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 भारतार्थ खबर, नहीं उसका अर्थ

20अक्टूबर /2026 /मंगलवार

अलुवा,19 अक्टूबर 2026। कभी-कभी जीवन में सुनी गई कोई बात या देखा गया कोई वीडियो सोचने का नजरिया बदल देता है। केरल की अरुंधति के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के एक वीडियो से प्रेरित अरुंधति ने उन्हें हाथ से लिखा भावुक पत्र भेजकर अपनी शादी में शामिल होने का निमंत्रण दिया है। उनकी शादी 20 दिसंबर 2026 को केरल के अलुवा में होनी है।

भारतार्थ लोगो: खबर नहीं, उसका अर्थ - राजनीतिक समाचार विश्लेषण

अलुवा,19 अक्टूबर 2026। कभी-कभी जीवन में सुनी गई कोई बात या देखा गया कोई वीडियो सोचने का नजरिया बदल देता है। केरल की अरुंधति के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के एक वीडियो से प्रेरित अरुंधति ने उन्हें हाथ से लिखा भावुक पत्र भेजकर अपनी शादी में शामिल होने का निमंत्रण दिया है। उनकी शादी 20 दिसंबर 2026 को केरल के अलुवा में होनी है।

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  • लक्षद्वीप में शराब नीति पर विवाद, सांसद बोले—युवाओं और सामाजिक ताने-बाने पर पड़ेगा असर

    भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) कवारत्ती। केंद्रशासित प्रदेश लक्षद्वीप में कुछ द्वीपों पर शराब उपलब्ध कराने के प्रशासनिक फैसले को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। इस निर्णय का स्थानीय स्तर पर विरोध शुरू हो गया है और जनप्रतिनिधियों ने भी इस पर गंभीर चिंता जताई है। क्षेत्र के सांसद मोहम्मद हमदुल्ला सईद ने कहा है कि इस तरह के कदम से युवाओं में नशे की प्रवृत्ति बढ़ सकती है और समाज में तनाव की स्थिति पैदा हो सकती है। सांसद ने एक बयान जारी करते हुए कहा कि लक्षद्वीप की सामाजिक संरचना अब तक अपेक्षाकृत शांत और संयमित रही है, जहां शराब पर कड़े नियंत्रण के कारण सामाजिक संतुलन बना हुआ था। उन्होंने आशंका जताई कि यदि कुछ द्वीपों पर शराब की उपलब्धता बढ़ाई जाती है, तो इसका नकारात्मक प्रभाव विशेष रूप से युवाओं पर पड़ेगा। इससे न केवल स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं बढ़ेंगी, बल्कि पारिवारिक और सामाजिक विवादों में भी वृद्धि हो सकती है। स्थानीय नागरिकों और सामाजिक संगठनों ने भी इस फैसले का विरोध करते हुए कहा कि यह निर्णय द्वीपों की सांस्कृतिक पहचान और पारंपरिक जीवनशैली के विपरीत है। उनका कहना है कि प्रशासन को पर्यटन को बढ़ावा देने के नाम पर ऐसे कदम उठाने से पहले स्थानीय समुदाय की राय अवश्य लेनी चाहिए थी। प्रशासन का पक्ष है कि यह कदम पर्यटन उद्योग को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से उठाया गया है। अधिकारियों के अनुसार, कुछ चुनिंदा द्वीपों पर नियंत्रित तरीके से शराब उपलब्ध कराने से पर्यटकों की संख्या में वृद्धि हो सकती है, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को लाभ मिलेगा। हालांकि, इस दावे को लेकर भी मतभेद सामने आ रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि पर्यटन विकास और सामाजिक संतुलन के बीच संतुलित नीति बनाना जरूरी है। यदि स्थानीय भावनाओं और सांस्कृतिक संवेदनशीलता की अनदेखी की जाती है, तो इससे दीर्घकालिक सामाजिक असंतोष उत्पन्न हो सकता है। फिलहाल, यह मुद्दा प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। आने वाले समय में इस पर क्या निर्णय लिया जाएगा, इस पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।

  • गेहूं-सरसों खरीद नियमों पर बवाल: सुरजेवाला बोले—‘तुगलकी फरमान’ से किसानों को राहत दे सरकार

    भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) चंडीगढ़। हरियाणा में गेहूं और सरसों की सरकारी खरीद को लेकर बनाए गए नए नियमों पर सियासत तेज हो गई है। कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव एवं राज्यसभा सांसद रणदीप सिंह सुरजेवाला ने राज्य और केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए इन्हें “तुगलकी फरमान” करार दिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि नई प्रक्रियागत शर्तों के जरिए किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर फसल बेचने से रोकने की कोशिश की जा रही है। रविवार को प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय में पत्रकारों से बातचीत के दौरान सुरजेवाला ने कहा कि तीन कृषि कानूनों की वापसी के बाद अब सरकार ने नए नियमों के माध्यम से किसानों के सामने बाधाएं खड़ी करनी शुरू कर दी हैं। उन्होंने कहा कि खरीद प्रक्रिया को जानबूझकर इतना जटिल बनाया जा रहा है कि किसान खुद ही मंडियों में आने से हतोत्साहित हो जाएं। ट्रैक्टर-ट्रॉली नियम पर उठाए सवाल सुरजेवाला ने ट्रैक्टर-ट्रॉली के रजिस्ट्रेशन नंबर को अनिवार्य बनाने और फसल की फोटो लेकर पोर्टल पर अपलोड करने की शर्तों को अव्यावहारिक बताया। उन्होंने सवाल उठाया कि जिन किसानों के पास खुद का ट्रैक्टर-ट्रॉली नहीं है, वे इन नियमों का पालन कैसे करेंगे। साथ ही किराए के साधनों के उपयोग को लेकर भी उन्होंने स्पष्टता मांगी। समय सीमा से बढ़ेगी परेशानी सरकार द्वारा मंडियों में फसल लाने का समय सुबह 6 बजे से रात 8 बजे तक तय किए जाने पर भी उन्होंने आपत्ति जताई। उनका कहना है कि कटाई के मौसम में किसान अक्सर रात के समय भी फसल लेकर मंडियों में पहुंचते हैं। ऐसे में यह समय सीमा लंबी कतारों, अतिरिक्त खर्च और अव्यवस्था को जन्म देगी। बायोमेट्रिक अनिवार्यता पर भी विरोध ‘मेरी फसल, मेरा ब्योरा’ पोर्टल के तहत बायोमेट्रिक सत्यापन को अनिवार्य बनाने पर सुरजेवाला ने कहा कि यह व्यवस्था किसानों के लिए व्यवहारिक नहीं है। उन्होंने कहा कि कटाई के दौरान किसान खेतों में व्यस्त रहते हैं, ऐसे में हर बार मंडी में उपस्थित होकर अंगूठा लगाना संभव नहीं होगा। इसके अलावा तकनीकी खामियों और इंटरनेट की समस्या से प्रक्रिया और जटिल हो सकती है। भूमिहीन किसानों के लिए मुश्किलें उन्होंने पट्टे पर खेती करने वाले किसानों की स्थिति पर भी चिंता जताई। सुरजेवाला के अनुसार, ऐसे किसानों को जमीन मालिक की अनुपस्थिति में फसल बेचने में दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा। साथ ही फसल उठान के लिए तीन अलग-अलग अधिकारियों के हस्ताक्षर की अनिवार्यता को भी उन्होंने अनावश्यक बताया। खरीद लक्ष्य घटाने पर सवाल सुरजेवाला ने सरकार से यह भी पूछा कि गेहूं खरीद का लक्ष्य 80 लाख टन से घटाकर 72 लाख टन क्यों किया गया है, जबकि बड़ी संख्या में किसानों ने पंजीकरण कराया है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि सरकार ने इन नियमों में तुरंत सुधार नहीं किया, तो किसान और खेत मजदूर आंदोलन के लिए सड़कों पर उतरने को मजबूर होंगे। इस मुद्दे पर अब राजनीतिक घमासान तेज होने के संकेत मिल रहे हैं, और आने वाले दिनों में यह विवाद और गहराने की संभावना है।

  • तमिलनाडु चुनाव में सीटों की ‘बिक्री’ का आरोप, कांग्रेस में बढ़ी अंदरूनी कलह

    भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) मार्तंडम (तमिलनाडु)। तमिलनाडु विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस पार्टी के भीतर मतभेद खुलकर सामने आने लगे हैं। पार्टी की सीट-बंटवारे और उम्मीदवार चयन प्रक्रिया को लेकर उठे विवाद ने अब सियासी तूल पकड़ लिया है। भारतीय जनता पार्टी की नेता एस. विजयधारानी ने कांग्रेस पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि पार्टी में सीटें ‘बेची’ जा रही हैं और उम्मीदवारों का चयन अलोकतांत्रिक तरीके से किया जा रहा है। यह विवाद तब शुरू हुआ जब कांग्रेस सांसद एस. जोतिमणि ने सार्वजनिक रूप से डीएमके-नेतृत्व वाले गठबंधन में सीट बंटवारे की प्रक्रिया पर सवाल उठाए। उनके बयान के एक दिन बाद विजयधारानी ने उनके आरोपों का समर्थन करते हुए कहा कि यह समस्या नई नहीं है, बल्कि लंबे समय से चली आ रही है। विजयधारानी, जिन्होंने वर्ष 2024 में कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थामा था, ने कहा कि पार्टी के भीतर सीटों के लिए लेन-देन जैसी स्थिति पहले भी देखी जा चुकी है। उन्होंने कहा, “जोतिमणि ने जो कहा है, वह सच्चाई है। कांग्रेस में सीटें बेचे जाने की बात सबको पता है। अब यह खुलकर सामने आ रही है, जिससे पार्टी की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।” उन्होंने आगे कहा कि इस तरह की प्रक्रिया न केवल लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है, बल्कि इससे जमीनी स्तर पर वर्षों से मेहनत कर रहे कार्यकर्ताओं का मनोबल भी टूटता है। विजयधारानी ने मतदाताओं से अपील की कि वे ऐसी राजनीति का विरोध करें और ऐसे उम्मीदवारों को नकारें। वहीं, जोतिमणि ने भी पार्टी नेतृत्व के प्रति नाराजगी जताते हुए कहा कि समर्पित कार्यकर्ताओं की अनदेखी की जा रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि जिन लोगों ने पार्टी के लिए न्यूनतम योगदान भी नहीं दिया, उन्हें प्राथमिकता दी जा रही है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि ‘किराए या बिक्री आधारित’ सीट आवंटन की यह प्रवृत्ति जारी रही, तो तमिलनाडु में कांग्रेस का भविष्य संकट में पड़ सकता है। सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी बात रखते हुए जोतिमणि ने कहा, “यदि यही स्थिति बनी रही, तो राज्य में कांग्रेस पार्टी को बचाना मुश्किल हो जाएगा।” गौरतलब है कि 23 अप्रैल 2026 को होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए 234 सदस्यीय तमिलनाडु विधानसभा में कांग्रेस को डीएमके गठबंधन के तहत 28 सीटें आवंटित की गई हैं। हालांकि, जोतिमणि ने आरोप लगाया कि इन सीटों के चयन की प्रक्रिया बेहद गोपनीय तरीके से पूरी की गई और इसमें पार्टी कार्यकर्ताओं व स्थानीय नेताओं की राय को नजरअंदाज किया गया। तमिलनाडु की राजनीति में इस विवाद ने चुनावी माहौल को और गर्म कर दिया है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस नेतृत्व इन आरोपों पर क्या प्रतिक्रिया देता है और इसका आगामी चुनाव परिणामों पर क्या असर पड़ता है।

  • केरल चुनाव: कांग्रेस ने दोहराया ‘भाजपा–सीपीआई(एम) समझौते’ का आरोप, सियासी घमासान तेज

    भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) कोच्चि। केरल विधानसभा चुनाव से पहले सियासी आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज हो गया है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रमेश चेन्नीथला ने एक बार फिर भारतीय जनता पार्टी और सीपीआई (एम) के बीच कथित ‘गुप्त समझौते’ का आरोप दोहराते हुए राज्य की राजनीति में हलचल बढ़ा दी है। रविवार को मीडिया से बातचीत में चेन्नीथला ने दावा किया कि भाजपा और सीपीआई (एम) के बीच यह समझौता आगामी 9 अप्रैल 2026 को होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले किया गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि यह कथित समझौता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के बीच हुआ है। उन्होंने कहा, “हमने इस समझौते का खुलासा किया है और अब राज्यभर में इस पर व्यापक चर्चा हो रही है। भाजपा और सीपीआई (एम) मिलकर कांग्रेस को सत्ता में आने से रोकना चाहते हैं।” कांग्रेस के इस आरोप को पार्टी के अन्य वरिष्ठ नेताओं का भी समर्थन मिला है। केरल विधानसभा में विपक्ष के नेता वीडी सतीशन ने भी पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के साथ मिलकर यह दावा किया है कि राज्य की लगभग 10 सीटों पर भाजपा और वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ) के बीच ‘अघोषित तालमेल’ है। चेन्नीथला ने 2021 के विधानसभा चुनाव का हवाला देते हुए कहा कि उस समय भी इसी प्रकार का समझौता हुआ था। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री मोदी ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ की नीति पर काम कर रहे हैं, जबकि मुख्यमंत्री विजयन कांग्रेस को सत्ता से दूर रखना चाहते हैं। “इसी कारण दोनों के हित एक जगह आकर मिल रहे हैं,” उन्होंने कहा। राज्य की राजनीतिक पृष्ठभूमि पर नजर डालें तो कांग्रेस के नेतृत्व वाला संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (यूडीएफ) वर्ष 2011 से 2016 तक सत्ता में रहा था। इसके बाद 2016 और 2021 के चुनावों में एलडीएफ ने जीत हासिल कर सरकार बनाई। हालांकि, कांग्रेस के इन आरोपों को सत्तारूढ़ पक्ष ने खारिज किया है। मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने पलटवार करते हुए विपक्ष के नेता वीडी सतीशन के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से कथित संबंधों पर सवाल उठाए हैं और कांग्रेस पर ‘भ्रामक राजनीति’ करने का आरोप लगाया है। इस बीच, कांग्रेस नेता चेन्नीथला ने आगामी चुनावों में यूडीएफ की जीत का दावा करते हुए कहा कि जनता इस ‘कथित समझौते’ को समझ चुकी है और इसका असर चुनाव परिणामों में दिखाई देगा। “यूडीएफ स्पष्ट बहुमत के साथ सत्ता में वापसी करेगी,” उन्होंने विश्वास जताया। केरल में चुनावी तारीख नजदीक आते ही राजनीतिक बयानबाजी और तेज होने के संकेत मिल रहे हैं, जिससे आगामी मुकाबला और भी दिलचस्प होता जा रहा है।

  • कांग्रेस सूची पर बंगाल में बवाल: मालदा दफ्तर में चलीं कुर्सियां, सड़कों पर उतरे कार्यकर्ता

    भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) कोलकाता/मालदा। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 से पहले इंडियन नेशनल कांग्रेस द्वारा उम्मीदवारों की सूची जारी होते ही राज्य के कई जिलों में विरोध और आक्रोश का माहौल देखने को मिला। खासतौर पर मालदा में स्थिति उस समय बिगड़ गई जब पार्टी कार्यालय के भीतर ही नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच तीखी झड़प हो गई और कुर्सियां तक चलने लगीं। रविवार दोपहर कांग्रेस ने 284 उम्मीदवारों की सूची जारी की। सूची जारी होने के कुछ ही मिनटों बाद मालदा स्थित पार्टी कार्यालय के बाहर बड़ी संख्या में कार्यकर्ता और समर्थक जमा हो गए। स्थानीय नेता आसिफ महबूब को उम्मीदवार बनाए जाने के फैसले से नाराज कार्यकर्ताओं ने जमकर हंगामा किया। स्थिति इतनी तनावपूर्ण हो गई कि देखते ही देखते विवाद हाथापाई में बदल गया और कार्यालय के भीतर कुर्सियां फेंकी जाने लगीं। सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची और हालात को काबू में करने का प्रयास किया। हालांकि, इस दौरान किसी गंभीर रूप से घायल होने की सूचना नहीं है। आक्रोशित कार्यकर्ताओं ने न केवल पार्टी कार्यालय में तोड़फोड़ की, बल्कि सड़कों पर उतरकर टायर जलाए और पश्चिम बंगाल कांग्रेस कमेटी के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि उम्मीदवार चयन में स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं की अनदेखी की गई है। इस बीच कांग्रेस ने अपने प्रमुख नेताओं पर दांव खेलते हुए अधीर रंजन चौधरी को बहरामपुर सीट से मैदान में उतारा है। पार्टी को उम्मीद है कि उनके चुनाव लड़ने से मुर्शिदाबाद, मालदा और नादिया जिलों की करीब 50 सीटों पर सकारात्मक असर पड़ेगा। वहीं मालतीपुर से मौसम नूर को टिकट देकर मुकाबले को रोचक बनाने की कोशिश की गई है। कांग्रेस ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खिलाफ भी उम्मीदवार खड़ा किया है। चुनाव कार्यक्रम की बात करें तो भारत निर्वाचन आयोग के अनुसार पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव दो चरणों में आयोजित होंगे। राज्य में 23 और 29 अप्रैल 2026 को मतदान होगा, जबकि 4 मई 2026 को मतगणना के बाद यह स्पष्ट होगा कि सत्ता में बदलाव होता है या एक बार फिर ‘खेला होबे’ का नारा गूंजता है। फिलहाल, उम्मीदवारों की घोषणा के बाद उभरा असंतोष कांग्रेस के लिए चुनाव से पहले एक बड़ी चुनौती बनकर सामने आया है, जिसे संभालना पार्टी नेतृत्व के लिए जरूरी हो गया है।

  • केरल चुनाव: महिला वोटर्स पर कांग्रेस का बड़ा दांव, मुफ्त बस सफर और बीमा योजनाओं से साधने की कोशिश

    भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) कोच्चि/तिरुवनंतपुरम। केरल विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी सरगर्मियां तेज हो गई हैं। आगामी 9 अप्रैल 2026 को होने वाले मतदान से पहले कांग्रेस ने महिला मतदाताओं को केंद्र में रखते हुए कई लोकलुभावन घोषणाएं की हैं। पार्टी को उम्मीद है कि महिलाओं के लिए मुफ्त बस यात्रा, युवतियों को आर्थिक सहायता और बीमा जैसी योजनाएं चुनाव में उसे बढ़त दिला सकती हैं। राज्य की 140 विधानसभा सीटों के लिए होने जा रहे इस चुनाव में कांग्रेस के नेतृत्व वाला संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (यूडीएफ) और वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ) के बीच सीधा मुकाबला माना जा रहा है। पिछले चुनाव में एलडीएफ ने 99 सीटों के साथ स्पष्ट बहुमत हासिल किया था, जबकि यूडीएफ को 41 सीटों से संतोष करना पड़ा था। इस बार कांग्रेस ने अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव करते हुए महिला मतदाताओं को विशेष प्राथमिकता दी है। पार्टी ने महिलाओं के लिए मुफ्त बस यात्रा की घोषणा की है, वहीं युवतियों को प्रतिमाह 1,000 रुपये की सहायता और 25 लाख रुपये तक का बीमा कवर देने का वादा किया है। इन योजनाओं के जरिए कांग्रेस महिला वोट बैंक को अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रही है। चुनावी आंकड़ों पर नजर डालें तो केरल में महिला मतदाताओं की संख्या पुरुषों से अधिक है। राज्य में कुल लगभग 2.70 करोड़ मतदाता हैं, जिनमें 1.38 करोड़ महिलाएं और 1.31 करोड़ पुरुष शामिल हैं। ऐसे में महिला मतदाता इस चुनाव में निर्णायक भूमिका निभा सकती हैं। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शशि थरूर ने दावा किया है कि राज्य की जनता एलडीएफ सरकार से बदलाव चाहती है। उन्होंने आरोप लगाया कि मौजूदा सरकार के कार्यकाल में शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं का ढांचा कमजोर हुआ है। वहीं कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने भी यूडीएफ की जीत का भरोसा जताते हुए कहा कि इस बार केरल बदलाव के लिए मतदान करेगा। चुनाव में जीत सुनिश्चित करने के लिए कांग्रेस संगठनात्मक स्तर पर भी सक्रिय नजर आ रही है। पार्टी नेतृत्व ने संभावित भीतरघात को रोकने के लिए नाराज नेताओं और कार्यकर्ताओं से संवाद शुरू किया है। टिकट वितरण से असंतुष्ट नेताओं को मनाने के प्रयास किए जा रहे हैं ताकि चुनाव के दौरान किसी तरह की आंतरिक कलह से बचा जा सके। केरल की 140 सीटों में से 124 सामान्य, 14 अनुसूचित जाति और 2 अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बार महिला मतदाताओं की भूमिका चुनाव परिणाम तय करने में अहम साबित हो सकती है। अब सभी की निगाहें 9 अप्रैल 2026 पर टिकी हैं, जब राज्य की जनता अपने मताधिकार का प्रयोग कर अगली सरकार का फैसला करेगी।

  • बंगाल में ‘दीदी बनाम भाजपा’ की जंग तेज, ममता की तीन ताकतों पर टिकी टीएमसी की उम्मीदें

    भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) कोलकाता। देश के कई राज्यों—असम, केरल, तमिलनाडु और केंद्रशासित प्रदेश पुदुचेरी—में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं, लेकिन सियासी नजरें सबसे ज्यादा पश्चिम बंगाल पर टिकी हैं। मीडिया और राजनीतिक गलियारों में मुकाबला सीधे तौर पर ममता बनर्जी बनाम भाजपा के रूप में देखा जा रहा है। जहां अन्य राज्यों में क्षेत्रीय समीकरण और स्थानीय मुद्दे चुनावी दिशा तय कर रहे हैं, वहीं बंगाल में यह चुनाव राष्ट्रीय राजनीतिक प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया है। खासकर भाजपा के लिए, जो पिछले एक दशक में कई राज्यों में सत्ता हासिल कर चुकी है, लेकिन बंगाल अब भी उसके लिए चुनौती बना हुआ है। क्यों खास है बंगाल का चुनाव? पश्चिम बंगाल में इस बार दो चरणों में मतदान हो रहा है, जो चुनाव की संवेदनशीलता और महत्व को दर्शाता है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह चुनाव केवल राज्य सरकार के गठन तक सीमित नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में विपक्ष की दिशा भी तय कर सकता है। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा इस चुनाव को प्रतिष्ठा की लड़ाई मानकर पूरी ताकत झोंक रही है, जबकि ममता बनर्जी अपने गढ़ को बचाने के लिए आक्रामक रणनीति अपना चुकी हैं। टीएमसी की तीन बड़ी ताकतें राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) इस बार तीन प्रमुख स्तंभों के सहारे चुनावी मैदान में मजबूत स्थिति में है: 1.बंटा हुआ और कमजोर विपक्ष: बंगाल में विपक्षी वोटों का विभाजन टीएमसी के लिए सबसे बड़ा लाभ साबित हो रहा है। भाजपा मुख्य चुनौती है, लेकिन अन्य दलों की उपस्थिति से विपक्षी एकजुटता कमजोर नजर आती है। 2.जनकल्याणकारी योजनाओं का असर: राज्य सरकार की ओर से विभिन्न वर्गों—महिलाओं, किसानों और गरीबों—के लिए चलाई जा रही योजनाओं ने टीएमसी के पक्ष में एक मजबूत सामाजिक आधार तैयार किया है। मुफ्त सुविधाओं और आर्थिक सहायता योजनाओं का सीधा असर वोटरों पर देखा जा रहा है। 3.‘फाइटर’ इमेज: स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के मुद्दे पर ममता बनर्जी की आक्रामक भूमिका ने उनकी ‘लड़ाकू नेता’ की छवि को और मजबूत किया है। कोलकाता से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक इस मुद्दे को उठाकर उन्होंने खुद को बंगाल की पहचान और अधिकारों की रक्षक के रूप में पेश किया है। भाजपा की रणनीति और चुनौतियां भाजपा इस बार घुसपैठ, कानून-व्यवस्था, बेरोजगारी और उद्योगों की कमी जैसे मुद्दों को जोर-शोर से उठा रही है। पार्टी को उम्मीद है कि SIR प्रक्रिया में नाम कटने से प्रभावित मतदाता उसके पक्ष में आ सकते हैं। हालांकि, विश्लेषकों का मानना है कि पिछले पांच वर्षों में भाजपा राज्य में कोई बड़ा जनआंदोलन खड़ा नहीं कर सकी, जिससे उसे जमीनी स्तर पर अपेक्षित मजबूती नहीं मिल पाई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैलियों से चुनावी माहौल जरूर गर्म होता है, लेकिन उसे वोटों में बदलना अब भी चुनौती बना हुआ है। बदलती रणनीति में ममता आगे इस बार ममता बनर्जी ने अपनी चुनावी रणनीति में बड़ा बदलाव किया है। जहां पहले वह धार्मिक नारों से दूरी बनाकर रखती थीं, वहीं अब मंदिर निर्माण और धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल भी कर रही हैं। उन्होंने भाजपा पर सांस्कृतिक हस्तक्षेप का आरोप लगाते हुए मछली जैसे स्थानीय खाद्य और बंगाली पहचान के मुद्दों को चुनावी बहस का हिस्सा बनाया है। इससे वे सीधे आम मतदाताओं से जुड़ने की कोशिश कर रही हैं। ‘ममता बनर्जी बनाम कौन?’ बंगाल का चुनाव इस सवाल को भी जन्म दे रहा है कि भाजपा के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर सबसे मजबूत चेहरा कौन है। कांग्रेस से अलग, ममता बनर्जी को एक ऐसे नेता के रूप में देखा जा रहा है, जो सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चुनौती दे रही हैं। करीब चार दशक की राजनीतिक पारी में उन्होंने राज्य में वामपंथी शासन का अंत किया और अब खुद को राष्ट्रीय विपक्ष के प्रमुख चेहरे के रूप में स्थापित करने की कोशिश में हैं। भाजपा के लिए प्रतिष्ठा की लड़ाई भाजपा ने बिहार, ओडिशा, असम और त्रिपुरा जैसे राज्यों में अपनी पकड़ मजबूत की है, लेकिन बंगाल अब भी उसकी पहुंच से दूर है। 2021 के विधानसभा चुनाव में बड़े दावों के बावजूद पार्टी 77 सीटों पर सिमट गई थी। ऐसे में इस बार का चुनाव भाजपा के लिए सिर्फ एक और राज्य जीतने का प्रयास नहीं, बल्कि वैचारिक और राजनीतिक प्रतिष्ठा की परीक्षा भी है। पश्चिम बंगाल का चुनाव इस बार बहुआयामी हो गया है—स्थानीय मुद्दे, सांस्कृतिक पहचान, राष्ट्रीय राजनीति और नेतृत्व की छवि—ऑल - इन - वन। एक ओर ममता बनर्जी अपनी ‘फाइटर’ छवि, जनकल्याण योजनाओं और सामाजिक समीकरणों के दम पर सत्ता में वापसी का दावा कर रही हैं, तो दूसरी ओर भाजपा पूरे दमखम से इस किले को फतह करने की कोशिश में जुटी है। अब देखना दिलचस्प होगा कि बंगाल की जनता किस पर भरोसा जताती है—स्थानीय ‘दीदी’ पर या राष्ट्रीय नेतृत्व के दावों पर।

  • लखीमपुर में आज कांग्रेस का घोषणापत्र जारी करेंगे खड़गे, जनसभा से चुनावी शंखनाद

    भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) गुवाहाटी। असम विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी सरगर्मियां तेज हो गई हैं। मल्लिकार्जुन खड़गे रविवार को लखीमपुर में कांग्रेस का बहुप्रतीक्षित घोषणापत्र जारी करेंगे और विशाल जनसभा को संबोधित कर चुनावी अभियान को धार देंगे। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (एआईसीसी) के महासचिव जितेंद्र सिंह ने गुवाहाटी में आयोजित प्रेसवार्ता में बताया कि पार्टी का घोषणापत्र कई महीनों की व्यापक तैयारी और जनसंवाद के बाद तैयार किया गया है। उन्होंने कहा कि राज्य के विभिन्न वर्गों, संगठनों और आम नागरिकों से सुझाव लेकर इसे अंतिम रूप दिया गया है, जिससे यह दस्तावेज जनता की आकांक्षाओं का प्रतिबिंब बने। उन्होंने जानकारी दी कि खड़गे लखीमपुर दौरे के दौरान घोषणापत्र जारी करने के साथ-साथ एक बड़ी जनसभा को भी संबोधित करेंगे, जिसमें पार्टी अपनी नीतियों और वादों को जनता के सामने रखेगी। इस दौरान कांग्रेस ने राज्य की भारतीय जनता पार्टी नीत सरकार पर तीखा हमला बोला। जितेंद्र सिंह ने आरोप लगाया कि राज्य में भय और दबाव का माहौल है। उन्होंने कहा कि यदि कोई व्यक्ति सरकार की आलोचना करता है, तो उसके खिलाफ त्वरित कार्रवाई की जाती है। साथ ही, उन्होंने मीडिया संस्थानों की स्वतंत्रता पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि भ्रष्टाचार उजागर करने वालों को खतरे का सामना करना पड़ रहा है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा पर निशाना साधते हुए सिंह ने कहा कि वे अपनी पार्टी की उपलब्धियों के बजाय कांग्रेस पर अधिक ध्यान केंद्रित करते हैं। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि भाजपा आंतरिक रूप से गुटबाजी का शिकार हो चुकी है। इसके साथ ही पूर्व मुख्यमंत्री एवं केंद्रीय मंत्री सरबानंद सोनोवाल का जिक्र करते हुए उन्होंने आरोप लगाया कि पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को भी दरकिनार किया जा रहा है। कांग्रेस नेता ने दावा किया कि आगामी चुनाव में कांग्रेस नीत गठबंधन पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में वापसी करेगा। उल्लेखनीय है कि असम की 126 सदस्यीय विधानसभा के लिए 9 अप्रैल 2026 को मतदान होगा, जबकि मतगणना 4 मई 2026 को निर्धारित है। कांग्रेस वर्ष 2016 से राज्य की सत्ता से बाहर है और इस बार वापसी के लिए पूरी ताकत झोंक रही है।

  • धर्मदम में सियासी संग्राम: क्या विजयन बचा पाएंगे अपना गढ़?

    भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) कन्नूर। केरल विधानसभा चुनाव 2026 में कन्नूर जिले की धर्मदम सीट इस बार राज्य की सबसे चर्चित और हॉट सीट बनकर उभरी है। मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन एक बार फिर इसी सीट से चुनावी मैदान में हैं, जहां उन्हें भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस-नीत यूडीएफ गठबंधन के उम्मीदवारों से कड़ी चुनौती मिल रही है। त्रिकोणीय मुकाबले ने इस सीट को बेहद रोचक बना दिया है। राज्य की 140 सदस्यीय विधानसभा, जिसे केरल नियमसभा के नाम से जाना जाता है, का कार्यकाल 23 मई 2026 को समाप्त हो रहा है। चुनाव आयोग के कार्यक्रम के अनुसार, राज्य में 9 अप्रैल को एक ही चरण में मतदान होगा, जबकि मतगणना 4 मई को की जाएगी। सत्तारूढ़ वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ), राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) और संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (यूडीएफ) के बीच सीधा मुकाबला है। धर्मदम सीट का बढ़ता राजनीतिक महत्व धर्मदम विधानसभा क्षेत्र मुख्यमंत्री विजयन का गढ़ माना जाता है, जिससे इस सीट का राजनीतिक महत्व और भी बढ़ जाता है। पिनाराई विजयन लगातार दो बार (2016 और 2021) यहां से जीत दर्ज कर चुके हैं, जबकि 2011 में भी यह सीट वामपंथी दल के खाते में गई थी। 2010 में अस्तित्व में आई इस सीट पर अब तक वाम दलों का दबदबा रहा है। त्रिकोणीय मुकाबले ने बढ़ाई चुनौती इस बार मुकाबला पहले की तुलना में अधिक कठिन माना जा रहा है। भाजपा ने के. रंजीत को मैदान में उतारा है, जबकि यूडीएफ ने एडवोकेट वी.पी. अब्दुल रशीद को उम्मीदवार बनाया है। दोनों ही प्रत्याशी स्थानीय स्तर पर सक्रिय और प्रभावशाली माने जा रहे हैं, जिससे मुकाबला त्रिकोणीय और दिलचस्प हो गया है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, मतदाताओं के सामने इस बार ‘विकास और निरंतरता’ बनाम ‘परिवर्तन’ का स्पष्ट विकल्प है। जहां एलडीएफ विजयन सरकार की विकास योजनाओं और कल्याणकारी नीतियों के आधार पर वोट मांग रही है, वहीं यूडीएफ और एनडीए बदलाव के मुद्दे को जोर-शोर से उठा रहे हैं। विकास बनाम बदलाव की लड़ाई एलडीएफ का दावा है कि विजयन के नेतृत्व में धर्मदम और आसपास के क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे, स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। वहीं विपक्ष बेरोजगारी, स्थानीय मुद्दों और शासन से जुड़े सवालों को लेकर सरकार को घेरने की रणनीति अपना रहा है। क्या कायम रहेगा विजयन का किला? धर्मदम सीट पर चुनाव परिणाम इस बात का संकेत देंगे कि क्या पिनाराई विजयन अपनी मजबूत पकड़ बरकरार रख पाएंगे या फिर विपक्ष बदलाव की लहर पैदा करने में सफल होगा। फिलहाल, इस हाई-प्रोफाइल सीट पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं, जहां हर वोट निर्णायक साबित हो सकता है।

  • पुडुचेरी चुनाव से पहले कांग्रेस को झटका: सीनियर नेता एवी सुब्रमण्यन का इस्तीफा, बढ़ी सियासी हलचल

    भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) पुडुचेरी। केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गई हैं। इसी बीच कांग्रेस पार्टी को बड़ा झटका तब लगा, जब उसके वरिष्ठ नेता एवी सुब्रमण्यन ने अचानक अपने सभी पदों से इस्तीफा दे दिया। चुनाव से कुछ ही दिन पहले आए इस फैसले ने पार्टी की रणनीति और संगठनात्मक एकजुटता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। सुब्रमण्यन ने अपना त्यागपत्र प्रदेश कांग्रेस कमेटी (पीसीसी) के अध्यक्ष वी वैथिलिंगम को सौंपा। उनके इस्तीफे के बाद पार्टी के भीतर असंतोष की चर्चा तेज हो गई है, जिसे चुनावी माहौल में कांग्रेस के लिए नुकसानदेह माना जा रहा है। टिकट वितरण बना विवाद की वजह हालांकि अपने इस्तीफे में सुब्रमण्यन ने निजी कारणों और मजबूरियों का हवाला दिया है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उम्मीदवारों के चयन को लेकर उनकी नाराजगी इस फैसले की प्रमुख वजह हो सकती है। खासतौर पर यह इस्तीफा उसी दिन आया, जब कांग्रेस ने 16 उम्मीदवारों की अपनी आधिकारिक सूची जारी की। सूची में मन्नाडीपट्टू से डीपीआर सेल्वम, ऊसूड़ू से पी कार्तिकेयन, थट्टांचावडी से स्वयं वी वैथिलिंगम, इंदिरानगर से एन राजा कुमार और लॉस्पेट से एम वैद्यनाथन को टिकट दिया गया है। सूत्रों के अनुसार, कुछ प्रमुख सीटों पर टिकट वितरण को लेकर असहमति लंबे समय से चल रही थी, जो अब खुलकर सामने आ गई है। मतदान से पहले बढ़ी चुनौती भारतीय चुनाव आयोग के कार्यक्रम के अनुसार, पुडुचेरी की सभी 30 विधानसभा सीटों पर 9 अप्रैल 2026 को एक ही चरण में मतदान होना है। ऐसे में चुनाव से ठीक पहले वरिष्ठ नेता का इस्तीफा कांग्रेस के लिए रणनीतिक रूप से झटका माना जा रहा है। कांग्रेस-डीएमके गठबंधन पर भी असर इस बार कांग्रेस ने द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम (डीएमके) के साथ गठबंधन कर चुनाव मैदान में उतरने का फैसला किया है। सीट बंटवारे के तहत कांग्रेस 16 और डीएमके 14 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। डीएमके अपनी कुछ सीटें सहयोगी दलों को भी दे रही है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि तमिलनाडु की तर्ज पर यह गठबंधन मजबूत माना जा रहा था, लेकिन आंतरिक असंतोष और वरिष्ठ नेताओं की नाराजगी अब इसकी एकजुटता को प्रभावित कर सकती है। क्या होंगे राजनीतिक मायने? विशेषज्ञों के अनुसार, सुब्रमण्यन का इस्तीफा केवल एक व्यक्तिगत निर्णय नहीं बल्कि संगठनात्मक असंतोष का संकेत भी हो सकता है। इससे न केवल पार्टी के कार्यकर्ताओं का मनोबल प्रभावित हो सकता है, बल्कि विरोधी दलों को भी कांग्रेस पर हमला करने का मौका मिल सकता है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस नेतृत्व इस संकट से कैसे निपटता है और चुनावी मैदान में अपनी स्थिति को कितना मजबूत बनाए रख पाता है।

  • बंगाल चुनाव से पहले सियासत गरम: भाजपा का टीएमसी पर घुसपैठियों को संरक्षण देने का आरोप

    भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) पटना। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक बयानबाजी तेज होती जा रही है। इसी कड़ी में बिहार भाजपा प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी और राज्य सरकार में मंत्री दिलीप कुमार जायसवाल ने तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर गंभीर आरोप लगाए हैं। पटना में मीडिया से बातचीत के दौरान भाजपा नेताओं ने कहा कि टीएमसी सरकार अवैध घुसपैठियों, बांग्लादेशी नागरिकों और रोहिंग्याओं को संरक्षण दे रही है, जिससे राज्य के संसाधनों पर दबाव बढ़ रहा है। संजय सरावगी ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के हालिया बयान का समर्थन करते हुए कहा कि बंगाल के रास्ते देश में घुसपैठ एक बड़ी समस्या बन चुकी है। उन्होंने आरोप लगाया कि टीएमसी सरकार वोट बैंक की राजनीति के तहत घुसपैठियों और बाहरी नागरिकों को संरक्षण दे रही है। सरावगी ने कहा कि इसके चलते राज्य के मूल निवासियों को संसाधनों की कमी का सामना करना पड़ रहा है और जनसंख्या संतुलन भी प्रभावित हो रहा है। उन्होंने दावा किया कि पश्चिम बंगाल में मुसलमानों की आबादी में लगातार वृद्धि हो रही है और सरकार इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठा रही है। सरावगी ने यह भी कहा कि आगामी चुनाव में जनता इसका जवाब देगी और इस बार राज्य में भाजपा की सरकार बनेगी। वहीं, मंत्री दिलीप कुमार जायसवाल ने सीमावर्ती इलाकों की सुरक्षा पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि बांग्लादेश से लगने वाली सीमा असम से लेकर पश्चिम बंगाल तक फैली हुई है, जहां कई स्थानों पर अब भी फेंसिंग अधूरी है। भौगोलिक चुनौतियों—जैसे नदी और पहाड़ी क्षेत्र—के कारण बाड़ लगाने में कठिनाई आ रही है, जिसका फायदा घुसपैठिए उठा रहे हैं। उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा के दृष्टिकोण से जल्द से जल्द पूर्ण फेंसिंग की आवश्यकता पर जोर दिया। गौरतलब है कि एक दिन पूर्व केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भाजपा की ओर से पश्चिम बंगाल में टीएमसी के 15 वर्षों के शासन पर आधारित 35 पन्नों का ‘श्वेत पत्र’ जारी किया था। इस रिपोर्ट में घुसपैठ, भ्रष्टाचार, संस्थागत कमजोरी, आर्थिक गिरावट, कानून-व्यवस्था और सामाजिक ढांचे के कमजोर होने जैसे पांच प्रमुख मुद्दों को उठाया गया है। ‘श्वेत पत्र’ के अनुसार, भारत-बांग्लादेश सीमा की कुल 2,216.7 किलोमीटर लंबाई में से लगभग 569 किलोमीटर क्षेत्र अब भी बिना फेंसिंग के है। रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि भूमि अधिग्रहण में देरी के कारण यह कार्य अधूरा है, जिससे घुसपैठ को बढ़ावा मिला। साथ ही टीएमसी पर कथित तौर पर फर्जी पहचान पत्र बनवाकर घुसपैठियों को बसाने के आरोप भी लगाए गए हैं। हालांकि, इन आरोपों पर टीएमसी की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। बंगाल चुनाव के नजदीक आते ही इस मुद्दे पर राजनीतिक घमासान और तेज होने की संभावना है।

  • बेंगलूरु में ‘सामाजिक सद्भाव सभा’ आज, समाज प्रमुखों का मंथन

    भारतार्थ खबर, बेंगलूरु संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) बेंगलूरु। बेंगलूरु स्थित श्री सीरवी समाज भवन बलेपेट में आज सामाजिक एकता और समन्वय को बढ़ावा देने के उद्देश्य से “सामाजिक सद्भाव सभा” का आयोजन किया जा रहा है। यह कार्यक्रम रविवार, 29 मार्च 2026 को सायं 4:30 बजे आयोजित होगा, जिसमें विभिन्न समाजों के प्रमुख, गणमान्य नागरिक एवं प्रबुद्धजन भाग लेंगे। आयोजकों के अनुसार, भारत की महान संस्कृति, परंपरा और विविधता उसकी सबसे बड़ी शक्ति है, जिसका आधार सामाजिक एकता, आपसी सद्भाव और सामूहिक प्रयासों में निहित है। इसी भावना को आगे बढ़ाने और समाज के सभी वर्गों के बीच समन्वय स्थापित करने के उद्देश्य से इस विशेष बैठक का आयोजन किया गया है। सभा में विभिन्न समाजों के प्रतिनिधि आपसी सहयोग, समन्वय और सामाजिक उत्थान के मुद्दों पर विचार-विमर्श करेंगे। साथ ही, समाज में एकजुटता बढ़ाने और राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करने के उपायों पर भी चर्चा की जाएगी। आयोजकों का मानना है कि इस प्रकार के संवाद से समाज के भीतर आपसी समझ और सहयोग की भावना और अधिक सुदृढ़ होगी। कार्यक्रम स्थल के रूप में बलेपेट स्थित श्री सीरवी समाज भवन को चुना गया है, जहां बड़ी संख्या में लोगों की उपस्थिति की संभावना जताई जा रही है। आयोजकों ने सभी समाज बंधुओं से समय पर उपस्थित होकर कार्यक्रम को सफल बनाने की अपील की है। बैठक की अवधि लगभग दो घंटे निर्धारित की गई है, जिसके पश्चात उपस्थित अतिथियों के लिए जलपान की व्यवस्था भी की गई है।

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