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रिश्तों की महक आख़िरी रोटी (भाग–5)

  • लेखक की तस्वीर: Ashok kumar Singh
    Ashok kumar Singh
  • 11 अग॰
  • 3 मिनट पठन

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श्राद्ध भोजन में बुजुर्ग महिला को घेरे रोते तीन पुरुष; सादा देसी घर, थाली-रोटी। पोस्टर पर रिश्तों की महक, भाग 5।

दिल को छू लेने वाली मौलिक कहानियाँ लेखक: अशोक कुमार सिंह


माँ की खाली थाली... और तीन बेटों की आँखों से बहते वर्षों पुराने आँसू

गौरी के मासूम प्रश्न के बाद पूरे आँगन में ऐसा सन्नाटा छा गया, मानो समय अचानक ठहर गया हो।

सरस्वती देवी अब भी मुस्कुरा रही थीं।

उन्होंने आख़िरी रोटी के छोटे-छोटे टुकड़े किए और धीरे से कहा—

"लो बिटिया... इसे तुम लोग बाँटकर खा लो। मैं बाद में खा लूँगी।"

लेकिन इस बार उनकी आवाज़ में वही दृढ़ता नहीं थी, जो बरसों पहले हुआ करती थी।

राघव धीरे-धीरे उठा।

उसकी नज़र पहली बार माँ की थाली पर गई।

वहाँ... कोई रोटी नहीं थी।

सिर्फ़ एक कटोरी दाल...

थोड़ा-सा नमक...

और एक गिलास पानी।

राघव का हाथ काँप गया।

उसके मन में बचपन का एक दृश्य बिजली की तरह कौंधा।

उसे याद आया...

एक बरसाती रात।

घर में केवल पाँच रोटियाँ बनी थीं।

चार बच्चों और बाबूजी के बाद जब उसकी बारी आई तो अम्मा ने अपनी थाली की रोटी उसके हाथ में रख दी थी।

उसने पूछा था—

"और तुम क्या खाओगी, अम्मा?"

अम्मा हँसकर बोली थीं—

"अरे... मैं तो रसोई में खा चुकी हूँ।"

आज...

इतने वर्षों बाद...

उसे समझ आया...

उस रात अम्मा झूठ बोली थीं।

उन्होंने खाया नहीं था...

उन्होंने खिलाया था।

मोहन की आँखों से आँसू टपक पड़े।

उसे वह दिन याद आया जब उसकी बोर्ड परीक्षा की फीस जमा करने के लिए अम्मा ने अपनी चाँदी की पायल बेच दी थी।

उन्होंने कभी यह बात बच्चों को नहीं बताई।

बस इतना कहा था—

"पुरानी हो गई थी... पहनने लायक नहीं रही।"

आज वही मोहन करोड़ों का कारोबार संभाल रहा था...

लेकिन माँ के त्याग का हिसाब कभी नहीं रख पाया।

सबसे छोटा सुरेश अब तक चुप बैठा था।

अचानक वह उठकर माँ के पास आया।

घुटनों के बल बैठ गया।

उसने काँपते हाथों से माँ की खाली थाली उठाई।

उसकी आँखों से आँसू लगातार गिर रहे थे।

भर्राई हुई आवाज़ में बोला—

"अम्मा... क्या हर बार ऐसा ही होता था?"

सरस्वती देवी मुस्कुरा दीं।

उन्होंने बेटे के सिर पर हाथ रखा।

"बेटा... माँ की थाली कभी खाली नहीं होती। बच्चों का पेट भर जाए... वही उसका भोजन है।"

यह सुनते ही तीनों भाइयों का धैर्य टूट गया।

राघव ने माँ के चरण पकड़ लिए।

मोहन फूट-फूटकर रोने लगा।

सुरेश ने पहली बार बिना किसी संकोच के माँ को गले लगा लिया।

आँगन में बैठी बहुओं की आँखें भी नम हो चुकी थीं।

छोटी गौरी यह सब देख रही थी।

उसे शायद पूरी बात समझ नहीं आई...

लेकिन इतना ज़रूर समझ आ गया...

कि दादी की रोटी सबसे कीमती है।

उधर चूल्हे की आँच धीरे-धीरे बुझने लगी...

लेकिन उसी पल तीनों बेटों के भीतर माँ के प्रति प्रेम की बुझती हुई लौ फिर से जल उठी।


क्रमशः...


अंतिम भाग में पढ़िए...


"जब आख़िरी रोटी माँ की थाली में रखी गई... और उस घर में वर्षों बाद रिश्तों ने फिर से जन्म लिया।"


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