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 भारतार्थ खबर, नहीं उसका अर्थ

21अक्टूबर /2026 /बुधवार

बेंगलुरु, 20 अक्टूबर 2026। बेंगलुरु में आयोजित 48वें दशहरा महोत्सव में राज्यसभा सांसद लहर सिंह सिरोया ने मां दुर्गा के दर्शन कर पूजा-अर्चना की और आशीर्वाद प्राप्त किया। सिद्धार्थ सांस्कृतिक समिति एवं राजेंद्र बाबू मेमोरियल ट्रस्ट ‘बिहार भवन’ के तत्वावधान में आयोजित इस महोत्सव में सांसद की उपस्थिति रही। इस अवसर पर समिति के पदाधिकारियों और सदस्यों ने मां भगवती की चुनड़ी ओढ़ाकर उनका स्वागत एवं अभिनंदन किया।

भारतार्थ लोगो: खबर नहीं, उसका अर्थ - राजनीतिक समाचार विश्लेषण

बेंगलुरु, 20 अक्टूबर 2026। बेंगलुरु में आयोजित 48वें दशहरा महोत्सव में राज्यसभा सांसद लहर सिंह सिरोया ने मां दुर्गा के दर्शन कर पूजा-अर्चना की और आशीर्वाद प्राप्त किया। सिद्धार्थ सांस्कृतिक समिति एवं राजेंद्र बाबू मेमोरियल ट्रस्ट ‘बिहार भवन’ के तत्वावधान में आयोजित इस महोत्सव में सांसद की उपस्थिति रही। इस अवसर पर समिति के पदाधिकारियों और सदस्यों ने मां भगवती की चुनड़ी ओढ़ाकर उनका स्वागत एवं अभिनंदन किया।

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  • बेंगलूरु में जल्द शुरू होगी ऑनलाइन खाता करेक्शन सेवा

    भारतार्थ खबर, बेंगलूरु संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) बेंगलूरु। शहर के लाखों प्रॉपर्टी धारकों के लिए बड़ी राहत की खबर है। ग्रेटर बेंगलूरु अथॉरिटी जल्द ही ऑनलाइन खाता करेक्शन की सुविधा शुरू करने जा रही है। इस पहल का उद्देश्य प्रॉपर्टी से जुड़ी सेवाओं को तेज़, पारदर्शी और नागरिकों के लिए अधिक सुविधाजनक बनाना है। इस संबंध में जानकारी देते हुए स्पेशल कमिश्नर (रेवेन्यू एवं आईटी) मुनीश मौदगिल ने बताया कि नई सुविधा के तहत नागरिक बिना किसी अनावश्यक देरी के अपनी प्रॉपर्टी से संबंधित अधिकांश विवरण ऑनलाइन ही सुधार सकेंगे। इससे लोगों को दफ्तरों के चक्कर लगाने से राहत मिलेगी और प्रक्रिया अधिक सरल बनेगी। क्या-क्या होगा ऑनलाइन संभव नई व्यवस्था के तहत नागरिक अपनी प्रॉपर्टी की लोकेशन, वार्ड नंबर और अन्य सामान्य विवरणों में ऑनलाइन सुधार कर सकेंगे। हालांकि, प्रॉपर्टी के मालिक का नाम और संपत्ति के माप (मेज़रमेंट) में बदलाव फिलहाल ऑनलाइन संभव नहीं होगा। इसके लिए निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना होगा। ई-खाता प्रक्रिया में तेजी अथॉरिटी के अनुसार, अब तक करीब 25 लाख ड्राफ्ट खाता आवेदन ऑनलाइन जमा किए जा चुके हैं, जिनमें से 10 लाख से अधिक नागरिकों को फाइनल ई-खाता जारी किया जा चुका है। रिकॉर्ड पूर्ण होने की स्थिति में औसतन 5 दिनों के भीतर ई-खाता उपलब्ध कराया जा रहा है। डिजिटल प्रोसेसिंग की गति का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि हर 30 सेकंड में एक ई-खाता जारी किया जा रहा है, जबकि प्रतिदिन 1,000 से अधिक नए आवेदन प्राप्त हो रहे हैं। रिजेक्शन ऑडिट से बढ़ेगी पारदर्शिता प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए एक विशेष ‘रिजेक्शन ऑडिट टीम’ का गठन किया गया है। यह टीम खारिज किए गए आवेदनों की समीक्षा करेगी और यदि कोई निर्णय गलत पाया जाता है, तो उसे निरस्त कर आवेदक को राहत दी जाएगी। ऑटोमैटिक म्यूटेशन से मिलेगा फायदा इसके अलावा, सब-रजिस्ट्रार कार्यालयों में होने वाले प्रॉपर्टी लेन-देन अब ऑटोमैटिक म्यूटेशन सिस्टम से जुड़े होंगे। आवश्यक नोटिस अवधि पूरी होने के बाद म्यूटेशन स्वतः पूर्ण हो जाएगा और नागरिकों को 7 दिनों के भीतर एसएमएस के माध्यम से इसकी सूचना मिल जाएगी। यह सुविधा विरासत (इनहेरिटेंस) से जुड़े मामलों में भी लागू होगी, जिससे लंबित मामलों में तेजी आएगी। डिजिटल गवर्नेंस की ओर बड़ा कदम यह पहल बेंगलूरु में डिजिटल गवर्नेंस को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। इससे न केवल प्रशासनिक प्रक्रिया में पारदर्शिता आएगी, बल्कि नागरिकों को भी बिना परेशानी और समय की बचत के साथ बेहतर सेवाएं मिल सकेंगी।

  • कचराकनाहल्ली में ब्लैक स्पॉट खत्म, बीएनसीसी की सख्त सफाई कार्रवाई

    भारतार्थ खबर, बेंगलूरु संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) बेंगलूरु। शहर को स्वच्छ और स्वस्थ बनाने की दिशा में बेंगलूरु उत्तर नगर निगम (बीएनसीसी) ने एक और ठोस कदम उठाते हुए वार्ड 29 के कचराकनाहल्ली स्थित ऑयल मिल रोड पर बने कचरे के “ब्लैक स्पॉट” को पूरी तरह समाप्त कर दिया। लंबे समय से जमा कचरे और गंदगी के कारण यह क्षेत्र स्थानीय लोगों के लिए परेशानी का कारण बना हुआ था। अधिकारियों की निगरानी में विशेष सफाई अभियान चलाकर न केवल यहां से कचरा हटाया गया, बल्कि पूरे क्षेत्र की गहन सफाई कर उसे स्वच्छ और व्यवस्थित बनाया गया। इस दौरान अवैध कचरा डंपिंग पॉइंट को भी पूरी तरह खत्म कर दिया गया, जिससे भविष्य में दोबारा गंदगी जमा होने की संभावना को कम किया जा सके। सफाई अभियान के तहत आधुनिक उपकरणों और श्रमिकों की मदद से इलाके को पूरी तरह साफ किया गया। साथ ही, स्थानीय निवासियों को भी जागरूक करते हुए अपील की गई कि वे सार्वजनिक स्थानों पर कचरा न डालें और स्वच्छता बनाए रखने में सहयोग करें। अधिकारियों ने बताया कि इस तरह के ब्लैक स्पॉट शहर की साफ-सफाई और स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती होते हैं। इन्हें खत्म करने के लिए लगातार निगरानी और सख्त कार्रवाई की जा रही है। बीएनसीसी का लक्ष्य है कि बेंगलूरु के सभी वार्डों से ऐसे कचरा स्थलों को समाप्त कर “ब्लैक स्पॉट फ्री” शहर बनाया जाए। राज्य के उपमुख्यमंत्री डी. के. शिवकुमार के नेतृत्व में चल रहे स्वच्छता अभियानों को भी इससे मजबूती मिल रही है। नगर प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि भविष्य में किसी भी स्थान पर अवैध कचरा फेंकने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। नगर निगम की इस पहल को स्थानीय नागरिकों ने सराहा है और उम्मीद जताई है कि इसी तरह के अभियान आगे भी जारी रहेंगे, जिससे बेंगलूरु को साफ, सुंदर और रहने योग्य शहर बनाया जा सके।

  • कोंगू में सियासी जंग तेज, अन्नाद्रमुक के गढ़ पर द्रमुक की नजर

    भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) कोयम्बटूर। तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के बीच पश्चिमी क्षेत्र कोंगू बेल्ट की राजनीति इस बार खासा दिलचस्प मोड़ लेती नजर आ रही है। कोयम्बटूर दक्षिण सीट, जिसे लंबे समय से अन्नाद्रमुक का मजबूत गढ़ माना जाता रहा है, अब कड़े मुकाबले का केंद्र बन गई है। सत्तारूढ़ द्रमुक इस क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए पूरी ताकत झोंक रही है। द्रमुक ने इस सीट पर अपने प्रभावशाली नेता वी. सेंथिल बालाजी को मैदान में उतारकर चुनावी मुकाबले को नई धार दी है। बालाजी का प्रचार अभियान पारंपरिक राजनीति से अलग सादगी और जनसंपर्क पर आधारित है। सुबह 7 बजे से ही वे समर्थकों के साथ पैदल निकलते हैं और देवंगा पेट रोड से शुरू होकर घर-घर पहुंचकर मतदाताओं से सीधा संवाद स्थापित कर रहे हैं। उनका यह जमीनी अंदाज स्थानीय लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गया है। पैदल प्रचार से साध रहे जनमानस भीषण गर्मी के बावजूद सेंथिल बालाजी का पैदल प्रचार अभियान निरंतर जारी है। बिना किसी तामझाम के आम मतदाताओं के बीच पहुंचना उनकी रणनीति का मुख्य हिस्सा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह तरीका मतदाताओं के साथ भावनात्मक जुड़ाव बनाने में कारगर साबित हो सकता है। कोंगू बेल्ट में सियासी समीकरण तमिलनाडु का कोंगू क्षेत्र परंपरागत रूप से अन्नाद्रमुक का गढ़ रहा है, जहां गौंडर समुदाय का प्रभाव निर्णायक माना जाता है। पिछले चुनाव में अन्नाद्रमुक-नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन ने यहां 57 में से 41 सीटें जीती थीं, जबकि कोयम्बटूर जिले की सभी 10 सीटें उनके खाते में गई थीं। ऐसे में इस बार द्रमुक के लिए यहां सेंध लगाना आसान नहीं है। मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन ने इस चुनौती को स्वीकार करते हुए मजबूत रणनीति बनाई है। सेंथिल बालाजी की उम्मीदवारी को उसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिसके जरिए द्रमुक इस क्षेत्र में अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करना चाहती है। विजय की एंट्री से बदली तस्वीर इस चुनाव में अभिनेता से नेता बने विजय की पार्टी तमिलगा वेत्री कझगम की एंट्री ने मुकाबले को और रोचक बना दिया है। हालांकि कोंगू बेल्ट में मुख्य मुकाबला अभी भी द्रमुक और अन्नाद्रमुक के बीच ही माना जा रहा है, लेकिन विजय की मौजूदगी ने वोटों के समीकरण को प्रभावित करने की संभावनाएं बढ़ा दी हैं। गर्मी बनी चुनौती, बदली प्रचार शैली कोयम्बटूर में पड़ रही तेज गर्मी ने चुनाव प्रचार की रणनीति को भी प्रभावित किया है। उम्मीदवार अब सुबह और शाम के समय ही ज्यादा सक्रिय नजर आ रहे हैं। बड़े जनसभाओं की जगह घर-घर संपर्क और छोटे समूहों में संवाद को प्राथमिकता दी जा रही है। कई स्थानों पर कार्यकर्ता 4 से 5 घंटे तक पैदल चलकर प्रचार कर रहे हैं। कोंगू बेल्ट की यह सियासी जंग तमिलनाडु चुनाव के नतीजों में निर्णायक भूमिका निभा सकती है। अन्नाद्रमुक अपने मजबूत गढ़ को बचाने की चुनौती से जूझ रही है, वहीं द्रमुक हर हाल में यहां बाजी पलटने की कोशिश में जुटी है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि मतदाता किसके पक्ष में अपना भरोसा जताते हैं।

  • पंजाब में आज 3 घंटे ‘रेल रोको’, कई रूट प्रभावित

    भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) चंडीगढ़, 17 अप्रैल। पंजाब में किसानों का आक्रोश एक बार फिर उफान पर है। गेहूं की खरीद में देरी और नियमों में राहत न मिलने से नाराज किसान संगठनों ने शुक्रवार को राज्यव्यापी ‘रेल रोको आंदोलन’ का ऐलान किया है। यह प्रदर्शन दोपहर 12 बजे से 3 बजे तक चलेगा, जिसके दौरान कई प्रमुख रेलवे ट्रैक जाम किए जाएंगे और ट्रेन सेवाएं व्यापक रूप से प्रभावित हो सकती हैं। भारतीय किसान यूनियन (डकौंदा), किसान मजदूर मोर्चा (केएमएम) और संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) समेत कई संगठनों ने इस आंदोलन को समर्थन दिया है। किसान नेताओं का कहना है कि सरकार की अनदेखी और खरीद प्रक्रिया में देरी ने उन्हें सड़कों से पटरियों तक उतरने को मजबूर कर दिया है। इन स्थानों पर रहेगा सबसे ज्यादा असर राज्य के विभिन्न जिलों में किसान बड़ी संख्या में रेलवे ट्रैक पर धरना देंगे। प्रमुख स्थानों में अमृतसर का देवी दासपुरा, संगरूर का सुनाम, होशियारपुर और दसूया स्टेशन, कपूरथला का फगवाड़ा और हुसैनपुर (रेल कोच फैक्ट्री के पास) शामिल हैं। इसके अलावा बरनाला, तरनतारन, मोगा, जगरांव, पटियाला, मानसा, फाजिल्का, फिरोजपुर, मलेरकोटला, पठानकोट, जालंधर, बठिंडा, लुधियाना (साहनेवाल), मुक्तसर और गुरदासपुर में भी बड़े स्तर पर प्रदर्शन की तैयारी है। इन रेल मार्गों पर पड़ेगा सीधा प्रभाव आंदोलन के चलते फिरोजपुर–लुधियाना, लुधियाना–जयपुर, फिरोजपुर–दिल्ली और फिरोजपुर–चंडीगढ़ जैसे प्रमुख रेल रूट्स पर ट्रेनों की आवाजाही बाधित हो सकती है। रेलवे सूत्रों के अनुसार कई ट्रेनों के देरी से चलने या आंशिक रूप से रद्द होने की आशंका है, जिससे यात्रियों को असुविधा का सामना करना पड़ सकता है। आंदोलन की मुख्य वजह किसानों का आरोप है कि बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि से पहले ही फसल को भारी नुकसान हुआ है, इसके बावजूद सरकारी एजेंसियों ने गेहूं की खरीद समय पर शुरू नहीं की। साथ ही, खरीद के नियमों में कोई ढील नहीं दी जा रही है, जिससे मंडियों में किसानों को परेशानी उठानी पड़ रही है। उनका कहना है कि इस लापरवाही के कारण उन्हें आर्थिक नुकसान झेलना पड़ रहा है। सरकार को चेतावनी किसान संगठनों ने स्पष्ट किया है कि यदि जल्द ही खरीद प्रक्रिया तेज नहीं की गई और नियमों में राहत नहीं दी गई, तो आंदोलन को और उग्र रूप दिया जाएगा। फिलहाल, राज्य में तीन घंटे का यह ‘रेल रोको’ प्रदर्शन प्रशासन और रेलवे के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। यात्रियों को सलाह दी गई है कि वे यात्रा से पहले ट्रेन की स्थिति की जानकारी अवश्य प्राप्त कर लें, ताकि किसी भी असुविधा से बचा जा सके।

  • आईटी सेक्टर में आचरण संकट: टीसीएस से लेंसकार्ट तक विवादों की लहर

    भारतार्थ खबर, बेंगलूरु संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) बेंगलूरु/नासिक/पुणे। देश के प्रतिष्ठित आईटी सेक्टर में कार्यस्थल सुरक्षा, लैंगिक संवेदनशीलता और सांस्कृतिक संतुलन को लेकर एक के बाद एक सामने आ रहे विवादों ने गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हालिया घटनाक्रमों में टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस) के नासिक बीपीओ से शुरू हुआ मामला अब इन्फोसिस और लेंसकार्ट जैसी कंपनियों तक पहुंच गया है, जिससे पूरे उद्योग की साख पर असर पड़ता दिख रहा है। टीसीएस नासिक मामला: संस्थागत विफलता के आरोप नासिक स्थित टीसीएस बीपीओ में यौन उत्पीड़न और धार्मिक दबाव से जुड़े गंभीर आरोपों ने आईटी सेक्टर को झकझोर दिया है। दर्ज एफआईआर के मुताबिक फरवरी 2022 से मार्च 2026 के बीच कम से कम आठ महिला कर्मचारियों ने वरिष्ठ सहयोगियों के खिलाफ बार-बार शिकायतें कीं। आरोप है कि न केवल इन शिकायतों को नजरअंदाज किया गया, बल्कि पीड़ितों को चुप रहने की सलाह भी दी जाती रही। मामले में जबरन नमाज पढ़वाने, बीफ खिलाने और धर्मांतरण के लिए दबाव बनाने जैसे संवेदनशील आरोप भी शामिल हैं। पुलिस अब तक एचआर मैनेजर समेत सात लोगों को गिरफ्तार कर चुकी है। बढ़ते विवाद के बीच कंपनी ने नासिक कार्यालय के कर्मचारियों को वर्क फ्रॉम होम के निर्देश दिए हैं। यह मामला अब व्यक्तिगत घटना से आगे बढ़कर संस्थागत जवाबदेही पर सवाल खड़ा कर रहा है। पुणे में इन्फोसिस पर आरोप, जांच शुरू इस घटनाक्रम की गूंज पुणे तक सुनाई दी, जहां इन्फोसिस के बीपीएम यूनिट में महिला कर्मचारियों के साथ अनुचित व्यवहार के आरोप सामने आए हैं। सोशल मीडिया पर मामला तेजी से वायरल होने के बाद कंपनी ने तत्काल प्रतिक्रिया दी है। इन्फोसिस ने स्पष्ट किया कि वह ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति पर काम करती है और एक स्वतंत्र समिति द्वारा मामले की जांच कराई जा रही है। उद्योग संगठन नैसकॉम ने इसे अलग-थलग घटना बताते हुए सेक्टर की छवि को बचाने का प्रयास किया है, लेकिन लगातार सामने आ रहे मामलों ने नीतियों की प्रभावशीलता पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। लेंसकार्ट विवाद: ड्रेस कोड पर सांस्कृतिक बहस इसी बीच लेंसकार्ट का एक पुराना स्टाइल गाइड नए विवाद का कारण बन गया। दस्तावेज में कर्मचारियों के लिए बिंदी, तिलक और कलावा जैसे पारंपरिक प्रतीकों पर रोक, जबकि हिजाब की अनुमति का उल्लेख सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली। विवाद बढ़ने पर कंपनी के सीईओ पीयूष बंसल ने बिना शर्त माफी मांगते हुए इसे पुराना दस्तावेज बताया और स्पष्ट किया कि कंपनी किसी भी धार्मिक प्रतीक पर प्रतिबंध का समर्थन नहीं करती। उन्होंने आश्वासन दिया कि कंपनी भारतीय परंपराओं का सम्मान करती है और नीतियों को अद्यतन किया जा चुका है। व्यापक सवाल: नीतियां बनाम जमीनी हकीकत इन घटनाओं ने आईटी कंपनियों द्वारा अपनाई जाने वाली ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति की वास्तविकता पर बहस तेज कर दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल नीतियों का होना पर्याप्त नहीं, बल्कि उनका सख्ती से क्रियान्वयन और पारदर्शिता भी उतनी ही आवश्यक है। कार्यस्थलों पर सुरक्षा, सम्मान और सांस्कृतिक संवेदनशीलता सुनिश्चित करना अब कंपनियों के लिए केवल नैतिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रतिष्ठा और विश्वास बनाए रखने की अनिवार्य शर्त बन चुका है। लगातार उभरते विवाद इस बात का संकेत हैं कि आईटी सेक्टर को अपनी आंतरिक प्रणालियों की गहन समीक्षा कर ठोस सुधारात्मक कदम उठाने होंगे।

  • शरीयत कानून पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र से जवाब तलब

    भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) और धार्मिक व्यक्तिगत कानूनों को लेकर जारी बहस के बीच एक अहम मोड़ आ गया है। मुस्लिम उत्तराधिकार और वसीयत से जुड़े शरीयत कानून को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट संकेत दिया कि यूसीसी संविधान का एक लक्ष्य है और इसे किसी धर्म विशेष के खिलाफ नहीं देखा जा सकता। इस महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने की, जिसमें जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल पांचोली भी शामिल रहे। सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि समान नागरिक संहिता का उद्देश्य देश के सभी नागरिकों के लिए समान कानून सुनिश्चित करना है, जिससे संविधान में निहित समानता और न्याय के सिद्धांत को मजबूती मिल सके। पीठ ने यह भी रेखांकित किया कि ऐसे संवेदनशील मामलों में संतुलन बनाए रखना आवश्यक है, ताकि किसी भी समुदाय की धार्मिक स्वतंत्रता प्रभावित न हो, लेकिन साथ ही नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा भी सुनिश्चित हो। अदालत ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए अन्य समान याचिकाओं के साथ जोड़ दिया है। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने जोरदार पक्ष रखा। उन्होंने दलील दी कि उत्तराधिकार और संपत्ति का बंटवारा धार्मिक नहीं बल्कि सिविल प्रकृति के विषय हैं। उनके अनुसार, मौजूदा व्यवस्था में मुस्लिम महिलाओं को पुरुषों की तुलना में कम हिस्सा मिलता है, जो समानता के अधिकार का उल्लंघन है। उन्होंने यह भी कहा कि मुस्लिम उत्तराधिकार कानून पूरी तरह संहिताबद्ध (कोडिफाइड) नहीं है, जिससे इसकी व्याख्या जटिल हो जाती है और आम लोगों के लिए न्याय तक पहुंच कठिन हो सकती है। सुनवाई के दौरान यह भी मुद्दा उठा कि विरासत का अधिकार किसी अनिवार्य धार्मिक प्रथा का हिस्सा नहीं है, इसलिए इसे संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत पूर्ण संरक्षण नहीं दिया जा सकता। साथ ही यह भी बताया गया कि वर्तमान प्रावधानों के तहत मुस्लिम व्यक्ति अपनी संपत्ति का केवल एक तिहाई हिस्सा ही वसीयत कर सकता है, जिससे व्यक्तिगत स्वतंत्रता सीमित होती है। अदालत ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि कोई प्रथा अपने स्वरूप में भेदभावपूर्ण है, तो उसे समाप्त किया जा सकता है। हालांकि, पीठ ने यह भी महत्वपूर्ण सवाल उठाया कि ऐसे मामलों में अंतिम निर्णय अदालत को लेना चाहिए या यह जिम्मेदारी विधायिका की है। इस मामले ने एक बार फिर देश में समान नागरिक संहिता को लेकर बहस को तेज कर दिया है। अब सभी की नजरें केंद्र सरकार के जवाब और सुप्रीम कोर्ट के अगले कदम पर टिकी हैं, जो न केवल व्यक्तिगत कानूनों बल्कि संवैधानिक मूल्यों की दिशा भी तय कर सकता है।

  • नेताओं की घटती संपत्ति, पत्नियों की बढ़ती पूंजी

    भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) चेन्नई। तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026 से पहले दाखिल किए गए चुनावी हलफनामों ने राज्य की राजनीति में एक दिलचस्प ट्रेंड को उजागर किया है। जहां कई प्रमुख नेताओं की व्यक्तिगत संपत्ति में गिरावट दर्ज की गई है, वहीं उनकी पत्नियों की संपत्ति में उल्लेखनीय वृद्धि देखने को मिली है। यह पैटर्न सत्तारूढ़ द्रमुक (डीएमके) और विपक्षी अन्नाद्रमुक (एआईएडीएमके) दोनों ही दलों के शीर्ष नेताओं में समान रूप से सामने आया है। मुख्यमंत्री की संपत्ति में कमी मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने अपने हलफनामे में 2026 के लिए कुल संपत्ति 6.2 करोड़ रुपये घोषित की है, जो 2021 में घोषित 7.2 करोड़ रुपये से एक करोड़ रुपये कम है। इस गिरावट का मुख्य कारण ‘अंजुगम पब्लिकेशन्स’ से जुड़ी एक जमीन से अलगाव बताया जा रहा है। यह वही 1,825 वर्गफुट का भूखंड है, जहां द्रमुक का मुखपत्र ‘मुरासोली’ संचालित होता है। इस भूमि को लेकर पूर्व में राजनीतिक विवाद भी सामने आ चुका है। उदयनिधि स्टालिन की संपत्ति में 25 प्रतिशत गिरावट उपमुख्यमंत्री उदयनिधि स्टालिन की संपत्ति में भी लगभग 25 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। इसका प्रमुख कारण फिल्म निर्माण कंपनी ‘रेड जायंट मूवीज’ से उनका अलग होना बताया गया है। अब इस कंपनी का संचालन उनके पुत्र इनबन उदयनिधि के हाथों में है, जबकि उनकी पत्नी किरुथिगा निवेशक के रूप में जुड़ी हुई हैं। वरिष्ठ मंत्रियों पर भी असर द्रमुक के वरिष्ठ मंत्री ई.वी. वेलु की संपत्ति घटकर 13.2 करोड़ रुपये रह गई है। 2021 में उनके द्वारा अरुनई मोटर फाइनेंस और काविन प्रोडक्ट्स में किया गया लगभग 2.8 करोड़ रुपये का निवेश अब हलफनामे में शामिल नहीं है। यह बदलाव 2023 में आयकर छापों के बाद सामने आया है। इसी तरह, मंत्री आई. पेरियासामी की संपत्ति 5.9 करोड़ रुपये दर्ज की गई है। उनके पहले के निवेश ‘इरुल्लापा मिल्स’ में अब प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की जांच चल रही है। उनके वाहन संग्रह में भी कमी आई है और अब उनके पास केवल एक टोयोटा ग्लांजा कार ही शेष है। विपक्षी नेताओं की संपत्ति में बदलाव अन्नाद्रमुक के पूर्व मंत्री सेल्लूर के. राजू की संपत्ति घटकर लगभग 50 लाख रुपये रह गई है। पहले उन्होंने ‘जेजे फार्मा’ और ‘जेजे मेडिकल्स’ में करीब 80 लाख रुपये का निवेश किया था, जो अब समाप्त हो चुका है। वहीं, पार्टी महासचिव एडपाडी के. पलनीस्वामी की व्यक्तिगत संपत्ति लगभग स्थिर रही है—2021 में 47 लाख रुपये से बढ़कर 2026 में 50 लाख रुपये। हालांकि, उनकी पत्नी की संपत्ति में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जो 2.8 करोड़ रुपये से बढ़कर 5.6 करोड़ रुपये हो गई है। इसमें इरोड स्थित एक फार्महाउस भी शामिल है। बढ़ती पत्नियों की संपत्ति—नई प्रवृत्ति इन हलफनामों से स्पष्ट होता है कि जहां नेताओं की घोषित संपत्ति में कमी आई है, वहीं उनके परिवार, विशेषकर पत्नियों की संपत्ति में वृद्धि दर्ज की गई है। यह प्रवृत्ति केवल एक दल तक सीमित नहीं है, बल्कि सत्तारूढ़ और विपक्ष दोनों में समान रूप से देखी जा रही है। राजनीतिक और कानूनी सवाल विशेषज्ञों का मानना है कि संपत्ति के इस पुनर्वितरण से पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर नए सवाल खड़े हो सकते हैं। चुनाव आयोग और जांच एजेंसियों के लिए यह एक महत्वपूर्ण पहलू बन सकता है, खासकर तब जब निवेश, स्वामित्व और नियंत्रण के बीच अंतर स्पष्ट करना जरूरी हो। तमिलनाडु की सियासत में यह नया ट्रेंड आने वाले दिनों में राजनीतिक बहस का प्रमुख मुद्दा बन सकता है।

  • तीसरी बार निर्विरोध बने राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश

    भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) नई दिल्ली। देश की संसदीय परंपराओं में एक महत्वपूर्ण क्षण उस समय दर्ज हुआ जब हरिवंश नारायण सिंह को राज्यसभा का उपसभापति लगातार तीसरी बार निर्विरोध चुन लिया गया। यह उपलब्धि भारतीय संसदीय इतिहास में एक दुर्लभ उदाहरण मानी जा रही है, जहां किसी सदस्य को इस संवैधानिक पद पर लगातार तीन बार बिना किसी मुकाबले के चयनित किया गया हो। चुनाव की औपचारिक प्रक्रिया के दौरान सदन में गरिमा और सहमति का माहौल देखने को मिला। इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति ने इस चयन की राजनीतिक और संवैधानिक महत्ता को और भी रेखांकित किया। उन्होंने सदन में हरिवंश को बधाई देते हुए उनके अनुभव और संतुलित नेतृत्व की सराहना की। राज्यसभा के उपसभापति का पद सदन की कार्यवाही को सुचारू और निष्पक्ष रूप से संचालित करने में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। सभापति की अनुपस्थिति में उपसभापति ही सदन की कार्यवाही का संचालन करते हैं और विभिन्न संसदीय प्रक्रियाओं को संतुलित ढंग से आगे बढ़ाते हैं। ऐसे में हरिवंश का लगातार तीसरी बार इस पद पर चुना जाना, उनके प्रति सदन के व्यापक विश्वास को दर्शाता है। इस चुनाव की एक उल्लेखनीय बात यह रही कि विपक्ष की ओर से कोई भी प्रत्याशी मैदान में नहीं उतारा गया। परिणामस्वरूप, चुनाव निर्विरोध संपन्न हुआ। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह स्थिति केवल विपक्ष की रणनीतिक चुप्पी ही नहीं, बल्कि एक व्यापक सहमति का संकेत भी हो सकती है, जो संसदीय संस्थाओं की गरिमा बनाए रखने के उद्देश्य से बनाई जाती है। हरिवंश नारायण सिंह का यह लगातार तीसरा कार्यकाल न केवल उनकी व्यक्तिगत स्वीकार्यता को दर्शाता है, बल्कि राज्यसभा की कार्यसंस्कृति में स्थिरता, निरंतरता और परिपक्वता का भी प्रतीक है। यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब देश की राजनीति में अक्सर टकराव और तीखे मतभेद देखने को मिलते हैं। ऐसे में यह चयन सहमति आधारित राजनीति की एक सकारात्मक मिसाल बनकर उभरा है। कुल मिलाकर, यह चुनाव केवल एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं रहा, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं में विश्वास, संतुलन और सहयोग की भावना को भी सशक्त करने वाला महत्वपूर्ण अवसर साबित हुआ।

  • जीबीजी अधिनियम पर हाईकोर्ट सख्त, स्थानीय निकायों की शक्तियों पर उठे सवाल

    भारतार्थ खबर, बेंगलूरु संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) बेंगलूरु। कर्नाटक में लागू ग्रेटर बेंगलूरु गवर्नेंस एक्ट, 2024 (जीबीजी अधिनियम) की संवैधानिक वैधता को लेकर बहस तेज हो गई है। अधिनियम को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान कर्नाटक उच्च न्यायालय के समक्ष यह गंभीर तर्क रखा गया कि कानून स्थानीय निकायों की संवैधानिक भूमिका को कमजोर करता है और नए बनाए गए प्राधिकरणों को अत्यधिक शक्तियां सौंपता है। मुख्य न्यायाधीश विभू बखरू और न्यायमूर्ति सीएम पूनाचा की खंडपीठ के समक्ष सिटीजन्स एक्शन फोरम की ओर से पेश अधिवक्ता हरीश नरसप्पा ने अधिनियम की कई धाराओं को असंवैधानिक बताया। वार्ड समितियों की भूमिका सीमित? याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि अधिनियम की धारा 103 और 104 वार्ड समितियों को केवल सलाहकार भूमिका तक सीमित कर देती हैं, जबकि संविधान के तहत इन समितियों को अधिक प्रभावी अधिकार दिए गए हैं। इसके विपरीत, धारा 96 के तहत गठित विधानसभा क्षेत्र स्तरीय परामर्श एवं समन्वय समिति की सिफारिशों को बाध्यकारी बनाया गया है, जिससे शासन व्यवस्था में असंतुलन पैदा होने का खतरा बताया गया। “असीमित हस्तक्षेप” का आरोप सबसे गंभीर आपत्ति धारा 127 को लेकर जताई गई, जिसमें राज्य सरकार और ग्रेटर बेंगलूरु प्राधिकरण (जीबीए) को नगर निगमों के कामकाज में व्यापक हस्तक्षेप का अधिकार दिया गया है। याचिकाकर्ता के अनुसार, यह प्रावधान स्थानीय निकायों को प्रभावहीन बनाकर उन्हें भंग करने तक की स्थिति पैदा कर सकता है। अवैध निर्माणों के नियमितीकरण पर सवाल धारा 249 भी विवाद के केंद्र में है। इसमें अवैध निर्माणों के नियमितीकरण के लिए कोई स्पष्ट समय सीमा निर्धारित नहीं है। याचिकाकर्ता ने इसे “अनिश्चित और दुरुपयोग योग्य व्यवस्था” करार दिया। मामले की अगली सुनवाई 5 जून 2026 को तय की गई है। हाईकोर्ट के आदेश देशभर में बाध्यकारी इसी दौरान, कर्नाटक उच्च न्यायालय ने एक अन्य मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया कि संवैधानिक न्यायालयों के आदेश पूरे देश में सभी प्राधिकरणों पर बाध्यकारी होते हैं। न्यायमूर्ति सचिन शंकर मगदुम ने कहा कि कोई भी अधिकारी केवल इस आधार पर आदेशों का पालन करने से इनकार नहीं कर सकता कि वह न्यायालय के क्षेत्राधिकार से बाहर है। यह टिप्पणी कोटक महिंद्रा बैंक की याचिका पर सुनवाई के दौरान आई। अदालत ने स्टाम्प एवं पंजीकरण विभाग को पूर्व आदेशों का पालन करने का निर्देश देते हुए 25,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया। शिक्षा व्यवस्था में बड़ा बदलाव एक अन्य अहम फैसले में कर्नाटक उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि शैक्षणिक सत्र 2025-26 की एसएसएलसी परीक्षाओं में तृतीय भाषा विषयों के लिए केवल ग्रेड नहीं, बल्कि संख्यात्मक अंक दिए जाएं। अदालत ने माना कि केवल ग्रेडिंग प्रणाली प्रतिस्पर्धात्मक माहौल में छात्रों के लिए नुकसानदायक हो सकती है, जबकि अंक प्रणाली अधिक पारदर्शी और निष्पक्ष मूल्यांकन सुनिश्चित करती है। जीबीजी अधिनियम को लेकर उठे सवाल न केवल स्थानीय स्वशासन की संवैधानिक संरचना पर बहस छेड़ रहे हैं, बल्कि यह भी स्पष्ट कर रहे हैं कि शहरी शासन में शक्ति संतुलन कितना महत्वपूर्ण है। आगामी सुनवाई इस मामले की दिशा तय करने में निर्णायक साबित हो सकती है।

  • मंदिर भूमि पर बढ़ता अतिक्रमण, संरक्षण बड़ी चुनौती

    भारतार्थ खबर, बेंगलूरु संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) बेंगलूरु। कर्नाटक में मंदिरों की संपत्तियां, जिन्हें कभी पवित्र और सुरक्षित माना जाता था, अब तेजी से अतिक्रमण की चपेट में आ रही हैं। शहरीकरण, बढ़ती भूमि कीमतों और रियल एस्टेट की मांग ने मंदिरों की हजारों एकड़ जमीन को अवैध कब्जों और लेन-देन का आसान लक्ष्य बना दिया है। स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि कई मंदिरों के लिए दैनिक पूजा-अर्चना तक कर पाना मुश्किल हो रहा है। मुजराई और धार्मिक बंदोबस्ती विभाग के अधीन आने वाले मंदिरों की भूमि पर बड़े पैमाने पर अतिक्रमण सामने आया है। अधिकारियों के अनुसार, ऐतिहासिक रूप से राजाओं द्वारा मंदिरों को उनके रखरखाव और धार्मिक गतिविधियों के लिए विशाल भूमि दान में दी गई थी। लेकिन स्वतंत्रता के बाद इन संपत्तियों का विधिवत दस्तावेजीकरण नहीं हो सका, जिससे स्वामित्व स्पष्ट नहीं रहा और इसका लाभ उठाकर कई लोगों ने अवैध कब्जे जमा लिए। राज्य में कुल 34,566 मंदिर मुजराई विभाग के अंतर्गत आते हैं, जिनमें 205 ए-श्रेणी, 193 बी-श्रेणी और 34,168 सी-श्रेणी के मंदिर शामिल हैं। जहां ए और बी श्रेणी के मंदिर आर्थिक रूप से अपेक्षाकृत स्थिर हैं, वहीं सी-श्रेणी के अधिकांश मंदिर सरकारी सहायता पर निर्भर हैं। भूमि से होने वाली आय खत्म होने के कारण इन मंदिरों के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया है। वर्ष 2020 के सरकारी सर्वेक्षण के मुताबिक, कर्नाटक में करीब 40,000 एकड़ मंदिर भूमि पर अतिक्रमण हो चुका है। अब तक 7,125 मंदिरों से संबंधित 18,870 एकड़ भूमि का मापन किया गया है, जिसमें से 17,202.02 एकड़ के स्वामित्व अभिलेख जारी किए जा चुके हैं। हालांकि, अभी भी 27,441 मंदिरों की भूमि का सर्वेक्षण और दस्तावेजीकरण लंबित है, जो प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है। अतिक्रमण हटाने की प्रक्रिया भी आसान नहीं है। कई मामलों में भूमि का रिकॉर्ड मंदिर के नाम पर दर्ज नहीं है, बल्कि उसे सरकारी या वन भूमि के रूप में वर्गीकृत किया गया है। कुछ स्थानों पर किसानों और पुजारियों ने भूमि सुधार कानूनों के तहत स्वामित्व अधिकार हासिल कर लिए हैं, जबकि प्रभावशाली लोगों ने अवैध तरीके से जमीन पर कब्जा कर उसे बेच भी दिया है। भूमि अभिलेखों में विसंगतियां और अस्पष्ट विवरण इस समस्या को और जटिल बना रहे हैं। इन चुनौतियों से निपटने के लिए राज्य सरकार ने ‘भू वराह’ योजना शुरू की है, जिसके तहत मंदिरों की संपत्तियों का व्यवस्थित सर्वेक्षण, स्वामित्व निर्धारण और सुरक्षा सुनिश्चित करने के प्रयास किए जा रहे हैं। चालू बजट में इसके लिए 15 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। योजना के अंतर्गत भूमि का सीमांकन, दस्तावेजीकरण और चारदीवारी निर्माण जैसे कार्य किए जाएंगे। बेंगलूरु शहरी और ग्रामीण, चिक्कबल्लापुर, मांड्या, उडुपी, दक्षिण कन्नड़, यादगीर और दावनगेरे जिलों से इस योजना के तहत प्रस्ताव प्राप्त हो चुके हैं। सरकार ने तहसीलदारों को हर माह कम से कम पांच भूमि अभिलेखों का निस्तारण करने के निर्देश दिए हैं और नियमित समीक्षा बैठकों के जरिए प्रक्रिया में तेजी लाने का प्रयास किया जा रहा है। इसके बावजूद, विशेषज्ञों का मानना है कि मंदिर भूमि को अतिक्रमण से मुक्त कराना और उसे मूल स्वरूप में वापस लाना एक लंबी और जटिल प्रक्रिया होगी। प्रशासनिक इच्छाशक्ति, पारदर्शिता और मजबूत कानूनी कार्रवाई के बिना इस समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है।

  • बेंगलूरु में ओवरलोडिंग का कहर, रोज़ 180 उल्लंघन दर्ज

    भारतार्थ खबर, बेंगलूरु संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com)। बेंगलूरु। शहर में यातायात नियमों की अनदेखी और ओवरलोडिंग के बढ़ते मामलों ने सड़क सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंताएं खड़ी कर दी हैं। हाल ही में सामने आए यातायात प्रवर्तन आंकड़ों के अनुसार, बेंगलूरु में ओवरलोडिंग से जुड़े उल्लंघनों की संख्या लगातार ऊंची बनी हुई है, जो नियमों के अनुपालन पर सवाल खड़े करती है। आंकड़ों के मुताबिक, तीन अलग-अलग श्रेणियों में कुल 16,205 ओवरलोडिंग उल्लंघन दर्ज किए गए हैं। इसका मतलब है कि शहर में प्रतिदिन औसतन करीब 180 मामले सामने आ रहे हैं। इनमें सबसे अधिक 7,952 मामले अतिरिक्त यात्रियों को बैठाने के हैं, जो यातायात सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बनते जा रहे हैं। यातायात अधिकारियों के अनुसार, प्रतिदिन औसतन 88 मामले ऐसे दर्ज किए जा रहे हैं, जिनमें वाहनों में निर्धारित क्षमता से अधिक यात्री सवार पाए जाते हैं। संयुक्त यातायात आयुक्त कार्तिक रेड्डी ने बताया कि इस तरह के उल्लंघन विशेष रूप से स्कूली बच्चों के परिवहन और निर्माण स्थलों के आसपास अधिक देखने को मिलते हैं। उन्होंने कहा, “अक्सर अभिभावक बच्चों के लिए ऑटो या टैक्सी किराए पर लेते हैं, जहां क्षमता से अधिक बच्चों को बैठाया जाता है। वहीं, निर्माण स्थलों पर मजदूरों को मालवाहक वाहनों में ढोना आम हो गया है, जो बेहद खतरनाक है।” तीन पहिया वाहनों में सबसे ज्यादा उल्लंघन डीसीपी (ट्रैफिक ईस्ट) साहिल बागला के अनुसार, ओवरलोडिंग के मामले सबसे ज्यादा तीन पहिया वाहनों यानी ऑटो-रिक्शा में पाए जाते हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि क्षमता से अधिक यात्री बैठाने से वाहन का संतुलन बिगड़ता है और दुर्घटना का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। नियमों की खुली अवहेलना, किराए की लालच बड़ी वजह बनासवाड़ी यातायात पुलिस के एक अधिकारी ने बताया कि नियम के अनुसार ऑटो-रिक्शा में चालक के अलावा अधिकतम तीन यात्री ही बैठ सकते हैं, लेकिन हकीकत में इसका खुलेआम उल्लंघन हो रहा है। विशेषकर स्कूल समय, बस स्टैंड और रेलवे स्टेशनों पर ऑटो चालकों द्वारा यात्रियों को ठूंस-ठूंसकर बैठाना आम बात हो गई है। कई चालक मीटर या ऐप आधारित किराए को ठुकराकर प्रति व्यक्ति किराया वसूलते हैं। उदाहरण के तौर पर, ₹150-₹160 की सामान्य सवारी को चार-पांच यात्रियों में बांटकर चालक ₹200-₹250 तक वसूल लेते हैं। लालच में वे यात्रियों को गोद में बैठाने तक से नहीं हिचकते, जिससे सुरक्षा नियमों की धज्जियां उड़ती हैं। मालवाहक वाहनों का दुरुपयोग बढ़ा रिपोर्ट के अनुसार, 2026 के पहले तीन महीनों में ही मालवाहक वाहनों में अवैध रूप से यात्रियों को ढोने के 3,812 मामले दर्ज किए गए हैं, जबकि 2025 में यह संख्या 6,076 थी। अधिकारियों का कहना है कि मालवाहक वाहन केवल सामान ढोने के लिए होते हैं, इनमें यात्रियों को ले जाना कानूनन गलत और अत्यंत जोखिम भरा है। ऐसे वाहनों में बैठने की अनुमति सामान्यतः एक या दो व्यक्तियों तक ही सीमित होती है। निर्माण स्थलों, विवाह समारोहों और स्थानांतरण के दौरान इन वाहनों का दोहरे उपयोग—सामान और लोगों दोनों के लिए—किया जा रहा है, जिससे दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ जाता है। लंबे सामान का परिवहन भी बना खतरा एक अन्य चिंताजनक प्रवृत्ति दोपहिया वाहनों पर लंबी वस्तुओं जैसे लोहे की छड़, पाइप और सीढ़ियों को ले जाना है। हाल के समय में ऐसे 4,441 मामले दर्ज किए गए हैं। घनी आबादी वाले बाजार क्षेत्रों में यह प्रवृत्ति आम हो गई है, जो अन्य वाहन चालकों और पैदल यात्रियों के लिए गंभीर खतरा पैदा करती है। सख्ती और जागरूकता दोनों पर जोर यातायात विभाग ने स्पष्ट किया है कि ओवरलोडिंग को लेकर अब सख्त रुख अपनाया जा रहा है। प्रमुख चौराहों, स्कूल परिवहन और वाणिज्यिक वाहनों पर विशेष जांच अभियान चलाए जा रहे हैं। इसके साथ ही, लोगों को जागरूक करने के लिए अभियान भी तेज किए गए हैं। अधिकारियों का कहना है कि नियमों की अनदेखी न केवल कानून का उल्लंघन है, बल्कि यह सीधे-सीधे मानव जीवन को खतरे में डालता है। ऐसे में नागरिकों की जिम्मेदारी भी उतनी ही अहम है कि वे सुविधा या जल्दबाजी के बजाय सुरक्षा को प्राथमिकता दें।

  • बेंगलूरु बना उन्नत हृदय उपचार का हब

    भारतार्थ खबर, बेंगलूरु संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) बेंगलूरु, 17 अप्रैल। देश में आधुनिक स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ता बेंगलूरु अब उन्नत हृदय चिकित्सा का प्रमुख केंद्र बनकर उभर रहा है। यहां उपलब्ध अत्याधुनिक तकनीकों और विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम ने जटिल हृदय रोगों के इलाज को अधिक सुरक्षित, प्रभावी और मरीजों के लिए सहज बना दिया है। विशेषज्ञों के अनुसार, ट्रांसकैथेटर एओर्टिक वाल्व रिप्लेसमेंट (टीएवीआर) और ट्रांसकैथेटर माइट्रल वाल्व रिप्लेसमेंट (टीएमवीआर) जैसी आधुनिक प्रक्रियाएं पारंपरिक ओपन हार्ट सर्जरी का प्रभावी विकल्प बन रही हैं। इन तकनीकों के माध्यम से बिना छाती खोले ही वाल्व से जुड़ी गंभीर समस्याओं का इलाज संभव हो रहा है, जिससे मरीजों के लिए जोखिम काफी कम हो गया है। नारायणा इंस्टीट्यूट ऑफ कार्डियक साइंसेज के वरिष्ठ हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. संजय मेहरोत्रा ने एक मीडिया संवाद में बताया कि नई तकनीकों के कारण जटिल मामलों में भी बेहतर परिणाम मिल रहे हैं। उन्होंने कहा कि “इन प्रक्रियाओं का सबसे बड़ा लाभ मरीजों की तेज रिकवरी है। जहां पारंपरिक सर्जरी के बाद मरीजों को हफ्तों अस्पताल में रहना पड़ता है, वहीं टीएवीआर कराने वाले मरीज 24 से 72 घंटे के भीतर सामान्य स्थिति में लौट आते हैं।” उन्होंने यह भी बताया कि वैश्विक आंकड़ों के अनुसार, टीएवीआर या अन्य वाल्व रिप्लेसमेंट सर्जरी कराने वाले 73 प्रतिशत से अधिक मरीज सात वर्षों तक स्वस्थ रहते हैं और उन्हें दोबारा वाल्व से संबंधित गंभीर समस्या नहीं होती। विशेषज्ञों का मानना है कि ये तकनीकें विशेष रूप से उन मरीजों के लिए वरदान साबित हो रही हैं, जिन्हें दूसरी बार हृदय सर्जरी की आवश्यकता होती है। पहले ऐसी सर्जरी अत्यधिक जोखिम भरी मानी जाती थी, लेकिन अब बिना छाती दोबारा खोले ही इलाज संभव हो गया है। बेंगलूरु में अत्याधुनिक अस्पतालों, नवीनतम उपकरणों और अनुभवी चिकित्सा विशेषज्ञों की उपलब्धता ने इसे देश ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी हृदय उपचार के लिए एक भरोसेमंद गंतव्य बना दिया है। तेजी से विकसित होती चिकित्सा सुविधाएं और मरीज-केंद्रित दृष्टिकोण बेंगलूरु को स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में नई ऊंचाइयों तक पहुंचा रहे हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में इस तरह की न्यूनतम इनवेसिव तकनीकों का उपयोग और बढ़ेगा, जिससे हृदय रोगों के इलाज में क्रांतिकारी बदलाव देखने को मिलेगा।

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