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 भारतार्थ खबर, नहीं उसका अर्थ

21अक्टूबर /2026 /बुधवार

बेंगलुरु, 20 अक्टूबर 2026। बेंगलुरु में आयोजित 48वें दशहरा महोत्सव में राज्यसभा सांसद लहर सिंह सिरोया ने मां दुर्गा के दर्शन कर पूजा-अर्चना की और आशीर्वाद प्राप्त किया। सिद्धार्थ सांस्कृतिक समिति एवं राजेंद्र बाबू मेमोरियल ट्रस्ट ‘बिहार भवन’ के तत्वावधान में आयोजित इस महोत्सव में सांसद की उपस्थिति रही। इस अवसर पर समिति के पदाधिकारियों और सदस्यों ने मां भगवती की चुनड़ी ओढ़ाकर उनका स्वागत एवं अभिनंदन किया।

भारतार्थ लोगो: खबर नहीं, उसका अर्थ - राजनीतिक समाचार विश्लेषण

बेंगलुरु, 20 अक्टूबर 2026। बेंगलुरु में आयोजित 48वें दशहरा महोत्सव में राज्यसभा सांसद लहर सिंह सिरोया ने मां दुर्गा के दर्शन कर पूजा-अर्चना की और आशीर्वाद प्राप्त किया। सिद्धार्थ सांस्कृतिक समिति एवं राजेंद्र बाबू मेमोरियल ट्रस्ट ‘बिहार भवन’ के तत्वावधान में आयोजित इस महोत्सव में सांसद की उपस्थिति रही। इस अवसर पर समिति के पदाधिकारियों और सदस्यों ने मां भगवती की चुनड़ी ओढ़ाकर उनका स्वागत एवं अभिनंदन किया।

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  • नाली खुली रही, सड़क पर गिरा पेड़; BBMP की कार्यशैली पर सवाल

    भारतार्थ खबर Bhaarataarth.com बेंगलुरु, 24 अगस्त 2026। बेंगलुरु शहर के ऑयल मिल रोड-कम्मनहल्ली मार्ग पर सोमवार को बीबीएमपी की ओर से चल रहे नाली सफाई अभियान के दौरान अधूरा छोड़ा गया काम परेशानी का कारण बन गया। नाली के पास खड़ा एक पेड़ अचानक सड़क के बीचोंबीच गिर गया, जिससे मार्ग पर आवागमन बाधित हो गया। पेड़ के गिरने के साथ बिजली का खंभा भी अधर में लटक गया, जिससे मौके पर दुर्घटना की आशंका बढ़ गई। स्थानीय लोगों के अनुसार, नाली की सफाई के लिए पिछले चार-पांच दिनों से सड़क किनारे नाली को खोलकर छोड़ दिया गया था। कार्य पूरा नहीं होने और खुले हिस्से के आसपास पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था नहीं होने के कारण नाली के पास खड़ा पेड़ कमजोर होकर सड़क पर गिर गया। हालांकि, पेड़ गिरने के दौरान किसी व्यक्ति के हताहत होने की सूचना नहीं है। पेड़ के सड़क पर गिरने से ऑयल मिल रोड से कम्मनहल्ली की ओर जाने वाले मार्ग पर यातायात प्रभावित हुआ। बिजली का खंभा भी असुरक्षित स्थिति में लटकने से स्थानीय लोगों में चिंता देखी गई। ऐसे में मार्ग से गुजरने वाले वाहन चालकों और पैदल यात्रियों के लिए अतिरिक्त सावधानी जरूरी हो गई। अधूरे काम पर उठे सवाल नाली की सफाई और जल निकासी व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए किए जा रहे कार्य का उद्देश्य निश्चित रूप से शहरवासियों को सुविधा देना है। लेकिन सवाल यह है कि यदि काम शुरू किया गया था तो उसे समय पर पूरा क्यों नहीं किया गया? कई दिनों तक नाली को खुला छोड़ना और उसके आसपास पर्याप्त सुरक्षा इंतजाम नहीं करना नागरिक सुरक्षा के लिहाज से गंभीर विषय है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि पेड़ गिरने के समय सड़क पर कोई वाहन या व्यक्ति मौजूद होता तो स्थिति गंभीर हो सकती थी। सौभाग्य से इस घटना में जनहानि नहीं हुई। लेकिन हादसा टल जाना व्यवस्था की खामियों को नजरअंदाज करने का कारण नहीं हो सकता। सफाई अभियान या नई मुसीबत? नाली की सफाई का काम नागरिक सुविधा के लिए है, लेकिन यदि अधूरा काम सड़क बंद होने और दुर्घटना के खतरे का कारण बन जाए तो व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है। शहर में विकास और सफाई कार्यों के दौरान नागरिकों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए। स्थानीय लोगों ने मांग की है कि सड़क से गिरे पेड़ को तत्काल हटाया जाए, बिजली के खंभे को सुरक्षित किया जाए और नाली का लंबित कार्य जल्द पूरा किया जाए। साथ ही ऐसे कार्यस्थलों पर सुरक्षा बैरिकेडिंग और चेतावनी संकेतों की पर्याप्त व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए। यह घटना जिम्मेदार विभाग के लिए एक सीधा संदेश भी है—नाली साफ करने के नाम पर सड़क और सुरक्षा व्यवस्था को ‘खुला’ छोड़ देना विकास कार्य नहीं, बल्कि समस्या को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाना है। समय पर काम पूरा होता और आवश्यक सुरक्षा उपाय किए जाते तो संभवतः यह स्थिति पैदा ही नहीं होती। फिलहाल राहत की बात यही है कि पेड़ गिरने से कोई जनहानि नहीं हुई। मगर हादसे की संभावना ने यह सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि किसी बड़े हादसे का इंतजार करने के बजाय संबंधित विभाग कब अधूरे काम को पूरा करेगा।

  • वंदे मातरम् पर भाजपा अध्यक्ष का विपक्ष पर हमला

    भारतार्थ खबर Bhaarataarth.com नई दिल्ली। 24 अगस्त 2026। भारतीय जनता पार्टी ( भाजपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने सोमवार को विपक्षी दलों पर समाज को बांटने वाली सोच के साथ काम करने और राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ का कथित रूप से अपमान करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि देश की जनता ऐसी सोच का जवाब देगी और समय के साथ विरोधियों की सोच बदलने में भारत की मिट्टी की ताकत निर्णायक साबित होगी। नितिन नवीन नई दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में संत गुरु रविदास की 650वीं जयंती के अवसर पर आयोजित ‘समरसता संकल्प दिवस’ कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि भारत की संस्कृति और विरासत को लंबे समय से विभिन्न चुनौतियों का सामना करना पड़ा है, लेकिन इसकी जड़ें मजबूत हैं और देश की सांस्कृतिक शक्ति हर चुनौती का सामना करने में सक्षम है। संस्कृति की मजबूती का किया उल्लेख भाजपा अध्यक्ष ने कहा कि भारत पर लंबे समय तक बाहरी शक्तियों का शासन रहा, लेकिन वे देश की सांस्कृतिक नींव को समाप्त नहीं कर सके। उन्होंने आरोप लगाया कि वर्तमान समय में भी कुछ लोग समाज में विभाजन की सोच को बढ़ावा देने का प्रयास कर रहे हैं। नवीन ने ‘वंदे मातरम्’ को भारत के स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ा महत्वपूर्ण राष्ट्रभक्ति गीत बताते हुए कहा कि इस गीत ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान लोगों में देशभक्ति की भावना को मजबूत किया और अनेक स्वतंत्रता सेनानियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना। ‘भारत की जनता देगी जवाब’ भाजपा अध्यक्ष ने अपने संबोधन में कहा कि भारत की मिट्टी में ऐसी शक्ति है, जो समय के साथ लोगों की सोच बदल सकती है। उन्होंने ऐतिहासिक उदाहरणों का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि अतीत में लोदी और सिकंदर जैसे लोगों की सोच बदली जा सकती थी, तो भविष्य में उन लोगों की सोच भी बदली जा सकती है, जो उनके अनुसार ‘वंदे मातरम्’ का अपमान करते हैं। उन्होंने कहा कि भारत के लोग ऐसी सोच का जवाब देंगे और देश की एकता तथा सांस्कृतिक विरासत को मजबूत बनाए रखने में अपनी भूमिका निभाएंगा।

  • नि:शुल्क आई कैंप में 76 लोगों की जांच

    भारतार्थ खबर संवाददाता धन्नाराम चौधरी Bhaarataarth.com चेन्नई, 23 अगस्त 2026। महावीर इंटरनेशनल चेन्नई गोल्ड सेंटर की ओर से रोटरी क्लब ऑफ चेन्नई नोबल हार्ट के सौजन्य तथा श्री रामचंद्रा हॉस्पिटल, पोरूर के सहयोग से रविवार को पल्लीकरणै स्थित मदर मैट्रिक हायर सेकेंडरी स्कूल में नौवां नि:शुल्क नेत्र जांच शिविर आयोजित किया गया। सुबह प्रार्थना के बाद आयोजित शिविर में चिकित्सकीय टीम ने कुल 76 लोगों की नेत्र जांच की। इसके साथ ही 49 लोगों की नि:शुल्क रक्तचाप और रक्त शर्करा की जांच की गई। जांच के बाद 43 जरूरतमंद लोगों को नि:शुल्क चश्मे वितरित किए गए। शिविर के दौरान जांच में 11 मरीजों में मोतियाबिंद की समस्या पाई गई। इन मरीजों को आगे उपचार एवं मोतियाबिंद ऑपरेशन के लिए श्री रामचंद्रा हॉस्पिटल, पोरूर भेजा गया। शिविर में जरूरतमंद मरीजों के लिए गले और कमर के पट्टे, घुटनों के मोजे, मोनीसन बाम, एड़ी के सॉक्स, स्प्रे, जेल तथा रिस्ट बैंड जैसी उपयोगी सामग्री भी किफायती दरों पर उपलब्ध कराई गई। आयोजन को सफल बनाने में चेयरमैन महेन्द्र-गुणवंती पगारिया, वाइस चेयरमैन प्रवीण-नीता कुम्भट, सचिव नरेन्द्र खांटेड, कोषाध्यक्ष बसन्त बरड़िया सहित उम्मेद बाफना, दीपक पगारिया, उत्तमजी कोठारी, बिरमाराम और नारायणलाल सीरवी का विशेष सहयोग रहा।

  • श्रीराम के वनवास ने भावुक किए श्रद्धालु.

    भारतार्थ खबर Bhaarataarth.com बेंगलूरु, संवाददाता धन्नाराम चौधरी 23 अगस्त 2026। श्री मातेश्वरी भक्त मंडल की ओर से होसूर भण्डे स्थित श्री कृष्णा गौशाला परिसर में आयोजित नौ दिवसीय श्रीराम कथा के पांचवें दिन रविवार को प्रभु श्रीराम के वनवास प्रस्थान का मार्मिक प्रसंग सुनाया गया। कथा वाचक संत किशोरचन्द रामायणी ने संगीतमय शैली में भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण के वन गमन का भावपूर्ण वर्णन किया। प्रसंग के दौरान पंडाल में मौजूद श्रद्धालु भाव-विभोर हो उठे। संत किशोरचन्द रामायणी ने कहा कि श्रीराम का वनवास त्याग, कर्तव्य, आज्ञापालन और मर्यादा का आदर्श प्रस्तुत करता है। प्रभु श्रीराम ने पिता राजा दशरथ के वचन की मर्यादा बनाए रखने के लिए राजपाट का त्याग कर वनवास स्वीकार किया। उन्होंने कहा कि श्रीराम का जीवन आज भी माता-पिता के सम्मान, परिवार के प्रति दायित्व और कठिन परिस्थितियों में धैर्य बनाए रखने की प्रेरणा देता है। कथा में श्रीराम और केवट संवाद तथा माता शबरी द्वारा भगवान को प्रेमपूर्वक बेर अर्पित करने का प्रसंग भी सुनाया गया। संत ने कहा कि भगवान बाहरी आडंबर के बजाय भक्त के सच्चे प्रेम और निष्कपट भाव को स्वीकार करते हैं। शबरी की भक्ति के माध्यम से प्रभु श्रीराम ने समाज को प्रेम, समानता और समर्पण का संदेश दिया। कथा के दौरान प्रस्तुत भजनों से वातावरण भक्तिमय हो गया और श्रद्धालु भाव-विभोर होकर झूम उठे। कार्यक्रम के अंत में आरती हुई और श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरित किया गया। आरती एवं प्रसाद वितरण के लाभार्थी चेलाराम, दानाराम, धनाराम, राजुराम एवं राकेश चोयल परिवार, कोयम्बटूर रहे।

  • चुनमुनियाँ - कहानी

    लेखक — लालबहादुर चौरसिया ‘लाल’, 23 अगस्त 2026 आजमगढ़ | रात के करीब आठ बजे थे। घर के बाहर से आती नाच की आवाज और भीतर बर्तनों की खटर-पटर से अचानक मेरी नींद खुल गई। दूर से ढोल-मजीरे की आवाज कानों में साफ सुनाई दे रही थी। घर में लगभग सभी लोग जाग रहे थे। मैंने बरामदे में देखा तो चाचा जी कपड़े पहनकर कहीं जाने की तैयारी में थे। बाहर दरवाजे पर उनका एक मित्र भी उनका इंतजार कर रहा था। मैंने पूछा— “चाचा जी, कहीं जा रहे हो क्या?” वे बनावटी गुस्से में बोले— नहीं तो!” मैंने फिर कहा— “चाचा जी, आप क्यों झूठ बोल रहे हो? मैं जानता हूं, आप नाच देखने जा रहे हो।”वे इस बार थोड़ा गरजे—“जा तो रहा हूं, क्यों? क्या बात है?” मैंने बालहठ करते हुए कहा—“मैं भी आपके साथ नाच देखने चलूंगा।” चाचा जी ने आंखें तरेरते हुए कहा—“नहीं, बिल्कुल नहीं। सो जा, नहीं तो कान के नीचे दो चांटे जड़ दूंगा।” इतना कहकर चाचा जी अपने मित्र के साथ चले गए। उनका यह व्यवहार मेरे बालमन को भीतर तक चोट कर गया। मेरी आंखें छलछला उठीं। कंठ भी शांत नहीं रह सका। मैं बिस्तर पर ही जोर-जोर से रोने लगा। मेरा रोना सुनकर दादा जी आए। उन्होंने मुझे पुचकारते हुए पूछा— “क्या बात है बेटा गोलू? अभी सोए नहीं? क्यों रो रहे हो?” लेकिन मेरे ऊपर उनकी बातों का कोई असर नहीं हुआ। मेरे कानों में पड़ रही ढोल की थाप किसी मृगमरीचिका की तरह मुझे अपनी ओर खींच रही थी। ढोल जितनी तेज गति से बज रहा था, मेरा कंठ भी उतनी ही तीव्रता से रुलाई की ताल मिला रहा था। दादा जी ने फिर पूछा—“बेटा गोलू, क्यों रो रहे हो? क्या बात है? पेट तो नहीं दर्द कर रहा? ”मैं और जोर-जोर से रोने लगा। मेरा बालरुदन सुनकर दादी जी भी आ गईं। उन्होंने मुझे दादा जी की गोद से अपनी गोद में बैठाया और स्नेह से पूछा—“अरे मेरे राजा बेटा को क्या हो गया? बेटा क्यों रो रहा है?”दादी जी के मक्खन जैसे मीठे शब्दों ने मेरे अंतर्मन को और भावुक कर दिया। मैं उनसे लिपटकर सिसकने लगा और अपने रोने का कारण बता दिया। मेरी बात सुनते ही दादी ने पिताजी को आवाज लगाई। पिताजी आए। दादी ने उन्हें आदेश दे दिया कि मुझे नाच दिखाकर लाया जाए। हालांकि हमारे पिताजी चाचा जी की तरह नाच देखने के शौकीन नहीं थे। उन्हें नाच-गाना बिल्कुल पसंद नहीं था। लेकिन दादी की बात मानने के अलावा उनके पास कोई रास्ता भी नहीं था। वे अनमने मन से मुझे लेकर उस स्थान पर पहुंच गए, जहां नाच हो रही थी। वहां उस रात चुनमुनियाँ का नाच था। चुनमुनियाँ का जलवा पचगोईंया और नौटंकी नाच की दुनिया में चुनमुनियाँ का नाम बहुत प्रसिद्ध था। हृष्ट-पुष्ट कद-काठी, आकर्षक व्यक्तित्व, मोहक अदाएं और सजीले नैन-नक्श—उसे देखकर ऐसा लगता था मानो कोई अप्सरा स्वर्ग से उतरकर मंच पर आ गई हो। दस कोस के चारों ओर उसके नृत्य का डंका बजता था। कोई दूसरा नचनिया उसके सामने खड़ा होने की हिम्मत नहीं करता था। संपन्न घरों में विवाह और अन्य समारोहों में चुनमुनियाँ का नाच करवाना अपनी शान समझा जाता था। लेकिन चुनमुनियाँ कोई महिला नहीं थी। वह एक पुरुष था। उसका वास्तविक नाम था—चुन्नू। हमारे गांव से सटे गांव का रहने वाला चुन्नू बेहद सादा और सरल इंसान था। पांच फुट का गोरा-चिट्टा युवक। घर की माली हालत खराब थी। पेट की आग ने उसे नृत्य की दुनिया में कदम रखने के लिए मजबूर कर दिया। सत्रह-अठारह वर्ष की उम्र में उसने नृत्य कला में अपनी किस्मत आजमाने का फैसला किया। शुरुआत कठिन थी। लेकिन उसने मेहनत की। अभ्यास किया। धीरे-धीरे मंच पर पहचान बनाई। और देखते ही देखते चुन्नू, चुनमुनियाँ बन गया। शोहरत मिली। पैसा मिला। और लोगों का प्यार भी मिला। उसी चुनमुनियाँ का नाच देखने मैं उस रात पिताजी के साथ पहुंचा था। मेरी उम्र उस समय महज छह वर्ष थी। मुझे चुनमुनियाँ के नृत्य की कला से विशेष मतलब नहीं था। मेरे लिए तो ढोल, मजीरा, हारमोनियम, भीड़ और वहां का हो-हल्ला ही सबसे बड़ा आकर्षण था। वैवाहिक उत्सवों में बच्चों की अपनी अलग दुनिया होती है। उनके लिए रात देर तक जागना, भीड़ में घूमना और तरह-तरह की चीजें देखना अपने आप में किसी उत्सव से कम नहीं होता। नाच देखते-देखते रात करीब डेढ़ बज गई। निद्रा देवी अब मुझे अपनी गोद में लेने लगी थीं। मैं तिरपाल पर बैठे-बैठे ऊंघने लगा और एक बार तो गिर भी पड़ा। पिताजी ने मुझे संभाला। फिर जब उन्हें लगा कि अब मैं नींद से नहीं बच पाऊंगा तो उन्होंने मुझे गोद में उठाया और घर ले आए। उस रात मैं सो गया। लेकिन चुनमुनियाँ की छवि मेरे बालमन में कहीं गहरे उतर चुकी थी। पंद्रह-सोलह साल बाद...समय बीतता गया। मई का महीना था। गांव में विवाह कार्यक्रमों की धूम थी। मैं बीकॉम की परीक्षा देकर इलाहाबाद से गांव आया हुआ था। पड़ोस में तिलक का कार्यक्रम था। गांव के मित्रों से पता चला कि उसी कार्यक्रम में आज चुनमुनियाँ का नाच होने वाला है। चुनमुनियाँ का नाम सुनते ही बचपन की यादें ताजा हो गईं। उसका नाच देखे लगभग पंद्रह-सोलह वर्ष बीत चुके थे। मन में फिर से चुनमुनियाँ को देखने की इच्छा जाग उठी। शाम हुई। स्टेज सज गया। वाद्य यंत्र तैयार हो गए। और फिर पर्दे के पीछे से घुंघरुओं की जोरदार आवाज सुनाई दी— छम... छम... छम...चुनमुनियाँ मंच पर दाखिल हुई। उसने वाद्य यंत्रों और दर्शकों का अभिवादन किया और जोरदार ठुमके के साथ नृत्य शुरू कर दिया। दर्शकों की भीड़ से वाह-वाह और सीटियों की आवाज उठने लगी। पूरा पंडाल गूंज उठा। एक ताल पर नाचने के बाद चुनमुनियाँ ने जोरदार घुमरी ली और अचानक रुक गई। अब बारी थी गाने के साथ नाचने की। चुनमुनियाँ का गायन भी बेहद कर्णप्रिय था। गाना शुरू हुआ—“नजर लागी राजा तोरे बंगले पे...”और देखते ही देखते भीड़ में से नोटों की बरसात होने लगी। एक गीत समाप्त हुआ। फिर दूसरा। फिर तीसरा। गीत बदलते रहे और नोटों की बारिश होती रही। चुनमुनियाँ बन चुका चुन्नू अब नृत्य कला में पूरी तरह दक्ष हो चुका था। उसकी गायकी भी अच्छी थी। आसपास के गांवों में आए दिन कहीं न कहीं उसके नाच का कार्यक्रम होता और लोग उसका आनंद लेने पहुंचते। उस समय किसे पता था कि जिस कलाकार पर आज नोट बरस रहे हैं, एक दिन वही कलाकार अपनी जिंदगी के अंतिम पड़ाव पर एक-एक सहारे के लिए तरसेगा। जिंदगी आगे बढ़ती रही गर्मी की छुट्टियां समाप्त हो गईं। परीक्षा का परिणाम आया और मुझे उच्च शिक्षा के लिए फिर गांव छोड़ना पड़ा। बीकॉम के बाद एमकॉम किया। सीए की तैयारी की। इसी दौरान चार्टर्ड अकाउंटेंट की नौकरी भी लग गई। नौकरी करते-करते साल बीतते गए। गांव आना-जाना लगा रहा, लेकिन अब एक-दो दिन से ज्यादा गांव में रहना संभव नहीं होता था। समय अपनी गति से आगे बढ़ता रहा। मेरा विवाह हुआ। बच्चे हुए। बच्चे बड़े हुए। उनके विवाह हुए। पुत्रवधुएं घर आईं। जिंदगी अपनी सामान्य गति से चलती रही। लेकिन समय ने बहुत कुछ बदल दिया था। विजयदशमी का मेला एक बार विजयदशमी के पावन पर्व पर मैं गांव में ही था। पुत्रवधू के आग्रह पर मैं अपने पौत्र शिवांश को लेकर गांव का मेला देखने पहुंचा। मेले में कोई खास भीड़ नहीं थी। मेरी आंखों के सामने बार-बार बचपन के मेले की तस्वीर उभर रही थी। ओह! कितनी भीड़ हुआ करती थी! कितना उल्लास! कितना अपनापन! अनगिनत दुकानें! हर तरफ चहल-पहल! लेकिन आज का दृश्य बिल्कुल बदल चुका था। चंद दुकानें थीं। चंद लोग थे। राम और रावण की वे कृत्रिम और रोमांचक लड़ाइयां दिखाई नहीं दे रही थीं। जगह-जगह दुर्गा पूजा के पंडाल थे। दुर्गा जी की प्रतिमाएं स्थापित थीं और उनके आसपास बज रहा डीजे कानों को चीर रहा था। कुछ बच्चे डीजे से निकलने वाले पॉप गीतों पर नाच रहे थे। मैंने शिवांश को जलेबी, गुब्बारे, सीटियां, खिलौने आदि दिलाए और मेले से बाहर निकलने लगा। तभी मेरी नजर एक वृद्ध पर पड़ी। वह एक लाठी के सहारे धीरे-धीरे मेले की ओर बढ़ रहा था। उसकी आंखें गड्ढों में धंस चुकी थीं। शरीर पर मांस नाममात्र का था। हड्डियों का ढांचा साफ दिखाई दे रहा था। झुलसी हुई त्वचा और धनुष जैसी झुकी कमर उसके बुढ़ापे की कहानी कह रही थी। मुंह में केवल दो-चार दांत ही बचे थे। वह अपनी ही धुन में कुछ गुनगुनाता हुआ आगे बढ़ रहा था। जैसे ही वह मेरे करीब आया, मैंने जिज्ञासावश उसे रोक लिया। मैंने पूछा— “दादा, आपका घर कहां है?” उसने चेहरे को बड़ी मुश्किल से ऊपर उठाया और मुझे गौर से देखते हुए कहा— “बाबू, हमको नहीं पहचान रहे हो?” मैंने कहा—“नहीं दादा। हम यहां रहते नहीं हैं, इसलिए पूछ रहे हैं।”वह वृद्ध मुस्कुराया। फिर बोला—“अरे बाबू, मैं चुनमुनियाँ डांसर हूं।”मेरे पैरों तले जैसे जमीन खिसक गई। मेरे कानों में एक साथ घुंघरुओं की आवाज गूंज उठी— छम... छम... छम...मेरी आंखों के सामने वर्षों पुराना मंच घूम गया। वही चुनमुनियाँ! वही ठुमके! वही तालियां! वही सीटियां! वही नोटों की बरसात! क्या यह सचमुच वही चुनमुनियाँ थी? वह आगे बोलता रहा— “क्या करूं बाबू, बुढ़ापा है ना। अब शरीर में वो बात कहां। लड़के अपने-अपने में मस्त हैं। पत्नी भी दो बरस पहले ही साथ छोड़ गई। क्या बताऊं बाबू... धीरे-धीरे समय काट रहा हूं।” मैं नि:शब्द था। जिस कलाकार के एक ठुमके पर हजारों लोग झूम उठते थे, आज वही कलाकार एक लाठी के सहारे जीवन की आखिरी पगडंडी पर चल रहा था। जिसके नाच पर कभी नोटों की बारिश होती थी, आज उसके जीवन में अभाव की बारिश थी। जिसे देखने के लिए कभी लोगों का हुजूम उमड़ता था, आज वह भीड़ में भी अकेला था। तालियों से तन्हाई तक मेरा कलेजा धक से कर गया। मैं अतीत में चला गया। छह वर्ष का वह बच्चा याद आया, जो चाचा जी के साथ नाच देखने के लिए रोया था। वह रात याद आई। पिताजी की गोद याद आई। चुनमुनियाँ का नृत्य याद आया। फिर वह दूसरी रात याद आई जब मैंने बीकॉम की परीक्षा के बाद उसे मंच पर नाचते देखा था। नोटों की बरसात याद आई। तालियों की गूंज याद आई। और अब सामने वही कलाकार खड़ा था। लेकिन सब कुछ बदल चुका था। समय ने मंच छीन लिया था। शरीर ने साथ छोड़ दिया था। भीड़ गायब हो गई थी। तालियां खामोश हो चुकी थीं। अब केवल लाठी थी और जीवन की लंबी थकान। उसी समय पौत्र शिवांश ने मेरा हाथ खींचा। “दादाजी, घर चलो।” मैंने जेब से दो सौ रुपये का एक नोट निकाला और उस बुजुर्ग के हाथ में रख दिया। उसने मेरी ओर देखा। उसकी आंखों में क्या था—आभार, बेबसी, पहचान या बीते दिनों की कोई स्मृति—मैं समझ नहीं सका। मैं शिवांश के साथ आगे बढ़ गया। लेकिन मेरा मन वहीं पीछे छूट गया था। चुनमुनियाँ की कहानी यहीं खत्म नहीं होती उस दिन मेले से लौटते समय मेरे भीतर एक सवाल लगातार घूमता रहा—क्या हम अपने कलाकारों को केवल उनके चमकते दिनों तक ही याद रखते हैं? जब तक मंच पर रोशनी रहती है, हम तालियां बजाते हैं। जब तक शरीर में ताकत रहती है, हम उनके नृत्य का आनंद लेते हैं। जब तक आवाज में मिठास रहती है, हम उन्हें बार-बार सुनते हैं। लेकिन जब उम्र ढल जाती है, जब घुंघरू उतर जाते हैं और मंच की रोशनी बुझ जाती है, तब क्या हम उन्हें याद रखते हैं? चुनमुनियाँ केवल एक नर्तक नहीं था। वह उस दौर की लोक संस्कृति का हिस्सा था। उसने अपनी कला से न जाने कितने विवाह समारोहों को यादगार बनाया होगा। कितनी रातों को अपनी प्रस्तुति से लोगों का मनोरंजन किया होगा। कितने लोगों ने उसके नृत्य पर तालियां बजाई होंगी और कितनों ने उसके हाथों में रुपये रखे होंगे। लेकिन उम्र के अंतिम पड़ाव पर उसे सहारा देने वाला कोई नहीं था। यह कहानी केवल चुन्नू या चुनमुनियाँ की कहानी नहीं है। यह उन तमाम लोक कलाकारों की कहानी है जो अपनी जवानी में हमारी खुशियों का हिस्सा बनते हैं और बुढ़ापे में समाज की स्मृतियों से बाहर हो जाते हैं। वक्त की सबसे बड़ी सच्चाई समय किसी के लिए नहीं रुकता। जो आज जवान है, कल बूढ़ा होगा। जो आज मंच पर है, कल मंच से नीचे होगा। जो आज दूसरों का मनोरंजन कर रहा है, कल उसे किसी के सहारे की जरूरत पड़ सकती है। इसलिए किसी इंसान की कीमत उसके वर्तमान रूप से नहीं, उसके पूरे जीवन के योगदान से तय होनी चाहिए। चुनमुनियाँ के ठुमकों पर बरसे नोट शायद उसके जीवन के अंतिम दिनों में उसके काम नहीं आए, लेकिन उन ठुमकों ने जिन लोगों को खुशी दी, क्या उनकी कोई जिम्मेदारी नहीं थी? शायद यही इस कहानी का सबसे बड़ा सवाल है। और शायद यही समाज के सामने सबसे बड़ा आईना भी। मेले से लौटते समय मेरे कानों में डीजे की तेज आवाज नहीं, बल्कि पुराने घुंघरुओं की धीमी-सी आवाज गूंज रही थी—छम... छम... छम...मैंने पीछे मुड़कर देखा। वह बूढ़ा चुनमुनियाँ अपनी लाठी के सहारे मेले की ओर बढ़ रहा था। कभी उसी के आने पर मेले में भीड़ उमड़ती थी। आज वह खुद भीड़ के बीच अपने लिए जगह तलाश रहा था। और मैं सोच रहा था— तालियां खत्म हो जाती हैं, मंच खाली हो जाता है, रोशनी बुझ जाती है; लेकिन कलाकार का जीवन उसके बाद भी चलता रहता है। चुनमुनियाँ की कहानी हमें यही याद दिलाती है कि किसी कलाकार की कला का सम्मान केवल उसके प्रदर्शन के समय नहीं, बल्कि उसके जीवन के अंतिम पड़ाव तक होना चाहिए। क्योंकि जिस समाज को अपने कलाकारों की जवानी याद रहती है, उसे उनके बुढ़ापे की चिंता भी करनी चाहिए। यही इंसानियत है। यही संवेदना है। और शायद यही हमारी संस्कृति की असली पहचान भी। ✍️ लेखक: अशोक कुमार सिंह अन्य कहानी , मार्गदर्शन एवं प्रेरणादायी ज़रूर पढ़िए रिश्तों-की-महक-आख-िरी-रोटी-भाग-1,रिश्तों-की-महक-आख-िरी-रोटी-भाग-2,रिश्तों-की-महक-आख-िरी-रोटी-भाग-3,रिश्तों-की-महक-आख-िरी-रोटी-भाग-4,रिश्तों-की-महक-आख-िरी-रोटी-भाग-5 कहानी माँ-की-आख-िरी-गुल्लक कहानी रिश्तों-की-सबसे-बड-ी-द-लत एक दिल दहलाने वाली कहानी धारावाहिक उपन्यास जरूर पढ़ि भाग 01 ,भाग 02,भाग 03,भाग 4,भाग 5,भाग 6,भाग 7,भाग 8,भाग 9,भाग 10,भाग 11 नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में इन पोस्ट्स पर अपनी राय ज़रूर दें। आपका नज़रिया ही लोकतंत्र की ताकत है; देश के निर्माण में आपकी अहम भूमिका है। सटीक, वैज्ञानिक और साहित्यिक खबरें पढ़ने के लिए 'भारतार्थ समाचार' से जुड़े रहें। अपना समर्थन दिखाएं—हमें लाइक, शेयर और फ़ॉलो करें—ताकि हर ज़रूरी अपडेट आपको सबसे पहले मिले। ताज़ा खबरों के लिए "भारतार्थ खबर" के साथ बने रहें।

  • 2029 में ‘एक देश, एक चुनाव’ की तैयारी तेज?

    भारतार्थ खबर संवाददाता धन्नाराम चौधरी Bhaarataarth.com नई दिल्ली 19 अगस्त 2026। देश में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने की प्रस्तावित व्यवस्था यानी ‘एक देश, एक चुनाव’ को लेकर राजनीतिक और संवैधानिक स्तर पर कवायद तेज होने की चर्चा है। सामने आई जानकारी के अनुसार, इस व्यवस्था को लागू करने के लिए गठित संसद की संयुक्त समिति विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों से विचार-विमर्श की प्रक्रिया आगे बढ़ा रही है। इस बीच सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या ‘एक देश, एक चुनाव’ को वर्ष 2034 के बजाय 2029 में ही लागू करने का लक्ष्य रखा जा रहा है? यदि ऐसा होता है तो आगामी लोकसभा चुनावों के साथ कई राज्यों में विधानसभा चुनावों को भी एक साथ कराने की दिशा में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। हालांकि, 2029 की समय-सीमा को लेकर अंतिम निर्णय और संवैधानिक प्रक्रिया पूरी होना अभी बाकी है। सभी विधानसभाओं के कार्यकाल को लेकर चुनौती एक साथ चुनाव कराने की व्यवस्था लागू करने के लिए अलग-अलग राज्यों की विधानसभाओं के कार्यकाल को एक निश्चित चुनावी चक्र के साथ समायोजित करना होगा। मौजूदा व्यवस्था में राज्यों के विधानसभा चुनाव अलग-अलग समय पर होते हैं, जबकि कुछ राज्यों में लोकसभा चुनाव के साथ विधानसभा चुनाव भी होते हैं। आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, ओडिशा और सिक्किम में वर्ष 2024 में लोकसभा चुनाव के साथ विधानसभा चुनाव भी हुए थे। ऐसे में सभी राज्यों को एक साझा चुनावी चक्र में लाना संवैधानिक और प्रशासनिक दृष्टि से बड़ी चुनौती होगी। संयुक्त समिति कर रही कानूनी पहलुओं की समीक्षा ‘एक देश, एक चुनाव’ से जुड़े प्रस्ताव पर संसद की संयुक्त समिति संवैधानिक, कानूनी और प्रशासनिक पहलुओं का अध्ययन कर रही है। समिति संविधान (129वां संशोधन) विधेयक, 2024 सहित इससे जुड़े प्रावधानों की समीक्षा कर रही है। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनावों को एक साझा चुनावी चक्र में लाने की परिकल्पना की गई है। इसके लिए संविधान में कई महत्वपूर्ण बदलाव आवश्यक होंगे। मुख्यमंत्रियों से मांगे जा रहे सुझाव इस मुद्दे पर राज्यों के मुख्यमंत्रियों और विभिन्न राजनीतिक दलों से विचार-विमर्श महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कुछ भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने के विचार का समर्थन किया है। हालांकि, इस व्यवस्था को लागू करने के लिए केवल राजनीतिक सहमति ही पर्याप्त नहीं होगी। संविधान संशोधन, राज्यों की सहमति, विधानसभाओं के कार्यकाल में संभावित बदलाव और चुनावी व्यवस्था से जुड़े अनेक कानूनी प्रश्नों का समाधान भी आवश्यक होगा। शीतकालीन सत्र में रिपोर्ट पर नजर संसदीय समिति की रिपोर्ट संसद के आगामी शीतकालीन सत्र में पेश किए जाने की संभावना को लेकर चर्चा है। रिपोर्ट आने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि समिति ने ‘एक देश, एक चुनाव’ को लागू करने के लिए किस समय-सीमा और किस संवैधानिक व्यवस्था की सिफारिश की है। फिलहाल 2029 में एक साथ चुनाव कराने की चर्चा को अंतिम निर्णय नहीं माना जा सकता। सरकार और संसद की ओर से औपचारिक निर्णय तथा आवश्यक संवैधानिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही इसकी वास्तविक तस्वीर स्पष्ट होगी। यदि प्रस्तावित व्यवस्था लागू होती है तो देश की चुनावी प्रक्रिया, राजनीतिक दलों की रणनीति और प्रशासनिक व्यवस्था पर इसका व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए 2029 की संभावित समय-सीमा पर अब राजनीतिक और संवैधानिक दोनों स्तरों पर नजर बनी हुई है।

  • दक्षिण के मुख्यमंत्रियों ने भरी हामी, परिसीमन पर नहीं बनी बात

    भारतार्थ खबर। Bhaarataarth.com चेन्नई | 21 अगस्त 2026।अंतरराज्यीय जल विवादों को बातचीत और आपसी सहमति से जल्द सुलझाने के केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के सुझाव को दक्षिण भारत के राज्यों ने समर्थन दिया है। गुरुवार को दक्षिण क्षेत्रीय परिषद की 31वीं बैठक में जल विवादों के साथ लोकसभा सीटों के परिसीमन का मुद्दा भी प्रमुखता से उठा। हालांकि, परिसीमन को लेकर दक्षिणी राज्यों की चिंताएं बरकरार हैं और इस पर कोई अंतिम सहमति नहीं बन सकी। ‘राज्य हित जरूरी, लेकिन विवाद लंबे न खिंचें’ बैठक की अध्यक्षता करते हुए अमित शाह ने कहा कि राज्यों का अपने हितों की रक्षा करना स्वाभाविक है, लेकिन यदि किसी विवाद के कारण वर्षों तक किसी राज्य को पानी से वंचित रहना पड़े और पानी समुद्र में बह जाए तो इससे किसी का हित पूरा नहीं होता। उन्होंने ब्रह्मपुत्र से कावेरी और गोदावरी तक प्रमुख नदियों को जोड़ने की दिशा में काम करने की जरूरत बताई। शाह के अनुसार, इससे भारत को आने वाले लंबे समय तक जल संकट से बचाने में मदद मिल सकती है और साथ ही नए जलमार्गों के विकास की संभावनाएं भी बढ़ेंगी। परिसीमन पर दक्षिणी राज्यों की चिंता कायम बैठक में परिसीमन का मुद्दा दक्षिणी राज्यों के लिए सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक चिंता के रूप में सामने आया। राज्यों का कहना है कि यदि लोकसभा सीटों का पुनर्वितरण मुख्य रूप से जनसंख्या के आधार पर किया गया तो जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है, उन्हें राजनीतिक प्रतिनिधित्व के मामले में नुकसान हो सकता है। कर्नाटक और तमिलनाडु ने मौजूदा 543 लोकसभा सीटों की संख्या अगले 25 वर्षों तक बरकरार रखने की मांग की। कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने दक्षिण क्षेत्रीय परिषद से प्रस्ताव पारित कर केंद्र से 1971 की जनगणना को परिसीमन का आधार बनाए रखने की मांग रखी। उन्होंने महिलाओं के लिए आरक्षण को मौजूदा सीटों के भीतर लागू करने का भी सुझाव दिया। मेकेदातु पर तमिलनाडु को भरोसा बैठक में कर्नाटक के मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने मेकेदातु बांध परियोजना को लेकर तमिलनाडु को आश्वस्त किया। उन्होंने कहा कि परियोजना बनने की स्थिति में तमिलनाडु और पुडुचेरी के हितों की रक्षा की जाएगी। हालांकि, तमिलनाडु के प्रतिनिधि ने स्पष्ट किया कि बैठक में कर्नाटक के साथ चल रहे कावेरी जल बंटवारे के विवाद या कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण से जुड़े मामलों पर चर्चा नहीं हुई। आंध्र प्रदेश ने रखा बुलेट ट्रेन का प्रस्ताव आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू ने आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु को जोड़ने वाले बुलेट ट्रेन कॉरिडोर का प्रस्ताव रखा। उन्होंने कुप्पम के रास्ते अमरावती, बेंगलुरु और चेन्नई को जोड़ने वाले ट्रांजिट नेटवर्क की भी पैरवी की। आंध्र प्रदेश और तेलंगाना ने परिसंपत्तियों एवं देनदारियों के बंटवारे से जुड़े लंबित मामलों को केंद्रीय गृह मंत्रालय के साथ बातचीत के जरिए सुलझाने पर सहमति जताई। केरल ने उठाया मुल्लापेरियार बांध का मुद्दा केरल की ओर से मुल्लापेरियार बांध का मुद्दा उठाया गया। राज्य ने स्वास्थ्य, बुनियादी ढांचे, पर्यावरण संरक्षण और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे विषयों पर सहकारी संघवाद को मजबूत करने की जरूरत बताई। वहीं तेलंगाना के उपमुख्यमंत्री मल्लू भट्टी विक्रमरका ने कृष्णा नदी के पानी पर राज्य के अधिकारों की सुरक्षा की मांग की और सिंचाई परियोजनाओं के लिए केंद्र से सहयोग मांगा। पुडुचेरी ने भी सालभर पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए केंद्र और पड़ोसी राज्यों, विशेषकर तमिलनाडु, के सहयोग की आवश्यकता जताई। दक्षिण क्षेत्रीय परिषद की बैठक से अंतरराज्यीय जल विवादों को बातचीत से सुलझाने की दिशा में सकारात्मक संकेत जरूर मिले हैं, लेकिन परिसीमन का मुद्दा अभी भी दक्षिणी राज्यों और केंद्र के बीच महत्वपूर्ण राजनीतिक चुनौती बना हुआ है।

  • PM मोदी की सचिवों को दो टूक, ‘साइलो’ तोड़कर साथ काम करें विभाग

    भारतार्थ खबर। Bhaarataarth.com नई दिल्ली | 21 अगस्त 2026। केंद्रीय कैबिनेट की बैठक के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को सभी मंत्रालयों के सचिवों के साथ बैठक कर सरकारी कामकाज में बेहतर तालमेल और दीर्घकालिक सोच पर जोर दिया। प्रधानमंत्री ने विभागों के बीच कामकाज में बनी रहने वाली ‘साइलो’ मानसिकता को खत्म करने की जरूरत बताई और कहा कि सरकार के सभी विभागों को एक टीम की तरह मिलकर काम करना होगा। ‘साइलो’ खत्म कर बढ़ाना होगा समन्वय प्रधानमंत्री ने कहा कि बुनियादी ढांचा, कनेक्टिविटी हो या राष्ट्रीय सुरक्षा—हर क्षेत्र में भविष्य को ध्यान में रखकर योजनाएं बनानी होंगी। अलग-अलग विभागों में तालमेल की कमी विकास की गति को प्रभावित कर सकती है। इसलिए लंबी अवधि के लक्ष्यों के लिए सभी मंत्रालयों और विभागों के बीच बेहतर समन्वय जरूरी है। कोरोना काल का उदाहरण देकर समझाया बैठक में प्रधानमंत्री ने कोविड-19 महामारी के दौरान केंद्र सरकार के कामकाज का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि उस कठिन दौर में विभिन्न मंत्रालयों ने एकजुट होकर संकट का सामना किया था। इसी तरह का समन्वित कार्य-तंत्र सामान्य परिस्थितियों में भी अपनाया जाना चाहिए। उन्होंने अधिकारियों से जरूरत पड़ने पर एक-दूसरे से विचार-विमर्श करने और किसी भी तरह की विभागीय दूरी को काम के रास्ते में बाधा नहीं बनने देने की अपील की। AI और डेटा पर बढ़े फोकस की जरूरत प्रधानमंत्री ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बढ़ते महत्व का उल्लेख करते हुए कहा कि सरकारी निगरानी और कामकाज में AI के इस्तेमाल को बढ़ावा देना चाहिए। साथ ही नवाचार को प्रोत्साहित कर इस क्षेत्र में विशेषज्ञता विकसित करने की जरूरत है। उन्होंने डेटा को राष्ट्रीय संपत्ति बताते हुए कहा कि भविष्य में डेटा एक महत्वपूर्ण संसाधन बन सकता है। इसके प्रभावी प्रबंधन के लिए भी विभिन्न विभागों के बीच बेहतर तालमेल आवश्यक है। मैन्युफैक्चरिंग और एक्सपोर्ट यूनिट में बेहतर संपर्क प्रधानमंत्री ने विनिर्माण इकाइयों और निर्यात केंद्रित इकाइयों के बीच बेहतर संपर्क की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि सभी मंत्रालय एक ही सरकार का हिस्सा हैं, इसलिए अलग-अलग दृष्टिकोण के बजाय साझा और समन्वित दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ना चाहिए। उन्होंने वरिष्ठ अधिकारियों को अपने साथ काम करने वाले अधिकारियों और कनिष्ठ कर्मचारियों के साथ केवल औपचारिक बातचीत तक सीमित न रहने की सलाह दी। बेहतर व्यक्तिगत संवाद और मजबूत नेटवर्क से कामकाज में सहयोग बढ़ाया जा सकता है। पोर्ट डेवलपमेंट से पोर्ट-लेड डेवलपमेंट की ओर प्रधानमंत्री ने भारत में बंदरगाह विकास की अवधारणा से आगे बढ़कर पोर्ट-लेड डेवलपमेंट पर जोर दिया। उन्होंने समुद्री बुनियादी ढांचे की पूरी क्षमता का इस्तेमाल करने के लिए विनिर्माण और निर्यात केंद्रित इकाइयों के बीच मजबूत संपर्क विकसित करने की जरूरत बताई। बैठक में सचिवों ने सरकार की प्रमुख प्राथमिकताओं और उनके क्रियान्वयन में आने वाली चुनौतियों पर अपने विचार भी साझा किए। प्रधानमंत्री का संदेश स्पष्ट रहा कि तेज और टिकाऊ विकास के लिए विभागों के बीच दीवारें नहीं, बल्कि मजबूत समन्वय और साझा जिम्मेदारी जरूरी है।

  • सुनील लखोटिया बने माहेश्वरी संगठन के संभाग उपाध्यक्ष

    भारतार्थ खबर। Bhaarataarth.com होसपेट, 21 अगस्त 2026।कर्नाटक–गोवा प्रांतीय माहेश्वरी संगठन के पूर्ण सत्र 2026–2029 के लिए होसपेट निवासी श्री सुनील कुमार लखोटिया को संभाग उपाध्यक्ष पद पर निर्वाचित किए जाने पर माहेश्वरी समाज सहित विष्णु समाज के बंधुओं में हर्ष की लहर है। समाजजनों ने लखोटिया को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं देते हुए उनके कार्यकाल की सफलता की कामना की। इस अवसर पर विष्णु समाज के अध्यक्ष श्री चंदन सिंह भाटी ने श्री सुनीलजी लखोटिया का हार पहनाकर अभिनंदन किया। उन्होंने शुभकामना व्यक्त करते हुए कहा कि लखोटिया के कुशल नेतृत्व में माहेश्वरी समाज का बहुमुखी विकास होगा तथा संगठन को नई ऊर्जा और दिशा मिलेगी। कर्नाटक–गोवा प्रांतीय माहेश्वरी संगठन के नव निर्वाचित पदाधिकारियों में अध्यक्ष श्री रमेशजी बूब, रायचूर, सचिव श्री वेंकटेशजी गिलडा, कलबुर्गी तथा संभाग उपाध्यक्ष श्री सुनीलजी लखोटिया, होसपेट शामिल हैं। इसके साथ ही कार्यकारिणी सदस्य के रूप में श्री राजेश करवा, श्री पुरुषोत्तम सिंगी, श्री सुशीलजी बूब, श्री नंदकिशोर सिंगी, श्री मनोजी बंग गंगावती तथा श्री गोपालजी चांडक कोप्पल निर्वाचित हुए। समाज के बंधुओं ने सभी निर्वाचित पदाधिकारियों को अनेकानेक हार्दिक अभिनंदन एवं शुभकामनाएं प्रेषित कीं। कार्यक्रम के दौरान श्री जबरसिंह राजपुरोहित सहित समाज के अनेक गणमान्य बंधु उपस्थित रहे। समाजजनों ने विश्वास जताया कि नई कार्यकारिणी संगठन को मजबूत करने, सामाजिक एकता बढ़ाने और समाजहित के कार्यों को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। प्रेषक: जबरसिंह राजपुरोहित होसपेट

  • सोशल मीडिया परफॉर्मेंस में पीएम मोदी नंबर-1, कैबिनेट मंत्रियों की रिपोर्ट में डिजिटल पहुंच का असर

    भारतार्थ खबर संवाददाता अशोक कुमार सिंह (Bhaarataarth.com) नई दिल्ली | 20 अगस्त 2026 केंद्रीय कैबिनेट मंत्रियों की सोशल मीडिया परफॉर्मेंस से जुड़ी एक रिपोर्ट सामने आई है। रिपोर्ट में 1 मई से 15 अगस्त 2026 तक इंस्टाग्राम, एक्स और फेसबुक पर मंत्रियों की गतिविधियों और सोशल मीडिया ट्रैक्शन का आकलन किया गया। इस रैंकिंग में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहले स्थान पर रहे हैं। तीन प्रमुख सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर आकलन रिपोर्ट में इंस्टाग्राम, एक्स और फेसबुक पर नेताओं की गतिविधियों को आधार बनाया गया। इसमें सोशल मीडिया पर सक्रियता, लोगों की प्रतिक्रिया और डिजिटल ट्रैक्शन जैसे पहलुओं को देखा गया। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस समग्र आकलन में शीर्ष स्थान पर रहे। पीएम मोदी का नंबर-1 रहना क्या बताता है? सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री मोदी का नंबर-1 रहना यह संकेत देता है कि उनकी डिजिटल पहुंच और ऑनलाइन सक्रियता का प्रभाव व्यापक है। राजनीतिक संवाद में सोशल मीडिया अब केवल सूचना साझा करने का माध्यम नहीं रह गया है, बल्कि जनता तक सीधे पहुंच बनाने का महत्वपूर्ण प्लेटफॉर्म भी बन चुका है। इस प्रदर्शन को केवल फॉलोअर्स की संख्या के आधार पर देखना उचित नहीं होगा। सोशल मीडिया पर किसी नेता की प्रभावशीलता को समझने के लिए पोस्ट की नियमितता, लोगों की प्रतिक्रिया और विभिन्न प्लेटफॉर्म पर कंटेंट की पहुंच जैसे पहलुओं को भी देखना महत्वपूर्ण है। रिपोर्ट के मुताबिक, 1 मई से 15 अगस्त के बीच के प्रदर्शन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अन्य केंद्रीय मंत्रियों और नेताओं की तुलना में शीर्ष पर रहे। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि डिजिटल माध्यमों पर राजनीतिक संचार को लेकर सक्रियता लगातार महत्वपूर्ण होती जा रही है।

  • शिक्षा क्षेत्र में नागेश की मजबूत विरासत: विजयेंद्र

    भारतार्थ खबर। संवाददाता: धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) बेंगलुरु, 19 अगस्त 2026।भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष बी.वाई. विजयेंद्र ने विधानसभा में पूर्व मंत्री बी.सी. नागेश के निधन पर शोक व्यक्त करते हुए उन्हें सरल, मिलनसार और सज्जन व्यक्तित्व का धनी नेता बताया। उन्होंने कहा कि कठिन परिस्थितियों के बीच नागेश ने शिक्षा क्षेत्र में मजबूत नींव रखने का महत्वपूर्ण कार्य किया। विजयेंद्र ने कहा कि आज की राजनीति में चुनाव जीतने और शीर्ष स्तर तक पहुंचने के लिए जातीय समीकरण और धनबल को महत्वपूर्ण माना जाता है, लेकिन बी.सी. नागेश ने अपनी अलग पहचान मेहनत, संगठनात्मक क्षमता और जनसेवा के माध्यम से बनाई। उन्होंने बताया कि नागेश टिपटूर विधानसभा क्षेत्र से दो बार विधायक रहे। बसवराज बोम्मई के मुख्यमंत्री कार्यकाल में प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा मंत्री के रूप में उन्होंने शिक्षा व्यवस्था में उल्लेखनीय योगदान दिया। शिक्षा में कौशल और रचनात्मकता पर जोर विजयेंद्र ने कहा कि नागेश का दृष्टिकोण केवल विद्यार्थियों को पाठ्यक्रम आधारित ज्ञान देने तक सीमित नहीं था। वे बच्चों में कौशल, रचनात्मकता और व्यावहारिक क्षमता विकसित करने पर भी जोर देते थे। उन्होंने शिक्षा क्षेत्र में विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास को प्राथमिकता दी। उन्होंने कहा कि नागेश ने छात्र परिषद और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़े रहकर संगठनात्मक अनुभव हासिल किया और एक सामान्य कार्यकर्ता के रूप में राजनीतिक जीवन की शुरुआत की। अपनी सरल कार्यशैली और सहज व्यवहार के कारण उन्होंने विभिन्न वर्गों के नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ बेहतर संबंध बनाए। विजयेंद्र ने कहा कि नागेश ऐसे नेता थे, जिन्होंने बिना अनावश्यक विवादों में पड़े सभी के साथ सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखे। कोविड महामारी के बाद शिक्षा क्षेत्र के सामने आई चुनौतियों के कठिन दौर में उन्होंने महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाई और शिक्षा के क्षेत्र को मजबूत आधार देने का प्रयास किया। उन्होंने कहा कि बी.सी. नागेश का योगदान और उनका सरल व्यक्तित्व लंबे समय तक याद किया जाएगा।

  • विधायकों को नई कार, ₹75 हजार भत्ता; विजय का बड़ा ऐलान

    भारतार्थ खबर। संवाददाता: धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) चेन्नई, 19 अगस्त 2026।तमिलनाडु सरकार ने विधायकों के लिए नई सुविधाओं के साथ स्वास्थ्य और चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में भी कई बड़ी घोषणाएं की हैं। मुख्यमंत्री विजय ने सभी विधायकों को नई कार उपलब्ध कराने तथा हर महीने ₹75 हजार का भत्ता देने की घोषणा की है। इसके अलावा प्रत्येक विधायक के कार्यालय में एक सहायक रखने के लिए ₹25 हजार मासिक अतिरिक्त दिए जाएंगे। सरकार के मुताबिक नई कार का उपयोग विधायक अपने विधानसभा क्षेत्रों में लोगों से संपर्क करने और उनकी समस्याओं के समाधान के लिए कर सकेंगे। ₹75 हजार के मासिक प्रावधान में वाहन से जुड़े खर्च और चालक का वेतन शामिल होगा। VCK विधायक की मांग के बाद घोषणा विधायकों के लिए सरकारी वाहन की मांग VCK विधायक जोतिमणि ने विधानसभा में उठाई थी। उन्होंने कहा था कि पर्याप्त लॉजिस्टिक सुविधाओं के अभाव में विधायकों के लिए अपने क्षेत्रों में प्रभावी ढंग से काम करना कठिन होता है। एक वरिष्ठ DMK विधायक ने भी कहा कि इससे पहले की सरकारें वित्तीय बाधाओं का हवाला देकर विधायकों की ऐसी मांगों को टालती रही हैं। उन्होंने कहा कि नगर निकायों के अध्यक्षों, मेयर और डिप्टी मेयर को सरकारी वाहन उपलब्ध कराए जाते हैं, जबकि विधायकों को यह सुविधा नहीं मिलती। चिकित्सा शिक्षा के लिए ₹351 करोड़ सरकार ने सरकारी मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश क्षमता बढ़ाने के लिए ₹351 करोड़ के प्रावधान की घोषणा की है। स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए प्रशिक्षित मानव संसाधन तैयार करने के उद्देश्य से कुल 6,098 अतिरिक्त सीटें बढ़ाने का प्रस्ताव है। इनमें बीएससी नर्सिंग की 660 सीटें, नर्सिंग कॉलेजों एवं स्कूलों में 1,925 सीटें, 12 पैरामेडिकल पाठ्यक्रमों में 2,778 सीटें और मेडिकल पाठ्यक्रमों में 735 अतिरिक्त सीटें शामिल हैं। इसके साथ ही राज्य में सात नए सरकारी नर्सिंग कॉलेज स्थापित करने की घोषणा भी की गई है। पेरम्बलूर में 400 बेड का अस्पताल पेरम्बलूर में करीब ₹300 करोड़ की लागत से 400 बेड का मल्टी-स्पेशियलिटी अस्पताल स्थापित करने की योजना है। अस्पताल में आधुनिक चिकित्सा सुविधाएं और उन्नत उपचार उपलब्ध कराने का प्रस्ताव है। स्वास्थ्य बीमा की सीमा ₹25 लाख करने का प्रस्ताव सरकार ने मुख्यमंत्री व्यापक स्वास्थ्य बीमा योजना के तहत वार्षिक चिकित्सा उपचार सीमा को ₹5 लाख से बढ़ाकर ₹25 लाख करने का प्रस्ताव रखा है। इसके अलावा ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए अतिरिक्त चिकित्सा एवं सर्जिकल सेवाओं को भी योजना में शामिल करने की बात कही गई है। ये विशेष सेवाएं चेन्नई के स्टेनली मेडिकल कॉलेज सहित तिरुनेलवेली, तूतीकोरिन, चेंगलपट्टू, तिरुवरूर, करूर और कन्याकुमारी में उपलब्ध कराने का प्रस्ताव है। सरकार की इन घोषणाओं में विधायकों की कार्यक्षमता बढ़ाने के साथ-साथ चिकित्सा एवं नर्सिंग शिक्षा के विस्तार, स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत करने और आम लोगों तक बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने पर जोर दिया गया है।

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