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भरत मिलाप के प्रसंग से गूंजा त्याग और भाईचारे का संदेश

  • लेखक की तस्वीर: धन्नाराम चौधरी
    धन्नाराम चौधरी
  • 26 अग॰
  • 2 मिनट पठन
मंच पर पगड़ीधारी पुरुष का स्वागत करते लोग, गले में फूलमालाएँ; पीछे कन्नड़ बैनर और औपचारिक माहौल।

भारतार्थ खबर Bhaarataarth.com बेंगलूरू, 25 अगस्त 2026। मातेश्वरी भक्त मंडल के तत्वावधान में होसूर बंडे स्थित श्रीकृष्णा गोसेवा आश्रम गोशाला में चल रही नौ दिवसीय श्रीराम कथा के सातवें दिन मंगलवार को श्रद्धा, भक्ति और भावनाओं का विशेष संगम देखने को मिला। कथा वाचक संत किशोरचन्द रामायणी ने भगवान श्रीराम और उनके अनुज भरत के अटूट प्रेम, त्याग, समर्पण और भाईचारे से जुड़े भरत मिलाप के पावन प्रसंग का भावपूर्ण वर्णन किया। प्रसंग के दौरान कथा पंडाल जय श्रीराम के जयघोष से गूंज उठा और अनेक श्रद्धालु भावुक हो गए।


संत किशोरचन्द रामायणी ने कहा कि भरत का चरित्र त्याग, तपस्या और समर्पण की अनुपम मिसाल है। उन्हें राजपाट प्राप्त होने के बावजूद उन्होंने उसे अपना अधिकार नहीं माना और भगवान श्रीराम को ही अयोध्या का वास्तविक राजा स्वीकार किया। भरत के मन में श्रीराम के प्रति प्रेम और सम्मान इतना गहरा था कि वे उन्हें वन से वापस अयोध्या लाने के लिए स्वयं उनके पास पहुंचे।


उन्होंने कहा कि भरत मिलाप केवल दो भाइयों के मिलन का प्रसंग नहीं है, बल्कि यह प्रेम, त्याग, मर्यादा, विश्वास और पारिवारिक संस्कारों का जीवंत संदेश है। वर्तमान समय में जब परिवारों के भीतर आपसी मतभेद और दूरी बढ़ती दिखाई देती है, तब श्रीराम और भरत का आदर्श समाज को रिश्तों की वास्तविक गरिमा समझाने का मार्ग दिखाता है।


झांकी ने किया श्रद्धालुओं को भावुक


कथा के दौरान भगवान श्रीराम और भरत के मिलाप की जीवंत झांकी प्रस्तुत की गई। जैसे ही दोनों भाइयों के गले मिलने का भावपूर्ण दृश्य सामने आया, श्रद्धालुओं ने जय श्रीराम के जयघोष से पूरे परिसर को गुंजायमान कर दिया। भावनात्मक वातावरण के बीच कई श्रद्धालुओं की आंखें नम हो गईं।

संत किशोरचन्द ने कहा कि सच्चे रिश्ते अधिकार जताने से नहीं, बल्कि त्याग, विश्वास और समर्पण से मजबूत होते हैं। परिवार के सदस्य यदि एक-दूसरे के सुख-दुख में साथ खड़े रहें और परस्पर सम्मान बनाए रखें तो परिवार में सौहार्द कायम रहता है। यही पारिवारिक एकता आगे चलकर समाज की मजबूती का आधार बनती है।

उन्होंने कहा कि श्रीराम और भरत का संबंध भारतीय संस्कृति में भाईचारे और त्याग का आदर्श प्रस्तुत करता है। भरत ने सत्ता और वैभव से ऊपर भाई के प्रति अपने प्रेम और धर्म को स्थान दिया। उनका जीवन बताता है कि व्यक्ति का वास्तविक गौरव उसके अधिकारों में नहीं, बल्कि दूसरों के लिए किए गए त्याग और समर्पण में निहित है।


भजनों से भक्तिमय हुआ कथा परिसर


संत पुष्करदास ने कहा कि श्रीराम कथा के दौरान प्रस्तुत भजनों और लगातार गूंजते श्रीराम के जयघोष से पूरा वातावरण भक्तिमय बना रहा। श्रद्धालुओं ने पूरे मनोयोग और श्रद्धाभाव के साथ कथा का श्रवण किया।

कथा आयोजन के दौरान धार्मिक वातावरण के बीच श्रद्धालुओं ने भगवान श्रीराम के आदर्शों को जीवन में उतारने का संकल्प भी लिया। आयोजकों के अनुसार कथा के आगामी प्रसंगों में भी श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या में सहभागिता की उम्मीद है।

आरती एवं महाप्रसादी के लाभार्थी गीतादेवी, जगदीश हाम्बड, रमेश कुमार, बाबूलाल तथा संगीता हाम्बड परिवार रहे। आयोजन में उपस्थित श्रद्धालुओं ने धार्मिक कार्यक्रम का लाभ लिया और महाप्रसादी ग्रहण की।


समाचार प्रेषक: नारायणलाल सीरवी।


भरत मिलाप श्रीराम कथा

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