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 भारतार्थ खबर, नहीं उसका अर्थ

21अक्टूबर /2026 /बुधवार

बेंगलुरु, 20 अक्टूबर 2026। बेंगलुरु में आयोजित 48वें दशहरा महोत्सव में राज्यसभा सांसद लहर सिंह सिरोया ने मां दुर्गा के दर्शन कर पूजा-अर्चना की और आशीर्वाद प्राप्त किया। सिद्धार्थ सांस्कृतिक समिति एवं राजेंद्र बाबू मेमोरियल ट्रस्ट ‘बिहार भवन’ के तत्वावधान में आयोजित इस महोत्सव में सांसद की उपस्थिति रही। इस अवसर पर समिति के पदाधिकारियों और सदस्यों ने मां भगवती की चुनड़ी ओढ़ाकर उनका स्वागत एवं अभिनंदन किया।

भारतार्थ लोगो: खबर नहीं, उसका अर्थ - राजनीतिक समाचार विश्लेषण

बेंगलुरु, 20 अक्टूबर 2026। बेंगलुरु में आयोजित 48वें दशहरा महोत्सव में राज्यसभा सांसद लहर सिंह सिरोया ने मां दुर्गा के दर्शन कर पूजा-अर्चना की और आशीर्वाद प्राप्त किया। सिद्धार्थ सांस्कृतिक समिति एवं राजेंद्र बाबू मेमोरियल ट्रस्ट ‘बिहार भवन’ के तत्वावधान में आयोजित इस महोत्सव में सांसद की उपस्थिति रही। इस अवसर पर समिति के पदाधिकारियों और सदस्यों ने मां भगवती की चुनड़ी ओढ़ाकर उनका स्वागत एवं अभिनंदन किया।

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  • सूखी जमीन में उम्मीद

    भारतार्थ खबर, Bhaarataarth.com लेखक: अशोक कुमार सिंह राजस्थान के एक छोटे से गांव केसरपुर की यह कहानी केवल एक किसान की मेहनत की कहानी नहीं, बल्कि विपरीत परिस्थितियों में उम्मीद, धैर्य और सामूहिक प्रयास की ताकत का संदेश देती है। केसरपुर में गोविंद नाम का एक साधारण किसान रहता था। उसके पास थोड़ी जमीन, एक पुराना कुआं और मिट्टी से बना छोटा सा घर था। सीमित साधनों के बावजूद वह मेहनत और धैर्य के साथ जीवन जी रहा था। लेकिन एक वर्ष गांव में बारिश बेहद कम हुई। खेतों में दरारें पड़ गईं, तालाब सूख गया और कुओं का जलस्तर लगातार नीचे जाने लगा। जल संकट बढ़ा तो गांव के कई परिवारों ने रोजी-रोटी के लिए शहर जाने का निर्णय लेना शुरू कर दिया। गोविंद का पड़ोसी मोहन भी परिवार सहित गांव छोड़ने की तैयारी में था। उसने गोविंद से कहा कि जब खेत और पानी दोनों साथ नहीं हैं तो गांव में रुकने का क्या फायदा। गोविंद ने सूखी मिट्टी को हाथ में लेकर जवाब दिया कि मिट्टी कभी बेकार नहीं होती। कई बार परिस्थितियां इंसान की परीक्षा लेती हैं और उसी परीक्षा से उसकी वास्तविक क्षमता सामने आती है। उसका विश्वास था कि उम्मीद केवल अच्छे हालात में नहीं, बल्कि कठिन समय में हिम्मत बनाए रखने से पैदा होती है। अगली सुबह गोविंद ने अपने खेत के एक कोने में खुदाई शुरू कर दी। ग्रामीणों ने उसका मजाक उड़ाया। किसी ने इसे व्यर्थ की मेहनत बताया तो किसी ने कहा कि सूखी जमीन में पानी तलाशना असंभव है। लेकिन गोविंद बिना किसी विवाद में पड़े सुबह से शाम तक फावड़ा चलाता रहा। कई दिन बीत गए। पानी का कोई संकेत नहीं मिला। उसका बेटा अर्जुन भी निराश होकर पिता से काम छोड़ने के लिए कहने लगा। गोविंद ने उसे समझाया कि प्रयास छोड़ने से पहले यह देखना जरूरी है कि हमने पूरी कोशिश की है या केवल कठिनाई देखकर डर गए हैं। इसके बाद अर्जुन भी पिता के साथ जुट गया। दोनों लगातार खुदाई करते रहे। आखिरकार एक सुबह फावड़े की चोट के साथ मिट्टी का रंग बदला। जमीन की एक परत नम थी। दोनों ने आगे खुदाई की तो धीरे-धीरे पानी रिसता हुआ दिखाई दिया। जलस्रोत बहुत बड़ा नहीं था, लेकिन इतना जरूर था कि कुछ पौधों और परिवारों की आवश्यकताओं में मदद मिल सके। गोविंद ने इस पानी पर अपना अधिकार जताने के बजाय पूरे गांव को उसका उपयोग करने के लिए आमंत्रित किया। मोहन भी वहां पहुंचा। उसने गोविंद से अपनी पुरानी बातों के लिए माफी मांगी। गोविंद ने उसे सहजता से कहा कि माफी की जरूरत नहीं है, लेकिन आगे से किसी व्यक्ति की मेहनत का मूल्यांकन उसकी सफलता आने से पहले नहीं करना चाहिए। इस छोटे से जलस्रोत ने गांव की सोच में बड़ा बदलाव ला दिया। ग्रामीणों ने समझा कि केवल बारिश का इंतजार करना पर्याप्त नहीं है। उन्होंने मिलकर वर्षा जल संरक्षण की दिशा में काम शुरू किया। तालाब की सफाई की गई, जलसंग्रह के लिए गड्ढे बनाए गए, खेतों में मेड़बंदी की गई और पुराने कुओं की सफाई का अभियान शुरू हुआ। अगली बारिश में ग्रामीणों ने पानी को बहकर बर्बाद होने देने के बजाय उसे खेतों और जलस्रोतों में सहेजा। कुछ महीनों बाद सूखी जमीन पर फिर हरियाली दिखाई देने लगी। जिस गांव से लोग पलायन करने की तैयारी कर रहे थे, वही गांव अपने संसाधनों को बचाने और भविष्य को मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ने लगा। समय बीतने के साथ गोविंद वृद्ध हो गया, लेकिन उसका बेटा अर्जुन गांव के युवाओं के साथ जल संरक्षण के कार्यों में जुटा रहा। एक दिन गांव के विद्यालय में गोविंद को सम्मानित किया गया। वहां उसने बच्चों से कहा कि जीवन में कभी ऐसा समय आए जब रास्ते बंद दिखाई दें, तो घबराने के बजाय एक कदम आगे बढ़ाना चाहिए। संभव है कि जिस जगह केवल सूखी जमीन दिखाई दे रही हो, वहीं उम्मीद की पहली बूंद छिपी हो। गोविंद की कहानी का सार केवल जमीन के नीचे पानी खोज लेना नहीं है। इसका वास्तविक संदेश यह है कि किसी भी संकट का सामना केवल शिकायतों से नहीं किया जा सकता। समाधान के लिए सामूहिक सोच, निरंतर प्रयास और धैर्य आवश्यक है। आज जब जल संकट अनेक क्षेत्रों के लिए गंभीर चुनौती बनता जा रहा है, यह कहानी वर्षा जल संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग की ओर भी ध्यान आकर्षित करती है। पानी की हर बूंद को बचाना केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति की साझा जिम्मेदारी है। संदेश: परिस्थितियां कठिन हो सकती हैं, संसाधन सीमित हो सकते हैं और परिणाम देर से मिल सकते हैं, लेकिन निरंतर प्रयास की शक्ति को कम नहीं आंका जा सकता। जहां निराशा अंत दिखाई देती है, वहीं से समाधान की शुरुआत भी संभव है। उम्मीद केवल प्रतीक्षा का नाम नहीं, बल्कि उसे सच करने के लिए उठाया गया पहला कदम है।

  • बिहार में बाढ़ की स्थिति का मुख्यमंत्री ने लिया जायजा, प्रभावित इलाकों का हवाई सर्वेक्षण

    भारतार्थ खबर संवाददाता अशोक कुमार सिंह (Bhaarataarth.com) पटना, 25 अगस्त 2026। बिहार के कई जिलों में गंगा और उसकी सहायक नदियों के बढ़ते जलस्तर के बीच बाढ़ की स्थिति गंभीर बनी हुई है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने सोमवार को बाढ़ प्रभावित और संवेदनशील क्षेत्रों का हवाई सर्वेक्षण कर स्थिति का जायजा लिया। इस दौरान निचले इलाकों, दियारा क्षेत्रों और जलमग्न क्षेत्रों की स्थिति का निरीक्षण किया गया। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार सर्वेक्षण के दौरान नवगछिया-राघोपुर दियारा, कोसी-गंगा संगम क्षेत्र, बेगूसराय और बख्तियारपुर समेत कई इलाकों की स्थिति देखी गई। बिहार में लगातार बारिश और नदियों के बढ़ते जलस्तर के कारण कई इलाकों में जनजीवन प्रभावित हुआ है। जल संसाधन विभाग के उपलब्ध आंकड़ों में पटना, भागलपुर, खगड़िया और कटिहार सहित कई स्थानों पर नदियों का जलस्तर चेतावनी या खतरे के स्तर के आसपास अथवा उससे ऊपर दर्ज किया गया है। भागलपुर जिले में बाढ़ की स्थिति के बीच काजीकोरैया-राघोपुर मार्जिनल तटबंध का एक हिस्सा क्षतिग्रस्त होने की सूचना भी सामने आई है। प्रशासन और संबंधित विभागों की ओर से स्थिति पर निगरानी रखते हुए राहत एवं बचाव कार्य किए जा रहे हैं। मुख्यमंत्री ने प्रभावित क्षेत्रों में प्रशासन को पूरी तत्परता के साथ राहत और बचाव कार्य चलाने तथा लोगों की सुरक्षा को प्राथमिकता देने के निर्देश दिए हैं। संवेदनशील क्षेत्रों में जलस्तर की लगातार निगरानी, जरूरतमंद लोगों तक आवश्यक सहायता पहुंचाने और आपात स्थिति में तत्काल कार्रवाई पर जोर दिया गया है। बाढ़ की स्थिति को देखते हुए स्थानीय प्रशासन द्वारा प्रभावित और निचले इलाकों में रहने वाले लोगों को सतर्क रहने की सलाह दी जा रही है। राहत शिविरों, भोजन, पेयजल और आवश्यक सुविधाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए प्रशासनिक स्तर पर प्रयास जारी हैं। बिहार में बाढ़ की स्थिति जिले-दर-जिले अलग-अलग है। इसलिए किसी एक क्षेत्र की स्थिति के आधार पर पूरे राज्य की स्थिति का आकलन करना उचित नहीं होगा। प्रशासन और जल संसाधन विभाग द्वारा नदियों के जलस्तर तथा तटबंधों की स्थिति पर लगातार निगरानी रखी जा रही है। बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदा के दौरान प्रशासन के साथ आम नागरिकों की सतर्कता भी महत्वपूर्ण है। लोगों से अपील है कि वे अफवाहों पर ध्यान न दें, प्रशासन द्वारा जारी निर्देशों का पालन करें और जरूरत पड़ने पर सुरक्षित स्थानों की ओर जाने में सहयोग करें।

  • सेनापति में गोलीबारी और आगजनी से तनाव, CRPF जवान घायल

    भारतार्थ खबर संवाददाता अशोक कुमार सिंह (Bhaarataarth.com) सेनापति, 25 अगस्त 2026।मणिपुर के सेनापति जिले में सोमवार को गोलीबारी और आगजनी की घटनाओं के बाद इलाके में तनाव की स्थिति बन गई। घटनाक्रम के दौरान केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) का एक जवान गोली लगने से घायल हो गया। उसे उपचार के लिए अस्पताल ले जाया गया, जहां उसकी स्थिति खतरे से बाहर बताई गई। स्थानीय स्तर पर मिली जानकारी के अनुसार, ताफू और आसपास के क्षेत्रों में दो पक्षों के बीच विवाद के बाद गोलीबारी हुई। इसी दौरान कुछ मकानों में आग लगाए जाने की घटनाएं भी सामने आईं। आगजनी के कारण क्षेत्र में भय और तनाव का माहौल बन गया। घटना की सूचना मिलने के बाद सुरक्षा बलों ने इलाके में पहुंचकर स्थिति को नियंत्रित करने का प्रयास किया। संवेदनशील स्थानों पर सुरक्षा बढ़ाई गई है और हालात पर नजर रखी जा रही है। प्रशासन की प्राथमिकता हिंसा को आगे फैलने से रोकना और सामान्य स्थिति बहाल करना है। घटना से नाराज स्थानीय लोगों ने विरोध प्रदर्शन किया। प्रदर्शन के दौरान राष्ट्रीय राजमार्ग-2 पर यातायात बाधित हुआ। प्रदर्शनकारियों ने आगजनी और गोलीबारी की घटनाओं के खिलाफ कार्रवाई की मांग की। सुरक्षा व्यवस्था के बीच मार्ग को सामान्य करने के प्रयास किए गए। अधिकारियों की ओर से घटना के कारणों और हिंसा में शामिल लोगों की भूमिका की जांच की जा रही है। फिलहाल किसी व्यक्ति या समूह को घटना के लिए जिम्मेदार ठहराने से पहले जांच पूरी होना जरूरी है। प्रशासन ने लोगों से शांति बनाए रखने और अफवाहों पर भरोसा नहीं करने की अपील की है। मणिपुर में पिछले कुछ समय से विभिन्न समुदायों के बीच तनाव की घटनाएं सामने आती रही हैं। ऐसे में सेनापति की घटना को लेकर सुरक्षा एजेंसियां अतिरिक्त सतर्कता बरत रही हैं। स्थिति पर लगातार निगरानी रखी जा रही है।

  • भरत मिलाप के प्रसंग से गूंजा त्याग और भाईचारे का संदेश

    भारतार्थ खबर Bhaarataarth.com बेंगलूरू, 25 अगस्त 2026। मातेश्वरी भक्त मंडल के तत्वावधान में होसूर बंडे स्थित श्रीकृष्णा गोसेवा आश्रम गोशाला में चल रही नौ दिवसीय श्रीराम कथा के सातवें दिन मंगलवार को श्रद्धा, भक्ति और भावनाओं का विशेष संगम देखने को मिला। कथा वाचक संत किशोरचन्द रामायणी ने भगवान श्रीराम और उनके अनुज भरत के अटूट प्रेम, त्याग, समर्पण और भाईचारे से जुड़े भरत मिलाप के पावन प्रसंग का भावपूर्ण वर्णन किया। प्रसंग के दौरान कथा पंडाल जय श्रीराम के जयघोष से गूंज उठा और अनेक श्रद्धालु भावुक हो गए। संत किशोरचन्द रामायणी ने कहा कि भरत का चरित्र त्याग, तपस्या और समर्पण की अनुपम मिसाल है। उन्हें राजपाट प्राप्त होने के बावजूद उन्होंने उसे अपना अधिकार नहीं माना और भगवान श्रीराम को ही अयोध्या का वास्तविक राजा स्वीकार किया। भरत के मन में श्रीराम के प्रति प्रेम और सम्मान इतना गहरा था कि वे उन्हें वन से वापस अयोध्या लाने के लिए स्वयं उनके पास पहुंचे। उन्होंने कहा कि भरत मिलाप केवल दो भाइयों के मिलन का प्रसंग नहीं है, बल्कि यह प्रेम, त्याग, मर्यादा, विश्वास और पारिवारिक संस्कारों का जीवंत संदेश है। वर्तमान समय में जब परिवारों के भीतर आपसी मतभेद और दूरी बढ़ती दिखाई देती है, तब श्रीराम और भरत का आदर्श समाज को रिश्तों की वास्तविक गरिमा समझाने का मार्ग दिखाता है। झांकी ने किया श्रद्धालुओं को भावुक कथा के दौरान भगवान श्रीराम और भरत के मिलाप की जीवंत झांकी प्रस्तुत की गई। जैसे ही दोनों भाइयों के गले मिलने का भावपूर्ण दृश्य सामने आया, श्रद्धालुओं ने जय श्रीराम के जयघोष से पूरे परिसर को गुंजायमान कर दिया। भावनात्मक वातावरण के बीच कई श्रद्धालुओं की आंखें नम हो गईं। संत किशोरचन्द ने कहा कि सच्चे रिश्ते अधिकार जताने से नहीं, बल्कि त्याग, विश्वास और समर्पण से मजबूत होते हैं। परिवार के सदस्य यदि एक-दूसरे के सुख-दुख में साथ खड़े रहें और परस्पर सम्मान बनाए रखें तो परिवार में सौहार्द कायम रहता है। यही पारिवारिक एकता आगे चलकर समाज की मजबूती का आधार बनती है। उन्होंने कहा कि श्रीराम और भरत का संबंध भारतीय संस्कृति में भाईचारे और त्याग का आदर्श प्रस्तुत करता है। भरत ने सत्ता और वैभव से ऊपर भाई के प्रति अपने प्रेम और धर्म को स्थान दिया। उनका जीवन बताता है कि व्यक्ति का वास्तविक गौरव उसके अधिकारों में नहीं, बल्कि दूसरों के लिए किए गए त्याग और समर्पण में निहित है। भजनों से भक्तिमय हुआ कथा परिसर संत पुष्करदास ने कहा कि श्रीराम कथा के दौरान प्रस्तुत भजनों और लगातार गूंजते श्रीराम के जयघोष से पूरा वातावरण भक्तिमय बना रहा। श्रद्धालुओं ने पूरे मनोयोग और श्रद्धाभाव के साथ कथा का श्रवण किया। कथा आयोजन के दौरान धार्मिक वातावरण के बीच श्रद्धालुओं ने भगवान श्रीराम के आदर्शों को जीवन में उतारने का संकल्प भी लिया। आयोजकों के अनुसार कथा के आगामी प्रसंगों में भी श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या में सहभागिता की उम्मीद है। आरती एवं महाप्रसादी के लाभार्थी गीतादेवी, जगदीश हाम्बड, रमेश कुमार, बाबूलाल तथा संगीता हाम्बड परिवार रहे। आयोजन में उपस्थित श्रद्धालुओं ने धार्मिक कार्यक्रम का लाभ लिया और महाप्रसादी ग्रहण की। समाचार प्रेषक: नारायणलाल सीरवी। भरत मिलाप श्रीराम कथा

  • 50वें जन्मदिन पर दोस्तों को कराई पांच धाम की यात्रा

    भारतार्थ खबर Bhaarataarth.com शिवमोग्गा, 25 अगस्त 2026। जन्मदिन को केवल उत्सव तक सीमित रखने के बजाय उसे यादगार और प्रेरणादायक बनाने की पहल करते हुए विष्णु समाज के सक्रिय कार्यकर्ता एवं बीमा एजेंट नरपतलाल ने अपने 50वें जन्मदिन के उपलक्ष्य में मित्रों के साथ धार्मिक एवं ऐतिहासिक यात्रा का आयोजन किया। उन्होंने शिवमोग्गा के 12 दोस्तों को मिनी बस के माध्यम से पांच धाम की यात्रा कराई। यात्रा में हलेबीडु, बेलूर, बेलगावी, श्रवणबेलगोला, हासन और चन्नरायपटना सहित ऐतिहासिक एवं धार्मिक स्थलों के दर्शन किए गए। यात्रियों ने इन प्राचीन तीर्थस्थलों की स्थापत्य कला, शिल्पकारी और नक्काशी को करीब से देखा। मंदिरों की कलात्मक बनावट, पत्थरों पर की गई बारीक कारीगरी तथा विशाल नंदी की प्रतिमा ने यात्रियों को विशेष रूप से आकर्षित किया। यात्रा के दौरान विभिन्न मंदिरों और तीर्थस्थलों से जुड़े धार्मिक एवं ऐतिहासिक प्रसंगों की जानकारी भी यात्रियों को मिली। शांत एवं प्राकृतिक वातावरण के बीच धार्मिक स्थलों के दर्शन ने सभी को आध्यात्मिक शांति और मानसिक सुकून का अनुभव कराया। वापसी के दौरान चन्नरायपटना में प्रवासी भाइयों के घर पहुंचकर चाय-पानी के साथ हुई आत्मीय मुलाकात ने यात्रा की यादों में एक और अध्याय जोड़ दिया। मित्रों के साथ बिताया यह समय सभी के लिए आनंद, आपसी अपनत्व और पुरानी यादों को ताजा करने वाला अनुभव रहा। यात्रा में नरपतलाल, नेमाराम, राणाराम सेन, गोविंदराम, किशोरकुमार, मुलाराम, केवलाराम, जीवसिंह, सूरथाराम, मिठादास तथा पत्रकार शांतिलाल सहित अन्य सदस्यों ने भाग लेकर धार्मिक यात्रा का लाभ उठाया। नरपतलाल की इस पहल ने जन्मदिन मनाने के पारंपरिक तरीके से अलग एक सकारात्मक संदेश दिया। मित्रों के साथ धार्मिक एवं ऐतिहासिक स्थलों की यात्रा कर जन्मदिन को यादगार बनाने की पहल सामाजिक मेलजोल, आध्यात्मिक शांति और मित्रता को मजबूत करने का प्रेरणादायक उदाहरण बनी। समाचार प्रेषक: शांतिलाल साकरीया, शिवमोग्गा 50वें जन्मदिन पर पांच धाम यात्रा

  • मासक्षमण तपस्वी अक्षय श्रीश्रीमाल का अभिनंदन

    भारतार्थ खबर Bhaarataarth.com बेंगलुरु, 25 अगस्त 2026। स्थानीय श्री ब्यावर संघ की ओर से मासक्षमण की तपस्या करने वाले तपस्वी श्री अक्षय श्रीश्रीमाल का सम्मान एवं अभिनंदन किया गया। श्रीश्रीमाल परिवार द्वारा तपस्या के उपलक्ष्य में आयोजित भक्ति संध्या में संघ के पदाधिकारियों एवं सदस्यों ने तपस्वी का सम्मान कर उनके प्रति शुभकामनाएं व्यक्त कीं। इस अवसर पर संघ अध्यक्ष ललित डाकलिया, महामंत्री रुपचंद कुमट, युवा अध्यक्ष कुलदीप छाजेड़, अरविन्द खिंवसरा, पदमचंद बोहरा, राजेन्द्र संचेती, विवेक खटोड़, भरत कोठारी, हेमन्त गुलेच्छा तथा लेडीज विंग से चन्द्रकला डाकलिया और मोनिका कुमट सहित अन्य सदस्य उपस्थित रहे। संघ के पदाधिकारियों एवं सदस्यों ने तपस्वी श्री अक्षय श्रीश्रीमाल का माला, शाल और स्मृति चिह्न भेंट कर अभिनंदन किया। इस दौरान वक्ताओं ने कहा कि आत्मसाधना के उद्देश्य से की गई दीर्घ एवं उग्र तपस्या प्रेरणादायी है। उन्होंने कहा कि तपस्वी ने अपनी साधना के माध्यम से परिवार और संघ का गौरव बढ़ाया है। कार्यक्रम में उपस्थित सदस्यों ने श्री अक्षय श्रीश्रीमाल के उत्तम स्वास्थ्य एवं सुखमय जीवन की कामना करते हुए उनकी तपस्या के लिए साधुवाद एवं शुभकामनाएं दीं। समाचार प्रेषक: ललित डाकलिया। मासक्षमण तपस्वी अक्षय श्रीश्रीमाल

  • श्रीयादे स्पोर्ट्स क्लब ने जीता वॉलीबॉल खिताब

    भारतार्थ खबर Bhaarataarth.com बेंगलुरु, 25 अगस्त 2026। श्री प्रजापति समाज वॉलीबॉल फेडरेशन साउथ के तत्वावधान में केआर पुरम ब्लू टीम द्वारा रामपुरा-बिदरहली में आयोजित वॉलीबॉल टूर्नामेंट में बेंगलुरु, चेन्नई और हैदराबाद सहित कुल 13 टीमों ने हिस्सा लिया। प्रतियोगिता में खिलाड़ियों ने शानदार प्रदर्शन करते हुए खेल भावना, अनुशासन और टीमवर्क का परिचय दिया। टूर्नामेंट के दौरान प्रजापति समाज की विभिन्न संस्थाओं के गणमान्य पदाधिकारी एवं समाज के प्रमुख लोग मौजूद रहे। जीवाराम घोडेला, भूपेंद्र भेदरा, मुनालाल बेतेडिया, सुरेश कवाडिया, डायाराम बेरा, गोविंदलाल बाबरिया, केशाराम भाणा, सुरेश कुमार बेतेडिया, ढगलाराम हाटवा, कैलाश कुमार कपूरपुरा, महेंद्र कुमार ब्रांदणा, बाबूलाल साडीवाल, लक्ष्मीनारायण मुलेरा, जयराम भड़कोलिया, नवरत्न मल कालबाल, किशोर रेडवाल, नोरतमल धुमाणिया, मदनलाल कपूरपुरा, श्रवण कुमार सांचोरा, मदनलाल रांवरिया, जीवणराम ब्रांदणा, केवलराम लुणिया, पुनाराम कवाडिया और श्रवण कुमार ब्रांदणा सहित समाज के गणमान्य लोगों ने खिलाड़ियों का उत्साहवर्धन किया। प्रतियोगिता में श्रीयादे स्पोर्ट्स क्लब, विजय नगर ने शानदार प्रदर्शन करते हुए प्रथम स्थान हासिल कर खिताब अपने नाम किया। महालक्ष्मी स्टार्स क्लब ने दूसरा स्थान प्राप्त किया, जबकि श्री कृष्णा स्पोर्ट्स क्लब, जेपी नगर तीसरे स्थान पर रहा। व्यक्तिगत पुरस्कारों में मैन ऑफ द मैच का पुरस्कार कुशल सांचोरा को और मैन ऑफ द सीरीज का सम्मान प्रवीण बाबरिया को दिया गया। बेस्ट अटैकर कालूराम बेतेडिया, बेस्ट सर्विस माणकलाल बेतेडिया, बेस्ट सेंटर कमलेश ब्रांदणा और बेस्ट नेकर तरुण कवाडिया चुने गए। बेस्ट डिफेंडर का पुरस्कार मंगलाराम बेतेडिया को तथा इमर्जिंग प्लेयर का पुरस्कार गोपाल कवाडिया को प्रदान किया गया। समापन अवसर पर विजेता एवं उपविजेता टीमों के साथ उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ियों को ट्रॉफी और व्यक्तिगत पुरस्कार देकर सम्मानित किया गया। आयोजकों और समाज के गणमान्य लोगों ने खिलाड़ियों का उत्साह बढ़ाते हुए युवाओं को खेलों से जोड़ने और प्रतिभाओं को आगे बढ़ाने पर जोर दिया। समाचार प्रेषक: केसाराम प्रजापत श्री प्रजापति समाज वॉलीबॉल टूर्नामेंट

  • प्रदर्शन से पहले 10 सवालों पर पुलिस की नजर

    भारतार्थ खबर Bhaarataarth.com नई दिल्ली, 25 अगस्त 2026। जंतर-मंतर पर 20 जुलाई को छात्रों के प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसक झड़प के बाद दिल्ली पुलिस ने अपनी खुफिया व्यवस्था की समीक्षा करते हुए बड़े प्रदर्शनों को लेकर रणनीति में बदलाव करने का निर्णय लिया है। सूत्रों के अनुसार, पुलिस की स्पेशल ब्रांच को अब किसी बड़े या प्रस्तावित प्रदर्शन से पहले कम से कम 10 महत्वपूर्ण जानकारियां जुटाने और उनका विस्तृत विश्लेषण करने के निर्देश दिए गए हैं। जंतर-मंतर की घटना के बाद समीक्षा 20 जुलाई को जंतर-मंतर और आसपास के क्षेत्रों में बड़ी संख्या में छात्र और युवा एकत्र हुए थे। पेपर लीक के मुद्दे और शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग को लेकर प्रदर्शनकारियों ने संसद की ओर मार्च करने का प्रयास किया। इस दौरान स्थिति बिगड़ने पर पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प हुई तथा पुलिस को भीड़ को नियंत्रित करने के लिए बल प्रयोग करना पड़ा। घटना के बाद पुलिस की कार्रवाई को लेकर सवाल भी उठे। इसके मद्देनजर दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शन से पहले मिलने वाले खुफिया इनपुट और कानून-व्यवस्था की तैयारियों की समीक्षा की। अब किन जानकारियों पर रहेगा जोर सूत्रों के मुताबिक नई व्यवस्था के तहत स्पेशल ब्रांच को केवल प्रदर्शन की तारीख, स्थान और संभावित भीड़ का अनुमान लगाने तक सीमित नहीं रखा जाएगा। प्रदर्शन की व्यापक पृष्ठभूमि और आयोजन से जुड़े विभिन्न पहलुओं का आकलन करने पर जोर रहेगा। पुलिस यह समझने का प्रयास करेगी कि प्रदर्शन में कौन-कौन से समूह शामिल हो सकते हैं, प्रदर्शनकारियों की अनुमानित संख्या कितनी है, वे किन राज्यों या क्षेत्रों से आ रहे हैं और उन्हें संगठित करने में किन आयोजकों या नेताओं की भूमिका है। इसके साथ ही प्रदर्शन का उद्देश्य, प्रमुख मांगें और आयोजन से जुड़े संगठनों के बीच संभावित समन्वय की जानकारी भी पहले से जुटाने पर जोर दिया जाएगा। ठहरने और आवाजाही की भी जानकारी नई रणनीति में प्रदर्शनकारियों के दिल्ली पहुंचने के बाद उनकी संभावित आवाजाही और ठहरने की व्यवस्था से संबंधित जानकारी को भी कानून-व्यवस्था के आकलन का हिस्सा बनाया गया है। पुलिस यह पता लगाने का प्रयास करेगी कि बड़ी संख्या में आने वाले प्रदर्शनकारियों की स्थानीय स्तर पर किस प्रकार की व्यवस्थाएं हैं और किन संगठनों या समूहों के साथ उनका संपर्क है। इसके अलावा आयोजन की लॉजिस्टिक तैयारियों तथा संभावित वित्तीय स्रोतों से संबंधित सूचनाओं का भी विश्लेषण किए जाने की बात सामने आई है। हालांकि इन सभी पहलुओं की जांच का उद्देश्य कानून-व्यवस्था से जुड़े संभावित जोखिमों का पूर्व आकलन करना बताया गया है। वायरलेस संचार व्यवस्था पर भी जोर पुलिस कमिश्नर की ओर से वायरलेस संचार व्यवस्था को मजबूत करने के निर्देश दिए जाने की भी जानकारी है। बड़े प्रदर्शनों के दौरान मौके पर तैनात पुलिसकर्मियों और वरिष्ठ अधिकारियों के बीच सूचनाओं का तेजी से आदान-प्रदान हो, इसके लिए वायरलेस नेटवर्क की समीक्षा और तकनीकी कमियों को समय रहते दूर करने पर जोर दिया गया है। उद्देश्य कानून-व्यवस्था का बेहतर प्रबंधन पुलिस सूत्रों के अनुसार नई व्यवस्था का उद्देश्य शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार को रोकना नहीं, बल्कि बड़े सार्वजनिक आयोजनों के दौरान संभावित कानून-व्यवस्था संबंधी परिस्थितियों का पहले से बेहतर आकलन करना है। खासतौर पर ऐसे प्रदर्शनों को लेकर अतिरिक्त तैयारी की जाएगी, जिनमें दिल्ली के बाहर से बड़ी संख्या में लोग आने की संभावना हो या कई संगठन एक साथ भाग ले रहे हों। लोकतांत्रिक व्यवस्था में शांतिपूर्ण प्रदर्शन नागरिकों की अभिव्यक्ति का महत्वपूर्ण माध्यम है। ऐसे में पुलिस के लिए चुनौती यह होगी कि सुरक्षा और कानून-व्यवस्था की तैयारियों के साथ शांतिपूर्ण सभा एवं प्रदर्शन के अधिकार के बीच संतुलन भी बनाए रखा जाए। नई रणनीति की प्रभावशीलता इस बात से तय होगी कि खुफिया सूचनाओं का इस्तेमाल कितनी सटीकता, पारदर्शिता और कानून के दायरे में किया जाता है।

  • बेंगलुरु व्हाइटफील्ड में सावन महोत्सव, मातृशक्ति ने मनाया भव्य उत्सव

    भारतार्थ खबर संवाददाता धन्नाराम चौधरी Bhaarataarth.com बेंगलुरु, 23 अगस्त 2026। भारतीय राजपुताना सेवा संगठन की व्हाइटफील्ड मातृशक्ति की ओर से सावन महोत्सव का भव्य आयोजन उत्साह और उल्लास के साथ किया गया। अध्यक्ष श्रीमती रोहिणी सिंह एवं उनकी टीम के नेतृत्व में आयोजित कार्यक्रम में बड़ी संख्या में मातृशक्ति बहनों ने भाग लिया। आयोजन में धार्मिक आस्था के साथ भारतीय संस्कृति, संस्कार और सामाजिक एकता की झलक दिखाई दी। माता रानी और भोले बाबा की पूजा से हुआ शुभारंभ कार्यक्रम की शुरुआत सामूहिक रूप से माता रानी और भोले बाबा की पूजा-अर्चना से हुई। इसके बाद संगठन और मातृशक्ति के जयघोष के बीच उपस्थित महिलाओं का तिलक, आरती एवं पुष्पों से स्वागत किया गया। सावन महोत्सव के दौरान महिलाओं के लिए म्यूजिकल चेयर और कप नॉट टचिंग सहित विभिन्न मनोरंजक गतिविधियां आयोजित की गईं। मातृशक्ति बहनों ने उत्साहपूर्वक हिस्सा लिया और नृत्य के साथ सावन की खुशियां साझा कीं। पूरे आयोजन के दौरान उत्साह, आपसी प्रेम और सौहार्द का वातावरण बना रहा। चूड़ी, बिंदी और मेहंदी का वितरण आयोजन में मातृशक्ति बहनों को चूड़ी, बिंदी, मेहंदी और केले वितरित किए गए। विभिन्न गतिविधियों में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाली एवं भाग लेने वाली महिलाओं को उपहार देकर सम्मानित किया गया। कार्यक्रम ने महिलाओं को मनोरंजन के साथ एक-दूसरे से जुड़ने और सामाजिक सहभागिता बढ़ाने का अवसर भी प्रदान किया। मातृशक्ति संगठन की मजबूत आधारशिला : अनिल सिंह भारतीय राजपुताना सेवा संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष अनिल सिंह सिकरवार ने मातृशक्ति को सावन महोत्सव की शुभकामनाएं दीं। उन्होंने कहा कि मातृशक्ति संगठन की मजबूती की महत्वपूर्ण आधारशिला है। महिलाओं की एकजुटता, सक्रिय सहभागिता और संस्कारों के प्रति समर्पण समाज को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उन्होंने आयोजन को सफल बनाने के लिए रोहिणी सिंह और व्हाइटफील्ड मातृशक्ति टीम को बधाई दी तथा कार्यक्रम में सहयोग करने वाले सभी लोगों के प्रति आभार व्यक्त किया। सावन महोत्सव धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक परंपरा और महिला सहभागिता के सुंदर संगम के रूप में सम्पन्न हुआ।

  • शरीर से आत्मा तक: मनुष्य आखिर किस स्तर पर जी रहा है?

    लेखक: अशोक कुमार सिंह रिपोर्टर/मल्टीमीडिया डायरेक्टर भारतार्थ खबर (बंगलुरु कर्नाटक) मनुष्य का पूरा जीवन एक प्रश्न के आसपास घूमता है—मैं कौन हूं? क्या मैं केवल यह शरीर हूं, जो जन्म लेता है, बढ़ता है, बूढ़ा होता है और एक दिन समाप्त हो जाता है? क्या मैं केवल यह मन हूं, जिसमें हर क्षण विचार, इच्छाएं, भय, क्रोध, प्रसन्नता और दुख आते-जाते रहते हैं? या इन सबके पीछे कोई ऐसी चेतना भी है, जो शरीर और मन दोनों को देखती है? भारतीय आध्यात्मिक परंपरा सदियों से मनुष्य को इसी प्रश्न पर विचार करने के लिए प्रेरित करती रही है। इसका एक महत्वपूर्ण संदेश है कि मनुष्य को केवल शरीर के स्तर पर नहीं जीना चाहिए और न ही अपने अस्तित्व को केवल मन के उतार-चढ़ाव तक सीमित कर देना चाहिए। जीवन की गहराई को समझने के लिए चेतना अथवा आत्मबोध के स्तर तक पहुंचने का प्रयास आवश्यक है। यह विचार शरीर को नकारने का संदेश नहीं देता। शरीर जीवन का महत्वपूर्ण साधन है। इसकी देखभाल करना हमारा कर्तव्य है। इसी प्रकार मन भी जीवन का आवश्यक हिस्सा है। लेकिन समस्या तब शुरू होती है, जब मनुष्य शरीर को ही अपना संपूर्ण अस्तित्व मान लेता है और मन में उठने वाले प्रत्येक विचार को अपना अंतिम सत्य समझने लगता है। शरीर जरूरी है, लेकिन शरीर ही सब कुछ नहीं। हमारा शरीर प्रकृति का अद्भुत उपहार है। इसी शरीर के माध्यम से हम संसार को देखते हैं, सुनते हैं, अनुभव करते हैं, कार्य करते हैं और अपने संबंध निभाते हैं। इसलिए शरीर की उपेक्षा करना आध्यात्मिकता नहीं हो सकती। लेकिन शरीर की देखभाल और शरीर के प्रति अत्यधिक आसक्ति में बहुत अंतर है। शरीर स्वस्थ रहे, स्वच्छ रहे और सक्षम रहे—यह आवश्यक है। लेकिन जब मनुष्य अपने पूरे जीवन का मूल्यांकन केवल अपने रूप, रंग, शक्ति, उम्र, सुंदरता और बाहरी आकर्षण के आधार पर करने लगता है, तब वह शरीर के स्तर पर बंधने लगता है। आज का समाज इस समस्या को बहुत स्पष्ट रूप से दिखाता है। युवा दिखने की इच्छा, सुंदर दिखाई देने की चिंता, दूसरों से बेहतर दिखने की प्रतिस्पर्धा और सामाजिक स्वीकृति पाने की लगातार कोशिश मनुष्य को भीतर से बेचैन कर सकती है। जिस शरीर पर मनुष्य इतना गर्व करता है, वही शरीर समय के साथ बदलता रहता है। बचपन का शरीर युवावस्था में बदलता है। युवावस्था का शरीर वृद्धावस्था की ओर जाता है। शक्ति धीरे-धीरे कम होती है। बाल सफेद होते हैं। त्वचा बदलती है। आंखों की रोशनी कम हो सकती है। शरीर रोगों से प्रभावित हो सकता है। प्रकृति का नियम परिवर्तन है। यदि हमारी पहचान केवल शरीर से जुड़ी होगी, तो शरीर में होने वाला प्रत्येक परिवर्तन हमारे भीतर भय पैदा करेगा। यहीं से बुढ़ापे का भय, बीमारी का भय और मृत्यु का भय जन्म ले सकता है। मृत्यु जीवन का सबसे बड़ा रहस्य है। मनुष्य मृत्यु को रोक नहीं सकता, लेकिन मृत्यु के विचार से डरता अवश्य है। इस भय का एक कारण यह भी है कि हम अपने अस्तित्व को शरीर से जोड़ लेते हैं। हमें लगता है कि शरीर समाप्त हुआ तो सब कुछ समाप्त हो गया। आध्यात्मिक चिंतन इस प्रश्न को दूसरी दृष्टि से देखने का प्रयास करता है। वह कहता है कि शरीर परिवर्तनशील है, जबकि आत्मा या चेतना को शरीर से अलग समझने की परंपरा भारतीय दर्शन में बहुत पुरानी है। यहां आत्मा की अवधारणा को केवल धार्मिक विश्वास के रूप में नहीं, बल्कि आत्मचिंतन के विषय के रूप में भी देखा जा सकता है। प्रश्न यह है कि यदि शरीर लगातार बदल रहा है, तो हमारे भीतर वह कौन-सा अनुभव है जो इन परिवर्तनों को देखता है? बचपन की तस्वीर देखकर हम कहते हैं—“यह मैं था।” युवावस्था की तस्वीर देखकर भी कहते हैं—“यह मैं था।” शरीर बदल गया, लेकिन ‘मैं’ की अनुभूति बनी रही। यही प्रश्न मनुष्य को आत्मचिंतन की ओर ले जाता है। शरीर के स्तर से ऊपर उठने की बात करते समय दूसरा प्रश्न मन का है। मनुष्य अक्सर सोचता है कि वह अपने विचार ही है। लेकिन यदि हम थोड़ी देर शांत बैठें और अपने विचारों को देखें तो पता चलता है कि विचार लगातार बदल रहे हैं। कुछ समय पहले हम प्रसन्न थे, फिर किसी बात ने दुखी कर दिया। कुछ देर बाद किसी समाचार ने क्रोधित कर दिया। थोड़ी देर बाद किसी प्रिय व्यक्ति से बात हुई तो मन फिर हल्का हो गया। यदि विचार लगातार बदल रहे हैं, तो क्या बदलते हुए विचार ही हमारा पूरा अस्तित्व हैं? यहीं से साक्षी भाव की अवधारणा सामने आती है। साक्षी भाव का अर्थ है—अपने विचारों, भावनाओं और अनुभवों को बिना तुरंत उनके साथ बह जाने के देखना। क्रोध आया तो यह देखना कि “मेरे भीतर क्रोध उठ रहा है।” भय आया तो देखना कि “मेरे भीतर भय की भावना है।” दुख आया तो समझना कि “मैं दुख का अनुभव कर रहा हूं।” इस दृष्टि में एक छोटा लेकिन महत्वपूर्ण अंतर पैदा होता है। हम यह नहीं कहते कि “मैं ही क्रोध हूं।” हम कहते हैं—“मेरे भीतर क्रोध उत्पन्न हुआ है।” यह अंतर मनुष्य को अपने विचारों का गुलाम बनने से बचाने की दिशा में एक कदम हो सकता है। आध्यात्मिक जीवन का अर्थ यह नहीं है कि मन में कोई विचार नहीं आना चाहिए। मन का स्वभाव ही विचार करना है। कभी सकारात्मक विचार आएंगे, कभी नकारात्मक। कभी आत्मविश्वास होगा, कभी संदेह। कभी प्रेम होगा, कभी क्रोध। कभी उत्साह होगा, कभी निराशा। समस्या विचारों के आने में नहीं है। समस्या तब होती है जब हम हर विचार को सत्य मान लेते हैं और उसके अनुसार तुरंत प्रतिक्रिया करने लगते हैं। यदि किसी ने हमें अपमानित किया और उसी क्षण हमने क्रोध में प्रतिक्रिया दे दी, तो संभव है कि बाद में हमें पछताना पड़े। लेकिन यदि हम कुछ क्षण रुककर अपने भीतर उठ रहे क्रोध को देख लें, तो प्रतिक्रिया और उत्तर के बीच एक छोटा-सा अंतर पैदा होता है। यही अंतर विवेक का स्थान बन सकता है। आत्मा के स्तर पर जीने का अर्थ शरीर या मन को छोड़ देना नहीं है। इसका अर्थ यह समझना है कि शरीर मेरा साधन है, मन मेरा उपकरण है और मेरी चेतना इन दोनों के अनुभवों की साक्षी हो सकती है। जैसे हम कार का उपयोग करते हैं, लेकिन स्वयं को कार नहीं मानते, उसी तरह आध्यात्मिक दृष्टि में शरीर को जीवन की यात्रा का साधन माना जा सकता है। नाव नदी पार कराने के लिए जरूरी है। इसलिए नाव की देखभाल करनी होगी। लेकिन नाव को ही अंतिम मंजिल मान लेना बुद्धिमानी नहीं होगी। इसी प्रकार शरीर की देखभाल करें, मन को स्वस्थ रखें, संसार में अपने कर्तव्यों का पालन करें—लेकिन अपने अस्तित्व को केवल इन सीमाओं में बंद न कर दें। मनुष्य सुख चाहता है। अच्छा भोजन, आरामदायक घर, धन, प्रतिष्ठा, मनोरंजन और सफलता—ये सभी जीवन में सुख दे सकते हैं। इनका अपना महत्व है। लेकिन इनसे मिलने वाला सुख सामान्यतः स्थायी नहीं होता। आज जिस वस्तु को पाने के लिए हम बेचैन हैं, उसे पाने के कुछ समय बाद वही वस्तु सामान्य लगने लगती है। फिर मन किसी दूसरी वस्तु की इच्छा करने लगता है। एक इच्छा पूरी होती है, दूसरी पैदा हो जाती है। मनुष्य सोचता है कि अगली उपलब्धि उसे स्थायी खुशी देगी। लेकिन अगली उपलब्धि आने के बाद फिर कोई नया लक्ष्य सामने खड़ा हो जाता है। इसका अर्थ यह नहीं कि लक्ष्य बनाना गलत है। समस्या तब है जब हमारी पूरी शांति केवल बाहरी उपलब्धियों पर निर्भर हो जाए। मन की शांति, संतोष, प्रेम, करुणा, सेवा और आत्मबोध ऐसे अनुभव हैं जो बाहरी वस्तुओं से अलग प्रकार की संतुष्टि प्रदान कर सकते हैं। इंद्रियों का स्वभाव अनुभव करना है। आंख सुंदर दृश्य देखना चाहती है। कान मधुर संगीत सुनना चाहते हैं। जीभ स्वाद चाहती है। शरीर आराम चाहता है। इन इच्छाओं में अपने आप कोई दोष नहीं है। लेकिन जब इच्छाएं मनुष्य को नियंत्रित करने लगती हैं, तब समस्या पैदा होती है। एक वस्तु मिली तो दूसरी चाहिए। दूसरी मिली तो तीसरी चाहिए। तुलना बढ़ती जाती है और संतोष पीछे छूटता जाता है। विज्ञापन आधारित आधुनिक जीवन ने इस प्रवृत्ति को और मजबूत किया है। हमें लगातार बताया जाता है कि हमारे पास कुछ कम है—बेहतर फोन चाहिए, बड़ा घर चाहिए, महंगी गाड़ी चाहिए, अधिक प्रसिद्धि चाहिए, बेहतर जीवनशैली चाहिए। मनुष्य अपनी वास्तविक जरूरत और बाजार द्वारा पैदा की गई इच्छा के बीच अंतर करना भूल सकता है। आत्मचेतना का मार्ग इस अंतर को पहचानने की क्षमता विकसित करने का प्रयास है। अनासक्ति शब्द को कई बार गलत समझा जाता है। अनासक्ति का अर्थ यह नहीं है कि मनुष्य अपने परिवार से प्रेम न करे, अपने काम को छोड़ दे या संसार से भाग जाए। अनासक्ति का अर्थ है—कर्तव्य निभाते हुए परिणाम और वस्तुओं के प्रति अत्यधिक मानसिक आसक्ति से मुक्त होने का प्रयास। परिवार से प्रेम करें, लेकिन अधिकार की भावना इतनी न बढ़े कि प्रेम बंधन बन जाए। धन कमाएं, लेकिन धन को अपनी पहचान न बना लें। सफलता प्राप्त करें, लेकिन असफलता को अपनी संपूर्ण पहचान न बनने दें। सम्मान मिले तो विनम्र रहें और अपमान मिले तो आत्ममंथन करें। यही संतुलन जीवन को परिपक्व बनाता है। मनुष्य जब संसार से विदा होता है, तब उसके साथ उसका पद, संपत्ति और बाहरी रूप नहीं जाता। पीछे रह जाते हैं उसके कर्म। लोग याद करते हैं कि उसने दूसरों के साथ कैसा व्यवहार किया। क्या उसने किसी जरूरतमंद की मदद की? क्या उसने अपने परिवार के साथ प्रेम से व्यवहार किया? क्या उसने किसी कमजोर व्यक्ति का शोषण किया या उसका हाथ थामा? क्या उसके कारण किसी के जीवन में आशा आई? यही प्रश्न मनुष्य के जीवन को उसके बाहरी रूप से कहीं अधिक अर्थपूर्ण बनाते हैं। इसलिए आत्मा के स्तर पर जीने का एक महत्वपूर्ण अर्थ यह भी है कि हम अपने कर्मों को अधिक महत्व दें। आत्मचेतना की यात्रा के लिए किसी बड़े आयोजन की आवश्यकता नहीं है। मनुष्य अपने दैनिक जीवन में कुछ मिनट मौन बैठकर शुरुआत कर सकता है। आंखें बंद करें। आराम से बैठें। अपनी सांसों को देखें। सांस भीतर जा रही है। सांस बाहर आ रही है। मन में विचार उठ रहे हैं। उन्हें रोकने की आवश्यकता नहीं। केवल उन्हें आते-जाते हुए देखने का प्रयास करें। धीरे-धीरे मनुष्य अनुभव कर सकता है कि वह अपने विचारों को देख भी सकता है। यही साक्षी भाव की प्रारंभिक साधना हो सकती है। हालांकि ध्यान कोई जादुई प्रक्रिया नहीं है। मन को शांत होने में समय लग सकता है। लगातार अभ्यास और धैर्य आवश्यक है। आज का मनुष्य शोर से घिरा हुआ है। मोबाइल की घंटियां, सोशल मीडिया की सूचनाएं, लगातार आती खबरें, मनोरंजन और बातचीत ने हमारे जीवन में बाहरी आवाजों की संख्या बढ़ा दी है। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण आवाज शायद भीतर की है, जिसे सुनने के लिए मौन चाहिए। कुछ समय बिना मोबाइल, बिना टीवी और बिना किसी बाहरी मनोरंजन के स्वयं के साथ बैठना कठिन लग सकता है। यही कठिनाई बताती है कि हम अपने भीतर से कितने दूर हो गए हैं। मौन भागना नहीं है। मौन अपने भीतर लौटने का अवसर है। यदि व्यक्ति अपने भीतर अधिक सजग होता है, तो उसका प्रभाव केवल उसके व्यक्तिगत जीवन तक सीमित नहीं रहता। जो व्यक्ति अपने क्रोध को पहचानना सीखता है, वह दूसरों पर कम क्रोध कर सकता है। जो व्यक्ति अपनी इच्छाओं को समझता है, वह दूसरों की वस्तुओं से कम ईर्ष्या कर सकता है। जो व्यक्ति अपने भीतर करुणा विकसित करता है, वह समाज में अधिक संवेदनशील व्यवहार कर सकता है। इसलिए आत्मचेतना केवल व्यक्तिगत आध्यात्मिक यात्रा नहीं है। इसका सामाजिक महत्व भी है। यदि मनुष्य भीतर से संतुलित होगा, तो परिवार अधिक संतुलित हो सकते हैं। परिवार संतुलित होंगे तो समाज में तनाव कम हो सकता है। आज मनुष्य के पास सुविधाएं पहले से कहीं अधिक हैं, लेकिन मानसिक बेचैनी भी कम नहीं हुई है। हमारे पास संचार के साधन हैं, लेकिन संवाद की कमी दिखाई देती है। हमारे पास मनोरंजन के अनेक साधन हैं, लेकिन भीतर का खालीपन कई बार बना रहता है। हमारे पास जानकारी बहुत है, लेकिन आत्मज्ञान की खोज अक्सर पीछे छूट जाती है। ऐसे समय में शरीर, मन और आत्मचेतना के बीच अंतर को समझने की आवश्यकता और अधिक बढ़ जाती है। मनुष्य यदि हर समस्या का समाधान केवल बाहरी दुनिया में खोजता रहेगा, तो संभव है कि वह अपने भीतर मौजूद कई प्रश्नों से बचता रहे। कभी-कभी समाधान बाहर नहीं, भीतर की दृष्टि बदलने से आता है। मानव जीवन को नदी में चलती नाव के समान समझना एक सुंदर प्रतीक है। शरीर नाव है। मन नाविक की तरह है। संसार नदी है। और जीवन का उद्देश्य केवल नाव को सजाते रहना नहीं, बल्कि यात्रा को अर्थपूर्ण बनाना है। नाव की मरम्मत करनी होगी। उसे स्वच्छ रखना होगा। उसे सुरक्षित रखना होगा। लेकिन नाव को ही अपना अंतिम घर मान लेना यात्रा के उद्देश्य को भुला देना है। इसी प्रकार शरीर की देखभाल करें, मन को स्वस्थ रखें, संसार में अपने कर्तव्यों का पालन करें—लेकिन अपने अस्तित्व को केवल इन सीमाओं में बंद न कर दें। मनुष्य का जीवन केवल जन्म से मृत्यु तक की शारीरिक यात्रा नहीं माना जा सकता। यह चेतना के विकास की यात्रा भी हो सकती है। शरीर हमें संसार में कार्य करने की शक्ति देता है। मन हमें अनुभव, विचार और कल्पना देता है। लेकिन आत्मचेतना हमें यह प्रश्न पूछने की क्षमता देती है कि इन सबके पीछे हमारा वास्तविक स्वरूप क्या है। शरीर को नकारना नहीं है। मन को दबाना नहीं है। संसार से भागना नहीं है। बल्कि शरीर की देखभाल करते हुए, मन को समझते हुए और अपने भीतर की चेतना के प्रति जागरूक होते हुए जीवन जीने का प्रयास करना है। शायद यही वह यात्रा है जिसमें मनुष्य धीरे-धीरे बाहरी पहचान से भीतर की पहचान की ओर बढ़ता है। जब मनुष्य केवल अपने रूप को नहीं, अपने चरित्र को महत्व देता है; केवल अपनी इच्छाओं को नहीं, अपने कर्तव्यों को महत्व देता है; केवल अपने सुख को नहीं, दूसरों के सुख को भी महत्व देता है; और केवल अपनी उपलब्धियों को नहीं, अपने अस्तित्व के अर्थ को समझने का प्रयास करता है—तब उसके जीवन में एक गहरा परिवर्तन शुरू हो सकता है। शरीर हमारा साधन है। मन हमारा माध्यम है। कर्म हमारी पहचान हैं। और आत्मचेतना वह प्रकाश है, जिसके माध्यम से हम स्वयं को समझने की यात्रा शुरू कर सकते हैं। अंततः प्रश्न यह नहीं कि हमने जीवन में कितना पाया। प्रश्न यह है कि जो जीवन हमें मिला, उसे हमने कितनी जागरूकता, करुणा, प्रेम और सत्य के साथ जिया। यही शरीर से आत्मा तक की यात्रा का सार है।

  • रामराज्याभिषेक से भक्तिमय हुआ कथा पंडाल

    भारतार्थ खबर Bhaarataarth.com बेंगलूररु। 24 अगस्त 2026। श्री मातेश्वरी भक्त मंडल के तत्वावधान में होसूर भण्डे स्थित श्री कृष्णा गौ सेवा आश्रम गोशाला में आयोजित नौ दिवसीय श्रीराम कथा के छठे दिन सोमवार को रामराज्याभिषेक का प्रसंग श्रद्धा और उल्लास के साथ प्रस्तुत किया गया। कथा परिसर में अयोध्या धाम जैसा भक्तिमय वातावरण दिखाई दिया। कथा व्यास संत किशोरचन्द रामायणी ने प्रभु श्रीराम के 14 वर्ष का वनवास पूर्ण कर माता सीता और लक्ष्मण के साथ अयोध्या लौटने तथा उनके राज्याभिषेक का प्रसंग भावपूर्ण ढंग से सुनाया। उन्होंने बताया कि प्रभु श्रीराम के अयोध्या लौटने पर पूरी नगरी में हर्ष और उत्सव का वातावरण छा गया। प्रजा ने दीप जलाकर अपने आराध्य का स्वागत किया, जिसके बाद विधि-विधान से श्रीराम का राज्याभिषेक हुआ और रामराज्य की स्थापना का वर्णन किया गया। कथा प्रसंग को प्रभावी बनाने के लिए कलाकारों ने श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण के अयोध्या आगमन की जीवंत झांकी प्रस्तुत की। श्रीराम के स्वरूप के आगमन पर श्रद्धालुओं ने पुष्पवर्षा कर स्वागत किया। राज्याभिषेक की झांकी ने श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया। इस दौरान पंडाल में दीपावली जैसा उत्सवी माहौल रहा और श्रद्धालुओं ने जय श्रीराम के जयघोष किए। संत किशोरचन्द रामायणी ने कहा कि रामराज्य में प्रजा सुखी और समृद्ध थी तथा अन्याय के लिए कोई स्थान नहीं था। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीराम का जीवन सत्य, मर्यादा, त्याग, सेवा और कर्तव्य का संदेश देता है। उनके आदर्शों को जीवन में अपनाने से परिवार और समाज में सुख, शांति तथा सद्भाव को बढ़ावा मिल सकता है। कथा के दौरान भजनों और जयघोषों से वातावरण लगातार भक्तिमय बना रहा। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने कथा का श्रवण कर रामराज्याभिषेक प्रसंग का आनंद लिया। कार्यक्रम के समापन पर आरती की गई तथा श्रद्धालुओं को महाप्रसादी वितरित की गई। आरती एवं महाप्रसादी के लाभार्थियों में सज्जयराम, ढलाराम, सुजाराम एवं किरण पंवार परिवार तथा ममता ग्रूप, मागडी रोड रहे।

  • खवड्या डोंगर हादसा: एक परिवार के तीन लोगों की मौत

    भारतार्थ खबर Bhaarataarth.com संवाददाता: अशोक कुमार सिंह छत्रपति संभाजीनगर, 24 अगस्त 2026। महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर जिले के तिसगांव क्षेत्र स्थित खवड्या डोंगर पर 21 अगस्त को हुई दर्दनाक घटना में एक ही परिवार के तीन सदस्यों की मौत हो गई। मृतकों की पहचान 18 वर्षीय कुणाल चांदगुडे, उनके पिता मुरलीधर चांदगुडे और मां संगीता चांदगुडे के रूप में हुई है। घटना के बाद इलाके में शोक का माहौल है। पुलिस मामले की परिस्थितियों और घटना के कारणों की जांच कर रही है। प्राप्त जानकारी के अनुसार, कुणाल किसी कारण से खवड्या डोंगर की पहाड़ी पर चला गया था। वह पहाड़ी के ऊंचे हिस्से में ऐसी स्थिति में पहुंच गया, जिसके बाद परिवार के सदस्यों और स्थानीय लोगों में चिंता फैल गई। उसे सुरक्षित नीचे लाने के लिए परिवार, स्थानीय लोग, पुलिस और बचाव दल ने बातचीत के माध्यम से काफी देर तक समझाने का प्रयास किया। बताया जा रहा है कि दोपहर के आसपास कुणाल को सुरक्षित नीचे लाने के प्रयास में उसके पिता मुरलीधर भी उसके पास पहुंचे। इसी दौरान दोनों के नीचे गिरने की जानकारी सामने आई। घटना के बाद मां संगीता भी पहाड़ी की ओर गईं और उनके भी नीचे गिरने की सूचना मिली। हादसे में तीनों की मौत हो गई। घटना की सूचना मिलने के बाद पुलिस और बचाव दल मौके पर पहुंचे। शवों को बाहर निकालकर पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया। पुलिस द्वारा घटना से जुड़े विभिन्न पहलुओं की जांच की जा रही है। iPhone और EMI विवाद की चर्चा, लेकिन पुष्टि नहीं घटना के बाद सोशल मीडिया और कुछ शुरुआती चर्चाओं में महंगे iPhone और उसकी किस्त (EMI) से जुड़े कथित पारिवारिक विवाद को घटना की वजह से जोड़कर देखा गया। हालांकि, उपलब्ध जानकारी के आधार पर पुलिस ने अभी इस दावे को घटना का अंतिम या प्रमाणित कारण नहीं बताया है। ऐसी स्थिति में किसी अपुष्ट चर्चा को घटना का निश्चित कारण मानना उचित नहीं होगा। पुलिस जांच के दौरान आर्थिक परिस्थितियों, पारिवारिक संबंधों, घटनाक्रम और अन्य संभावित पहलुओं की पड़ताल की जा रही है। जांच पूरी होने के बाद ही घटना की वास्तविक पृष्ठभूमि को लेकर स्पष्ट स्थिति सामने आ सकेगी। घटना ने उठाया संवाद और सहयोग का सवाल खवड्या डोंगर की घटना ने परिवारों में संवाद, विश्वास और भावनात्मक सहयोग की आवश्यकता को भी सामने रखा है। आर्थिक दबाव या पारिवारिक मतभेद गंभीर होने पर परिवार और करीबी लोगों को समय रहते संवाद का प्रयास करना चाहिए। किसी व्यक्ति के व्यवहार में अचानक बदलाव, अत्यधिक तनाव या निराशा दिखाई दे तो उसे गंभीरता से लेना जरूरी है। ऐसी परिस्थितियों में डांट या दबाव बढ़ाने के बजाय शांतिपूर्वक बातचीत, भरोसे का वातावरण और जरूरत पड़ने पर योग्य विशेषज्ञ से सहायता लेना अधिक प्रभावी हो सकता है। सोशल मीडिया की सूचनाओं पर सावधानी जरूरी इस घटना ने जिम्मेदार पत्रकारिता की आवश्यकता को भी रेखांकित किया है। दुखद घटनाओं के बाद सोशल मीडिया पर कई तरह की सूचनाएं तेजी से प्रसारित होती हैं। इनमें कुछ तथ्यात्मक हो सकती हैं, जबकि कुछ अपुष्ट दावों पर आधारित होती हैं। पुलिस जांच जारी रहने के दौरान पुष्ट जानकारी और अपुष्ट दावे के बीच स्पष्ट अंतर रखना आवश्यक है। खवड्या डोंगर मामले में iPhone या EMI से जुड़ी चर्चा सामने आई है, लेकिन इसे फिलहाल घटना का अंतिम कारण बताना उचित नहीं होगा। एक ही परिवार के तीन सदस्यों की मौत से क्षेत्र में गहरा दुख है। घटना की वास्तविक वजह पुलिस जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी। फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यही है कि एक परिवार ने इस हादसे में अपने तीन सदस्यों को खो दिया है।

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