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जीबीजी अधिनियम पर हाईकोर्ट सख्त, स्थानीय निकायों की शक्तियों पर उठे सवाल

  • Writer: धन्ना राम चौधरी
    धन्ना राम चौधरी
  • Apr 17
  • 2 min read

भारतार्थ खबर, बेंगलूरु संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com)

बेंगलूरु। कर्नाटक में लागू ग्रेटर बेंगलूरु गवर्नेंस एक्ट, 2024 (जीबीजी अधिनियम) की संवैधानिक वैधता को लेकर बहस तेज हो गई है। अधिनियम को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान कर्नाटक उच्च न्यायालय के समक्ष यह गंभीर तर्क रखा गया कि कानून स्थानीय निकायों की संवैधानिक भूमिका को कमजोर करता है और नए बनाए गए प्राधिकरणों को अत्यधिक शक्तियां सौंपता है। मुख्य न्यायाधीश विभू बखरू और न्यायमूर्ति सीएम पूनाचा की खंडपीठ के समक्ष सिटीजन्स एक्शन फोरम की ओर से पेश अधिवक्ता हरीश नरसप्पा ने अधिनियम की कई धाराओं को असंवैधानिक बताया।

वार्ड समितियों की भूमिका सीमित?

याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि अधिनियम की धारा 103 और 104 वार्ड समितियों को केवल सलाहकार भूमिका तक सीमित कर देती हैं, जबकि संविधान के तहत इन समितियों को अधिक प्रभावी अधिकार दिए गए हैं। इसके विपरीत, धारा 96 के तहत गठित विधानसभा क्षेत्र स्तरीय परामर्श एवं समन्वय समिति की सिफारिशों को बाध्यकारी बनाया गया है, जिससे शासन व्यवस्था में असंतुलन पैदा होने का खतरा बताया गया।

“असीमित हस्तक्षेप” का आरोप

सबसे गंभीर आपत्ति धारा 127 को लेकर जताई गई, जिसमें राज्य सरकार और ग्रेटर बेंगलूरु प्राधिकरण (जीबीए) को नगर निगमों के कामकाज में व्यापक हस्तक्षेप का अधिकार दिया गया है। याचिकाकर्ता के अनुसार, यह प्रावधान स्थानीय निकायों को प्रभावहीन बनाकर उन्हें भंग करने तक की स्थिति पैदा कर सकता है।

अवैध निर्माणों के नियमितीकरण पर सवाल

धारा 249 भी विवाद के केंद्र में है। इसमें अवैध निर्माणों के नियमितीकरण के लिए कोई स्पष्ट समय सीमा निर्धारित नहीं है। याचिकाकर्ता ने इसे “अनिश्चित और दुरुपयोग योग्य व्यवस्था” करार दिया। मामले की अगली सुनवाई 5 जून 2026 को तय की गई है।

हाईकोर्ट के आदेश देशभर में बाध्यकारी

इसी दौरान, कर्नाटक उच्च न्यायालय ने एक अन्य मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया कि संवैधानिक न्यायालयों के आदेश पूरे देश में सभी प्राधिकरणों पर बाध्यकारी होते हैं। न्यायमूर्ति सचिन शंकर मगदुम ने कहा कि कोई भी अधिकारी केवल इस आधार पर आदेशों का पालन करने से इनकार नहीं कर सकता कि वह न्यायालय के क्षेत्राधिकार से बाहर है। यह टिप्पणी कोटक महिंद्रा बैंक की याचिका पर सुनवाई के दौरान आई। अदालत ने स्टाम्प एवं पंजीकरण विभाग को पूर्व आदेशों का पालन करने का निर्देश देते हुए 25,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया।

शिक्षा व्यवस्था में बड़ा बदलाव

एक अन्य अहम फैसले में कर्नाटक उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि शैक्षणिक सत्र 2025-26 की एसएसएलसी परीक्षाओं में तृतीय भाषा विषयों के लिए केवल ग्रेड नहीं, बल्कि संख्यात्मक अंक दिए जाएं। अदालत ने माना कि केवल ग्रेडिंग प्रणाली प्रतिस्पर्धात्मक माहौल में छात्रों के लिए नुकसानदायक हो सकती है, जबकि अंक प्रणाली अधिक पारदर्शी और निष्पक्ष मूल्यांकन सुनिश्चित करती है। जीबीजी अधिनियम को लेकर उठे सवाल न केवल स्थानीय स्वशासन की संवैधानिक संरचना पर बहस छेड़ रहे हैं, बल्कि यह भी स्पष्ट कर रहे हैं कि शहरी शासन में शक्ति संतुलन कितना महत्वपूर्ण है। आगामी सुनवाई इस मामले की दिशा तय करने में निर्णायक साबित हो सकती है।

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