गोस्वामी तुलसीदास का काव्य में परिवार प्रबोधन
- धन्नाराम चौधरी

- 19 अग॰
- 3 मिनट पठन

डॉ. वीरमाराम पटेल लेखक एवं कवि, गुड़ामालानी, बालोतरा भारत की पहचान विश्व में परिवार व्यवस्था के कारण अनोखी है। परिवार हमारी सांस्कृतिक धरोहर है और वर्तमान में इसी धरोहर का आधार है महाकवि तुलसीदास के साहित्य में निहित परिवार भाव। उनके साहित्य में परिवार का आवरण केवल रक्त के रिश्ते से नहीं अपितु जड़-चेतन के प्रति परिवार भाव है। प्रभु श्री राम परिवार परिवेश को अगर आदर्श आमने तो आज वहीं भाव हमारे समाज के परिवारों का है लेकिन आज के परिवार बिखराव के दौर में है। प्रभु श्री का परिवार बिखकर भी एक है। यही भाव आज के समाज में कम होता जा रहा है। वर्तमान में एकल परिवारों, पीढ़ीगत अंतराल और पारिवारिक बिखराव के दौर में तुलसीदास का साहित्य अत्यंत प्रासंगिक हो जाता है।
तुलसीदास रामचरितमानस में तुलसीदास जी ने विभिन्न संबंधों—माता-पिता, भाई-भाई, पति-पत्नी और गुरु-शिष्य के आचरण को लेकर लिखते हैं कि जिस घर में सुमति (सद्भाव) होती है, वहाँ संपत्ति और सुख स्वतः निवास करते हैं- जहाँ सुमति तहँ संपत्ति नाना। जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना॥
आज हम परिवार में जमीन विवाद को लेकर मनमुटाव और रक्त-रंजीश आपसी भाइयों के झगड़े को समाचर-पत्रों में पढ़ते है, वहीं मानस के अयोध्याकाण्ड में भरत और राम का चरित्र 'अधिकार त्यागने' की प्रतिस्पर्धा दिखाता है-
भरत प्राणप्रिय पावहिं राजू। विधि सब विधि मोहि दीन्ह सुकाजू॥
जौं अनीति कछु भाषौं भाई। तौ मोहि कोइ न कहौ भलाई॥
इस पद में श्रीराम भरत के राजा बनने की बात सुनकर अत्यंत हर्षित होते हैं। वे संपत्ति या पद को नहीं, बल्कि भाई के प्रेम और उसके आत्म-संतोष को सर्वोपरि मानते हैं।
केवल भाई से झगड़ा ही नहीं अपितु माता-पिता से भी मतभेद होकर वृद्धाश्रम की ओर रूख अनेक युगल दिखायी देते हैं, तब रामचरितमानस समाज को माता-पिता के प्रति संतानों के कर्तव्यों से अवगत करवाता है। माता-पिता के वचन को अपना धर्म समझकर पालन करना संतानों का कर्तव्य है- बालकाण्ड में लिखा कि-
प्रातकाल उठि कै रघुनाथा। मातु पिता गुरु नावहिं माथा॥
आयसु मागि करहिं पुर काजा। देखि चरित हरषइ मुनिराजा॥
पितु आयसु सब धरम कहुँ टीका। मातु पिता गुर बचन अमीका॥ (अयोध्याकाण्ड)
अत: प्रातःकाल उठकर बड़ों को प्रणाम करना केवल शिष्टाचार नहीं, बल्कि परिवार के संस्कारों की नींव है। पिता के आदेश पर राज्य त्यागकर वन जाने में राम कोई कष्ट नहीं, अपितु परम धर्म देखते हैं। इसमें पिता का इतना बड़ा आदर्श है कि राम के बिना तीन दिन तक जीवित नहीं रह सके। आज के युग में राम और दशरथ जैसे चरित्रों के समन्वय से ही परिवार चल सकता हैं अगर एक में कमी है तो परिवार की नींव डगमगाने लगेगी।
इसके अलावा आज दंपती के बीच के विवादों से न्यायालय में अनेक वाद के निपटारे बाकी है। दम्पति के बीच केवल अधिकार नहीं, बल्कि एक-दूसरे के संकट में संबल बनने का भाव तुलसीदास का साहित्य देता है।
जहँ तिय देह धरहि अनुगामी। सोइ सुखु सोइ सुहागु जग स्वामी॥ (अयोध्याकाण्ड-सीता-राम संवाद)
सीता जी राम से कहती हैं कि जहाँ राम हैं, वही उनका महल और सुख है। तुलसीदास ने पति-पत्नी के रिश्ते को केवल 'सहमति' नहीं, बल्कि 'सह-अस्तित्व और सुख-दुःख के साझापन' का माध्यम माना है।
सास बहू के झगड़े अक्सर आज परिवार टूटने के कारण बनते हैं। सुमित्रा जी अपनी बहुओं (सीता व उर्मिला) और पुत्रों को निःस्वार्थ सेवा का उपदेश देती हैं-

तात ताव कहुँ मातु वैदेही। पिता रामु सब भांति सनेही॥ (अयोध्याकाण्ड)
यहाँ माता सुमित्रा अपने पुत्र लक्ष्मण से कहती हैं कि वन में सीता ही तुम्हारी माता हैं और राम तुम्हारे पिता। यह पद दर्शाता है कि एक आदर्श सास-माता परिवार के व्यापक हित के लिए स्वार्थ से ऊपर उठकर संस्कार देती है।
भारतीय संस्कारों एवं परिवार व्यवस्था में अधिकारों के स्थान पर कर्तव्यों की प्राथमिकता दी है। एक सशक्त परिवार का यही आधार है, लेकिन मूल्यहीनता के कारण आज परिवार टूट रहे हैं। तुलसीदास संवाद और त्याग को परिवार के लिए आवश्यक मानते हैं जिससे संस्कारों का हस्तांतरण होता है, जहाँ नई पीढ़ी बड़ों के आचरण को देखकर मर्यादा और शील सीखती है।
डॉ. वीरमाराम पटेल लेखक एवं कवि, गुड़ामालानी, बालोतरा
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