बंगाल में बदली हवा? रैलियों ने बढ़ाया सियासी ताप
- धन्ना राम चौधरी

- 11 अप्रैल
- 2 मिनट पठन

भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com)
कोलकाता। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में सियासी समीकरणों को लेकर बहस तेज हो गई है। अब तक सामने आए अधिकांश ओपिनियन पोल ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की वापसी का संकेत देते रहे हैं, लेकिन हालिया चुनावी रैलियों के बाद माहौल में बदलाव की चर्चा जोर पकड़ने लगी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नरेंद्र मोदी की जनसभाओं ने चुनावी हवा को नया मोड़ दिया है।
प्रधानमंत्री मोदी ने हल्दिया, बीरभूम और आसनसोल में बड़ी रैलियां कर चुनावी माहौल को गरमा दिया है। इन रैलियों में उमड़ी भीड़ और जनता का उत्साह यह संकेत दे रहा है कि भाजपा राज्य में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश में पूरी ताकत झोंक रही है। शनिवार को पूर्वी बर्धमान, जंगीपुर और दक्षिण दिनाजपुर में प्रस्तावित रैलियों को भी इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। राजनीतिक जानकारों के अनुसार, इन जनसभाओं में दिखा जनसैलाब और जनता की सक्रिय भागीदारी भाजपा के लिए सकारात्मक संकेत माने जा रहे हैं। आमतौर पर चुनावी रैलियों में समर्थकों की भीड़ होती है, लेकिन यहां लोगों की प्रतिक्रियाओं और जुड़ाव ने अलग ही तस्वीर पेश की है। विशेषकर युवाओं और महिलाओं की मौजूदगी ने भाजपा के लिए उम्मीदें बढ़ाई हैं। विश्लेषकों का यह भी कहना है कि राज्य की जनता लंबे समय से रोजगार, विकास और बेहतर प्रशासन जैसे मुद्दों पर ठोस बदलाव चाहती है। ऐसे में जब प्रधानमंत्री मोदी अपने भाषणों में विकास, नौकरी और महिला सशक्तिकरण की बात करते हैं, तो इसका असर जनमानस पर साफ दिखाई देता है।
इसी क्रम में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह द्वारा जारी भाजपा के घोषणापत्र ने भी चुनावी बहस को नया आयाम दिया है। घोषणापत्र में महिलाओं को हर महीने आर्थिक सहायता देने और युवाओं के लिए वित्तीय समर्थन जैसी योजनाओं का वादा किया गया है, जिसे लेकर मतदाताओं के बीच चर्चा तेज है। हालांकि, यह भी सच है कि पश्चिम बंगाल की सामाजिक और धार्मिक संरचना चुनावी परिणामों में अहम भूमिका निभाती है। मुस्लिम आबादी को लेकर भाजपा की संभावनाओं पर सवाल उठाए जाते रहे हैं, लेकिन पार्टी नेतृत्व अन्य राज्यों के उदाहरण देकर अपनी रणनीति पर भरोसा जता रहा है।
वहीं, तृणमूल कांग्रेस अपने संगठन और जमीनी पकड़ के दम पर चुनावी मैदान में मजबूती से डटी हुई है। ममता बनर्जी का व्यक्तिगत प्रभाव और कल्याणकारी योजनाएं भी पार्टी के लिए बड़ी ताकत मानी जाती हैं। कुल मिलाकर, पश्चिम बंगाल का चुनाव इस बार बेहद दिलचस्प मोड़ पर पहुंच गया है। एक ओर ममता बनर्जी की स्थापित पकड़ है, तो दूसरी ओर प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह की आक्रामक रणनीति। ऐसे में अंतिम परिणाम क्या होगा, यह तो मतगणना के दिन ही स्पष्ट होगा, लेकिन फिलहाल इतना जरूर है कि बंगाल की सियासत में मुकाबला पहले से कहीं ज्यादा कड़ा नजर आ रहा है।
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