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बंगाल में कांग्रेस की पूरी ताकत, पर गांधी परिवार दूरी पर क्यों?

  • Writer: धन्ना राम चौधरी
    धन्ना राम चौधरी
  • 1 day ago
  • 2 min read

भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com)

कोलकाता। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के राजनीतिक परिदृश्य में इस बार एक दिलचस्प स्थिति उभरकर सामने आई है। जहां एक ओर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने राज्य की सभी 294 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारकर पूरी ताकत झोंक दी है, वहीं दूसरी ओर पार्टी के सबसे बड़े चेहरे—राहुल गांधी और प्रियंका गांधी—के चुनाव प्रचार में सक्रिय भूमिका को लेकर अब भी संशय बना हुआ है।

कांग्रेस इस बार पश्चिम बंगाल में अकेले चुनावी मैदान में है। इससे पहले 2021 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने लेफ्ट दलों के साथ गठबंधन कर केवल 90 सीटों पर चुनाव लड़ा था, जबकि 2024 के लोकसभा चुनाव में भी उसने सीमित सीटों पर ही उम्मीदवार उतारे थे। लेकिन इस बार रणनीति बदली हुई है—हर सीट पर उम्मीदवार, पर प्रचार में सीमित संसाधनों का इस्तेमाल।


सीमित सीटों पर फोकस की रणनीति

पार्टी सूत्रों के अनुसार कांग्रेस का ध्यान उन क्षेत्रों पर केंद्रित है, जहां उसकी स्थिति अपेक्षाकृत मजबूत मानी जाती है। खासकर मुर्शिदाबाद और मालदा जैसे जिले, जहां पार्टी का पारंपरिक जनाधार रहा है। बहरामपुर से अधीर रंजन चौधरी और मालतीपुर से मौसम नूर जैसे नेताओं पर पार्टी ने भरोसा जताया है। इसी रणनीति के तहत कांग्रेस अपने संसाधनों और प्रचार को सीमित लेकिन प्रभावी बनाए रखने की कोशिश कर रही है। यही कारण है कि शीर्ष नेतृत्व की मौजूदगी को लेकर स्पष्टता नहीं है।


‘अघोषित समझ’ की चर्चा

राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी जोरों पर है कि कांग्रेस और राज्य की सत्तारूढ़ अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस के बीच एक तरह की ‘अघोषित समझ’ हो सकती है। माना जा रहा है कि ममता बनर्जी नहीं चाहतीं कि राहुल गांधी के सक्रिय प्रचार से विपक्षी वोटों, खासकर मुस्लिम मतदाताओं में विभाजन हो, जिसका लाभ भारतीय जनता पार्टी उठा सकती है। सूत्रों का यह भी कहना है कि कांग्रेस नेतृत्व इस आशंका को समझता है और उसी के अनुरूप अपनी रणनीति बना रहा है। हालांकि, औपचारिकता के तौर पर राहुल और प्रियंका गांधी सीमित सीटों पर प्रचार कर सकते हैं।


पिछला रिकॉर्ड भी देता है संकेत

पिछले चुनावों का रिकॉर्ड भी इसी रणनीति की पुष्टि करता है। 2021 के विधानसभा चुनाव में राहुल गांधी ने केवल एक दिन प्रचार किया था और दो सीटों पर ही सभाएं की थीं। बाद में कोरोना महामारी का हवाला देकर उन्होंने प्रचार से दूरी बना ली थी।

वहीं 2024 के लोकसभा चुनाव में भी राहुल गांधी ने राज्य में केवल एक दिन प्रचार किया, जबकि देशभर में उन्होंने 100 से अधिक सभाएं की थीं। उस दौरान भी उनका फोकस मुर्शिदाबाद और मालदा जैसे क्षेत्रों तक ही सीमित रहा।


रणनीति या मजबूरी?

विश्लेषकों का मानना है कि यह कांग्रेस की एक सोची-समझी रणनीति हो सकती है, जिसमें वह सीधे टकराव से बचते हुए अपने पारंपरिक गढ़ों को मजबूत करने पर ध्यान दे रही है। वहीं कुछ इसे संसाधनों की कमी और जमीनी संगठन की कमजोरी का संकेत भी मानते हैं। कुल मिलाकर, पश्चिम बंगाल में कांग्रेस की ‘पूरी भागीदारी, लेकिन सीमित प्रचार’ की रणनीति ने चुनावी समीकरण को और दिलचस्प बना दिया है। अब यह देखना अहम होगा कि बिना गांधी परिवार की सक्रिय मौजूदगी के कांग्रेस कितनी राजनीतिक जमीन हासिल कर पाती है।

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