मंदिर भूमि पर बढ़ता अतिक्रमण, संरक्षण बड़ी चुनौती
- धन्ना राम चौधरी

- 17 अप्रैल
- 2 मिनट पठन

भारतार्थ खबर, बेंगलूरु संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com)
बेंगलूरु। कर्नाटक में मंदिरों की संपत्तियां, जिन्हें कभी पवित्र और सुरक्षित माना जाता था, अब तेजी से अतिक्रमण की चपेट में आ रही हैं। शहरीकरण, बढ़ती भूमि कीमतों और रियल एस्टेट की मांग ने मंदिरों की हजारों एकड़ जमीन को अवैध कब्जों और लेन-देन का आसान लक्ष्य बना दिया है। स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि कई मंदिरों के लिए दैनिक पूजा-अर्चना तक कर पाना मुश्किल हो रहा है।
मुजराई और धार्मिक बंदोबस्ती विभाग के अधीन आने वाले मंदिरों की भूमि पर बड़े पैमाने पर अतिक्रमण सामने आया है। अधिकारियों के अनुसार, ऐतिहासिक रूप से राजाओं द्वारा मंदिरों को उनके रखरखाव और धार्मिक गतिविधियों के लिए विशाल भूमि दान में दी गई थी। लेकिन स्वतंत्रता के बाद इन संपत्तियों का विधिवत दस्तावेजीकरण नहीं हो सका, जिससे स्वामित्व स्पष्ट नहीं रहा और इसका लाभ उठाकर कई लोगों ने अवैध कब्जे जमा लिए। राज्य में कुल 34,566 मंदिर मुजराई विभाग के अंतर्गत आते हैं, जिनमें 205 ए-श्रेणी, 193 बी-श्रेणी और 34,168 सी-श्रेणी के मंदिर शामिल हैं। जहां ए और बी श्रेणी के मंदिर आर्थिक रूप से अपेक्षाकृत स्थिर हैं, वहीं सी-श्रेणी के अधिकांश मंदिर सरकारी सहायता पर निर्भर हैं। भूमि से होने वाली आय खत्म होने के कारण इन मंदिरों के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया है। वर्ष 2020 के सरकारी सर्वेक्षण के मुताबिक, कर्नाटक में करीब 40,000 एकड़ मंदिर भूमि पर अतिक्रमण हो चुका है। अब तक 7,125 मंदिरों से संबंधित 18,870 एकड़ भूमि का मापन किया गया है, जिसमें से 17,202.02 एकड़ के स्वामित्व अभिलेख जारी किए जा चुके हैं। हालांकि, अभी भी 27,441 मंदिरों की भूमि का सर्वेक्षण और दस्तावेजीकरण लंबित है, जो प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है।
अतिक्रमण हटाने की प्रक्रिया भी आसान नहीं है। कई मामलों में भूमि का रिकॉर्ड मंदिर के नाम पर दर्ज नहीं है, बल्कि उसे सरकारी या वन भूमि के रूप में वर्गीकृत किया गया है। कुछ स्थानों पर किसानों और पुजारियों ने भूमि सुधार कानूनों के तहत स्वामित्व अधिकार हासिल कर लिए हैं, जबकि प्रभावशाली लोगों ने अवैध तरीके से जमीन पर कब्जा कर उसे बेच भी दिया है। भूमि अभिलेखों में विसंगतियां और अस्पष्ट विवरण इस समस्या को और जटिल बना रहे हैं। इन चुनौतियों से निपटने के लिए राज्य सरकार ने ‘भू वराह’ योजना शुरू की है, जिसके तहत मंदिरों की संपत्तियों का व्यवस्थित सर्वेक्षण, स्वामित्व निर्धारण और सुरक्षा सुनिश्चित करने के प्रयास किए जा रहे हैं। चालू बजट में इसके लिए 15 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। योजना के अंतर्गत भूमि का सीमांकन, दस्तावेजीकरण और चारदीवारी निर्माण जैसे कार्य किए जाएंगे।
बेंगलूरु शहरी और ग्रामीण, चिक्कबल्लापुर, मांड्या, उडुपी, दक्षिण कन्नड़, यादगीर और दावनगेरे जिलों से इस योजना के तहत प्रस्ताव प्राप्त हो चुके हैं। सरकार ने तहसीलदारों को हर माह कम से कम पांच भूमि अभिलेखों का निस्तारण करने के निर्देश दिए हैं और नियमित समीक्षा बैठकों के जरिए प्रक्रिया में तेजी लाने का प्रयास किया जा रहा है। इसके बावजूद, विशेषज्ञों का मानना है कि मंदिर भूमि को अतिक्रमण से मुक्त कराना और उसे मूल स्वरूप में वापस लाना एक लंबी और जटिल प्रक्रिया होगी। प्रशासनिक इच्छाशक्ति, पारदर्शिता और मजबूत कानूनी कार्रवाई के बिना इस समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है।
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