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रिश्तों की महक आख़िरी रोटी (भाग–3)

  • लेखक की तस्वीर: Ashok kumar Singh
    Ashok kumar Singh
  • 8 अग॰
  • 3 मिनट पठन
दादी परिवार को रोटियाँ परोसती हुई, मेज पर भोजन; पोस्टर पर लिखाः रिश्तों की महक, आशिकी रोटी, भाग-3

दिल को छू लेने वाली मौलिक कहानियाँ लेखक: अशोक कुमार सिंह


जब पूरा परिवार एक साथ बैठा... लेकिन एक थाली अब भी खाली थी।

बरईपुर गाँव का वह छोटा-सा घर वर्षों बाद फिर से चहल-पहल से भर गया था। आँगन में बच्चों की खिलखिलाहट गूँज रही थी। बहुएँ सामान समेट रही थीं और तीनों बेटे बरामदे में बैठकर शहर की बातें कर रहे थे।

उधर रसोई में अम्मा अकेली थीं।

मिट्टी के चूल्हे में जलती लकड़ियों की आँच तेज़ हो चुकी थी। तवे पर पहली रोटी फूली तो अम्मा के चेहरे पर मुस्कान भी खिल उठी।

उन्होंने धीरे से कहा—

"आज फिर मेरा घर, घर जैसा लग रहा है।"

रसोई की चौखट पर खड़ी छोटी गौरी सब कुछ बड़े ध्यान से देख रही थी।

"दादी..."

"हाँ बिटिया।"

"इतनी सारी रोटियाँ अकेले कैसे बना लेती हो?"

अम्मा हँस दीं।

"जिसके हाथों में अपनों का प्यार हो, उसके लिए काम कभी बोझ नहीं बनता।"

गौरी ने मासूमियत से पूछा—

"क्या पापा भी बचपन में यहीं बैठकर खाते थे?"

अम्मा की आँखें चमक उठीं।

उन्होंने तवे से रोटी उतारते हुए कहा—

"यहीं... इसी चूल्हे के पास। तीनों भाई एक-दूसरे से पहले रोटी लेने के लिए झगड़ते थे। कभी-कभी तो मुझे अपनी थाली की रोटी भी उन्हें देनी पड़ती थी।"

गौरी ने भोलेपन से पूछा—

"फिर आप क्या खाती थीं?"

अम्मा कुछ क्षण चुप रहीं।

फिर मुस्कुराकर बोलीं—

"माँ का पेट बच्चों को खाते देखकर ही भर जाता है।"

रसोई के बाहर खड़ा सुरेश यह बात सुन चुका था।

उसने पहली बार महसूस किया कि माँ ने यह बात हँसते हुए कही ज़रूर है, लेकिन उसके पीछे वर्षों का त्याग छिपा है।

थोड़ी देर बाद आँगन में दरी बिछा दी गई।

पीतल की थालियाँ एक-एक करके सजने लगीं।

अम्मा ने सबसे पहले बाबूजी की तस्वीर के सामने एक रोटी रखी और हाथ जोड़कर बोलीं—

"आज देखिए जी... आपका पूरा परिवार फिर एक साथ बैठा है।"

फिर उन्होंने सबकी थालियों में गर्म-गर्म रोटियाँ परोसनी शुरू कर दीं।

राघव मोबाइल पर किसी अधिकारी से बात कर रहा था।

मोहन बीच-बीच में अपने व्यापार की चर्चा कर रहा था।

सुरेश बच्चों को खाना परोस रहा था।

लेकिन...

किसी ने यह नहीं देखा कि रसोई और आँगन के बीच दौड़ती अम्मा ने अभी तक अपने लिए थाली भी नहीं लगाई थी।

गौरी की नज़र बार-बार दादी पर जा रही थी।

उसे लगा...

दादी सबको खिला रही हैं...


पर दादी खुद कब खाएँगी?


उधर तवे पर रोटियाँ सिकती रहीं।

एक...

दो...

तीन...

और फिर...

टोकरी में केवल एक आख़िरी रोटी बची।

अम्मा ने उसे बड़े प्यार से उठाया...

उनकी नज़र पूरे परिवार पर गई...

और होंठों पर वही पुरानी मुस्कान आ गई...


क्रमशः...


अगले भाग में पढ़िए...

"जब एक मासूम बच्ची ने पूछा—'दादी... आपकी थाली कहाँ है?' और पूरे परिवार की आँखें झुक गईं..."


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