top of page
भारतार्थ-logo

रिश्तों की महक आख़िरी रोटी (भाग–4)

  • लेखक की तस्वीर: Ashok kumar Singh
    Ashok kumar Singh
  • 10 अग॰
  • 3 मिनट पठन
गांव के घर में दादी रोटी परोसती हैं, बच्ची पूछती है; पास बैठा परिवार चिंतित है। पोस्टर पर आखिरी रोटी लिखा है

दिल को छू लेने वाली मौलिक कहानियाँ लेखक: अशोक कुमार सिंह


एक मासूम सवाल... जिसने तीन बेटों की ज़िंदगी का सबसे बड़ा सच सामने ला दिया।

आँगन में बिछी दरी पर पूरा परिवार एक साथ बैठा था। वर्षों बाद उस घर में फिर से हँसी सुनाई दे रही थी। पीतल की थालियाँ सजी थीं। मिट्टी के चूल्हे से उठती रोटियों की खुशबू पूरे घर में फैल रही थी।

सरस्वती देवी एक-एक करके सबकी थाली में गर्म रोटियाँ रख रही थीं।

पहले बड़े बेटे राघव की थाली...

फिर मोहन...

फिर सुरेश...

फिर बहुएँ...

फिर पोते-पोतियाँ...

हर बार रोटी रखते हुए उनके चेहरे पर वही संतोष था, जो केवल एक माँ के चेहरे पर होता है।

कुछ ही देर में टोकरी लगभग खाली हो गई।

अम्मा ने तवे पर आख़िरी लोई डाली।

रोटी धीरे-धीरे फूलने लगी।

उसी समय छोटी गौरी ने चारों ओर नज़र दौड़ाई।

सबकी थालियों में रोटियाँ थीं...

लेकिन...

उसने दादी की ओर देखा।

दादी अब भी खड़ी थीं।

उनके सामने कोई थाली नहीं थी।

गौरी ने मासूमियत से पूछा—

"दादी... आपकी थाली कहाँ है?"

पूरा आँगन जैसे एक पल के लिए थम गया।

राघव के हाथ में रखा निवाला वहीं रुक गया।

मोहन ने पहली बार सिर उठाकर माँ की ओर देखा।

सुरेश की नज़र सीधे रसोई के दरवाज़े पर जा टिकी।

अम्मा मुस्कुराईं।

उन्होंने हमेशा की तरह बात को हल्का करने की कोशिश की।

"अरे बिटिया... मैं बाद में खा लूँगी। पहले तुम लोग खा लो।"

लेकिन गौरी मानने वाली नहीं थी।

वह उठकर दादी के पास पहुँची।

रोटी की टोकरी में झाँका।

उसमें केवल एक आख़िरी रोटी बची थी।

उसने वह रोटी उठाई और बोली—

"दादी... यह आपकी है न?"

अम्मा ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—

"नहीं बिटिया... जिसे सबसे ज़्यादा भूख होगी, वह खा लेगा।"

गौरी ने भोलेपन से फिर पूछा—

"दादी... आपको भूख नहीं लगती क्या?"

यह सुनते ही रसोई की दीवारों पर जैसे वर्षों से दबे शब्द गूँज उठे।

राघव की आँखों के सामने बचपन का वह दृश्य कौंध गया जब अम्मा अपनी रोटी उसे खिलाकर कहती थीं—

"मुझे भूख नहीं है बेटा।"

मोहन को याद आया...

कितनी ही बार अम्मा ने अचार और पानी से रात गुज़ार दी थी, ताकि बच्चों का पेट भर सके।

सुरेश की आँखों से आँसू बह निकले।

उसे समझ आ गया...

माँ ने कभी यह नहीं कहा कि वह भूखी है...

क्योंकि माँ की भूख हमेशा बच्चों की भूख से हार जाती है।

आँगन में सन्नाटा था।

चूल्हे की आग अब भी जल रही थी...

लेकिन तीनों बेटों के भीतर पश्चाताप की आग उससे कहीं अधिक धधक रही थी।

क्रमशः...


अगले भाग में पढ़िए...


"जब तीनों बेटों ने माँ की खाली थाली देखी... और वर्षों से सीने में दबा अपराधबोध आँसुओं में बह निकला।"

अन्य कहानी , मार्गदर्शन एवं प्रेरणादायी ज़रूर पढ़िए


केवल भारतार्थ ख़बर पर प्रकाशित मौलिक धारावाहिक एउपन्यास — मौन दान

एक दिल दहलाने वाली कहानी धारावाहिक उपन्यास जरूर पढ़ि


नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में इन पोस्ट्स पर अपनी राय ज़रूर दें। आपका नज़रिया ही लोकतंत्र की ताकत है; देश के निर्माण में आपकी अहम भूमिका है।


सटीक, वैज्ञानिक और साहित्यिक खबरें पढ़ने के लिए 'भारतार्थ समाचार' से जुड़े रहें।

अपना समर्थन दिखाएं—हमें लाइक, शेयर और फ़ॉलो करें—ताकि हर ज़रूरी अपडेट आपको सबसे पहले मिले।

ताज़ा खबरों के लिए "भारतार्थ खबर" के साथ बने रहें।

टिप्पणियां

5 स्टार में से 0 रेटिंग दी गई।
अभी तक कोई रेटिंग नहीं

रेटिंग जोड़ें
bottom of page