ज्ञान का पिटारा व मन का सुकून है "देखा जब स्वप्न सबेरे"----
- Ashok kumar Singh

- 27 अग॰
- 5 मिनट पठन

पुस्तक समीक्षा - समीक्षक लालबहादुर चौरसिया लाल
'साहित्य' शब्दों का मकड़जाल नहीं वरन विचारों का एक विशाल मंथन है। साहित्यकार जब हृदय को अध्ययन,स्वविवेक व यथार्थ की मथनी से मथता है तो आए दिन नवीनतम साहित्य निकाल कर बाहर आते हैं। जो धरा धाम को युगों युगों तक अपनी स्वर्णिम आभा, मधुरिम पराग व मनहर सुगंध से भरते रहते हैं। हिंदी साहित्य की दो विधाए हैं। गद्य साहित्य व पद्य साहित्य। गद्य साहित्य की अनेकों शाखाएं हैं। उन्ही शाखाओं में एक शाखा है 'यात्रा वृत्त' । यात्रा वृत्त गद्य की बड़ी ही रोचक विधा है। पाठक को यह बिल्कुल चलचित्र की अनुभूति प्रदान करती है।
अभी हाल में ही मैंने ख्यातिलब्ध साहित्यकार डॉ जितेंद्र पांडेय जी की पुस्तक "देखा जब स्वप्न सवेरे" पढ़ी। महाराष्ट्र सरकार द्वारा 'काका कालेलकर' पुरस्कार से पुरस्कृत तथा यात्रावृत्त के पैमाने पर सोरहो आने खरी उतरने वाली यह पुस्तक विशिष्ट है। डॉ जितेंद्र पांडेय जी ने भारत के विभिन्न स्थलों की अपने यात्रा के दौरान अलग-अलग शीर्षकों से ऐसा खाका तैयार किया है जो मन को आह्लादित ही नहीं सुकून व ज्ञान से भर देता है। पुस्तक पढ़ने पर ऐसा प्रतीत होता है कि पाठक पढ़ नहीं, वर्णित स्थलों को देख रहा हो। यह डॉ जितेंद्र पांडेय के उत्कृष्ट लेखन शैली का परिचय है। चाहे धार्मिक स्थल हो, पौराणिक स्थल हो, ऐतिहासिक स्थल हो, या किसी व्यक्ति विशेष से मुलाकात का वर्णन हो, सभी बेजोड़ है।
यात्रा वृत्त "देखा जब स्वप्न सवेरे" का प्रथम पाठ "भय बिनु होय न प्रीति" से प्रारंभ होता है। इसमें दक्षिण भारत के पौराणिक स्थल रामेश्वरम के साथ-साथ वहां के अनेकों दर्शनीय व धार्मिक स्थलों का वृतांत समाहित है। लेखक डॉ जितेंद्र पांडेय जी ने यात्रा वृत्त के दौरान स्थलों का वर्णन ही नहीं किया अपितु पाठकों को पौराणिक, ऐतिहासिक व आस्था की चासनी से पगी हुई ज्ञान सलिला में डुबकी लगाने पर भी विवश किया है। विराट स्वरूप से लेकर सूक्ष्म जानकारी को भी साझा किया है, जो लेखक के साहित्य साधना का प्रमाण है। कहीं कहीं अपनी पीड़ा को भी प्रकट किया है।एक बानगी देखें-
(पुस्तक- देखा जब स्वप्न सवेरे- पृष्ठ संख्या 13)
"मंदिर की परिक्रमा करते समय चौबीस कुंडों के जल से स्नान करना पुण्य माना जाता है। कुछ कुंड सुख भी गए हैं। इनके जल औषधीय गुणों से युक्त हैं। इन कुंडों में स्नान करते हुए हम आगे बढ़ रहे थे किंतु इनकी गंदगी आस्था पर भारी पड़ने लगी। हरी काई और फंगस के बीच तैरती छोटी-छोटी मछलियां मंदिर प्रशासन की लापरवाही बयां कर रही थीं।"
पुस्तक "देखा जब स्वप्न सवेरे" में "एक गुलशन था जलवा नुमा इस जगह" शीर्षक में डॉ. जितेंद्र पांडेय जी ने बीजापुर के गोलकुंडा का वर्णन बड़े ही व्यवस्थित ढंग से किया है। लगभग 2000 एकड़ में फैले इस विस्तृत भूखंड को साहित्यकार ने अपने यात्रा वृत्तांत के दौरान सन् 1364 से लेकर अब तक की तमाम गतिविधियों पर प्रकाश डाला है। चाहे सन् 1518 का कुतुबशाही शासन रहा हो, चाहे 1627 का औरंगजेब का अधिपत्य रहा हो या गोलकुंडा किले पर अंग्रेजी शासन रहा हो तथा अंग्रेजी शासन के बाद हिंदू राजा शिवाजी का आधिपत्य रहा हो। डॉ जितेंद्र पांडेय जी ने अनेकों ऐतिहासिक जानकारी पर प्रकाश डाला है । गोलकुंडा के वास्तु शैली, विभिन्न बेगमों के स्थापित महल, रोमांटिक प्रेम कथाओ एवं वहां के हीरे या अन्य वस्तुओं के वैश्विक बाजार का भी वर्णन बड़े ही संजीदगी से किया है। डॉ जितेंद्र पांडेय ने तात्कालिक दृश्य पर ऐसा प्रकाश डाला है जो वास्तव में पाठक को आनंद प्रदान करता है। जिसका एक उदाहरण देखें-
(पुस्तक -देखा जब सपना सवेरे -पृष्ठ संख्या 18)
"संगीत संवाद और प्रकाश के समवेत मिश्रण में गोलकुंडा का इतिहास उतरने लगा। सोते हुए इतिहास का स्रोत रिस रिस कर टलमल कर रहा था। तारों भरे आकाश के नीचे सदियां बोल रही थीं। ध्वनि और प्रकाश के सम्मिलित प्रभाव से हम जान पाए कि चार मील के दायरे में फैले गोलकुंडा फोर्ट की गाथा सन् 1364 से शुरू होती है।.............................................. लगभग डेढ़ घंटे तक हम गोलकुंडा के प्रांगण में बैठे इतिहास के वैभव और पतन के महानगर में डूबते उतरते रहे।"
गोलकुंडा के विभिन्न दृश्यों का वर्णन करते-करते देश के बड़े चिड़ियाघर "नेहरू प्राणी उद्यान" देखने के उपरांत लेखक डॉक्टर जितेंद्र पांडे द्रवित हो उठते हैं। यात्रा वृत्त से कुछ हटकर अपने मन की पीड़ा को स्थान देना उन्होंने उपर्युक्त समझा और होना भी चाहिए। पीड़ा कहीं की हो उसका उद्गार तो होना ही चाहिए। यही कलमकार को श्रेष्ठता की तरफ ले जाती है।
(देखें पुस्तक देखा जब स्वप्न सवेरे -पृष्ठ 23)
"मनुष्य ईश्वर की सर्वोत्तम रचना है। मनोरंजन के नाम पर जीवों को कैद करना कितना उचित है। काश!इन बेजुबानों के दर्द की एक लिपि होती। यह भी न्याय की फरियाद कर पाते। मनुष्य ने अपने अधिकारों की रक्षा के लिए कचहरियां तो बना ली है किंतु इनका क्या? कुछ सौभाग्यशाली पशु पक्षियों के अलावा बाकी न्याय की प्रतीक्षा में रत। दूसरी तरफ विलुप्तप्राय प्राणियों का संरक्षण करता मानव देव तुल्य लगा।इन्हीं विचारों में डूबता उतराता मैं चिड़ियाघर से बाहर निकल आया।"
"देखा जब स्वप्न सवेरे" पुस्तक में एक शीर्षक है "योगियों मनीषियों की ज़मीं पर" जिसमें लेखक ने साहित्यकार विश्वनाथ प्रसाद तिवारी जी से मुलाकात का बड़ा ही मनोहारी वर्णन किया है। साथ ही साथ गोरखपुर के तपोवन व अनेकों तपस्वीयों का व्यापक वर्णन करते हुए गोरखनाथ मंदिर का सजीव चित्रण उकेरा है। देखें-
("देखा जब स्वप्न सवेरे"- पृष्ठ27)
"भीतरी कक्ष के मुख्य वेदी पर गोरखनाथ की दिव्य मूर्ति है। पास में ही इनकी चरण पादुका भी है। गोरखनाथ हठ योगी थे। माना जाता है त्रेता में इस योगी ने यहां पर धुनी रमई थी। जिसकी अखंड ज्योति आज भी जल रही है। यह ज्ञान ज्योति अखंडता और एकता की प्रतीक है। महाभारत काल के पांडवों ने राजसूय यज्ञ किया था।पांडवों की तरफ से भीम गोरखनाथ के लिए निमंत्रण पत्र लेकर आए थे। उस समय वे ध्यानस्थ थे।अतः भीम को महीनों मठ के बाहर इंतजार करना पड़ा। आज भी मंदिर के बाहर भीम की विशालकाय प्रतिमा विश्राम की मुद्रा में लेटी है। प्राचीन काल से यह यौगिक साधना का प्रसिद्ध केंद्र रहा है। इसी कारण मुगल सम्राटों ने इस मठ को मटिया मेट करने की कई बार कोशिशें की।"
इसी प्रकार "देखा जब स्वप्न सवेरे" यात्रा वृत्त में डॉ जितेंद्र पांडेय जी ने 'गंगा का मौन हाहाकार' 'देखा जब स्वप्न सवेरे' 'को कहि सकइ प्रयाग प्रभाऊ' 'उत्तर दिसि सरयू बह पावन' 'जल में कुंभ' 'झरती आस्थाएं' जैसे अनेकों शीर्षक रूपी पुष्पों का ऐसा गुलदस्ता तैयार किया है जो साहित्याकाश में दीप्तिमान सितारों के समान प्रतीत होता है। लेखक डॉ जितेंद्र पांडेय जी को बहुत-बहुत शुभकामनाएं।
यदि आपको अवसर मिले तो डॉ जितेंद्र जी की पुस्तक "देखा जब स्वप्न सवेरे" यात्रा वृत्त अवश्य पढ़िएगा।

धन्यवाद,
-लालबहादुर चौरसिया 'लाल'
महामंत्री ( विश्व हिंदी शोध एवं संवर्धन अकादमी आजमगढ़)
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