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भारतार्थ – भारतीय राजनीति गहन विचार पर विशेष


पुस्तक समीक्षा -"इंद्रधनु मन के"
समीक्षक -लालबहादुर चौरसिया लाल, कवि एवं साहित्यकार महामंत्री- विश्व हिंदी शोध एवं संवर्धन अकादमी आजमगढ़ इकाई "इंद्रधनु मन के" काव्य-संग्रह आजमगढ़ के वरिष्ठ एवं श्रेष्ठ साहित्यकार श्री हरिहर प्रसाद पाठक जी की लंबी काव्य-यात्रा का एक वृहद दस्तावेज है। सैनिक शिक्षा कोर में सूबेदार पद से सेवानिवृत्त श्री पाठक जी का रस-सिक्त हृदय रचनात्मकता से परिपूर्ण है। सामाजिक एवं प्रशासनिक भाग-दौड़ कभी उनकी रचनाशीलता पर अंकुश नहीं बन सकी। भारत-पाकिस्तान के बीच 1971 में हुए युद्ध के साक्षी श्र

Ashok kumar Singh
29 अग॰4 मिनट पठन


सही रास्ता
लेखक: अशोक कुमार सिंह "रिपोर्टर/मल्टीमीडिया' डायरेक्टर "भारतर्थ खबर' (बंगलुरु कर्नाटक)
एक छोटे से गाँव में विवेक नाम का युवक रहता था। वह मेहनती और समझदार था, लेकिन उसे हमेशा लगता था कि जीवन में आगे बढ़ने के लिए कोई ऐसा व्यक्ति होना चाहिए जो उसे सही दिशा दिखाए। वह अक्सर गाँव के बाहर बैठकर सोचता कि आखिर कुछ लोग कठिन परिस्थितियों के बावजूद सफल कैसे हो जाते हैं, जबकि कई लोग अवसर मिलने के बाद भी आगे नहीं बढ़ पाते।

Ashok kumar Singh
27 अग॰4 मिनट पठन


सूखी जमीन में उम्मीद
भारतार्थ खबर, Bhaarataarth.com लेखक: अशोक कुमार सिंह राजस्थान के एक छोटे से गांव केसरपुर की यह कहानी केवल एक किसान की मेहनत की कहानी नहीं, बल्कि विपरीत परिस्थितियों में उम्मीद, धैर्य और सामूहिक प्रयास की ताकत का संदेश देती है।
केसरपुर में गोविंद नाम का एक साधारण किसान रहता था। उसके पास थोड़ी जमीन, एक पुराना कुआं और मिट्टी से बना छोटा सा घर था। सीमित साधनों के बावजूद वह मेहनत और धैर्य के साथ जीवन जी रहा था। लेकिन एक वर्ष गांव में बारिश बेहद कम हुई। खेतों में दरारें पड़ गईं,

Ashok kumar Singh
26 अग॰3 मिनट पठन


चुनमुनियाँ - कहानी
लेखक — लालबहादुर चौरसिया ‘लाल’, 23 अगस्त 2026 आजमगढ़ | रात के करीब आठ बजे थे। घर के बाहर से आती नाच की आवाज और भीतर बर्तनों की खटर-पटर से अचानक मेरी नींद खुल गई। दूर से ढोल-मजीरे की आवाज कानों में साफ सुनाई दे रही थी। घर में लगभग सभी लोग जाग रहे थे।
मैंने बरामदे में देखा तो चाचा जी कपड़े पहनकर कहीं जाने की तैयारी में थे। बाहर दरवाजे पर उनका एक मित्र भी उनका इंतजार कर रहा था।
मैंने पूछा—
“चाचा जी, कहीं जा रहे हो क्या?” वे बनावटी गुस्से में बोले— नहीं तो!” मैंने फिर कहा— “चाचा

Ashok kumar Singh
23 अग॰9 मिनट पठन


रिश्तों की महक, आख़िरी रोटी (अंतिम भाग)
जिस दिन आख़िरी रोटी माँ की थाली में पहुँची... उसी दिन उस घर में रिश्ते फिर से जीवित हो गए।
आँगन में सन्नाटा पसरा हुआ था।
तीनों बेटे अब भी अपनी माँ के सामने सिर झुकाए बैठे थे। किसी की हिम्मत नहीं हो रही थी कि उनकी आँखों में आँखें डाल सके।
सरस्वती देवी ने धीरे से अपने आँसू पोंछे।
फिर उसी ममता भरी आवाज़ में बोलीं—
"इतना मत रोओ बेटा... माँ अपने बच्चों के आँसू नहीं देख सकती।"
राघव ने काँपते हुए हाथों से माँ की खाली थाली उठाई।
उसने रसोई में जाकर वही आख़िरी रोटी उठाई, जिसे अम

Ashok kumar Singh
12 अग॰3 मिनट पठन
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