणम्य है। संत कवि कबीरदास, तुलसीदास, सूरदास, मीराबाई, पद्माकर, रहीम, रसखान, रत्नाकर, हरिऔध, जयशंकर प्रसाद, मैथिलीशरण गुप्त, सुमित्रानंदन पंत, सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला', रामधारी सिंह 'दिनकर' जैसे शीर्ष कवियों की रचनाओं को बड़ा ही रोचक एवं काव्यात्मकता से सजाया है।


कुल मिलाकर श्री हरिहर प्रसाद पाठक जी ने अपने इस संग्रह को विविधवर्णी पुष्पों से सुसज्जित गुलदस्ते का रूप दिया है। यह पुस्तक अध्येताओं को एक अलग ही आनंदानुभूति प्रदान करेगी। यह पुस्तक एक रचनाकार की रचनाओं का संकलन ही नहीं, वरन् लोक-मंगल, लोक-रक्षण एवं लोक-रंजन की भावना से ओत-प्रोत एक सच्चे साहित्यकार का सच्चा दस्तावेज है। साहित्य जगत को 'इंद्रधनु मन के' नामक पुस्तक देने के लिए कविवर श्री हरिहर प्रसाद पाठक जी को हृदय से धन्यवाद देता हूँ तथा उनके सुदीर्घायु की ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ। आप से साहित्य जगत को और अपेक्षाएं हैं।

-लालबहादुर चौरसिया लाल, कवि एवं साहित्यकार

महामंत्री- विश्व हिंदी शोध एवं संवर्धन अकादमी आजमगढ़ इकाई


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