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 भारतार्थ खबर, नहीं उसका अर्थ

21अक्टूबर /2026 /बुधवार

बेंगलुरु, 20 अक्टूबर 2026। बेंगलुरु में आयोजित 48वें दशहरा महोत्सव में राज्यसभा सांसद लहर सिंह सिरोया ने मां दुर्गा के दर्शन कर पूजा-अर्चना की और आशीर्वाद प्राप्त किया। सिद्धार्थ सांस्कृतिक समिति एवं राजेंद्र बाबू मेमोरियल ट्रस्ट ‘बिहार भवन’ के तत्वावधान में आयोजित इस महोत्सव में सांसद की उपस्थिति रही। इस अवसर पर समिति के पदाधिकारियों और सदस्यों ने मां भगवती की चुनड़ी ओढ़ाकर उनका स्वागत एवं अभिनंदन किया।

भारतार्थ लोगो: खबर नहीं, उसका अर्थ - राजनीतिक समाचार विश्लेषण

बेंगलुरु, 20 अक्टूबर 2026। बेंगलुरु में आयोजित 48वें दशहरा महोत्सव में राज्यसभा सांसद लहर सिंह सिरोया ने मां दुर्गा के दर्शन कर पूजा-अर्चना की और आशीर्वाद प्राप्त किया। सिद्धार्थ सांस्कृतिक समिति एवं राजेंद्र बाबू मेमोरियल ट्रस्ट ‘बिहार भवन’ के तत्वावधान में आयोजित इस महोत्सव में सांसद की उपस्थिति रही। इस अवसर पर समिति के पदाधिकारियों और सदस्यों ने मां भगवती की चुनड़ी ओढ़ाकर उनका स्वागत एवं अभिनंदन किया।

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  • कर्नाटक का क्वांटम रोडमैप लॉन्च, 2035 तक 20 बिलियन डॉलर इकॉनमी का लक्ष्य

    भारतार्थ खबर, बेंगलूरु संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) बेंगलूरु। कर्नाटक ने उभरती हुई क्वांटम टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में देश को नई दिशा देते हुए भारत का पहला व्यापक क्वांटम रोडमैप “विज़न से रियलिटी तक” लॉन्च कर ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है। इस पहल के साथ राज्य ने वर्ष 2035 तक 20 बिलियन डॉलर की क्वांटम अर्थव्यवस्था विकसित करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है। राज्य सरकार के इस दूरदर्शी कदम का उद्देश्य क्वांटम कंप्यूटिंग, क्वांटम कम्युनिकेशन और क्वांटम सेंसिंग जैसे अत्याधुनिक क्षेत्रों में अनुसंधान, नवाचार और औद्योगिक विकास को गति देना है। इस रोडमैप के जरिए कर्नाटक न केवल तकनीकी आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देगा, बल्कि वैश्विक स्तर पर भारत की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति को भी मजबूत करेगा। इस महत्वाकांक्षी योजना के तहत “क्वांटम-सिटी” की स्थापना का प्रस्ताव रखा गया है, जो क्वांटम टेक्नोलॉजी से जुड़े स्टार्टअप्स, शोध संस्थानों और उद्योगों के लिए एक समर्पित इकोसिस्टम प्रदान करेगा। इसके साथ ही एक विशेष क्वांटम टास्क फोर्स का गठन भी किया जाएगा, जो नीति निर्माण, अनुसंधान दिशा और वैश्विक सहयोग को समन्वित करने का कार्य करेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि यह पहल कर्नाटक को क्वांटम टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में अग्रणी बनाने के साथ-साथ उच्च गुणवत्ता वाले रोजगार अवसर भी पैदा करेगी। स्किल डेवलपमेंट पर विशेष जोर देते हुए राज्य युवाओं को भविष्य की तकनीकों के अनुरूप तैयार करने की दिशा में भी ठोस कदम उठा रहा है। सरकार का फोकस अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों को मजबूत करने पर भी है, ताकि वैश्विक संस्थानों और कंपनियों के साथ मिलकर अनुसंधान एवं विकास को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया जा सके। इससे निवेश आकर्षित होगा और राज्य में टेक्नोलॉजी आधारित उद्योगों का विस्तार होगा। कर्नाटक पहले से ही आईटी और स्टार्टअप इकोसिस्टम में देश का अग्रणी केंद्र रहा है। अब क्वांटम टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में यह पहल राज्य को भविष्य की तकनीकी क्रांति का नेतृत्व करने की दिशा में एक मजबूत आधार प्रदान करेगी। स्पष्ट है कि विज्ञान और तकनीक के सहारे कर्नाटक विकास की नई इबारत लिख रहा है। इनोवेशन को विकास का इंजन बनाकर राज्य न केवल अपनी अर्थव्यवस्था को सशक्त कर रहा है, बल्कि भारत को भी वैश्विक टेक्नोलॉजी मानचित्र पर नई पहचान दिलाने की ओर अग्रसर है।

  • मांड्या में एआरएआई सेंटर 500 एकड़ तक बढ़ाने पर मंथन

    भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) मांड्या। कर्नाटक में ऑटोमोबाइल क्षेत्र को नई दिशा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल सामने आई है। राज्य के उद्योग मंत्री एम.बी. पाटिल ने बुधवार को केंद्रीय भारी उद्योग मंत्री एच.डी. कुमारस्वामी के साथ उच्चस्तरीय बैठक कर मांड्या में प्रस्तावित देश के पहले एआरएआई (ऑटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया) सेंटर को लेकर विस्तृत चर्चा की। बैठक में इस महत्वाकांक्षी परियोजना को मौजूदा 100 एकड़ से बढ़ाकर 500 एकड़ तक विस्तारित करने की संभावनाओं पर गंभीर विचार-विमर्श हुआ। राज्य सरकार पहले ही इस प्रोजेक्ट के लिए 100 एकड़ भूमि आवंटित कर चुकी है, जबकि राज्य और एआरएआई अधिकारियों की संयुक्त टीम द्वारा स्थल निरीक्षण भी पूरा किया जा चुका है। मंत्री एम.बी. पाटिल ने केंद्रीय मंत्री को अब तक हुई प्रगति की जानकारी देते हुए कहा कि यह परियोजना केवल एक रिसर्च सेंटर तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि भविष्य में यह क्षेत्र ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरिंग और एंसिलरी इंडस्ट्रीज़ का बड़ा हब बन सकता है। इसी व्यापक दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए भूमि विस्तार का प्रस्ताव रखा गया है। बैठक में यह भी निर्देश दिए गए कि संबंधित अधिकारी शीघ्र ही अतिरिक्त भूमि की उपलब्धता का आकलन कर विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करें, ताकि परियोजना के विस्तार पर जल्द निर्णय लिया जा सके। इस अहम बैठक में विधायक एच.डी. रेवन्ना, सांसद एम. मल्लेश बाबू, पूर्व मंत्री डी.सी. थम्मन्ना और सी.एस. पुट्टाराजू, मांड्या के विधायक रविकुमार, एमएलसी सरवण सहित कई जनप्रतिनिधि और अधिकारी मौजूद रहे। इसके अलावा एआरएआई के निदेशक डॉ. रेजी मथाई और सीनियर डिप्टी डायरेक्टर डॉ. बी.वी. शमसुंदर सहित राज्य सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों ने भी बैठक में भाग लिया। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह परियोजना प्रस्तावित विस्तार के साथ आगे बढ़ती है, तो कर्नाटक के औद्योगिक परिदृश्य में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है और मांड्या जिला देश के प्रमुख ऑटोमोबाइल अनुसंधान और उत्पादन केंद्र के रूप में उभर सकता है।

  • शपथ समारोह से दूर रहे निशांत, संगठन पर फोकस

    भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) पटना। बिहार की राजनीति में बुधवार को एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया, जब सम्राट चौधरी ने राज्य के 24वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण की। राजधानी स्थित लोकभवन में आयोजित भव्य समारोह में राजनीतिक और प्रशासनिक जगत की कई प्रमुख हस्तियां मौजूद रहीं। जदयू कोटे से विजय कुमार चौधरी और बिजेंद्र प्रसाद यादव ने उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ली। हालांकि इस समारोह में एक नाम की अनुपस्थिति ने सियासी गलियारों में चर्चा को हवा दे दी—पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के पुत्र निशांत कुमार। समारोह से पहले यह कयास लगाए जा रहे थे कि निशांत कुमार को जदयू की ओर से उपमुख्यमंत्री बनाया जा सकता है, लेकिन उन्होंने इस पद को स्वीकार करने से इंकार कर दिया। उनकी गैरमौजूदगी पर उठे सवालों का जवाब देते हुए उपमुख्यमंत्री बिजेंद्र प्रसाद यादव ने स्पष्ट कहा कि राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाना या न निभाना पूरी तरह निशांत का व्यक्तिगत निर्णय है। सूत्रों के अनुसार, निशांत कुमार फिलहाल सत्ता की बजाय संगठनात्मक जिम्मेदारियों पर ध्यान केंद्रित करना चाहते हैं। जदयू के भीतर उनकी भूमिका लगातार मजबूत होती नजर आ रही है। पार्टी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय कुमार झा ने भी पुष्टि की कि निशांत पार्टी में सक्रिय हैं और संगठन को मजबूत करने में जुटे हुए हैं। उन्होंने बताया कि निशांत लगातार कार्यकर्ताओं और नेताओं से संवाद स्थापित कर रहे हैं तथा संगठन की कार्यप्रणाली को समझते हुए अपनी भागीदारी बढ़ा रहे हैं। राजनीतिक सूत्रों का यह भी कहना है कि नीतीश कुमार फिलहाल नहीं चाहते कि उनके पुत्र सीधे सत्ता में प्रवेश करें। उनका मानना है कि पहले संगठन में अनुभव हासिल करना आवश्यक है, ताकि भविष्य में बड़ी जिम्मेदारियों का निर्वहन बेहतर तरीके से किया जा सके। इसी रणनीति के तहत निशांत को धीरे-धीरे राजनीतिक रूप से तैयार किया जा रहा है। यह भी संकेत मिल रहे हैं कि आने वाले समय में निशांत कुमार को विधान परिषद के जरिए सक्रिय राजनीति में औपचारिक रूप से उतारा जा सकता है। इसके साथ ही वे राज्यभर में दौरे कर संगठन को मजबूत करने की दिशा में काम कर सकते हैं। गौरतलब है कि नीतीश कुमार लंबे समय से खुद को परिवारवाद की राजनीति से अलग रखने की कोशिश करते रहे हैं। समाजवादी विचारधारा के नेताओं जैसे राममनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण और कर्पूरी ठाकुर के आदर्शों का अनुसरण करते हुए वे परिवार आधारित राजनीति से दूरी बनाए रखने का संदेश देते रहे हैं। यही कारण है कि निशांत की पार्टी में औपचारिक एंट्री के दौरान भी वे स्वयं उपस्थित नहीं रहे। बहरहाल, शपथ समारोह में अनुपस्थित रहकर भी निशांत कुमार ने बिहार की राजनीति में अपनी मौजूदगी का एहसास करा दिया है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि संगठन से शुरुआत करने वाला यह युवा चेहरा भविष्य में किस रूप में उभरता है।

  • तंजावुर में विठोबा मंदिर पर मराठा संगम का शक्ति प्रदर्शन, बीजेपी उम्मीदवार को समर्थन

    भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) तंजावुर, तमिलनाडु। तंजावुर के कीलावेती स्थित विठोबा मंदिर में तमिलनाडु मराठा संगम की ओर से आयोजित विशेष पूजा एवं सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यक्रम ने राजनीतिक और सामाजिक दृष्टि से महत्वपूर्ण संदेश दिया। इस अवसर पर बड़ी संख्या में मराठा समाज के लोगों की उपस्थिति ने न केवल सांस्कृतिक एकता को प्रदर्शित किया, बल्कि आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर समाज की सक्रियता भी उजागर की। कार्यक्रम में कर्नाटक मीडिया के अध्यक्ष करुणागर कासले तथा कर्नाटक अन्य भाषा समाचार पत्र के अध्यक्ष चंद्रकांत विशेष रूप से उपस्थित रहे। दोनों अतिथियों ने आयोजन की सराहना करते हुए इसे सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक परंपराओं के संरक्षण का उत्कृष्ट उदाहरण बताया। इस आयोजन में तंजावुर क्षेत्र के 50 से अधिक मराठा परिवारों ने भाग लेकर एकजुटता का परिचय दिया। कार्यक्रम के दौरान उपस्थित समाजजनों ने आगामी तंजावुर विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार थिरु कर्पू मुरुगनंदम के समर्थन की घोषणा की। वक्ताओं ने कहा कि तमिलनाडु में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की सरकार बनाना राज्य के समग्र विकास के लिए आवश्यक है। तमिलनाडु मराठा संगम के राज्य अध्यक्ष थिरु विश्वजीत कड़ेराव साहेब ने अपने संबोधन में समाज को संगठित रहने और राजनीतिक रूप से जागरूक बनने का आह्वान किया। तंजावुर जिला अध्यक्ष अलेक्जेंडर भोंसले और जिला सचिव ए. रघुपति राव सूर्यवंशी ने भी समाज के हितों और विकास के लिए एकजुट होकर कार्य करने पर बल दिया। कार्यक्रम में राज्य युवा विंग के सचिव एम. विनोद राव मोहिते सहित अन्य पदाधिकारियों और गणमान्य नागरिकों ने भी सक्रिय भागीदारी निभाई। आयोजन के अंत में सभी उपस्थितजनों ने सामूहिक रूप से समाज की प्रगति और क्षेत्र के विकास के लिए सहयोग करने का संकल्प लिया। यह कार्यक्रम न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक रहा, बल्कि सामाजिक एकता और राजनीतिक जागरूकता का सशक्त मंच भी साबित हुआ।

  • शोक पत्र में चूक, सोनिया गांधी ट्रोल

    भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) नई दिल्ली। दिग्गज गायिका आशा भोसले के निधन के बाद देशभर में शोक की लहर है। सिनेमा, संगीत और राजनीति जगत की अनेक हस्तियों ने उनके परिवार के प्रति संवेदनाएं व्यक्त की हैं। इसी क्रम में कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी द्वारा भेजे गए शोक पत्र को लेकर अब विवाद खड़ा हो गया है। पत्र में हुई एक गंभीर त्रुटि के कारण सोशल मीडिया पर उन्हें तीखी आलोचना और ट्रोलिंग का सामना करना पड़ रहा है। दरअसल, सोनिया गांधी ने अपने शोक संदेश की शुरुआत “प्रिय आनंद और हेमंत” लिखकर की। यहीं से विवाद की शुरुआत हुई, क्योंकि आशा भोसले के बड़े पुत्र हेमंत भोसले का निधन वर्ष 2015 में कैंसर के कारण हो चुका है। ऐसे में दिवंगत व्यक्ति के नाम पत्र संबोधित किए जाने को लेकर लोगों ने इसे बड़ी चूक और असंवेदनशीलता करार दिया है। सोशल मीडिया पर यूजर्स ने इस गलती को लेकर कांग्रेस पर भी निशाना साधा। कई लोगों ने सवाल उठाया कि जब कोई राष्ट्रीय स्तर का नेता किसी प्रतिष्ठित परिवार को शोक संदेश भेजता है, तो तथ्यों की पुष्टि क्यों नहीं की जाती। एक यूजर ने तंज कसते हुए लिखा कि “ऐसी गलतियां लापरवाही और गैर-गंभीरता को दर्शाती हैं,” जबकि अन्य ने इसे “संवेदनहीन प्रशासनिक चूक” बताया। हालांकि, यदि इस त्रुटि को अलग रखा जाए, तो शोक पत्र की भाषा में आशा भोसले के प्रति गहरा सम्मान झलकता है। सोनिया गांधी ने अपने संदेश में लिखा कि आशा जी के निधन से संगीत के स्वर्णिम युग का अंत हो गया है। उन्होंने उन्हें एक ऐसी महान कलाकार बताया, जिनकी आवाज ने करोड़ों लोगों के दिलों को छुआ और जिनकी कला ने हर शैली में अपनी अमिट छाप छोड़ी। उन्होंने आगे लिखा कि आशा भोसले न केवल एक अद्वितीय गायिका थीं, बल्कि देश की सांस्कृतिक धरोहर भी थीं। पत्र में परिवार के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त करते हुए इस दुख की घड़ी में ईश्वर से शक्ति प्रदान करने की प्रार्थना भी की गई। यह घटना ऐसे समय में सामने आई है जब सार्वजनिक जीवन में संचार की शुद्धता और संवेदनशीलता पर लगातार सवाल उठ रहे हैं। आलोचकों का मानना है कि इस तरह की त्रुटियां न केवल व्यक्तिगत स्तर पर असहज स्थिति उत्पन्न करती हैं, बल्कि संस्थागत कार्यप्रणाली पर भी प्रश्नचिह्न लगाती हैं। फिलहाल, इस पूरे विवाद पर कांग्रेस की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन सोशल मीडिया पर यह मुद्दा चर्चा का केंद्र बना हुआ है।

  • एसएचओ पर ईओयू का शिकंजा, करोड़ों की अवैध संपत्ति उजागर

    भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) पटना/किशनगंज। बिहार में भ्रष्टाचार के खिलाफ चल रही सख्त कार्रवाई के बीच आर्थिक अपराध इकाई (ईओयू) ने किशनगंज सदर थाना के थानाध्यक्ष अभिषेक कुमार रंजन पर बड़ी कार्रवाई करते हुए करोड़ों रुपये की संदिग्ध संपत्ति का खुलासा किया है। मंगलवार सुबह करीब 8:30 बजे पटना, छपरा और किशनगंज समेत पांच ठिकानों पर एक साथ छापेमारी की गई, जिससे पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया। आय से 118 प्रतिशत अधिक संपत्ति, जांच में बड़ा खुलासा ईओयू की प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि अभिषेक कुमार रंजन की वैध आय और अर्जित संपत्ति के बीच भारी अंतर है। जांच के अनुसार उनकी कुल संपत्ति उनकी आय से लगभग 118.66 प्रतिशत अधिक पाई गई है, जिसे अवैध माना जा रहा है। 1.47 करोड़ की आय, 2.09 करोड़ से अधिक की संपत्ति जांच रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2009 में सब-इंस्पेक्टर के रूप में सेवा शुरू करने वाले रंजन 2023 में इंस्पेक्टर बने। इस दौरान उनकी कुल वैध आय करीब 1.47 करोड़ रुपये आंकी गई है, जबकि उनकी संपत्ति 2.09 करोड़ रुपये से अधिक पाई गई। खर्चों के समायोजन के बाद भी लगभग 1.70 करोड़ रुपये की संपत्ति को अवैध माना गया है। पटना में आलीशान मकान, कई शहरों में निवेश छापेमारी के दौरान पटना के रामकृष्ण नगर में 2200 वर्ग फीट में फैला चार मंजिला आलीशान मकान मिला, जिसकी अनुमानित कीमत 2 करोड़ रुपये से अधिक बताई जा रही है। इसके अलावा छपरा में 30 लाख रुपये का मकान, पैतृक गांव में 50 लाख रुपये का निर्माणाधीन घर और सिलीगुड़ी के दार्जिलिंग रोड पर 6 कट्ठा जमीन में निवेश का भी खुलासा हुआ है। जांच एजेंसियों का दावा है कि इन संपत्तियों में भारी मात्रा में नकद लेनदेन हुआ है। लग्जरी लाइफस्टाइल ने बढ़ाए शक ईओयू की जांच में अधिकारी की जीवनशैली भी संदेह के घेरे में है। जानकारी के मुताबिक, मुंबई यात्रा के दौरान वे परिवार सहित 15 दिनों तक पांच सितारा होटल ‘ताज’ में ठहरे थे। महंगे गैजेट्स, लग्जरी सामान और बच्चों की उच्च शिक्षा पर भारी खर्च ने आय और व्यय के बीच असंतुलन को और स्पष्ट कर दिया है। सिंडिकेट कनेक्शन की आशंका जांच एजेंसी को आशंका है कि रंजन का संबंध जमीन कारोबार और अवैध सिंडिकेट से रहा है। सिलीगुड़ी में फ्लैट, कई ट्रकों की खरीद और मुजफ्फरपुर में करोड़ों के निवेश के संकेत मिले हैं। अनुमान है कि उनकी बेनामी संपत्ति 20 करोड़ रुपये से अधिक हो सकती है। साथ ही किशनगंज में तैनाती के दौरान बालू, शराब और तस्करी नेटवर्क से जुड़े लोगों को संरक्षण देने तथा अवैध उगाही के आरोप भी सामने आए हैं। जांच जारी, और खुलासों की संभावना डीएसपी सुनील कुमार के नेतृत्व में ईओयू की टीम मामले की गहन जांच में जुटी है। छापेमारी के दौरान बरामद दस्तावेजों और संपत्तियों की जांच की जा रही है। अधिकारियों का कहना है कि आने वाले दिनों में इस मामले में और भी बड़े खुलासे हो सकते हैं। यह कार्रवाई बिहार में भ्रष्टाचार के खिलाफ सरकार की सख्त नीति का संकेत मानी जा रही है और इससे पुलिस विभाग में पारदर्शिता को लेकर नई बहस छिड़ गई है।

  • मित्तल पर ईडी का शिकंजा, एलपीयू समेत कई ठिकानों पर छापे

    भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) जालंधर/चंडीगढ़। आम आदमी पार्टी (आप) के राज्यसभा सांसद अशोक कुमार मित्तल के ठिकानों पर बुधवार को प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की बड़ी कार्रवाई ने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी। एजेंसी ने पंजाब के फगवाड़ा स्थित लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी (एलपीयू) परिसर सहित लवली ग्रुप से जुड़े कई स्थानों पर एक साथ छापेमारी की। सूत्रों के अनुसार, यह कार्रवाई विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (फ़ेमा) के कथित उल्लंघन से जुड़े मामले में की गई है। ईडी की जालंधर और चंडीगढ़ टीमों ने संयुक्त रूप से इस ऑपरेशन को अंजाम दिया। खास बात यह रही कि इस दौरान केंद्रीय एजेंसी ने स्थानीय पुलिस की कोई सहायता नहीं ली, जिससे कार्रवाई की गोपनीयता और संवेदनशीलता का अंदाजा लगाया जा रहा है। अशोक मित्तल, जो एलपीयू के संस्थापक एवं चांसलर हैं, अपने भाइयों रमेश मित्तल और नरेश मित्तल के साथ इस शैक्षणिक समूह का संचालन करते हैं। छापेमारी की जद में यूनिवर्सिटी के प्रशासनिक दफ्तरों के अलावा समूह से जुड़े अन्य कारोबारी प्रतिष्ठान भी आए। इस बीच, पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने दावा किया कि ईडी ने एलपीयू परिसर के साथ-साथ जालंधर स्थित मित्तल के निजी आवास पर भी छापा मारा है। उन्होंने केंद्र की भाजपा सरकार पर निशाना साधते हुए इस कार्रवाई को राजनीतिक प्रतिशोध करार दिया। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर उन्होंने लिखा कि यह “मोदी सरकार की सामान्य कार्यशैली” का हिस्सा है। गौरतलब है कि यह कार्रवाई ऐसे समय में हुई है जब हाल ही में आप नेतृत्व ने अशोक मित्तल को राज्यसभा में डिप्टी लीडर की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी है। उन्होंने इस पद पर राघव चड्ढा का स्थान लिया है। इस बदलाव को लेकर पार्टी के भीतर मतभेद की चर्चाएं भी सामने आई थीं, हालांकि मित्तल ने इसे संगठन की सामान्य प्रक्रिया बताया। उन्होंने स्पष्ट किया कि राघव चड्ढा पार्टी के वरिष्ठ नेता हैं और आगे भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहेंगे। मित्तल ने कहा कि आप एक लोकतांत्रिक दल है, जहां समय-समय पर नेताओं को नई जिम्मेदारियां सौंपी जाती हैं। ईडी की इस कार्रवाई ने जहां एक ओर कानूनी और आर्थिक पहलुओं पर सवाल खड़े किए हैं, वहीं दूसरी ओर यह मामला आगामी चुनावी परिदृश्य में राजनीतिक रंग भी लेता नजर आ रहा है। फिलहाल एजेंसी की जांच जारी है और आने वाले दिनों में इस प्रकरण में और खुलासे होने की संभावना है।

  • पवन खेड़ा को सुप्रीम कोर्ट से झटका, हाईकोर्ट की जमानत पर रोक

    भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) नई दिल्ली। कांग्रेस नेता पवन खेड़ा को भारत का सर्वोच्च न्यायालय से बड़ा झटका लगा है। शीर्ष अदालत ने तेलंगाना हाईकोर्ट द्वारा दी गई ट्रांजिट अग्रिम जमानत पर रोक लगा दी है। साथ ही अदालत ने असम सरकार की याचिका पर सुनवाई करते हुए खेड़ा को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। इस फैसले के बाद राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। मामला उस आदेश से जुड़ा है, जिसमें तेलंगाना हाईकोर्ट ने 10 अप्रैल 2026 को पवन खेड़ा को एक सप्ताह की ट्रांजिट अग्रिम जमानत दी थी। इस राहत को चुनौती देते हुए असम सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। अब सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश पर अंतरिम रोक लगाते हुए स्पष्ट किया है कि मामले की सुनवाई जारी रहेगी और सभी पक्षों की दलीलों पर विचार किया जाएगा। असम सरकार की ओर से अदालत में यह तर्क रखा गया कि खेड़ा के खिलाफ लगाए गए आरोप गंभीर प्रकृति के हैं और ऐसे मामलों में ट्रांजिट अग्रिम जमानत देना उचित नहीं है। सरकार का कहना है कि इससे जांच प्रभावित हो सकती है और न्यायिक प्रक्रिया पर असर पड़ सकता है। दरअसल, यह विवाद उस समय शुरू हुआ जब पवन खेड़ा ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा और उनके परिवार को लेकर गंभीर आरोप लगाए थे। खेड़ा ने दावा किया था कि मुख्यमंत्री की पत्नी के पास कथित रूप से तीन अलग-अलग देशों के पासपोर्ट हैं और उनके पास कुछ ऐसे दस्तावेज हैं जो बड़े खुलासों की ओर इशारा करते हैं। इन आरोपों को मुख्यमंत्री और उनके परिवार ने सिरे से खारिज करते हुए इन्हें भ्रामक, मनगढ़ंत और राजनीतिक रूप से प्रेरित बताया है। इसके बाद मामला कानूनी दायरे में पहुंचा और विभिन्न धाराओं के तहत कार्रवाई शुरू हुई। इस घटनाक्रम ने राजनीतिक माहौल को और अधिक गर्म कर दिया है। कांग्रेस इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़कर देख रही है, जबकि असम सरकार इसे गंभीर कानूनी और प्रशासनिक मुद्दा बता रही है। अब सुप्रीम कोर्ट के ताजा हस्तक्षेप के बाद मामले ने नया मोड़ ले लिया है। आगामी सुनवाई में अदालत का रुख क्या रहता है, इस पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं।

  • बेंगलूरु की शासन व्यवस्था पर सवाल, 80 प्रतिशत खर्च पर ‘शून्य जवाबदेही’

    भारतार्थ खबर, बेंगलूरु संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) बेंगलूरु। देश की आईटी राजधानी बेंगलूरु में सार्वजनिक धन के उपयोग को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। शहर में लगभग 80 प्रतिशत सार्वजनिक व्यय ऐसे अर्ध-सरकारी निकायों और राज्य विभागों के हाथों में है, जो न तो चुने हुए हैं और न ही सीधे तौर पर नागरिकों के प्रति जवाबदेह। यह खुलासा नागरिक संगठन जनअग्रहा की एक हालिया रिपोर्ट में हुआ है, जिसने शहर की प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही पर चिंता बढ़ा दी है। रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2020 से नगर सरकार निर्वाचित प्रतिनिधियों के बिना कार्य कर रही है। ऐसे में यह बड़ा प्रश्न खड़ा होता है कि हजारों करोड़ रुपये के सार्वजनिक धन के खर्च की जिम्मेदारी आखिर किसकी है। खर्च का बंटवारा और जवाबदेही का संकट आंकड़ों के मुताबिक, कुल सार्वजनिक व्यय का केवल 19.6 प्रतिशत हिस्सा ही बृहत् बेंगलूरु महानगर पालिका (बीबीएमपी) के नियंत्रण में है। शेष धनराशि विभिन्न एजेंसियों में विभाजित है—बेंगलूरु विद्युत आपूर्ति कंपनी (47.3 प्रतिशत), बेंगलूरु मेट्रो रेल निगम लिमिटेड (13.4 प्रतिशत), जल आपूर्ति एवं सीवरेज बोर्ड (8.8 प्रतिशत), मेट्रोपॉलिटन ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन (6.3 प्रतिशत) और पुलिस विभाग (2.4 प्रतिशत)। ये एजेंसियां शहर की आवश्यक सेवाएं तो संभालती हैं, लेकिन नागरिकों के प्रति उनकी जवाबदेही स्पष्ट नहीं है। यही कारण है कि आम नागरिकों और निर्णय लेने वाली संस्थाओं के बीच दूरी लगातार बढ़ती जा रही है। रोजमर्रा की समस्याओं में दिखती है कमी रिपोर्ट में बताया गया है कि जब पानी की आपूर्ति बाधित होती है, सड़कें जर्जर होती हैं या बस किराया बढ़ता है, तो जिम्मेदारी तय करना मुश्किल हो जाता है। नागरिक शिकायत तो दर्ज कर सकते हैं, लेकिन एजेंसियों पर जवाब देने की कोई स्पष्ट कानूनी बाध्यता नहीं है। पारदर्शिता में पिछड़ती संस्थाएं जहां निजी कंपनियों को नियमित रूप से अपने वित्तीय विवरण सार्वजनिक करने होते हैं, वहीं बेंगलूरु की कई सार्वजनिक एजेंसियां इस जिम्मेदारी से मुक्त हैं। पारदर्शिता के मामले में बीबीएमपी और बीडीए का प्रदर्शन अपेक्षाकृत बेहतर रहा, लेकिन इसे भी पर्याप्त नहीं माना गया। वहीं, बीएमआरसीएल, बीएमटीसी और बीईएसकॉम जैसी एजेंसियां मध्यम स्तर पर रहीं, जबकि जल बोर्ड और अन्य प्राधिकरणों का प्रदर्शन बेहद खराब पाया गया। कुछ संस्थाएं तो ऐसी भी हैं, जिन्होंने किसी भी प्रकार की जानकारी सार्वजनिक नहीं की। चौंकाने वाली बात यह है कि एक प्रमुख इंफ्रास्ट्रक्चर संस्था, जिसे हजारों करोड़ का बजट मिला है, उसकी कार्यात्मक वेबसाइट तक नहीं है। कानूनी ढांचे में खामियां ग्रेटर बेंगलुरु अथॉरिटी अधिनियम, 2024 के तहत नगर निगमों को बजट और प्रदर्शन रिपोर्ट सार्वजनिक करना अनिवार्य है, लेकिन अधिकांश अर्ध-सरकारी निकाय इस दायरे से बाहर हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि 12 प्रमुख एजेंसियों में से केवल तीन पर ही वित्तीय जानकारी सार्वजनिक करने की कानूनी बाध्यता है। सुधार की जरूरत रिपोर्ट में तत्काल सुधारों की मांग की गई है। इसमें सभी सार्वजनिक प्राधिकरणों को एक समान पारदर्शिता ढांचे में लाने, शहर-स्तरीय व्यय डैशबोर्ड बनाने और परियोजनाओं की वास्तविक समय में जानकारी उपलब्ध कराने की सिफारिश शामिल है। साथ ही, खर्च को सेवा परिणामों—जैसे जल आपूर्ति, सड़क गुणवत्ता और कचरा प्रबंधन—से जोड़ने पर जोर दिया गया है। नागरिकों की प्रतिक्रिया स्थानीय नागरिकों का कहना है कि जहां ग्रामीण क्षेत्रों में ई-गवर्नेंस के माध्यम से पारदर्शिता बढ़ी है, वहीं बेंगलूरु जैसे महानगर में अभी भी यह कमी बनी हुई है। उनका कहना है, “पारदर्शिता के बिना जवाबदेही संभव नहीं है और जवाबदेही के बिना बेहतर शहरी शासन केवल एक अधूरा वादा बनकर रह जाता है।” बेंगलूरु की प्रशासनिक व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी अब एक गंभीर मुद्दा बन चुकी है। यदि समय रहते सुधार नहीं किए गए, तो इसका सीधा असर शहर के विकास और नागरिक सुविधाओं पर पड़ना तय है।

  • “चोरी या ‘गुम’? आंकड़ों के खेल में दबते अपराध”

    भारतार्थ खबर, बेंगलूरु संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) बेंगलूरु। शहर में मोबाइल चोरी और जेबकतरी जैसी घटनाओं को “गुमशुदा” शिकायतों के रूप में दर्ज करने का मामला एक गंभीर प्रशासनिक और कानूनी बहस का विषय बनता जा रहा है। स्पष्ट प्रक्रियात्मक दिशा-निर्देशों के बावजूद, कई पुलिस थानों में चोरी के मामलों को कथित तौर पर “लॉस्ट प्रॉपर्टी” के रूप में दर्ज किया जा रहा है, जिससे न केवल अपराध के वास्तविक आंकड़े प्रभावित हो रहे हैं बल्कि पीड़ितों को न्याय मिलने की प्रक्रिया भी कमजोर पड़ रही है। हाल ही में सिल्क बोर्ड फ्लाईओवर के पास घटी एक घटना ने इस प्रवृत्ति को उजागर कर दिया। 6 अप्रैल 2026 को दोपहर करीब 1:30 बजे एक 23 वर्षीय युवक को एक कार ने टक्कर मार दी। हादसे के बाद मदद के बहाने पहुंचे दो लोगों ने उसकी जेब से मोबाइल फोन चुरा लिया। घटना स्पष्ट रूप से चोरी की श्रेणी में आती है, लेकिन पुलिस ने इसे “गुमशुदगी” की शिकायत के रूप में दर्ज किया। पीड़ित ने बताया, “मैंने बोम्मनहल्ली पुलिस स्टेशन में लिखित शिकायत दी, लेकिन एफआईआर दर्ज नहीं की गई। पुलिस ने कहा कि बिना एफआईआर के भी फोन ढूंढ लिया जाएगा। बाद में मेरा मोबाइल नंबर सीईआईआर पोर्टल पर ब्लॉक कर दिया गया, लेकिन उसके बाद कोई अपडेट नहीं मिला।” सीईआईआर पर बढ़ती निर्भरता, लेकिन सीमित सफलता पुलिस के अनुसार, पिछले तीन महीनों में बेंगलूरु में सेंट्रल इक्विपमेंट आइडेंटिटी रजिस्टर (सीईआईआर) पोर्टल पर 13,912 मोबाइल डिवाइस की रिपोर्ट दर्ज की गई है। हालांकि, इन मामलों में रिकवरी दर मात्र 27.2 प्रतिशत रही है, जो इस व्यवस्था की सीमाओं को दर्शाती है। कानूनी विशेषज्ञों की चिंता कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि चोरी के मामलों को “गुम” के रूप में दर्ज करना एक पुरानी लेकिन चिंताजनक प्रवृत्ति है। इससे न केवल संज्ञेय अपराधों में अनिवार्य एफआईआर दर्ज करने की प्रक्रिया दरकिनार होती है, बल्कि जांच का दायरा भी सीमित हो जाता है। वकीलों के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति से जबरन फोन छीना जाता है तो यह डकैती या चोरी का मामला बनता है, जबकि सामान्य परिस्थितियों में चोरी भी संज्ञेय अपराध है और उसमें एफआईआर दर्ज होना अनिवार्य है। इसके विपरीत, “गुमशुदा” शिकायत को मामूली मानकर अक्सर गहन जांच नहीं की जाती। आंकड़ों का दबाव या संसाधनों की कमी? विशेषज्ञों का कहना है कि पुलिस पर बढ़ते कार्यभार और अपराध दर को नियंत्रित दिखाने के दबाव के चलते इस तरह की प्रवृत्तियां सामने आती हैं। चोरी की एफआईआर दर्ज करने का मतलब है विस्तृत जांच, रिपोर्टिंग और आगे की कानूनी प्रक्रिया—जो समय और संसाधन दोनों मांगती है। ऐसे में कई मामलों को “छोटा” मानकर उन्हें गुमशुदगी के रूप में दर्ज कर लिया जाता है। पीड़ितों के अनुभव भी यही बताते हैं एक अन्य पीड़ित, जो एक सहायक अभियंता है, ने बताया कि तड़के 3:30 बजे दोपहिया सवार दो लोगों ने उसकी जेब से मोबाइल छीन लिया। बावजूद इसके, उसका मामला भी “गुमशुदा” के रूप में दर्ज किया गया और केवल आईएमईआई नंबर ब्लॉक कर दिया गया। एक अन्य मामले में, एक कॉन्सर्ट के दौरान फोन खोने वाले व्यक्ति को कानूनी सलाह लेने के बाद ही एफआईआर दर्ज कराने में सफलता मिली। एफआईआर न होने के गंभीर परिणाम विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि यदि अपराधों को सही तरीके से दर्ज नहीं किया गया, तो न केवल अपराध के आंकड़े भ्रामक बनते हैं बल्कि भविष्य में आरोपी के खिलाफ मजबूत साक्ष्य जुटाना भी कठिन हो जाता है। इससे दोषसिद्धि की संभावना घटती है और अपराधियों को दोबारा अपराध करने का अवसर मिल सकता है। पुलिस आयुक्त का बयान शहर के पुलिस आयुक्त ने स्पष्ट किया है कि केवल वास्तव में खोई हुई वस्तुओं के मामलों में ही “लॉस्ट प्रॉपर्टी” शिकायत दर्ज की जानी चाहिए। यदि किसी व्यक्ति से फोन छीना गया है, तो उसे चोरी के रूप में दर्ज करना अनिवार्य है। उन्होंने आश्वासन दिया कि ऐसे मामलों की शिकायत मिलने पर जांच की जाएगी और दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। बेंगलूरु जैसे महानगर में बढ़ते डिजिटल अपराधों और जेबकतरी की घटनाओं के बीच, शिकायतों का सही वर्गीकरण केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था की नींव है। यदि आंकड़ों के दबाव में अपराधों को “गुम” बताकर दबाया गया, तो इसका खामियाजा अंततः आम नागरिकों को ही भुगतना पड़ेगा।

  • उद्घाटन में देरी, सफाईकर्मियों की बढ़ी मुश्किलें

    भारतार्थ खबर, बेंगलूरु संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) बेंगलूरु। राजा राजेश्वरी नगर विधानसभा क्षेत्र के यशवंतपुर स्थित पाइपलाइन रोड पर बने नवनिर्मित बहुउद्देशीय भवन का उद्घाटन लंबे समय से अटका हुआ है, जिसका खामियाजा बीस से अधिक महिला सफाईकर्मियों को रोजमर्रा की परेशानियों के रूप में भुगतना पड़ रहा है। करोड़ों रुपये की लागत से तैयार यह बहुमंजिला इमारत उपयोग के अभाव में बंद पड़ी है, जबकि जिनके लिए यह सुविधा बनाई गई, वे बुनियादी जरूरतों के लिए भी संघर्ष कर रही हैं। पहले ये महिला कर्मचारी एक पुराने ढांचे का उपयोग करती थीं, जहां उन्हें न केवल काम के दौरान विश्राम की जगह मिलती थी, बल्कि नाश्ता करने और कपड़े बदलने जैसी सुविधाएं भी उपलब्ध थीं। हालांकि, बीबीएमपी के तत्कालीन अधिकारियों द्वारा उस ढांचे को ध्वस्त कर नई इमारत बनाने का निर्णय लेने के बाद उनकी समस्याएं बढ़ गईं। वर्तमान स्थिति यह है कि सफाईकर्मियों को नाश्ता करने के लिए सड़क किनारे जगह तलाशनी पड़ रही है, जबकि कपड़े बदलने और शौच जैसी मूलभूत आवश्यकताओं के लिए उन्हें स्थानीय निवासियों की दया पर निर्भर रहना पड़ता है। कई महिलाएं मजबूरी में घर से ही वर्दी पहनकर निकलती हैं, जिससे उन्हें असुविधा और असहजता का सामना करना पड़ता है। एक महिला सफाईकर्मी ने अपनी पीड़ा साझा करते हुए कहा, “पहले हम भवन के परिसर में कपड़े बदल लेते थे, लेकिन अब इसकी अनुमति नहीं है। घर से वर्दी पहनकर आना पड़ता है, जो हमारे लिए बेहद असुविधाजनक है। हम चाहते हैं कि भवन का उद्घाटन जल्द से जल्द हो।” सिर्फ व्यक्तिगत असुविधा ही नहीं, बल्कि कामकाज से जुड़ी समस्याएं भी बढ़ गई हैं। कर्मचारियों के पास झाड़ू और अन्य उपकरण रखने के लिए कोई सुरक्षित स्थान नहीं है। एक अन्य सफाईकर्मी ने बताया, “हमें रोजाना अपने उपकरण घर ले जाने पड़ते हैं। बीएमटीसी बसों में झाड़ू लेकर सफर करना बेहद मुश्किल होता है। प्रशासन को चाहिए कि या तो वैकल्पिक व्यवस्था करे या भवन को तुरंत चालू करे।” स्थिति की गंभीरता इस बात से भी झलकती है कि ये कर्मचारी अपनी समस्याओं को लेकर खुलकर विरोध तक नहीं कर पा रही हैं। एक महिला कर्मचारी ने नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर कहा, “हमारे पास चुपचाप सहने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। भवन कब से तैयार है, लेकिन उद्घाटन क्यों नहीं हो रहा, यह सिर्फ अधिकारी और नेता ही जानते हैं।” इस बीच, बेंगलूरु सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट लिमिटेड (बीएसडब्ल्यूएमएल) की सहायक महाप्रबंधक पवना, जिनका हाल ही में यशवंतपुर में तबादला हुआ है, ने मामले को गंभीरता से लेते हुए जांच का आश्वासन दिया है। उन्होंने कहा कि वे स्थल का निरीक्षण कर महिला कर्मचारियों को हो रही असुविधाओं की रिपोर्ट वरिष्ठ अधिकारियों को सौंपेंगी। स्थानीय नागरिकों और सामाजिक संगठनों ने भी प्रशासन से मांग की है कि इस मुद्दे को प्राथमिकता देते हुए जल्द से जल्द भवन का उद्घाटन किया जाए, ताकि महिला सफाईकर्मियों को सम्मानजनक और सुरक्षित कार्य वातावरण मिल सके।

  • बेंगलूरु में जनगणना ड्यूटी में ‘वैज्ञानिक आवंटन’ की मांग, शिक्षकों का प्रदर्शन

    भारतार्थ खबर, बेंगलूरु संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) बेंगलूरु। 2027 की जनगणना को लेकर ड्यूटी आवंटन में व्यावहारिकता और पारदर्शिता की मांग करते हुए शहर के सैकड़ों सरकारी और अनुदानित स्कूलों के शिक्षक तथा प्री-यूनिवर्सिटी कॉलेज के व्याख्याता सोमवार को सड़कों पर उतर आए। एनआर स्क्वायर स्थित ग्रेटर बेंगलूरु अथॉरिटी (जीबीए) मुख्यालय के सामने हुए इस प्रदर्शन में शिक्षकों ने मुख्य आयुक्त एम. महेश्वर राव से ‘वैज्ञानिक आधार’ पर जनगणना क्षेत्रों के आवंटन की मांग की। कर्नाटक राज्य पूर्व-विश्वविद्यालय कॉलेज व्याख्याता संघ के नेतृत्व में आयोजित इस विरोध में शामिल शिक्षकों ने आरोप लगाया कि उन्हें उनके निवास या कार्यस्थल से तीस किलोमीटर से अधिक दूर जनगणना कार्य सौंपा जा रहा है, जिससे न केवल समय और संसाधनों की बर्बादी हो रही है, बल्कि उनकी नियमित शैक्षणिक जिम्मेदारियां भी प्रभावित हो रही हैं। संघ के अध्यक्ष निंगेगौड़ा ए.एच. ने कहा, “केंगेरी के शिक्षकों को येलाहांका और बैनरघट्टा के व्याख्याताओं को दूरस्थ क्षेत्रों में भेजा जा रहा है। यह व्यवस्था न तो व्यावहारिक है और न ही न्यायसंगत। हम जनगणना कार्य से छूट नहीं मांग रहे, बल्कि आवंटन में तार्किकता चाहते हैं।” प्रदर्शन में शामिल एमएलसी पुट्टन्ना ने भी शिक्षकों की मांगों का समर्थन करते हुए कहा कि पहले से ही परीक्षा मूल्यांकन, प्रशासनिक कार्यों और शिक्षण दायित्वों में व्यस्त शिक्षकों पर इस तरह का अतिरिक्त बोझ डालना उचित नहीं है। उन्होंने सुझाव दिया कि जनगणना कार्यस्थल शिक्षकों के घर या कार्यस्थल के नजदीक ही निर्धारित किए जाएं। शिक्षकों ने यह भी मांग उठाई कि साठ वर्ष से अधिक आयु के शिक्षकों तथा गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे कर्मचारियों को जनगणना ड्यूटी से छूट दी जाए। इस बीच, मुख्य आयुक्त एम. महेश्वर राव ने प्रदर्शनकारियों को आश्वस्त करते हुए कहा कि वे अपने पुनः आवंटन संबंधी अनुरोध संबंधित नगर निगम आयुक्तों को लोक शिक्षा उप निदेशक (डीडीपीआई) के माध्यम से प्रस्तुत करें। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि स्वास्थ्य संबंधी मामलों में शिक्षक वैध चिकित्सा प्रमाण पत्र प्रस्तुत कर छूट प्राप्त कर सकते हैं। हालांकि, शिक्षकों का कहना है कि जब तक आवंटन प्रक्रिया में ठोस और व्यावहारिक बदलाव नहीं किए जाते, तब तक उनका विरोध जारी रहेगा। यह मुद्दा अब प्रशासन और शिक्षकों के बीच समन्वय की परीक्षा बनता जा रहा है, जिसमें संतुलन स्थापित करना आवश्यक होगा।

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