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शरीयत कानून पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र से जवाब तलब

  • Writer: धन्ना राम चौधरी
    धन्ना राम चौधरी
  • Apr 17
  • 2 min read

भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com)

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) और धार्मिक व्यक्तिगत कानूनों को लेकर जारी बहस के बीच एक अहम मोड़ आ गया है। मुस्लिम उत्तराधिकार और वसीयत से जुड़े शरीयत कानून को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट संकेत दिया कि यूसीसी संविधान का एक लक्ष्य है और इसे किसी धर्म विशेष के खिलाफ नहीं देखा जा सकता। इस महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने की, जिसमें जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल पांचोली भी शामिल रहे। सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि समान नागरिक संहिता का उद्देश्य देश के सभी नागरिकों के लिए समान कानून सुनिश्चित करना है, जिससे संविधान में निहित समानता और न्याय के सिद्धांत को मजबूती मिल सके।


पीठ ने यह भी रेखांकित किया कि ऐसे संवेदनशील मामलों में संतुलन बनाए रखना आवश्यक है, ताकि किसी भी समुदाय की धार्मिक स्वतंत्रता प्रभावित न हो, लेकिन साथ ही नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा भी सुनिश्चित हो। अदालत ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए अन्य समान याचिकाओं के साथ जोड़ दिया है। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने जोरदार पक्ष रखा। उन्होंने दलील दी कि उत्तराधिकार और संपत्ति का बंटवारा धार्मिक नहीं बल्कि सिविल प्रकृति के विषय हैं। उनके अनुसार, मौजूदा व्यवस्था में मुस्लिम महिलाओं को पुरुषों की तुलना में कम हिस्सा मिलता है, जो समानता के अधिकार का उल्लंघन है। उन्होंने यह भी कहा कि मुस्लिम उत्तराधिकार कानून पूरी तरह संहिताबद्ध (कोडिफाइड) नहीं है, जिससे इसकी व्याख्या जटिल हो जाती है और आम लोगों के लिए न्याय तक पहुंच कठिन हो सकती है।


सुनवाई के दौरान यह भी मुद्दा उठा कि विरासत का अधिकार किसी अनिवार्य धार्मिक प्रथा का हिस्सा नहीं है, इसलिए इसे संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत पूर्ण संरक्षण नहीं दिया जा सकता। साथ ही यह भी बताया गया कि वर्तमान प्रावधानों के तहत मुस्लिम व्यक्ति अपनी संपत्ति का केवल एक तिहाई हिस्सा ही वसीयत कर सकता है, जिससे व्यक्तिगत स्वतंत्रता सीमित होती है। अदालत ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि कोई प्रथा अपने स्वरूप में भेदभावपूर्ण है, तो उसे समाप्त किया जा सकता है। हालांकि, पीठ ने यह भी महत्वपूर्ण सवाल उठाया कि ऐसे मामलों में अंतिम निर्णय अदालत को लेना चाहिए या यह जिम्मेदारी विधायिका की है। इस मामले ने एक बार फिर देश में समान नागरिक संहिता को लेकर बहस को तेज कर दिया है। अब सभी की नजरें केंद्र सरकार के जवाब और सुप्रीम कोर्ट के अगले कदम पर टिकी हैं, जो न केवल व्यक्तिगत कानूनों बल्कि संवैधानिक मूल्यों की दिशा भी तय कर सकता है।

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