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बंगाल में बीजेपी जीती तो ‘बंगाल का बेटा’ बनेगा मुख्यमंत्री: अमित शाह

  • लेखक की तस्वीर: धन्ना राम चौधरी
    धन्ना राम चौधरी
  • 10 अप्रैल
  • 2 मिनट पठन

भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com)

कोलकाता। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र राजनीतिक सरगर्मी अपने चरम पर है। इसी क्रम में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने राज्य में ताबड़तोड़ चुनावी प्रचार करते हुए बड़ा ऐलान किया है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि यदि बीजेपी को बहुमत मिलता है, तो राज्य का मुख्यमंत्री कोई बाहरी नहीं बल्कि “बंगाल का बेटा” ही होगा।


“वंशवाद नहीं, बंगाल का नेतृत्व बंगाली के हाथ”

अमित शाह ने मुख्यमंत्री चेहरे को लेकर चल रही अटकलों पर विराम लगाते हुए कहा कि बीजेपी वंशवादी राजनीति में विश्वास नहीं रखती। उनका इशारा सीधे तौर पर ममता बनर्जी और उनकी पार्टी अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की ओर था। शाह ने कहा, “हम ऐसी पार्टी नहीं हैं जहां एक परिवार के बाद दूसरा सदस्य सत्ता संभाले। बंगाल की जनता को भरोसा दिलाता हूं कि हमारा मुख्यमंत्री यहीं की मिट्टी से जुड़ा व्यक्ति होगा।”


छह महीने में लागू होगा यूसीसी

गृह मंत्री ने चुनावी मंच से बड़ा वादा करते हुए कहा कि यदि बीजेपी सत्ता में आती है, तो छह महीने के भीतर राज्य में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू की जाएगी। उन्होंने इसे संविधान सभा की सिफारिश बताते हुए कहा कि “तुष्टीकरण की राजनीति के कारण इसे दशकों तक टाला गया।” शाह ने कहा, “बंगाल में हर नागरिक के लिए एक समान कानून लागू होगा। कानून के सामने सभी बराबर होंगे, यही सच्चा न्याय है।”


टीएमसी पर तुष्टीकरण का आरोप

अमित शाह ने टीएमसी सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि राज्य में तुष्टीकरण की राजनीति चरम पर है। उन्होंने कहा कि बीजेपी किसी के खान-पान में दखल नहीं देगी, बल्कि सभी नागरिकों के लिए समान अधिकार सुनिश्चित करेगी।


हुमायूं कबीर विवाद पर सफाई

टीएमसी के निलंबित नेता हुमायूं कबीर से जुड़े कथित वीडियो विवाद पर भी शाह ने प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि “हुमायूं कबीर और बीजेपी दो अलग-अलग ध्रुव हैं। हम ऐसी किसी भी राजनीति से दूरी रखते हैं और जरूरत पड़ी तो विपक्ष में बैठना पसंद करेंगे।”


चुनावी समीकरणों में नई गर्मी

अमित शाह के इस बयान से पश्चिम बंगाल की राजनीति में नई बहस छिड़ गई है। एक ओर बीजेपी “स्थानीय चेहरे” के जरिए जनता को साधने की कोशिश कर रही है, वहीं दूसरी ओर टीएमसी इसे चुनावी रणनीति करार दे रही है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मुख्यमंत्री चेहरे को लेकर यह स्पष्टता बीजेपी के लिए लाभकारी हो सकती है, खासकर तब जब राज्य की राजनीति लंबे समय से क्षेत्रीय बनाम बाहरी नेतृत्व के मुद्दे पर केंद्रित रही है।

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