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 भारतार्थ खबर, नहीं उसका अर्थ

21अक्टूबर /2026 /बुधवार

बेंगलुरु, 20 अक्टूबर 2026। बेंगलुरु में आयोजित 48वें दशहरा महोत्सव में राज्यसभा सांसद लहर सिंह सिरोया ने मां दुर्गा के दर्शन कर पूजा-अर्चना की और आशीर्वाद प्राप्त किया। सिद्धार्थ सांस्कृतिक समिति एवं राजेंद्र बाबू मेमोरियल ट्रस्ट ‘बिहार भवन’ के तत्वावधान में आयोजित इस महोत्सव में सांसद की उपस्थिति रही। इस अवसर पर समिति के पदाधिकारियों और सदस्यों ने मां भगवती की चुनड़ी ओढ़ाकर उनका स्वागत एवं अभिनंदन किया।

भारतार्थ लोगो: खबर नहीं, उसका अर्थ - राजनीतिक समाचार विश्लेषण

बेंगलुरु, 20 अक्टूबर 2026। बेंगलुरु में आयोजित 48वें दशहरा महोत्सव में राज्यसभा सांसद लहर सिंह सिरोया ने मां दुर्गा के दर्शन कर पूजा-अर्चना की और आशीर्वाद प्राप्त किया। सिद्धार्थ सांस्कृतिक समिति एवं राजेंद्र बाबू मेमोरियल ट्रस्ट ‘बिहार भवन’ के तत्वावधान में आयोजित इस महोत्सव में सांसद की उपस्थिति रही। इस अवसर पर समिति के पदाधिकारियों और सदस्यों ने मां भगवती की चुनड़ी ओढ़ाकर उनका स्वागत एवं अभिनंदन किया।

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  • आरोपों के बीच जस्टिस वर्मा का इस्तीफा, न्यायपालिका में फिर उठा जवाबदेही का सवाल

    भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) नई दिल्ली/प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज यशवंत वर्मा ने आखिरकार अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने राष्ट्रपति को अपना इस्तीफा सौंपते हुए उस विवाद पर विराम लगाने की कोशिश की है, जिसने पिछले कुछ समय से न्यायपालिका और संसद दोनों में हलचल मचा रखी थी। उनके सरकारी आवास से कथित रूप से भारी मात्रा में नकदी मिलने के मामले और महाभियोग की प्रक्रिया के बीच यह कदम बेहद अहम माना जा रहा है। कैश कांड से गहराया विवाद पूरा मामला उस वक्त सुर्खियों में आया, जब दिल्ली स्थित जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास में आग लगने की घटना सामने आई। बताया गया कि इस दौरान नौकरों के क्वार्टर के पास बने एक स्टोर रूम से जले हुए नोट बरामद हुए। इस घटना ने न केवल न्यायपालिका की साख पर सवाल खड़े किए, बल्कि राजनीतिक गलियारों में भी तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली। हालांकि जस्टिस वर्मा ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया। उनका कहना था कि घटना के समय वे और उनकी पत्नी दिल्ली में मौजूद नहीं थे। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि सुरक्षा में कोई चूक हुई है, तो उसके लिए उन्हें जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा। तबादला, जांच और बढ़ता दबाव विवाद के बीच उनका तबादला दिल्ली हाई कोर्ट से वापस इलाहाबाद हाई कोर्ट कर दिया गया था, जहां उन्होंने 5 अप्रैल 2025 को शपथ ली। इसके साथ ही उनके खिलाफ इन-हाउस जांच भी जारी रही, जिससे मामला और संवेदनशील हो गया। इस पूरे प्रकरण ने संसद का ध्यान भी अपनी ओर खींचा। लोकसभा में बड़ी संख्या में सांसदों के समर्थन से उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पेश किया गया। जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन भी किया गया, जिससे यह साफ हो गया था कि मामला गंभीर मोड़ ले चुका है। पहले भी इस्तीफे से टली कार्रवाई भारत के न्यायिक इतिहास में यह पहला मामला नहीं है, जब किसी जज ने आरोपों के दबाव में पद छोड़ा हो। इससे पहले भी कई न्यायाधीश महाभियोग या जांच से पहले इस्तीफा दे चुके हैं— पी. डी. दिनाकरण: अवैध जमीन कब्जाने और आय से अधिक संपत्ति के आरोपों के बीच 2011 में इस्तीफा दिया। सौमित्र सेन: वित्तीय अनियमितताओं के आरोप में राज्यसभा से महाभियोग पारित होने के बाद 2011 में पद छोड़ा। वी. रामास्वामी: सरकारी धन के दुरुपयोग के आरोपों के बाद 1994 में पद से हटे। दिलीप बी. भोसले: प्रशासनिक अनियमितताओं के विवादों के बीच 2018 में इस्तीफा दिया। न्यायपालिका की साख पर फिर बहस जस्टिस वर्मा का इस्तीफा ऐसे समय में आया है, जब न्यायपालिका की पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं। महाभियोग जैसी संवैधानिक प्रक्रिया के सक्रिय होने से पहले ही उनका पद छोड़ना कई संकेत देता है—एक ओर यह दबाव की गंभीरता को दर्शाता है, तो दूसरी ओर न्यायिक संस्थानों में सुधार की जरूरत को भी रेखांकित करता है। आगे क्या? विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकरण का असर केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह पूरे न्यायिक तंत्र में जवाबदेही की नई बहस को जन्म देगा। आने वाले समय में न्यायाधीशों की नियुक्ति, निगरानी और आंतरिक जांच प्रणाली को और अधिक पारदर्शी बनाने की मांग तेज हो सकती है। जस्टिस वर्मा का इस्तीफा भले ही एक अध्याय का अंत हो, लेकिन इससे उठे सवाल आने वाले दिनों में न्यायपालिका की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

  • इस्लामाबाद वार्ता पर टकराव—डील या जंग?

    भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) इस्लामाबाद। मध्य पूर्व में जारी तनाव के बीच शनिवार को पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद वैश्विक कूटनीति का केंद्र बन गई, जहां ईरान और अमेरिका के बीच संभावित समझौते या टकराव की दिशा तय करने वाली अहम वार्ता शुरू हुई। बातचीत से पहले ही ईरान ने कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट कर दिया कि अगर वार्ता में “अमेरिका फर्स्ट” नीति हावी रही तो समझौते की गुंजाइश है, लेकिन “इजराइल फर्स्ट” रुख अपनाया गया तो बातचीत बेनतीजा रह सकती है और संघर्ष और तेज हो सकता है। ईरान के उपराष्ट्रपति मोहम्मद रजा आरिफ ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर यह बयान देकर कूटनीतिक माहौल को पहले ही गरमा दिया। इसे अमेरिका के लिए सीधा संदेश माना जा रहा है कि इजराइल के प्रभाव में लिए गए किसी भी निर्णय को ईरान स्वीकार नहीं करेगा। कड़ी सुरक्षा के बीच इस्लामाबाद पहुंचा ईरानी दल ईरानी प्रतिनिधिमंडल देर रात इस्लामाबाद पहुंचा, जहां अभूतपूर्व सुरक्षा इंतजाम देखने को मिले। पाकिस्तानी वायुसेना ने ईरानी विमान को अपनी हवाई सीमा में प्रवेश करते ही चारों ओर से सुरक्षा घेरे में ले लिया। एडब्ल्यूएसीएस, इलेक्ट्रॉनिक युद्धक विमान और लड़ाकू जेट्स की तैनाती ने इस यात्रा को असाधारण बना दिया। प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व मोहम्मद बाघेर ग़ालिबफ़ कर रहे हैं, जिन्हें मौजूदा संघर्ष के दौरान तेहरान की रणनीति का प्रमुख चेहरा माना जाता है। अमेरिकी टीम भी पूरी ताकत के साथ मौजूद दूसरी ओर अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व उपराष्ट्रपति जेडी वेंस कर रहे हैं। उनके साथ विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दामाद जेरेड कुशनर भी इस्लामाबाद पहुंचे हैं। अमेरिकी पक्ष पहले ही संकेत दे चुका है कि यदि ईरान ने वार्ता में “रणनीतिक चालाकी” दिखाई, तो सख्त रुख अपनाया जाएगा। ‘करो या मरो’ की स्थिति में वार्ता पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने इस बैठक को “मेक ऑर ब्रेक” क्षण बताया है। उनके अनुसार यह वार्ता न केवल क्षेत्रीय बल्कि वैश्विक स्थिरता के लिए निर्णायक साबित हो सकती है। गौरतलब है कि 8 अप्रैल 2026 को घोषित संघर्षविराम के बाद यह पहली उच्चस्तरीय प्रत्यक्ष वार्ता है। ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद पहले ही स्पष्ट कर चुकी है कि कूटनीतिक समाधान के लिए समयसीमा सीमित है और अगले 15 दिन बेहद महत्वपूर्ण हैं। दुनिया की नजरें अगले 48 घंटों पर इस्लामाबाद में चल रही यह वार्ता ऐसे समय हो रही है जब मध्य पूर्व पिछले एक महीने से लगातार तनाव और सैन्य गतिविधियों की आग में झुलस रहा है। एक ओर अमेरिका दबाव की नीति पर कायम है, वहीं ईरान अपनी शर्तों पर अड़ा हुआ है। पाकिस्तान खुद को एक मध्यस्थ के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहा है, लेकिन स्थिति बेहद नाजुक बनी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगले 48 घंटे यह तय करेंगे कि क्षेत्र में शांति बहाल होगी या संघर्ष और अधिक व्यापक रूप ले लेगा। फिलहाल पूरी दुनिया की निगाहें इस्लामाबाद पर टिकी हुई हैं, जहां कूटनीति और टकराव के बीच संतुलन साधने की कठिन परीक्षा जारी है।

  • बंगाल चुनाव से पहले ईडी का शिकंजा, पार्थ चटर्जी के घर छापा

    भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) कोलकाता। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने एक बार फिर पूर्व शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी के खिलाफ कार्रवाई तेज कर दी है। शनिवार को ईडी की टीम ने दक्षिण कोलकाता के नकटला स्थित उनके आवास पर छापेमारी की, जिससे राज्य की राजनीति में हलचल मच गई है। यह कार्रवाई चर्चित शिक्षक भर्ती घोटाले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में की गई है। सूत्रों के अनुसार, ईडी चटर्जी से दोबारा पूछताछ करना चाहती है, लेकिन वह कई बार जारी समन के बावजूद पेश नहीं हुए। एजेंसी का आरोप है कि उन्होंने स्वास्थ्य कारणों का हवाला देकर पूछताछ से बचने की कोशिश की। ऐसे में जांच अधिकारियों ने सीधे उनके आवास पर पहुंचकर कार्रवाई की। छापेमारी के दौरान केंद्रीय बलों की भारी तैनाती भी देखी गई, जिससे इलाके में सुरक्षा कड़ी कर दी गई। इस मामले में ईडी की एक अन्य टीम ने न्यू टाउन स्थित कारोबारी प्रसन्ना रॉय के कार्यालय पर भी छापा मारा। एजेंसी का मानना है कि शिक्षक भर्ती प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर अनियमितताएं हुईं और इसमें कई प्रभावशाली लोगों की भूमिका हो सकती है। जांच अब इस पूरे नेटवर्क की कड़ियों को जोड़ने में जुटी है। गौरतलब है कि यह मामला जुलाई 2022 में तब सुर्खियों में आया था, जब ईडी ने पार्थ चटर्जी को गिरफ्तार किया था। उसी दौरान उनकी करीबी सहयोगी अर्पिता मुखर्जी के आवास से करीब 20 करोड़ रुपये नकद बरामद हुए थे। इस बरामदगी ने पूरे देश को चौंका दिया था और घोटाले की गंभीरता उजागर हुई थी। बाद में अदालत ने अर्पिता मुखर्जी को जमानत दे दी, जबकि पार्थ चटर्जी को भी सितंबर में कलकत्ता हाई कोर्ट से राहत मिली। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के चलते उनकी रिहाई में देरी हुई और अंततः नवंबर में उन्हें न्यायिक हिरासत से बाहर आने की अनुमति मिली। ईडी की इस ताजा कार्रवाई ने चुनावी माहौल में सियासी तापमान बढ़ा दिया है। विपक्ष जहां इसे भ्रष्टाचार के खिलाफ बड़ी कार्रवाई बता रहा है, वहीं सत्तारूढ़ दल इसे चुनाव से पहले की राजनीतिक साजिश करार दे रहा है। जांच एजेंसियों का कहना है कि शिक्षक भर्ती घोटाले में अभी और भी बड़े खुलासे हो सकते हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में यह मामला बंगाल की राजनीति में और अधिक गरमाने के संकेत दे रहा है।

  • भव्यता के साथ मनाया गया 54वां मुनेश्वरा जात्रा महोत्सव

    भारतार्थ खबर, बेंगलूरु संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) बेंगलूरु। मुनेश्वरा ब्लॉक स्थित श्री मुनेश्वरा स्वामी देवस्थान में श्री जडे मुनेश्वरा स्वामी देवस्थान ट्रस्ट के तत्वावधान में 54वें जात्रा महोत्सव का आयोजन अत्यंत श्रद्धा, भक्ति और उत्साह के साथ किया गया। इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लेकर भगवान मुनेश्वर स्वामी के दर्शन कर पुण्य लाभ अर्जित किया। महोत्सव के दौरान मंदिर परिसर भक्तिमय माहौल से सराबोर रहा। विधिवत पूजा-अर्चना, विशेष अनुष्ठान एवं धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन किया गया, जिसमें दूर-दूर से आए श्रद्धालुओं ने बढ़-चढ़कर भाग लिया। मंदिर को आकर्षक रूप से सजाया गया था, जिससे पूरे क्षेत्र में उत्सव का वातावरण देखने को मिला। कार्यक्रम में विशेष अतिथि के रूप में उपस्थित महेंद्र मुणोत ने भगवान मुनेश्वर स्वामी के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किया। उन्होंने अन्नदान कार्यक्रम में भी सक्रिय भागीदारी निभाते हुए श्रद्धालुओं की सेवा की। इस दौरान उन्होंने ट्रस्ट के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे धार्मिक आयोजन समाज में आस्था, एकता और सेवा भाव को मजबूत करते हैं। मंदिर के प्रमुख पुजारी गोविंदराज एवं भाग्यामा ने परंपरानुसार महेंद्र मुणोत का सम्मान कर आभार व्यक्त किया। अन्नदान कार्यक्रम में सैकड़ों श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरित किया गया, जिससे सेवा और समर्पण की भावना स्पष्ट रूप से परिलक्षित हुई। पूरे आयोजन के सफल संचालन में ट्रस्ट के सदस्यों एवं स्थानीय श्रद्धालुओं का विशेष योगदान रहा। महोत्सव ने न केवल धार्मिक आस्था को प्रगाढ़ किया, बल्कि सामाजिक समरसता और सेवा की भावना को भी सुदृढ़ किया।

  • ‘इंडियन स्टेट’ बयान पर घिरे राहुल, हाईकोर्ट में फैसला सुरक्षित

    भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) प्रयागराज। कांग्रेस नेता राहुल गांधी एक बार फिर अपने बयान को लेकर कानूनी और राजनीतिक विवादों में घिर गए हैं। ‘इंडियन स्टेट’ को लेकर दिए गए उनके एक भाषण ने अब कानूनी मोड़ ले लिया है और मामला इलाहाबाद उच्च न्यायालय पहुंच चुका है, जहां सुनवाई पूरी होने के बाद अदालत ने फैसला सुरक्षित रख लिया है। क्या है पूरा मामला विवाद की शुरुआत पिछले वर्ष दिल्ली में कांग्रेस मुख्यालय ‘इंदिरा भवन’ के उद्घाटन समारोह से हुई। अपने संबोधन में राहुल गांधी ने कहा था कि उनकी लड़ाई केवल बीजेपी और आरएसएस से नहीं, बल्कि ‘इंडियन स्टेट’ से भी है। उनके इस बयान को लेकर राजनीतिक हलकों में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली और इसे लेकर देशभर में बहस छिड़ गई। कोर्ट तक कैसे पहुंचा विवाद राहुल गांधी के इस बयान को राष्ट्रविरोधी बताते हुए सामाजिक कार्यकर्ता सिमरन गुप्ता ने उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग की। सबसे पहले यह मामला संभल की निचली अदालत में पहुंचा, जहां 7 नवंबर को याचिका को कमजोर आधार बताते हुए खारिज कर दिया गया। इसके बाद याचिकाकर्ता ने निचली अदालत के फैसले को इलाहाबाद उच्च न्यायालय में चुनौती दी, जिसके बाद यह मामला अब उच्च न्यायालय के समक्ष विचाराधीन है। अदालत में तीखी बहस जस्टिस विक्रम डी. चौहान की पीठ के समक्ष सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि राहुल गांधी का बयान केवल राजनीतिक आलोचना नहीं, बल्कि देश की संप्रभुता को चुनौती देने वाला है, जिससे जनभावनाएं आहत हुई हैं। वहीं, राहुल गांधी की ओर से पेश वकीलों ने इन आरोपों को पूरी तरह खारिज करते हुए इसे राजनीतिक दुर्भावना से प्रेरित बताया। उन्होंने कहा कि बयान को संदर्भ से काटकर पेश किया जा रहा है और यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में आता है। कानूनी पेच और अहम सवाल मामले में सबसे बड़ा सवाल क्षेत्राधिकार (जूरिस्डिक्शन) का है। क्या संभल की अदालत को दिल्ली में दिए गए बयान पर एफआईआर दर्ज करने का आदेश देने का अधिकार है? साथ ही, क्या प्रथम दृष्टया कोई संज्ञेय अपराध बनता है—यह भी अदालत को तय करना है। इन कानूनी बिंदुओं पर दोनों पक्षों के बीच लंबी बहस हुई, जिसके बाद अदालत ने फैसला सुरक्षित रख लिया। यूपी सरकार का रुख उत्तर प्रदेश सरकार ने इस मामले में संतुलित रुख अपनाया है। सरकार ने सीधे तौर पर राहुल गांधी का बचाव नहीं किया, लेकिन याचिका में तकनीकी कमियों की ओर इशारा करते हुए कहा कि मजिस्ट्रेट को स्वतंत्र रूप से यह तय करने दिया जाना चाहिए कि मामला बनता है या नहीं। अन्य मामलों में भी घिरे राहुल गौरतलब है कि राहुल गांधी के खिलाफ इलाहाबाद उच्च न्यायालय में अन्य मामले भी लंबित हैं, जिनमें नागरिकता और सेना पर टिप्पणी से जुड़े विवाद शामिल हैं। इन मामलों में भी अदालत के फैसले का इंतजार किया जा रहा है। क्या हो सकता है आगे यदि हाईकोर्ट याचिका स्वीकार करता है, तो राहुल गांधी के खिलाफ एफआईआर दर्ज होने का रास्ता साफ हो सकता है और जांच शुरू हो सकती है। वहीं, याचिका खारिज होने की स्थिति में उन्हें बड़ी कानूनी राहत मिलेगी। अब सबकी निगाहें अदालत के अंतिम फैसले पर टिकी हैं, जो यह तय करेगा कि यह मामला महज राजनीतिक बयानबाजी है या कानूनी कार्रवाई के योग्य अपराध।

  • सीमा के 143 गांवों का कायाकल्प, 700 करोड़ की योजना

    भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) किशनगंज (बिहार)। भारत-नेपाल सीमा से सटे बिहार के सुदूरवर्ती गांवों की तस्वीर अब बदलने वाली है। केंद्र सरकार की महत्त्वाकांक्षी वाइब्रेंट विलेज योजना (वीवीपी) के तहत पहले चरण में 143 गांवों के समग्र विकास की विस्तृत रूपरेखा तैयार कर ली गई है। इन गांवों के विकास पर करीब 700 करोड़ रुपये से अधिक खर्च होने का अनुमान है। इस पहल का उद्देश्य सीमावर्ती क्षेत्रों में पलायन रोकना, आधारभूत सुविधाओं को मजबूत करना और ग्रामीण जीवन को सशक्त बनाना है। योजना के तहत किशनगंज जिले के 22 गांवों के लिए लगभग 112 करोड़ रुपये की परियोजनाओं का विस्तृत प्रोजेक्ट रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार कर सरकार को भेजा गया है। प्रति गांव औसतन पांच करोड़ रुपये खर्च करने की योजना है। प्रशासनिक स्तर पर तैयारियां तेज कर दी गई हैं और स्वीकृति मिलते ही कार्य शुरू होने की उम्मीद है। जिलावार चयनित गांव सीमावर्ती जिलों में चयनित गांवों की संख्या इस प्रकार है— किशनगंज: 22, अररिया: 12, मधुबनी: 36, सीतामढ़ी: 9, बेतिया: 31, मोतिहारी: 12 और सुपौल: 30 गृहमंत्री के दौरे के बाद बढ़ी रफ्तार फरवरी में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के सीमांचल दौरे के दौरान अररिया में सात जिलों के अधिकारियों के साथ हुई उच्चस्तरीय बैठक के बाद इस योजना को गति मिली। बैठक में सीमावर्ती गांवों में विकास कार्यों को प्राथमिकता देने के स्पष्ट निर्देश दिए गए थे। इसके बाद से संबंधित जिलों में अतिक्रमण हटाने, आधारभूत संरचना सुधारने और परियोजनाओं को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया तेज हो गई है। क्या-क्या बदलेगा गांवों में वाइब्रेंट विलेज योजना के तहत इन गांवों में व्यापक विकास कार्य किए जाएंगे। इसमें— 24 घंटे बिजली आपूर्ति एवं सौर ऊर्जा व्यवस्था।, मोबाइल नेटवर्क और इंटरनेट कनेक्टिविटी।, स्वच्छ पेयजल और स्वास्थ्य सेवाएं (वेलनेस सेंटर)।, स्मार्ट क्लासरूम और बहुउद्देशीय सामुदायिक केंद्र।, स्थानीय संस्कृति और परंपराओं को बढ़ावा।, पर्यटन सर्किट का विकास।, महिलाओं और युवाओं का सशक्तीकरण। स्वरोजगार, स्वयं सहायता समूह और सहकारी समितियों को मजबूती इसके साथ ही औषधीय पौधों की खेती को बढ़ावा देने और स्थानीय कला, संगीत एवं विरासत को मंच देने की भी योजना है। सुरक्षा और रोजगार पर विशेष फोकस योजना के तहत सीमावर्ती गांवों के निवासियों को ‘सीमा सुरक्षा बलों की आंख और कान’ के रूप में विकसित करने पर भी जोर दिया जा रहा है। बेहतर रोजगार और जीवन स्तर उपलब्ध कराकर लोगों को गांव में ही रहने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा, जिससे पलायन पर रोक लगेगी और सीमा क्षेत्र अधिक सुरक्षित बन सकेगा। प्रशासन की तैयारी जिलाधिकारी विशाल राज के अनुसार, चयनित गांवों के विकास की पूरी रूपरेखा तैयार कर ली गई है और डीपीआर सरकार को भेज दी गई है। पोर्टल पर दूसरे चरण के तहत 290 गांवों से संबंधित जानकारी भी मांगी गई है, हालांकि इस पर अभी अंतिम निर्देश आना बाकी है। वाइब्रेंट विलेज योजना सीमावर्ती बिहार के गांवों के लिए नई उम्मीद लेकर आई है। यदि योजनाएं तय समय पर धरातल पर उतरती हैं, तो यह न केवल इन क्षेत्रों के विकास का मार्ग प्रशस्त करेगी, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी नई मजबूती देगी।

  • चेहरा ही बनेगा पासपोर्ट, बेंगलूरु एयरपोर्ट पर नई पहल

    भारतार्थ खबर, बेंगलूरु संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) बेंगलूरु। हवाई यात्रा के अनुभव को पूरी तरह बदल देने वाली एक अत्याधुनिक पहल की शुरुआत केम्पेगौड़ा इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर सफल परीक्षण के साथ हो चुकी है। अब यात्रियों को पासपोर्ट या बोर्डिंग पास दिखाने की झंझट से मुक्ति मिल सकती है, क्योंकि सिर्फ चेहरे की पहचान से ही पूरी यात्रा प्रक्रिया पूरी करने का रास्ता तैयार किया जा रहा है। इस अभिनव प्रणाली का परीक्षण एयरपोर्ट संचालक बैंगलोर अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा लिमिटेड (बीआईएएल) द्वारा किया गया, जिसमें फेस रिकग्निशन तकनीक के जरिए यात्रियों को बिना किसी फिजिकल दस्तावेज के प्रवेश और बोर्डिंग की सुविधा प्रदान की गई। ट्रायल के दौरान यात्रियों की पहचान पहले से सुरक्षित डिजिटल डेटा के आधार पर की गई और एयरपोर्ट के विभिन्न चरणों पर केवल फेस स्कैन से सत्यापन किया गया। इस महत्वाकांक्षी परियोजना में देश की प्रमुख एयरलाइन इंडिगो, डिजी यात्रा फाउंडेशन और अंतरराष्ट्रीय संस्था इंटरनेशनल एयर ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन (आईएटीए) का सहयोग रहा। यह पहल आईएटीए के ‘एक आईडी’’ कार्यक्रम के तहत विकसित की जा रही है, जिसका उद्देश्य वैश्विक स्तर पर कॉन्टैक्टलेस और सहज यात्रा अनुभव को बढ़ावा देना है। कैसे काम करती है तकनीक इस नई प्रणाली में यात्री अपनी पहचान संबंधी जानकारी पहले से डिजिटल रूप में पंजीकृत कराते हैं। एयरपोर्ट पहुंचने पर कैमरों के माध्यम से फेस स्कैन किया जाता है, जो पहले से उपलब्ध डेटा से मिलान कर पहचान की पुष्टि करता है। इसके बाद यात्री बिना पासपोर्ट या बोर्डिंग पास दिखाए सीधे सुरक्षा जांच और बोर्डिंग तक पहुंच सकता है। इससे लंबी कतारों और दस्तावेज जांच की प्रक्रिया में लगने वाला समय काफी हद तक कम हो जाएगा। सुरक्षा और गोपनीयता पर फोकस नई तकनीक को लेकर डेटा सुरक्षा और गोपनीयता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है। यात्रियों का डेटा केवल उनकी सहमति से ही उपयोग किया जाता है और इसे सीमित समय तक सुरक्षित रखा जाता है। अधिकारियों के अनुसार, यह सिस्टम अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप सुरक्षित और विश्वसनीय बनाया गया है, जिससे यात्रियों का भरोसा कायम रखा जा सके। भविष्य की यात्रा का संकेत विशेषज्ञों का मानना है कि फेस रिकग्निशन आधारित यह प्रणाली आने वाले वर्षों में अंतरराष्ट्रीय यात्रा का नया मानक बन सकती है। भारत इस क्षेत्र में तेजी से कदम बढ़ा रहा है और जल्द ही देश के अन्य प्रमुख हवाई अड्डों पर भी इस सुविधा के विस्तार की संभावना जताई जा रही है। यदि यह पहल व्यापक स्तर पर लागू होती है, तो हवाई यात्रा न केवल तेज और सुविधाजनक होगी, बल्कि यात्रियों के लिए एक पूरी तरह डिजिटल और निर्बाध अनुभव का मार्ग भी प्रशस्त करेगी।

  • दिल्ली की नई ईवी नीति—रोड टैक्स माफ, इलेक्ट्रिक वाहनों को बड़ा बढ़ावा

    भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) नई दिल्ली। राजधानी में बढ़ते प्रदूषण पर लगाम लगाने और स्वच्छ परिवहन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से दिल्ली सरकार ने नई इलेक्ट्रिक व्हीकल (ईवी) पॉलिसी का ड्राफ्ट जारी किया है। इस प्रस्तावित नीति में इलेक्ट्रिक वाहनों पर रोड टैक्स और रजिस्ट्रेशन फीस को पूरी तरह माफ करने का प्रावधान किया गया है, जिससे आम लोगों को ईवी अपनाने के लिए बड़ा प्रोत्साहन मिलेगा। यह पॉलिसी भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 से प्रेरित है, जिसमें स्वच्छ हवा और प्रदूषण मुक्त वातावरण को जीवन के अधिकार का हिस्सा माना गया है। इसके साथ ही, एमसी मेहता बनाम भारत संघ के ऐतिहासिक फैसले, पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 और मोटर वाहन अधिनियम, 1988 जैसे कानूनी आधारों को भी इसमें शामिल किया गया है। दिल्ली में सर्दियों के दौरान प्रदूषण की गंभीर स्थिति को देखते हुए यह नीति अहम मानी जा रही है। वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, राजधानी में करीब 23 प्रतिशत प्रदूषण के लिए वाहन जिम्मेदार हैं। खासकर दोपहिया वाहन, जो कुल वाहनों का लगभग 67 प्रतिशत हैं, प्रदूषण में बड़ी भूमिका निभाते हैं। ऐसे में इन्हें तेजी से इलेक्ट्रिक में बदलना इस नीति का प्रमुख लक्ष्य है। नीति के तहत इलेक्ट्रिक वाहनों की खरीद पर सरकार सीधे बैंक खाते में सब्सिडी (डीबीटी) देगी। दोपहिया ईवी पर पहले साल अधिकतम 30 हजार रुपये, दूसरे साल 20 हजार और तीसरे साल 10 हजार रुपये तक की सहायता मिलेगी। वहीं, ई-ऑटो के लिए पहले साल 50 हजार, दूसरे साल 40 हजार और तीसरे साल 30 हजार रुपये की सब्सिडी तय की गई है। छोटे इलेक्ट्रिक ट्रक (एन1) के लिए भी पहले साल 1 लाख रुपये तक का लाभ प्रस्तावित है। पुराने प्रदूषणकारी वाहनों को हटाने के लिए स्क्रैपिंग इंसेंटिव भी दिया जाएगा। इसके तहत पुराने दोपहिया पर 10 हजार, तीन पहिया पर 25 हजार, कार पर 1 लाख और छोटे ट्रक पर 50 हजार रुपये तक का प्रोत्साहन मिलेगा। नीति में यह भी स्पष्ट किया गया है कि 30 लाख रुपये तक की इलेक्ट्रिक कारों को रोड टैक्स और रजिस्ट्रेशन फीस में पूरी छूट दी जाएगी, जबकि स्ट्रॉन्ग हाइब्रिड वाहनों को 50 प्रतिशत छूट मिलेगी। 30 लाख रुपये से अधिक कीमत वाली कारों को इस छूट के दायरे से बाहर रखा गया है। चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत बनाने के लिए दिल्ली ट्रांसको लिमिटेड को नोडल एजेंसी बनाया गया है, जो चार्जिंग स्टेशनों की योजना, लोकेशन और बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करेगी। साथ ही, एक डिजिटल पोर्टल और सिंगल विंडो सिस्टम विकसित किया जाएगा, जिससे चार्जिंग स्टेशन स्थापित करना आसान होगा। वाहन निर्माताओं को हर डीलरशिप पर कम से कम एक पब्लिक चार्जिंग स्टेशन लगाना अनिवार्य होगा। इसके अलावा, बैटरी कलेक्शन सेंटर और सुरक्षित निपटान के लिए नियम बनाए जाएंगे। बैटरी ट्रैकिंग सिस्टम भी विकसित किया जाएगा, ताकि रीसाइक्लिंग और दोबारा उपयोग सुरक्षित तरीके से हो सके। नीति में भविष्य के लिए सख्त लक्ष्य भी तय किए गए हैं। 1 जनवरी 2027 से केवल इलेक्ट्रिक तीन पहिया वाहनों का ही पंजीकरण होगा, जबकि 1 अप्रैल 2028 से केवल इलेक्ट्रिक दोपहिया ही रजिस्टर किए जाएंगे। स्कूल बसों में भी ईवी का हिस्सा 2030 तक 30 प्रतिशत तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है। सरकारी विभागों में नई खरीदी जाने वाली सभी गाड़ियां इलेक्ट्रिक होंगी और दिल्ली परिवहन निगम की नई बसें भी ईवी होंगी। इसके साथ ही, 2026 से डिलीवरी और फ्लीट कंपनियों को पेट्रोल-डीजल वाहनों को शामिल करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। पूरी प्रक्रिया को डिजिटल और पेपरलेस बनाया जाएगा और इस नीति के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए परिवहन विभाग के तहत एक विशेष ईवी सेल का गठन किया जाएगा। विशेषज्ञों के अनुसार, यह नीति न केवल दिल्ली को प्रदूषण मुक्त बनाने की दिशा में बड़ा कदम है, बल्कि देश में इलेक्ट्रिक मोबिलिटी को नई गति देने का मार्ग भी प्रशस्त होगा।

  • बंगाल में बदली हवा? रैलियों ने बढ़ाया सियासी ताप

    भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) कोलकाता। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में सियासी समीकरणों को लेकर बहस तेज हो गई है। अब तक सामने आए अधिकांश ओपिनियन पोल ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की वापसी का संकेत देते रहे हैं, लेकिन हालिया चुनावी रैलियों के बाद माहौल में बदलाव की चर्चा जोर पकड़ने लगी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नरेंद्र मोदी की जनसभाओं ने चुनावी हवा को नया मोड़ दिया है। प्रधानमंत्री मोदी ने हल्दिया, बीरभूम और आसनसोल में बड़ी रैलियां कर चुनावी माहौल को गरमा दिया है। इन रैलियों में उमड़ी भीड़ और जनता का उत्साह यह संकेत दे रहा है कि भाजपा राज्य में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश में पूरी ताकत झोंक रही है। शनिवार को पूर्वी बर्धमान, जंगीपुर और दक्षिण दिनाजपुर में प्रस्तावित रैलियों को भी इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। राजनीतिक जानकारों के अनुसार, इन जनसभाओं में दिखा जनसैलाब और जनता की सक्रिय भागीदारी भाजपा के लिए सकारात्मक संकेत माने जा रहे हैं। आमतौर पर चुनावी रैलियों में समर्थकों की भीड़ होती है, लेकिन यहां लोगों की प्रतिक्रियाओं और जुड़ाव ने अलग ही तस्वीर पेश की है। विशेषकर युवाओं और महिलाओं की मौजूदगी ने भाजपा के लिए उम्मीदें बढ़ाई हैं। विश्लेषकों का यह भी कहना है कि राज्य की जनता लंबे समय से रोजगार, विकास और बेहतर प्रशासन जैसे मुद्दों पर ठोस बदलाव चाहती है। ऐसे में जब प्रधानमंत्री मोदी अपने भाषणों में विकास, नौकरी और महिला सशक्तिकरण की बात करते हैं, तो इसका असर जनमानस पर साफ दिखाई देता है। इसी क्रम में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह द्वारा जारी भाजपा के घोषणापत्र ने भी चुनावी बहस को नया आयाम दिया है। घोषणापत्र में महिलाओं को हर महीने आर्थिक सहायता देने और युवाओं के लिए वित्तीय समर्थन जैसी योजनाओं का वादा किया गया है, जिसे लेकर मतदाताओं के बीच चर्चा तेज है। हालांकि, यह भी सच है कि पश्चिम बंगाल की सामाजिक और धार्मिक संरचना चुनावी परिणामों में अहम भूमिका निभाती है। मुस्लिम आबादी को लेकर भाजपा की संभावनाओं पर सवाल उठाए जाते रहे हैं, लेकिन पार्टी नेतृत्व अन्य राज्यों के उदाहरण देकर अपनी रणनीति पर भरोसा जता रहा है। वहीं, तृणमूल कांग्रेस अपने संगठन और जमीनी पकड़ के दम पर चुनावी मैदान में मजबूती से डटी हुई है। ममता बनर्जी का व्यक्तिगत प्रभाव और कल्याणकारी योजनाएं भी पार्टी के लिए बड़ी ताकत मानी जाती हैं। कुल मिलाकर, पश्चिम बंगाल का चुनाव इस बार बेहद दिलचस्प मोड़ पर पहुंच गया है। एक ओर ममता बनर्जी की स्थापित पकड़ है, तो दूसरी ओर प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह की आक्रामक रणनीति। ऐसे में अंतिम परिणाम क्या होगा, यह तो मतगणना के दिन ही स्पष्ट होगा, लेकिन फिलहाल इतना जरूर है कि बंगाल की सियासत में मुकाबला पहले से कहीं ज्यादा कड़ा नजर आ रहा है।

  • घर-घर पहुंचेगी पाइप गैस, 14 जिलों को बड़ी राहत

    भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) जबलपुर। मध्यप्रदेश के जबलपुर समेत 14 जिलों के लाखों घरों को अब रसोई गैस के लिए सिलेंडर पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। गेल (इंडिया) लिमिटेड द्वारा नागपुर से जबलपुर तक पाइपलाइन का कार्य लगभग पूरा कर लिया गया है और इसकी सफल टेस्टिंग भी हो चुकी है। अब शहर के भीतर पाइपलाइन बिछाने का कार्य शेष है, जिसके बाद घर-घर पाइप नेचुरल गैस (पीएनजी) की सप्लाई शुरू हो जाएगी। जानकारी के अनुसार, इस महत्वाकांक्षी परियोजना के तहत करीब 14 लाख घरों को सीधे गैस कनेक्शन मिलेगा। हालांकि शहरी क्षेत्रों में पाइपलाइन बिछाने में अभी करीब एक वर्ष का समय लग सकता है। यह कार्य मेघा इंजीनियरिंग एंड इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड को सौंपा गया है। सिलेंडर की झंझट से मिलेगी मुक्ति पीएनजी सुविधा शुरू होने के बाद उपभोक्ताओं को गैस सिलेंडर की बुकिंग, डिलीवरी और लंबी कतारों से राहत मिलेगी। गैस की आपूर्ति सीधे पाइपलाइन के माध्यम से होगी, जिससे रसोई का काम और भी आसान हो जाएगा। वर्तमान में पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव के कारण एलपीजी सप्लाई प्रभावित होने से उपभोक्ताओं को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में पीएनजी एक भरोसेमंद विकल्प बनकर उभर रही है। राष्ट्रीय गैस ग्रिड से जुड़ा प्रोजेक्ट यह परियोजना राष्ट्रीय गैस ग्रिड और पीएम गति शक्ति मास्टर प्लान के तहत विकसित की जा रही है। तीन चरणों में तैयार इस नेटवर्क में मुंबई-नागपुर (698 किमी), नागपुर-झारसुगुड़ा (692 किमी) और नागपुर-जबलपुर (317 किमी) शामिल हैं। कुल मिलाकर इस परियोजना पर लगभग 7,844 करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं, जबकि नागपुर-जबलपुर खंड पर करीब 1,100 करोड़ रुपये की लागत आई है। कोसमघाट में तैयार गैस प्लांट जबलपुर के पास कोसमघाट में गैस प्लांट बनकर तैयार हो चुका है, जिससे सप्लाई को मजबूती मिलेगी। फिलहाल इस पाइपलाइन के जरिए नागपुर स्थित जेएसडब्ल्यू समूह के प्लांट को गैस आपूर्ति शुरू हो चुकी है। सस्ती और पर्यावरण के अनुकूल पीएनजी के उपयोग से गैस की कीमतों में लगभग 25 प्रतिशत तक कमी आने का दावा किया जा रहा है। साथ ही यह पर्यावरण के लिहाज से भी बेहतर विकल्प है, क्योंकि इससे प्रदूषण में कमी आएगी। उपभोक्ताओं को बिजली बिल की तरह ही गैस का मासिक बिल मिलेगा, जो खपत के आधार पर तय होगा। 14 जिलों को मिलेगा लाभ इस परियोजना का लाभ जबलपुर के अलावा सिवनी, छिंदवाड़ा सहित कुल 14 जिलों के उपभोक्ताओं को मिलेगा। शहर में करीब 45 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन बिछाई जानी है। इसके साथ ही सीएनजी पंप और औद्योगिक इकाइयों को भी गैस आपूर्ति सुनिश्चित की जाएगी। यह परियोजना न केवल उपभोक्ताओं को सस्ती और सुविधाजनक गैस उपलब्ध कराएगी, बल्कि ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता और स्वच्छ ईंधन की दिशा में भी एक बड़ा कदम साबित होगी।

  • बंगाल में कांग्रेस की पूरी ताकत, पर गांधी परिवार दूरी पर क्यों?

    भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) कोलकाता। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के राजनीतिक परिदृश्य में इस बार एक दिलचस्प स्थिति उभरकर सामने आई है। जहां एक ओर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने राज्य की सभी 294 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारकर पूरी ताकत झोंक दी है, वहीं दूसरी ओर पार्टी के सबसे बड़े चेहरे—राहुल गांधी और प्रियंका गांधी—के चुनाव प्रचार में सक्रिय भूमिका को लेकर अब भी संशय बना हुआ है। कांग्रेस इस बार पश्चिम बंगाल में अकेले चुनावी मैदान में है। इससे पहले 2021 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने लेफ्ट दलों के साथ गठबंधन कर केवल 90 सीटों पर चुनाव लड़ा था, जबकि 2024 के लोकसभा चुनाव में भी उसने सीमित सीटों पर ही उम्मीदवार उतारे थे। लेकिन इस बार रणनीति बदली हुई है—हर सीट पर उम्मीदवार, पर प्रचार में सीमित संसाधनों का इस्तेमाल। सीमित सीटों पर फोकस की रणनीति पार्टी सूत्रों के अनुसार कांग्रेस का ध्यान उन क्षेत्रों पर केंद्रित है, जहां उसकी स्थिति अपेक्षाकृत मजबूत मानी जाती है। खासकर मुर्शिदाबाद और मालदा जैसे जिले, जहां पार्टी का पारंपरिक जनाधार रहा है। बहरामपुर से अधीर रंजन चौधरी और मालतीपुर से मौसम नूर जैसे नेताओं पर पार्टी ने भरोसा जताया है। इसी रणनीति के तहत कांग्रेस अपने संसाधनों और प्रचार को सीमित लेकिन प्रभावी बनाए रखने की कोशिश कर रही है। यही कारण है कि शीर्ष नेतृत्व की मौजूदगी को लेकर स्पष्टता नहीं है। ‘अघोषित समझ’ की चर्चा राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी जोरों पर है कि कांग्रेस और राज्य की सत्तारूढ़ अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस के बीच एक तरह की ‘अघोषित समझ’ हो सकती है। माना जा रहा है कि ममता बनर्जी नहीं चाहतीं कि राहुल गांधी के सक्रिय प्रचार से विपक्षी वोटों, खासकर मुस्लिम मतदाताओं में विभाजन हो, जिसका लाभ भारतीय जनता पार्टी उठा सकती है। सूत्रों का यह भी कहना है कि कांग्रेस नेतृत्व इस आशंका को समझता है और उसी के अनुरूप अपनी रणनीति बना रहा है। हालांकि, औपचारिकता के तौर पर राहुल और प्रियंका गांधी सीमित सीटों पर प्रचार कर सकते हैं। पिछला रिकॉर्ड भी देता है संकेत पिछले चुनावों का रिकॉर्ड भी इसी रणनीति की पुष्टि करता है। 2021 के विधानसभा चुनाव में राहुल गांधी ने केवल एक दिन प्रचार किया था और दो सीटों पर ही सभाएं की थीं। बाद में कोरोना महामारी का हवाला देकर उन्होंने प्रचार से दूरी बना ली थी। वहीं 2024 के लोकसभा चुनाव में भी राहुल गांधी ने राज्य में केवल एक दिन प्रचार किया, जबकि देशभर में उन्होंने 100 से अधिक सभाएं की थीं। उस दौरान भी उनका फोकस मुर्शिदाबाद और मालदा जैसे क्षेत्रों तक ही सीमित रहा। रणनीति या मजबूरी? विश्लेषकों का मानना है कि यह कांग्रेस की एक सोची-समझी रणनीति हो सकती है, जिसमें वह सीधे टकराव से बचते हुए अपने पारंपरिक गढ़ों को मजबूत करने पर ध्यान दे रही है। वहीं कुछ इसे संसाधनों की कमी और जमीनी संगठन की कमजोरी का संकेत भी मानते हैं। कुल मिलाकर, पश्चिम बंगाल में कांग्रेस की ‘पूरी भागीदारी, लेकिन सीमित प्रचार’ की रणनीति ने चुनावी समीकरण को और दिलचस्प बना दिया है। अब यह देखना अहम होगा कि बिना गांधी परिवार की सक्रिय मौजूदगी के कांग्रेस कितनी राजनीतिक जमीन हासिल कर पाती है।

  • टीएमसी में ‘पुराने बनाम नए’ की जंग तेज, शुभेंदु का बड़ा दावा

    भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) कोलकाता। पश्चिम बंगाल की राजनीति में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के भीतर कथित अंदरूनी खींचतान को लेकर बयानबाज़ी तेज हो गई है। विधानसभा में विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी ने शुक्रवार को दावा किया कि पार्टी में अब पुराने और वरिष्ठ नेताओं को दरकिनार किया जा रहा है, जबकि नए चेहरों को तरजीह दी जा रही है। अधिकारी ने आरोप लगाया कि जिन नेताओं ने पार्टी के शुरुआती दौर में संघर्ष किया, आज वही उपेक्षा और अपमान का सामना कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि 2000 के दशक की शुरुआत में जब टीएमसी अपना जनाधार मजबूत कर रही थी, तब कई कार्यकर्ताओं और नेताओं ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के खिलाफ आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई थी। “आज उन्हीं लोगों को उनकी ही पार्टी में सम्मान नहीं मिल रहा,” उन्होंने कहा। राजनीतिक संकेतों के बीच ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली पार्टी में संगठनात्मक बदलावों की चर्चा भी तेज है। पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी की बढ़ती भूमिका को लेकर विपक्ष लगातार सवाल उठा रहा है। अधिकारी का दावा है कि अब अहम बैठकों और निर्णयों में अभिषेक बनर्जी को प्राथमिकता दी जा रही है, जिससे पुराने नेताओं में असंतोष बढ़ रहा है। इसी क्रम में शुभेंदु अधिकारी ने नाराज वरिष्ठ नेताओं को भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने का खुला न्योता भी दिया। उन्होंने पूर्व बर्धवान जिले के मंगलकोट से जुड़े वरिष्ठ नेता विकास नारायण चौधरी को भाजपा की सदस्यता दिलाते हुए कहा कि “सम्मानित और संघर्षशील नेताओं के लिए भाजपा ही सही मंच है।” विशेषज्ञों का मानना है कि यह बयान केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे दल-बदल की रणनीति भी साफ झलकती है। दरअसल, विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा टीएमसी के असंतुष्ट नेताओं को अपने पाले में लाकर संगठन को मजबूत करने की कोशिश कर रही है। हालांकि, टीएमसी की ओर से इन आरोपों पर आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। पार्टी के भीतर बदलावों को लेकर समर्थक इसे “स्वाभाविक संगठनात्मक विस्तार” बता रहे हैं, जबकि विपक्ष इसे “नेतृत्व में केंद्रीकरण” करार दे रहा है। आगामी चुनावों के मद्देनज़र यह मुद्दा पश्चिम बंगाल की राजनीति में और गरमाने की संभावना है, जहां ‘पुराने बनाम नए’ की बहस सियासी समीकरणों को प्रभावित कर सकती है।

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