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टीएमसी के गढ़ में ओवैसी की सीधी चुनौती

  • Writer: धन्ना राम चौधरी
    धन्ना राम चौधरी
  • 1 day ago
  • 3 min read

भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com)

कोलकाता। पश्चिम बंगाल की सियासत में इस बार एक दिलचस्प मोड़ देखने को मिल रहा है। असदुद्दीन ओवैसी ने पारंपरिक राजनीतिक समीकरणों से हटकर अपनी रणनीति तैयार की है। ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) ने न तो भाजपा, न कांग्रेस और न ही वाम दलों को सीधे निशाने पर लिया है, बल्कि उसने सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के मजबूत गढ़ों में ही चुनावी ताल ठोकी है।

हाल ही में एआईएमआईएम ने हुमायूं कबीर की जन उन्नयन पार्टी के साथ अपना गठबंधन तोड़ते हुए अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया है। पार्टी राज्य की 12 विधानसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार उतार रही है, जिनमें अधिकांश सीटें मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तर दिनाजपुर जैसे मुस्लिम बहुल जिलों में स्थित हैं।


टीएमसी पर सीधा फोकस क्यों?

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार एआईएमआईएम का यह कदम एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। 2021 के विधानसभा चुनाव में इन क्षेत्रों में टीएमसी ने भारी बहुमत से जीत दर्ज की थी। कई सीटों पर जीत का अंतर 50 हजार से लेकर एक लाख वोट तक रहा। ऐसे में ओवैसी की पार्टी ने सीधे उसी मजबूत किले को चुनौती देने का निर्णय लिया है। एआईएमआईएम पर अक्सर भाजपा की ‘बी-टीम’ होने के आरोप लगते रहे हैं। ऐसे आरोपों को खारिज करने के लिए पार्टी अब उन क्षेत्रों में उतर रही है जहां मुकाबला सीधे टीएमसी से है। एआईएमआईएम के नेताओं का कहना है कि राज्य में वास्तविक विपक्ष टीएमसी ही है, जबकि कांग्रेस और वाम दलों का जनाधार लगातार कमजोर हुआ है।


सीमांचल कनेक्शन और सामाजिक समीकरण

एआईएमआईएम की नजर उन इलाकों पर है, जो बिहार के सीमांचल क्षेत्र से सटे हुए हैं। सीमांचल में पार्टी का प्रभाव पहले से मौजूद है, और इसी आधार को बंगाल में विस्तार देने की कोशिश की जा रही है। पार्टी का दावा है कि वह मुस्लिम समुदाय के साथ-साथ अन्य पिछड़े वर्गों और गरीब तबकों की आवाज बनना चाहती है। एआईएमआईएम का मानना है कि इन क्षेत्रों में सामाजिक और आर्थिक मुद्दों को लेकर असंतोष है, जिसे वह राजनीतिक समर्थन में बदल सकती है।


गठबंधन टूटने का असर

हुमायूं कबीर के साथ गठबंधन टूटने को लेकर भी चर्चा तेज है। एक विवादित वीडियो सामने आने के बाद एआईएमआईएम ने दूरी बना ली। हालांकि राजनीतिक जानकार मानते हैं कि इससे पार्टी को संगठनात्मक नुकसान हो सकता है, लेकिन ओवैसी इसे अपनी साफ-सुथरी छवि के तौर पर पेश कर रहे हैं।


खुद को मजबूत क्यों मानती है एआईएमआईएम?

बिहार के सीमांचल क्षेत्र में पिछले चुनावों में बेहतर प्रदर्शन के बाद एआईएमआईएम का आत्मविश्वास बढ़ा है। पश्चिम बंगाल में मुस्लिम आबादी 24 फीसदी से अधिक है, जो पार्टी के लिए एक महत्वपूर्ण वोट बैंक माना जाता है। ओवैसी खुद को अल्पसंख्यकों के मजबूत नेता के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं। यही कारण है कि उन्होंने उन्हीं सीटों पर दांव लगाया है, जहां उनकी सामाजिक पकड़ बनने की संभावना अधिक है।


चुनावी असर और संभावनाएं

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि एआईएमआईएम का यह कदम सीधे जीत दिलाने से ज्यादा वोटों के ध्रुवीकरण पर असर डाल सकता है। यदि पार्टी मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में प्रभावी प्रदर्शन करती है, तो इसका सीधा असर टीएमसी के वोट बैंक पर पड़ सकता है।


कब होंगे चुनाव?

इन 12 सीटों पर मतदान दो चरणों में होगा। 9 सीटों पर 23 अप्रैल 2026 को पहले चरण में और शेष 3 सीटों पर 29 अप्रैल 2026 को दूसरे चरण में वोट डाले जाएंगे। पश्चिम बंगाल की इस चुनावी जंग में ओवैसी की यह रणनीति कितना असर दिखाती है, यह तो नतीजों के बाद ही साफ होगा, लेकिन इतना तय है कि उन्होंने मुकाबले को और दिलचस्प बना दिया है।

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