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 भारतार्थ खबर, नहीं उसका अर्थ

21अक्टूबर /2026 /बुधवार

बेंगलुरु, 20 अक्टूबर 2026। बेंगलुरु में आयोजित 48वें दशहरा महोत्सव में राज्यसभा सांसद लहर सिंह सिरोया ने मां दुर्गा के दर्शन कर पूजा-अर्चना की और आशीर्वाद प्राप्त किया। सिद्धार्थ सांस्कृतिक समिति एवं राजेंद्र बाबू मेमोरियल ट्रस्ट ‘बिहार भवन’ के तत्वावधान में आयोजित इस महोत्सव में सांसद की उपस्थिति रही। इस अवसर पर समिति के पदाधिकारियों और सदस्यों ने मां भगवती की चुनड़ी ओढ़ाकर उनका स्वागत एवं अभिनंदन किया।

भारतार्थ लोगो: खबर नहीं, उसका अर्थ - राजनीतिक समाचार विश्लेषण

बेंगलुरु, 20 अक्टूबर 2026। बेंगलुरु में आयोजित 48वें दशहरा महोत्सव में राज्यसभा सांसद लहर सिंह सिरोया ने मां दुर्गा के दर्शन कर पूजा-अर्चना की और आशीर्वाद प्राप्त किया। सिद्धार्थ सांस्कृतिक समिति एवं राजेंद्र बाबू मेमोरियल ट्रस्ट ‘बिहार भवन’ के तत्वावधान में आयोजित इस महोत्सव में सांसद की उपस्थिति रही। इस अवसर पर समिति के पदाधिकारियों और सदस्यों ने मां भगवती की चुनड़ी ओढ़ाकर उनका स्वागत एवं अभिनंदन किया।

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  • 10 प्रतिशत से अधिक फीस बढ़ाने पर जिला समिति की मंजूरी अनिवार्य

    भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) रांची। निजी विद्यालयों में मनमानी फीस वृद्धि पर अंकुश लगाने और अभिभावकों को राहत देने के उद्देश्य से रांची जिला प्रशासन ने सख्त कदम उठाए हैं। झारखंड शिक्षा न्यायाधिकरण संशोधन अधिनियम, 2017 के तहत जिला स्तरीय शुल्क निर्धारण समिति की पहली बैठक समाहरणालय स्थित एनआईसी सभागार में उपायुक्त सह जिला दंडाधिकारी मंजूनाथ भजन्त्री की अध्यक्षता में संपन्न हुई। बैठक का मुख्य उद्देश्य शुल्क निर्धारण प्रक्रिया को पारदर्शी, न्यायसंगत और जवाबदेह बनाना रहा। बैठक में जिला शिक्षा पदाधिकारी विनय कुमार, जिला परिवहन पदाधिकारी अखिलेश कुमार, जिला जनसंपर्क पदाधिकारी उर्वशी पांडेय, जिला शिक्षा अधीक्षक बादल राज समेत विभिन्न विभागों के अधिकारी, निजी विद्यालयों के प्रतिनिधि और अभिभावक सदस्य मौजूद रहे। अधिकारियों ने समिति के गठन को शिक्षा व्यवस्था में सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण पहल बताया। फीस वृद्धि पर सख्त नियंत्रण समिति ने स्पष्ट किया कि सभी निजी विद्यालय अपनी आंतरिक शुल्क समिति की सहमति से अधिकतम 10 प्रतिशत तक ही फीस बढ़ा सकेंगे। यदि कोई विद्यालय इससे अधिक वृद्धि करना चाहता है, तो उसे जिला स्तरीय समिति से पूर्व अनुमति लेना अनिवार्य होगा। साथ ही, विद्यालयों को पिछले तीन शैक्षणिक सत्रों की कक्षावार फीस का विस्तृत ब्योरा और सत्र 2026-27 की प्रस्तावित शुल्क सूची समिति के समक्ष प्रस्तुत करनी होगी। पारदर्शिता और पीटीए गठन अनिवार्य प्रत्येक विद्यालय में शुल्क समिति और अभिभावक-शिक्षक संघ (पीटीए) का गठन अनिवार्य कर दिया गया है। इन समितियों से जुड़ी सभी जानकारियां विद्यालय की वेबसाइट और सूचना पट्ट पर सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करनी होंगी, ताकि अभिभावकों की भागीदारी और निगरानी सुनिश्चित हो सके। किताबों और यूनिफॉर्म पर भी नियम विद्यालयों को कक्षावार पुस्तकों की कीमत की जानकारी देना अनिवार्य होगा। सीबीएसई से संबद्ध स्कूल एनसीईआरटी पुस्तकों के अतिरिक्त अन्य किताबें अनिवार्य नहीं कर सकेंगे। वहीं, यूनिफॉर्म में बदलाव कम से कम पांच वर्षों के अंतराल पर ही किया जाएगा और अभिभावकों को किसी विशेष दुकान से खरीदारी के लिए बाध्य नहीं किया जा सकेगा। परिवहन शुल्क वृद्धि भी निर्धारित मानकों के तहत ही मान्य होगी। छात्र हित सर्वोपरि समिति ने स्पष्ट निर्देश दिए कि किसी भी छात्र को परीक्षा से वंचित नहीं किया जाएगा और परीक्षा के नाम पर अतिरिक्त शुल्क नहीं वसूला जाएगा। साथ ही, प्रमोशन के लिए दोबारा नामांकन शुल्क लेने पर रोक रहेगी। आरटीई के तहत 25 प्रतिशत सीटें वंचित वर्ग के छात्रों के लिए अनिवार्य रूप से भरी जाएंगी। शिकायत पर त्वरित कार्रवाई अभिभावक अपनी शिकायत समाहरणालय के कक्ष संख्या 105 में या “अबुआ साथी” व्हाट्सएप नंबर 9430328080 पर दर्ज करा सकते हैं। उपायुक्त मंजूनाथ भजन्त्री ने चेतावनी दी कि नियमों का उल्लंघन करने वाले विद्यालयों पर 50 हजार से 2.5 लाख रुपये तक का जुर्माना लगाया जाएगा। गंभीर मामलों में विद्यालय की मान्यता रद्द करने तक की कार्रवाई की जा सकती है। जिला प्रशासन की इस पहल को निजी शिक्षा क्षेत्र में पारदर्शिता बढ़ाने और अभिभावकों का विश्वास मजबूत करने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।

  • 4 साल में वादे पूरे, अब नए राज्यों पर नजर: आप

    भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) पंजाब। आम आदमी पार्टी (आप) ने पंजाब में अपनी सरकार के चार साल पूरे होने पर उपलब्धियों का दावा करते हुए अब अन्य राज्यों में विस्तार की रणनीति तेज कर दी है। पार्टी के राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी अनुराग ढांडा ने कहा कि पंजाब में ऐतिहासिक जनादेश के बाद सरकार ने पांच वर्षों के वादों को मात्र चार साल में ही पूरा कर दिखाया है। एक विशेष बातचीत में अनुराग ढांडा ने कहा कि 92 सीटों की प्रचंड जीत के बाद पार्टी ने जनहित के प्रमुख वादों को प्राथमिकता के आधार पर लागू किया। उन्होंने बताया कि राज्य में बिजली और पानी मुफ्त करने जैसी योजनाओं से आम लोगों को बड़ी राहत मिली है। “आज पंजाब के लगभग 90 प्रतिशत घरों को मुफ्त बिजली मिल रही है, जबकि किसानों को दिन में बिजली उपलब्ध कराई जा रही है,” उन्होंने कहा। महिलाओं के सशक्तिकरण को लेकर भी सरकार ने कई कदम उठाए हैं। ढांडा के अनुसार, महिलाओं के लिए बस यात्रा मुफ्त की गई है और आर्थिक सहायता योजनाओं के तहत सामान्य वर्ग की महिलाओं को 1000 रुपये तथा अनुसूचित जाति परिवारों की महिलाओं को 1500 रुपये प्रतिमाह दिए जा रहे हैं। उन्होंने दावा किया कि राज्य की 97 प्रतिशत महिलाओं को इन योजनाओं का लाभ मिल रहा है। नशे के खिलाफ सख्ती पंजाब में लंबे समय से गंभीर समस्या रहे नशे के मुद्दे पर भी सरकार ने सख्त कार्रवाई का दावा किया है। ढांडा ने बताया कि ड्रग तस्करी के नेटवर्क को तोड़ने के लिए बड़े स्तर पर अभियान चलाया गया। “करीब 70 से 80 हजार पेडलर्स के खिलाफ कार्रवाई की गई और 20 हजार से अधिक एफआईआर दर्ज हुई हैं। पाकिस्तान से आने वाली ड्रग सप्लाई चेन को भी काफी हद तक खत्म किया गया है,” उन्होंने कहा। अन्य राज्यों में विस्तार की रणनीति पंजाब के बाद पार्टी अब अन्य राज्यों में अपनी पकड़ मजबूत करने की दिशा में काम कर रही है। ढांडा ने बताया कि गुजरात और गोवा में पार्टी का प्रदर्शन लगातार बेहतर हो रहा है। “गुजरात में 2022 के चुनाव में हमें 13 प्रतिशत वोट मिले थे और 5 विधायक जीते थे। हालिया सर्वे में यह आंकड़ा 25 प्रतिशत तक पहुंचता दिख रहा है। वहीं गोवा में दो विधायकों के साथ हमने एक ईमानदार विपक्ष की भूमिका निभाई है,” उन्होंने कहा। उन्होंने कहा कि पार्टी का ‘मोहल्ला क्लिनिक’ मॉडल अन्य राज्यों में भी लोकप्रिय हो रहा है और इसे स्वास्थ्य सेवाओं के बेहतर विकल्प के रूप में देखा जा रहा है। 2027 पर नजर, 17 राज्यों में संगठन विस्तार भविष्य की योजनाओं का जिक्र करते हुए ढांडा ने कहा कि पार्टी असम, केरल, पंजाब, गोवा, गुजरात और हिमाचल प्रदेश सहित कुल 17 राज्यों में संगठन को मजबूत करने पर काम कर रही है। “हम 2027 के चुनावों में एक मजबूत तीसरे विकल्प के रूप में उभरना चाहते हैं, जो कांग्रेस और बीजेपी से अलग एक भरोसेमंद विकल्प दे सके,” उन्होंने कहा। केंद्र पर साधा निशाना इस दौरान ढांडा ने वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक संकट के मुद्दे पर केंद्र सरकार की नीतियों की भी आलोचना की। उन्होंने कहा कि देश को मजबूत और पारदर्शी नीतियों की जरूरत है, जिससे आम जनता को राहत मिल सके। पंजाब मॉडल को आधार बनाकर आप अब राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। आने वाले चुनावों में पार्टी की रणनीति और प्रदर्शन पर सभी की नजरें टिकी रहेंगी।

  • 16,720 करोड़ की मंजूरी, किसानों को बड़ी राहत

    भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) भोपाल। डॉ. मोहन यादव की अध्यक्षता में मंगलवार को मंत्रालय में आयोजित मंत्रि-परिषद की बैठक में प्रदेश के विकास और जनकल्याण को नई गति देने वाले कई अहम फैसले लिए गए। सरकार ने कृषि, शिक्षा, सिंचाई, वन, बुनियादी ढांचे और प्रशासनिक सुधार से जुड़ी योजनाओं के लिए कुल 16,720 करोड़ रुपये की बड़ी राशि को मंजूरी दी है। बैठक में लिए गए निर्णयों में किसानों के हितों को विशेष प्राथमिकता दी गई है। सरकार ने आगामी तीन वर्षों के लिए चना एवं मसूर उपार्जन हेतु 3,174 करोड़ रुपये स्वीकृत किए हैं, जिससे किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर उपज बेचने में सहूलियत मिलेगी। यह उपार्जन भारत सरकार की प्राइस सपोर्ट स्कीम के तहत किया जाएगा, जिसमें चना उत्पादन का 25 प्रतिशत और मसूर का 100 प्रतिशत खरीदा जाएगा। साथ ही, मंडी शुल्क में छूट देकर किसानों को अतिरिक्त राहत देने का निर्णय भी लिया गया है। सिंचाई और कृषि को मजबूती मंदसौर जिले की कातना सूक्ष्म सिंचाई परियोजना को 88.41 करोड़ रुपये की स्वीकृति दी गई है। इस परियोजना से भानपुरा तहसील के 12 गांवों की लगभग 3500 हेक्टेयर भूमि को सिंचाई सुविधा मिलेगी, जिससे कृषि उत्पादन में वृद्धि और किसानों की आय में सुधार की उम्मीद है। वन संरक्षण पर बड़ा निवेश राज्य सरकार ने वन क्षेत्रों के संरक्षण, पुनर्स्थापना और पुनरुत्पादन के लिए वर्ष 2026 से 2031 तक 5,215 करोड़ रुपये खर्च करने की मंजूरी दी है। इस योजना में नए पौधारोपण के साथ पुराने कार्यों के रखरखाव को भी शामिल किया गया है, जिससे पर्यावरण संतुलन को मजबूती मिलेगी। शिक्षा क्षेत्र में राहत और विस्तार शिक्षा के क्षेत्र में भी सरकार ने कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए हैं। आरटीई के तहत फीस प्रतिपूर्ति, पीएमश्री स्कूल योजना का विस्तार तथा कक्षा 9वीं से 12वीं तक के छात्रों को मुफ्त पाठ्यपुस्तकें उपलब्ध कराने के लिए वित्तीय स्वीकृति प्रदान की गई है। इसके साथ ही दिल्ली में अध्ययनरत अनुसूचित जाति के छात्रों को 10,000 रुपये मासिक सहायता देने का भी निर्णय लिया गया है। बुनियादी ढांचे और प्रशासनिक सुधार राजधानी भोपाल में अत्याधुनिक वित्तीय प्रशिक्षण एवं शोध संस्थान (एफटीआरआई) स्थापित किया जाएगा, जिससे सरकारी कार्यों में पारदर्शिता और वित्तीय अनुशासन को बढ़ावा मिलेगा। वहीं, उज्जैन की हवाई पट्टी को एयरबस विमानों के अनुकूल विकसित करने की योजना भी स्वीकृत की गई है, जिससे क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को मजबूती मिलेगी। समग्र विकास का संकल्प मंत्रि-परिषद के ये फैसले राज्य में कृषि सशक्तिकरण, शिक्षा विस्तार, पर्यावरण संरक्षण और आधारभूत संरचना विकास के जरिए समग्र प्रगति की दिशा में एक बड़ा कदम माने जा रहे हैं। सरकार का दावा है कि इन योजनाओं से समाज के हर वर्ग को सीधा लाभ मिलेगा और प्रदेश की अर्थव्यवस्था को नई मजबूती मिलेगी।

  • बंगाल में कांग्रेस की नई चाल, टीएमसी पर सीधा वार

    भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) कोलकाता। केंद्र में विपक्षी एकता के बड़े मंच ‘इंडिया’ गठबंधन का हिस्सा होने के बावजूद पश्चिम बंगाल में कांग्रेस ने अलग राह पकड़ ली है। राज्य की सियासत में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाते हुए कांग्रेस ने अपनी खोई जमीन वापस पाने की ठोस रणनीति तैयार कर ली है, जिससे मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की राजनीतिक चिंता बढ़ना तय माना जा रहा है। दरअसल, कांग्रेस अब बंगाल में ‘मित्र नहीं, मुकाबला’ की नीति पर काम कर रही है। पार्टी का फोकस उन क्षेत्रों पर है, जहां अल्पसंख्यक और सामाजिक रूप से प्रभावशाली वोटबैंक निर्णायक भूमिका निभाते हैं। मालदा, मुर्शिदाबाद, उत्तर दिनाजपुर और पुरुलिया जैसे जिलों में कांग्रेस ने पूरी ताकत झोंकने का निर्णय लिया है। इसके अलावा दार्जिलिंग जैसे संवेदनशील क्षेत्र को भी रणनीतिक रूप से टारगेट किया गया है। राज्य में बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच असदुद्दीन ओवैसी और स्थानीय नेताओं के गठजोड़ ने अल्पसंख्यक वोटों में नई हलचल पैदा कर दी है। वहीं वाम दल भी अपने पारंपरिक आधार को पुनर्जीवित करने की कोशिश में जुटे हैं। ऐसे में कांग्रेस के लिए यह चुनाव खुद को पुनर्स्थापित करने का अहम अवसर बन गया है। चुनावी अभियान को धार देने के लिए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मैदान में उतरने वाले हैं। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा की कई बड़ी रैलियों की तैयारी है, जबकि कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे कोलकाता में पार्टी का घोषणापत्र जारी कर चुनावी बिगुल फूंकेंगे। खास बात यह है कि अनुसूचित जाति-जनजाति बहुल क्षेत्रों में खरगे की सभाओं के जरिए कांग्रेस सामाजिक समीकरण साधने की कोशिश करेगी। कांग्रेस ने इस चुनाव के लिए चार प्रमुख मुद्दों को केंद्र में रखा है—कानून-व्यवस्था, भ्रष्टाचार, महंगाई और केंद्र से बकाया राशि का मुद्दा। पार्टी का आरोप है कि राज्य में कानून व्यवस्था चरमरा गई है और भ्रष्टाचार के मामलों में टीएमसी सरकार घिरी हुई है। वहीं महंगाई को लेकर कांग्रेस ने राज्य और केंद्र दोनों सरकारों को जिम्मेदार ठहराया है। सबसे तीखा हमला उस आरोप को लेकर है जिसमें कांग्रेस, टीएमसी और भाजपा के बीच ‘अघोषित समझ’ होने की बात कह रही है। कांग्रेस का दावा है कि केंद्र द्वारा राज्य के करीब दो लाख करोड़ रुपये के बकाये को रोके जाने के बावजूद ममता बनर्जी चुप हैं, जिससे जनता के अधिकारों का हनन हो रहा है। गौरतलब है कि पिछले लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस और टीएमसी ने अलग-अलग चुनाव लड़ा था, हालांकि उस समय प्रचार में इतनी तीखी बयानबाजी देखने को नहीं मिली थी। इस बार कांग्रेस का आक्रामक रुख साफ संकेत दे रहा है कि वह बंगाल में टीएमसी को सीधी चुनौती देने के मूड में है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस की यह रणनीति जहां एक ओर राज्य में उसके पुनरुत्थान की कोशिश है, वहीं दूसरी ओर ‘इंडिया’ गठबंधन की एकजुटता पर भी सवाल खड़े कर सकती है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह सियासी टकराव गठबंधन की राष्ट्रीय राजनीति को किस दिशा में ले जाता है।

  • खार्ग द्वीप पर अमेरिकी हमला, मिडिल ईस्ट में बढ़ा युद्ध का खतरा

    भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) खार्ग द्वीप। मध्य पूर्व में लंबे समय से सुलग रहा तनाव अब खुली सैन्य टकराव की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है। ताजा घटनाक्रम में अमेरिका ने ईरान के रणनीतिक रूप से बेहद अहम खार्ग द्वीप पर भीषण हवाई हमला कर क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर पर हड़कंप मचा दिया है। इस कार्रवाई को संभावित महायुद्ध की शुरुआत के तौर पर देखा जा रहा है। सूत्रों के अनुसार, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा ईरान को दी गई समयसीमा समाप्त होने से पहले ही अमेरिकी सेना ने यह बड़ा कदम उठाया। यह हमला सीधे तौर पर ईरान की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले खार्ग द्वीप को निशाना बनाकर किया गया। आर्थिक और रणनीतिक झटका खार्ग द्वीप ईरान के तेल निर्यात का मुख्य केंद्र है, जहां से देश का लगभग 90 प्रतिशत कच्चा तेल विश्व बाजार में भेजा जाता है। इस द्वीप पर हुए हमले ने न केवल तेल भंडारण और निर्यात ढांचे को भारी नुकसान पहुंचाया है, बल्कि वहां मौजूद सैन्य प्रतिष्ठानों और मिसाइल ठिकानों को भी गंभीर क्षति पहुंचने की खबर है। प्रत्यक्षदर्शियों और क्षेत्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, धमाकों की तीव्रता इतनी अधिक थी कि उनकी गूंज दूर-दूर तक सुनी गई। इससे यह संकेत मिलता है कि हमला बेहद योजनाबद्ध और व्यापक स्तर पर किया गया। अल्टीमेटम से पहले कार्रवाई अमेरिका ने पहले ईरान को युद्धविराम और समझौते के लिए अंतिम चेतावनी दी थी, जिसकी समय सीमा 8 अप्रैल 2026 सुबह तक तय की गई थी। हालांकि, समयसीमा समाप्त होने से पहले ही अमेरिकी वायुसेना ने कार्रवाई शुरू कर दी, जिसे कूटनीतिक दबाव के साथ सैन्य शक्ति प्रदर्शन के रूप में देखा जा रहा है। वैश्विक बाजार में उथल-पुथल इस हमले का सीधा असर अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार पर देखने को मिल रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि खार्ग द्वीप की क्षमता लंबे समय तक प्रभावित रहती है, तो वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की आपूर्ति बाधित हो सकती है। इसका परिणाम पेट्रोल और डीजल की कीमतों में भारी उछाल के रूप में सामने आ सकता है। ऐतिहासिक और भौगोलिक महत्व खार्ग द्वीप केवल आर्थिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि ऐतिहासिक रूप से भी महत्वपूर्ण है। इसे “फारस की खाड़ी का अनमोल मोती” कहा जाता है। यहां प्राचीन सभ्यताओं के अवशेष, ईसाई मठ और अचमेनिड काल के शिलालेख मौजूद हैं, जो इसकी सांस्कृतिक विरासत को दर्शाते हैं। बढ़ता युद्ध का खतरा विशेषज्ञों का मानना है कि इस हमले के बाद क्षेत्र में व्यापक युद्ध की आशंका और बढ़ गई है। यदि ईरान जवाबी कार्रवाई करता है, तो यह संघर्ष पूरे मध्य पूर्व को अपनी चपेट में ले सकता है, जिससे वैश्विक शांति और अर्थव्यवस्था दोनों पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। फिलहाल पूरी दुनिया की नजर इस घटनाक्रम पर टिकी हुई है, क्योंकि आने वाले कदम यह तय करेंगे कि यह टकराव सीमित रहेगा या एक बड़े युद्ध में तब्दील होगा।

  • तमिलनाडु में सत्ता परिवर्तन के संकेत, सर्वे ने बढ़ाई सियासी हलचल

    भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) चेन्नई। तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026 को लेकर सामने आए ताजा जनमत सर्वेक्षण ने राज्य की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। सर्वे के संकेत बताते हैं कि इस बार सत्ता परिवर्तन की संभावना मजबूत हो रही है और मौजूदा सत्तारूढ़ दल को कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ सकता है। राज्य में मुख्य मुकाबला दो बड़े गठबंधनों के बीच सिमटता नजर आ रहा है, जिससे चुनावी परिदृश्य और भी दिलचस्प हो गया है। सर्वे के मुताबिक द्रविड़ मुनेत्र कषगम (डीएमके) के नेतृत्व वाला गठबंधन इस बार पिछड़ता हुआ दिखाई दे रहा है, जबकि अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कषगम (एआईएडीएमके) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का गठबंधन बढ़त बनाता दिख रहा है। वोट प्रतिशत के अनुमान में एआईएडीएमके गठबंधन को करीब 41.4 प्रतिशत समर्थन मिलने की संभावना जताई गई है, जबकि डीएमके गठबंधन लगभग 39.3 प्रतिशत पर सिमट सकता है। यह अंतर भले ही मामूली प्रतीत हो, लेकिन सीटों के लिहाज से इसका असर निर्णायक हो सकता है। सीटों के अनुमान पर नजर डालें तो एआईएडीएमके-भाजपा गठबंधन को 130 से 140 सीटें मिलने का आकलन किया गया है, जो स्पष्ट बहुमत की ओर इशारा करता है। वहीं डीएमके गठबंधन 90 से 100 सीटों के बीच सिमट सकता है। यदि ये आंकड़े वास्तविक परिणामों में तब्दील होते हैं, तो राज्य में सत्ता परिवर्तन लगभग तय माना जा रहा है। मुख्यमंत्री पद की पसंद को लेकर भी तस्वीर बेहद रोचक बनी हुई है। वर्तमान मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन को 39.0 प्रतिशत लोगों का समर्थन मिलता दिख रहा है, जबकि एआईएडीएमके नेता एडप्पाडी के. पलानीस्वामी 38.7 प्रतिशत के साथ बेहद करीबी मुकाबले में हैं। दोनों नेताओं के बीच यह मामूली अंतर चुनाव को और अधिक रोमांचक बना रहा है। इस बीच अभिनेता से नेता बने विजय भी 14.3 प्रतिशत समर्थन के साथ तीसरे विकल्प के रूप में उभरते नजर आ रहे हैं, जो पारंपरिक राजनीति में नए समीकरण बना सकते हैं। तमिलनाडु की राजनीति में लंबे समय से सत्ता परिवर्तन का एक चक्र देखने को मिलता रहा है, जहां मतदाता अक्सर एक कार्यकाल के बाद सरकार बदलने का रुझान दिखाते हैं। इस बार भी सर्वे में इसी प्रवृत्ति के दोहराए जाने के संकेत मिल रहे हैं, हालांकि अंतिम फैसला मतदाताओं के हाथ में ही होगा। कुल मिलाकर, चुनावी मुकाबला बेहद कांटे का होता जा रहा है और आने वाले समय में राजनीतिक दलों की रणनीतियां, गठबंधन समीकरण और जमीनी प्रचार इस तस्वीर को और स्पष्ट करेंगे। फिलहाल, इस सर्वे ने इतना जरूर तय कर दिया है कि तमिलनाडु में 2026 का चुनाव बेहद दिलचस्प और निर्णायक होने वाला है।

  • पवन खेड़ा पर कानूनी शिकंजा

    भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) असम। असम विधानसभा चुनाव के बीच सियासी बयानबाज़ी अब कानूनी दायरे में प्रवेश करती नजर आ रही है। कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता पवन खेड़ा द्वारा असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा की पत्नी पर लगाए गए गंभीर आरोपों के बाद विवाद ने नया मोड़ ले लिया है। मंगलवार को असम पुलिस की एक टीम दिल्ली के निजामुद्दीन ईस्ट स्थित खेड़ा के आवास पर पहुंची, जहां उनसे पूछताछ की प्रक्रिया शुरू की गई। इस दौरान दिल्ली पुलिस केवल सहयोगी भूमिका में मौजूद रही। दरअसल, कांग्रेस नेता पवन खेड़ा और असम कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गौरव गोगोई ने हाल ही में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान मुख्यमंत्री की पत्नी रिंकी भुइयां सरमा पर कई गंभीर आरोप लगाए थे। उन्होंने दावा किया था कि रिंकी भुइयां के पास यूएई, मिस्र और एंटीगुआ-बारबुडा के पासपोर्ट हैं, साथ ही दुबई में उनकी संपत्तियां और अमेरिका के व्योमिंग राज्य की एक कंपनी से संबंध भी हैं। कांग्रेस नेताओं ने यह भी आरोप लगाया कि इन विदेशी संपत्तियों का खुलासा चुनावी हलफनामों में नहीं किया गया। इन आरोपों के बाद राजनीतिक माहौल गरमा गया। मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि वे इस मामले में सख्त कानूनी कार्रवाई करेंगे। उन्होंने यहां तक कहा कि “मैं पवन खेड़ा को पवन पेड़ा बना दूंगा,” जिससे विवाद और बढ़ गया। सरमा ने आरोपों को पूरी तरह निराधार बताते हुए दावा किया कि जिन दस्तावेजों का हवाला दिया गया है, वे कथित तौर पर फर्जी हैं और सोशल मीडिया के संदिग्ध स्रोतों से तैयार किए गए हैं। वहीं, रिंकी भुइयां सरमा ने भी इन आरोपों को खारिज करते हुए पवन खेड़ा के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है और कड़ी कानूनी कार्रवाई की मांग की है। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस नेताओं द्वारा तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया है और उनकी छवि को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की जा रही है। चुनावी माहौल के बीच यह प्रकरण अब केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि कानूनी लड़ाई का रूप लेता दिख रहा है। आने वाले दिनों में इस मामले में जांच और संभावित कार्रवाई पर सभी की नजरें टिकी है।

  • भारत का परमाणु छलांग: कल्पक्कम में स्वदेशी फास्ट ब्रीडर रिएक्टर सफल

    भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) तमिलनाडु। भारत ने अपनी परमाणु ऊर्जा यात्रा में एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल करते हुए तमिलनाडु के कल्पक्कम परमाणु परिसर में देश का पहला स्वदेशी प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर सफलतापूर्वक चालू कर दिया है। यह उपलब्धि भारत को उन चुनिंदा देशों की श्रेणी में खड़ा करती है, जिनके पास यह उन्नत परमाणु तकनीक मौजूद है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस सफलता को “देश के लिए गर्व का क्षण” बताते हुए वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को बधाई दी। उन्होंने कहा कि यह उपलब्धि न केवल भारत की वैज्ञानिक क्षमता को दर्शाती है, बल्कि ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा कदम भी है। यह रिएक्टर अपनी विशेष “ब्रीडर” तकनीक के कारण पारंपरिक परमाणु रिएक्टरों से अलग है। जहां सामान्य रिएक्टर ईंधन का उपयोग कर उसे समाप्त कर देते हैं, वहीं फास्ट ब्रीडर रिएक्टर ईंधन जलाने के साथ-साथ नया ईंधन भी तैयार करता है। इस कारण यह तकनीक ऊर्जा उत्पादन को अधिक टिकाऊ और दीर्घकालिक बनाती है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह परियोजना भारत के तीन-चरणीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के दूसरे चरण की औपचारिक शुरुआत का संकेत है। इस कार्यक्रम के अंतिम चरण में देश अपने विशाल थोरियम भंडार का उपयोग कर सस्ती और स्वच्छ ऊर्जा का बड़े पैमाने पर उत्पादन कर सकेगा। गौरतलब है कि भारत विश्व में थोरियम के सबसे बड़े भंडार वाले देशों में शामिल है। इस स्वदेशी रिएक्टर के निर्माण में 200 से अधिक भारतीय कंपनियों का योगदान रहा है, जिनमें लघु एवं मध्यम उद्योग भी शामिल हैं। इससे न केवल तकनीकी आत्मनिर्भरता को बल मिला है, बल्कि देश के औद्योगिक विकास को भी गति मिली है। सुरक्षा के दृष्टिकोण से भी यह रिएक्टर अत्याधुनिक है। इसमें ‘पैसिव सेफ्टी फीचर्स’ लगाए गए हैं, जो किसी भी आपात स्थिति में रिएक्टर को स्वतः सुरक्षित रूप से बंद कर सकते हैं। यह तकनीक मानव हस्तक्षेप के बिना दुर्घटनाओं के जोखिम को न्यूनतम करने में सक्षम है। विशेषज्ञ मानते हैं कि इस उपलब्धि के साथ भारत रूस के बाद दुनिया का दूसरा देश बनने की ओर अग्रसर है, जो व्यावसायिक स्तर पर फास्ट ब्रीडर रिएक्टर संचालित करेगा। यह न केवल ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करेगा, बल्कि कोयले पर निर्भरता घटाकर पर्यावरण संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। कुल मिलाकर, कल्पक्कम में हासिल यह सफलता भारत के लिए ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता, स्वच्छता और स्थिरता की दिशा में एक मील का पत्थर साबित हो सकती हैं।

  • तमिलनाडु में सियासी मुकाबला तेज, बढ़त की दौड़ में एनडीए

    भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) चेन्नई। तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026 को लेकर सामने आए ताज़ा ओपिनियन पोल ने राज्य की राजनीति को नई दिशा दे दी है। अब तक इंडिया गठबंधन का मजबूत गढ़ माने जाने वाले इस राज्य में मुकाबला बेहद कांटे का हो गया है और रुझान सत्ता परिवर्तन की ओर इशारा कर रहे हैं। एम. के. स्टालिन के नेतृत्व में सत्तारूढ़ गठबंधन को इस बार कड़ी चुनौती मिलती दिखाई दे रही है। वहीं एडप्पादी के. पलानीस्वामी के नेतृत्व में एनडीए गठबंधन ने चुनावी मैदान में मजबूत पकड़ बनानी शुरू कर दी है। सीएम चेहरे पर कांटे की टक्कर ओपिनियन पोल के अनुसार मुख्यमंत्री पद की पसंद में मुकाबला लगभग बराबरी पर है। स्टालिन को 39.0 प्रतिशत और पलानीस्वामी को 38.7 प्रतिशत समर्थन मिलता दिख रहा है। यह मामूली अंतर चुनाव को पूरी तरह खुला और अनिश्चित बना देता है। इस बीच अभिनेता विजय भी 14.3 प्रतिशत समर्थन के साथ उभरते विकल्प के रूप में सामने आए हैं, खासकर युवाओं के बीच उनकी लोकप्रियता बढ़ती दिख रही है। सरकार के प्रदर्शन पर बंटी राय राज्य सरकार के कामकाज को लेकर जनता की राय स्पष्ट रूप से बंटी हुई है। करीब 35.8 प्रतिशत लोग सरकार के प्रदर्शन को अच्छा मानते हैं, जबकि 39 प्रतिशत इसे खराब या बहुत खराब बताते हैं। वहीं 16.9 प्रतिशत मतदाता अब भी निर्णायक राय नहीं बना पाए हैं। महिलाओं में सरकार के प्रति अपेक्षाकृत सकारात्मक रुख देखा जा रहा है, जबकि पुरुष मतदाताओं में असंतोष अधिक नजर आता है। उम्र के आधार पर बुज़ुर्ग मतदाता सरकार के साथ खड़े दिखते हैं, जबकि युवा वर्ग में नाराज़गी प्रमुख रूप से सामने आई है। चुनाव के प्रमुख मुद्दे इस बार का चुनाव मुद्दा-प्रधान होता दिख रहा है। कानून-व्यवस्था और महिलाओं की सुरक्षा (23 प्रतिशत ) शराब और नशे की समस्या (20.4 प्रतिशत) बेरोज़गारी (18.5 प्रतिशत) महंगाई और भ्रष्टाचार इन मुद्दों ने लगभग सभी वर्गों और क्षेत्रों में असर डाला है। खासतौर पर युवाओं में रोजगार और ग्रामीण इलाकों में सामाजिक सुरक्षा प्रमुख चिंता बनी हुई है। सामाजिक समीकरण और क्षेत्रीय प्रभाव सर्वे के अनुसार दलित और मुस्लिम समुदाय सरकार के प्रति अपेक्षाकृत सकारात्मक हैं, जबकि ओबीसी और सवर्ण वर्गों में असंतोष अधिक देखा गया है। उत्तरी तमिलनाडु में सत्ता विरोधी रुझान मजबूत है, जबकि कुछ क्षेत्रों में सत्तारूढ़ गठबंधन की पकड़ अभी भी कायम है। सीटों का अनुमान और गठबंधन की स्थिति ओपिनियन पोल के मुताबिक एनडीए गठबंधन 130-140 सीटों के साथ बढ़त बनाता दिख रहा है, जबकि डीएमके-कांग्रेस वाला इंडिया गठबंधन 90-100 सीटों तक सिमट सकता है। एआईएडीएमके को पीएमके के साथ गठबंधन का लाभ मिल रहा है, जिससे खासकर वन्नियार वोटों का ध्रुवीकरण हो रहा है। वहीं बीजेपी के साथ तालमेल शहरी और युवा मतदाताओं को आकर्षित करता दिख रहा है। दूसरी ओर, डीएमके गठबंधन में आंतरिक असंतोष और घोषणापत्र जारी करने में देरी ने उसकी चुनावी रणनीति को प्रभावित किया है। घोषणापत्र और महिला वोट निर्णायक एआईएडीएमके के घोषणापत्र में महिलाओं के लिए ₹2000 मासिक सहायता, मुफ्त रेफ्रिजरेटर और “अम्मा 2 व्हीलर” जैसी योजनाओं ने खासा प्रभाव डाला है। इसके चलते महिला मतदाताओं में एनडीए गठबंधन की पकड़ मजबूत होती दिख रही है। तमिलनाडु की राजनीति इस समय निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। अब तक एकतरफा माने जाने वाले समीकरण बदलते नजर आ रहे हैं। हालांकि अंतिम परिणाम जातीय समीकरणों, क्षेत्रीय मुद्दों और चुनावी गठबंधनों के अंतिम स्वरूप पर निर्भर करेगा। फिलहाल संकेत साफ हैं—तमिलनाडु में इस बार मुकाबला सीधा, कड़ा और पूरी तरह खुला है, जहां हर वोट सत्ता की दिशा तय करेगा।

  • अमरावती बनी आंध्र की आधिकारिक राजधानी

    भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) अमरावती। आंध्र प्रदेश की सियासत और प्रशासनिक भविष्य से जुड़ी एक लंबी प्रतीक्षा आखिरकार समाप्त हो गई। लगभग 12 वर्षों के वनवास के बाद अमरावती को आधिकारिक रूप से राज्य की राजधानी घोषित कर दिया गया है। केंद्र सरकार द्वारा 6 अप्रैल 2026 को जारी राजपत्र अधिसूचना के साथ इस निर्णय को कानूनी मान्यता मिल गई, जिससे 2014 में राज्य के विभाजन के बाद से जारी अनिश्चितता का दौर समाप्त हो गया। अधिसूचना के अनुसार, अमरावती को 2 जून 2024 से प्रभावी रूप से राज्य की राजधानी माना जाएगा। इस निर्णय का उद्देश्य शासन में निरंतरता बनाए रखना और प्रशासनिक ढांचे को स्थिरता प्रदान करना बताया गया है। गौरतलब है कि तेलंगाना के गठन के बाद हैदराबाद को एक निश्चित अवधि तक संयुक्त राजधानी के रूप में रखा गया था, जिससे आंध्र प्रदेश के लिए स्थायी राजधानी का मुद्दा लगातार चर्चा में बना रहा। मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू ने इस ऐतिहासिक फैसले की पुष्टि करते हुए कहा कि “अमरावती ही आंध्र प्रदेश की राजधानी है।” उन्होंने इस निर्णय को राज्य की जनता, विशेषकर अमरावती क्षेत्र के किसानों की जीत बताया। नायडू ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि यह निर्णय राज्य के विकास को नई दिशा देगा। इस फैसले की पृष्ठभूमि में हाल के घटनाक्रम महत्वपूर्ण रहे हैं। 28 मार्च को आंध्र प्रदेश विधानसभा ने अमरावती के समर्थन में प्रस्ताव पारित किया था। इसके बाद 1 अप्रैल को लोकसभा और 2 अप्रैल को राज्यसभा में आंध्र प्रदेश पुनर्गठन (संशोधन) विधेयक पारित हुआ, जिसने इस घोषणा का मार्ग प्रशस्त किया। हालांकि, इस निर्णय पर राजनीतिक मतभेद भी सामने आए हैं। विपक्षी दल वाईएसआर कांग्रेस पार्टी ने इस कदम की आलोचना करते हुए इसे “राजनीतिक नाटक” करार दिया। पार्टी के नेताओं का कहना है कि राजधानी से जुड़े किसी भी फैसले में सभी क्षेत्रों और वर्गों के हितों को समान रूप से ध्यान में रखा जाना चाहिए। फिलहाल, अमरावती को राजधानी घोषित किए जाने के साथ ही राज्य में प्रशासनिक गतिविधियों के केंद्रीकरण और विकास कार्यों को गति मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। यह निर्णय न केवल राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि आंध्र प्रदेश के आर्थिक और बुनियादी ढांचे के विकास के लिए भी एक निर्णायक कदम माना जा रहा है।

  • 9 अप्रैल को केरल में मतदान, 4 मई को नतीजे

    भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) तिरुवनंतपुरम। केरल विधानसभा चुनाव 2026 के लिए सियासी सरगर्मियां अपने चरम पर पहुंच गई हैं। 140 सदस्यीय विधानसभा के लिए मतदान 9 अप्रैल 2026 को एक ही चरण में कराया जाएगा, जबकि चुनाव प्रचार का शोर मंगलवार शाम थम जाएगा। राज्य के करीब 2.7 करोड़ मतदाता इस बार अपने मताधिकार का प्रयोग कर नई सरकार की दिशा तय करेंगे। मतगणना 4 मई 2026 को होगी, जिसके साथ ही चुनावी तस्वीर साफ हो जाएगी। राज्य की मौजूदा विधानसभा का कार्यकाल 23 मई 2026 को समाप्त हो रहा है, ऐसे में चुनाव आयोग ने समयबद्ध तरीके से पूरी तैयारियां सुनिश्चित कर ली हैं। केरल के साथ-साथ असम और पुडुचेरी में भी 9 अप्रैल 2026 को मतदान होगा, जबकि तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में 23 अप्रैल 2026 से चुनावी प्रक्रिया शुरू होगी। सभी राज्यों के नतीजे एक साथ 4 मई 2026 को घोषित किए जाएंगे। जनता के मुद्दों पर टिका चुनाव इस बार का चुनाव पूरी तरह जनसरोकारों के इर्द-गिर्द घूमता नजर आ रहा है। महंगाई राज्य के मतदाताओं के लिए सबसे बड़ी चिंता बनी हुई है, जिसने आम परिवारों की आर्थिक स्थिति पर दबाव बढ़ाया है। इसके अलावा बेरोजगारी, खासकर 18 से 34 वर्ष के युवाओं के बीच, एक गंभीर मुद्दा बनकर उभरी है। भ्रष्टाचार को लेकर भी लोगों में नाराजगी साफ दिखाई दे रही है। वहीं, शराब और नशीली दवाओं के बढ़ते दुरुपयोग ने सामाजिक चिंता को जन्म दिया है। कानून-व्यवस्था की स्थिति और सुरक्षा का सवाल भी मतदाताओं के निर्णय को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारकों में शामिल है। सियासी दलों ने झोंकी ताकत चुनावी रण में सभी प्रमुख दलों ने पूरी ताकत झोंक दी है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) राज्य में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए आक्रामक प्रचार अभियान चला रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हाल ही में केरल में रैली कर विपक्षी दलों पर तीखा हमला बोला। वहीं केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कोझिकोड में रोड शो कर पार्टी के पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश की। त्रिकोणीय मुकाबले की संभावना राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, इस बार केरल में मुकाबला पहले से ज्यादा दिलचस्प और कांटे का हो सकता है। राज्य में पिछले एक दशक से सत्ता पर काबिज वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ) और कांग्रेस के नेतृत्व वाला संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (यूडीएफ) आमने-सामने हैं। वहीं, भाजपा के नेतृत्व वाला राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) भी मजबूती के साथ मैदान में उतरकर मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने की कोशिश कर रहा है। देश की नजर केरल पर केरल विधानसभा चुनाव को इस बार राष्ट्रीय राजनीति के लिहाज से भी अहम माना जा रहा है। मतदाता 9 अप्रैल 2026 को ईवीएम के जरिए अपना फैसला सुनाएंगे और 4 मई 2026 को नतीजों के साथ यह स्पष्ट हो जाएगा कि राज्य की सत्ता किसके हाथों में जाएगी। चुनाव परिणाम न केवल केरल की राजनीति की दिशा तय करेंगे, बल्कि राष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य पर भी इसका असर देखने को मिल सकता है।

  • दिल्ली हाईकोर्ट में केजरीवाल की खुद बहस की मांग, एसजी का तंज—“कोर्ट है, मंच नहीं”

    भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) नई दिल्ली। दिल्ली आबकारी नीति से जुड़े चर्चित मामले में मंगलवार को दिल्ली हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान दिलचस्प और तीखी नोकझोंक देखने को मिली। आम आदमी पार्टी के प्रमुख एवं दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने अदालत में खुद अपनी दलीलें रखने की अनुमति मांगी, जिस पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कड़ा एतराज जताते हुए टिप्पणी की कि “यह अदालत है, नाटक का मंच नहीं।” दरअसल, केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने ट्रायल कोर्ट द्वारा केजरीवाल समेत 23 आरोपियों को बरी किए जाने के फैसले को चुनौती देते हुए संशोधन याचिका दाखिल की है। इसी याचिका पर हाईकोर्ट में सुनवाई चल रही है। सुनवाई के दौरान केजरीवाल स्वयं अदालत में उपस्थित हुए और न्यायमूर्ति से आग्रह किया कि वे उन्हें व्यक्तिगत रूप से अपनी दलीलें रखने की अनुमति दें। उन्होंने कहा कि ई-फाइलिंग के तहत व्यक्तिगत रूप से याचिका दाखिल करने की अनुमति नहीं है, इसलिए वे अदालत से इसकी इजाजत चाहते हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उनके पास याचिका की हार्ड कॉपी मौजूद है और वे किसी भी तारीख पर बहस के लिए तैयार हैं। केजरीवाल ने कहा, “मैं इस याचिका पर खुद बहस करूंगा और अपने कानूनी अधिकारों का इस्तेमाल करूंगा।” हालांकि, सीबीआई की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इस मांग का तीखा विरोध किया। उन्होंने कहा कि कुछ लोग संवैधानिक संस्थाओं पर आरोप लगाकर अपना राजनीतिक करियर बना रहे हैं। उन्होंने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा कि यदि केजरीवाल खुद बहस करना चाहते हैं, तो उन्हें अपने वकीलों को हटाकर हर सुनवाई में बिना कानूनी सहायता के पेश होना चाहिए। मेहता ने दो टूक कहा, “यह अदालत है, कोई नाटक का मंच नहीं।” मेहता ने मामले को देश की राजधानी से जुड़ा एक बड़ा “शराब घोटाला” बताते हुए इसकी शीघ्र सुनवाई की भी मांग की। इस बीच, अदालत ने केजरीवाल की मांग पर सीबीआई को निर्देश दिया कि वह रिक्यूजल (न्यायाधीश के स्वयं को मामले से अलग करने) की संभावित अर्जी पर कल तक लिखित जवाब दाखिल करे। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई अन्य पक्षकार भी न्यायाधीश से खुद को अलग करने की मांग करना चाहता है, तो वह भी अपनी अर्जी दाखिल कर सकता है। साथ ही जिन आरोपियों ने अभी तक अपना जवाब दाखिल नहीं किया है, उन्हें जल्द से जल्द जवाब देने का निर्देश दिया गया, अन्यथा उनकी दलीलों पर विचार नहीं किया जाएगा। गौरतलब है कि 27 फरवरी को ट्रायल कोर्ट ने इस मामले में केजरीवाल समेत सभी 23 आरोपियों को बरी कर दिया था, जिसके खिलाफ अब सीबीआई हाईकोर्ट पहुंची है। अगली सुनवाई: मामले की अगली सुनवाई 13 अप्रैल 2026 को दोपहर 2:30 बजे निर्धारित की गई है।

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