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बेंगलूरु की शासन व्यवस्था पर सवाल, 80 प्रतिशत खर्च पर ‘शून्य जवाबदेही’

  • Writer: धन्ना राम चौधरी
    धन्ना राम चौधरी
  • Apr 15
  • 3 min read

भारतार्थ खबर, बेंगलूरु संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com)

बेंगलूरु। देश की आईटी राजधानी बेंगलूरु में सार्वजनिक धन के उपयोग को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। शहर में लगभग 80 प्रतिशत सार्वजनिक व्यय ऐसे अर्ध-सरकारी निकायों और राज्य विभागों के हाथों में है, जो न तो चुने हुए हैं और न ही सीधे तौर पर नागरिकों के प्रति जवाबदेह। यह खुलासा नागरिक संगठन जनअग्रहा की एक हालिया रिपोर्ट में हुआ है, जिसने शहर की प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही पर चिंता बढ़ा दी है। रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2020 से नगर सरकार निर्वाचित प्रतिनिधियों के बिना कार्य कर रही है। ऐसे में यह बड़ा प्रश्न खड़ा होता है कि हजारों करोड़ रुपये के सार्वजनिक धन के खर्च की जिम्मेदारी आखिर किसकी है।


खर्च का बंटवारा और जवाबदेही का संकट

आंकड़ों के मुताबिक, कुल सार्वजनिक व्यय का केवल 19.6 प्रतिशत हिस्सा ही बृहत् बेंगलूरु महानगर पालिका (बीबीएमपी) के नियंत्रण में है। शेष धनराशि विभिन्न एजेंसियों में विभाजित है—बेंगलूरु विद्युत आपूर्ति कंपनी (47.3 प्रतिशत), बेंगलूरु मेट्रो रेल निगम लिमिटेड (13.4 प्रतिशत), जल आपूर्ति एवं सीवरेज बोर्ड (8.8 प्रतिशत), मेट्रोपॉलिटन ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन (6.3 प्रतिशत) और पुलिस विभाग (2.4 प्रतिशत)। ये एजेंसियां शहर की आवश्यक सेवाएं तो संभालती हैं, लेकिन नागरिकों के प्रति उनकी जवाबदेही स्पष्ट नहीं है। यही कारण है कि आम नागरिकों और निर्णय लेने वाली संस्थाओं के बीच दूरी लगातार बढ़ती जा रही है।


रोजमर्रा की समस्याओं में दिखती है कमी

रिपोर्ट में बताया गया है कि जब पानी की आपूर्ति बाधित होती है, सड़कें जर्जर होती हैं या बस किराया बढ़ता है, तो जिम्मेदारी तय करना मुश्किल हो जाता है। नागरिक शिकायत तो दर्ज कर सकते हैं, लेकिन एजेंसियों पर जवाब देने की कोई स्पष्ट कानूनी बाध्यता नहीं है।


पारदर्शिता में पिछड़ती संस्थाएं

जहां निजी कंपनियों को नियमित रूप से अपने वित्तीय विवरण सार्वजनिक करने होते हैं, वहीं बेंगलूरु की कई सार्वजनिक एजेंसियां इस जिम्मेदारी से मुक्त हैं। पारदर्शिता के मामले में बीबीएमपी और बीडीए का प्रदर्शन अपेक्षाकृत बेहतर रहा, लेकिन इसे भी पर्याप्त नहीं माना गया। वहीं, बीएमआरसीएल, बीएमटीसी और बीईएसकॉम जैसी एजेंसियां मध्यम स्तर पर रहीं, जबकि जल बोर्ड और अन्य प्राधिकरणों का प्रदर्शन बेहद खराब पाया गया। कुछ संस्थाएं तो ऐसी भी हैं, जिन्होंने किसी भी प्रकार की जानकारी सार्वजनिक नहीं की। चौंकाने वाली बात यह है कि एक प्रमुख इंफ्रास्ट्रक्चर संस्था, जिसे हजारों करोड़ का बजट मिला है, उसकी कार्यात्मक वेबसाइट तक नहीं है।


कानूनी ढांचे में खामियां

ग्रेटर बेंगलुरु अथॉरिटी अधिनियम, 2024 के तहत नगर निगमों को बजट और प्रदर्शन रिपोर्ट सार्वजनिक करना अनिवार्य है, लेकिन अधिकांश अर्ध-सरकारी निकाय इस दायरे से बाहर हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि 12 प्रमुख एजेंसियों में से केवल तीन पर ही वित्तीय जानकारी सार्वजनिक करने की कानूनी बाध्यता है।


सुधार की जरूरत

रिपोर्ट में तत्काल सुधारों की मांग की गई है। इसमें सभी सार्वजनिक प्राधिकरणों को एक समान पारदर्शिता ढांचे में लाने, शहर-स्तरीय व्यय डैशबोर्ड बनाने और परियोजनाओं की वास्तविक समय में जानकारी उपलब्ध कराने की सिफारिश शामिल है। साथ ही, खर्च को सेवा परिणामों—जैसे जल आपूर्ति, सड़क गुणवत्ता और कचरा प्रबंधन—से जोड़ने पर जोर दिया गया है।


नागरिकों की प्रतिक्रिया

स्थानीय नागरिकों का कहना है कि जहां ग्रामीण क्षेत्रों में ई-गवर्नेंस के माध्यम से पारदर्शिता बढ़ी है, वहीं बेंगलूरु जैसे महानगर में अभी भी यह कमी बनी हुई है। उनका कहना है, “पारदर्शिता के बिना जवाबदेही संभव नहीं है और जवाबदेही के बिना बेहतर शहरी शासन केवल एक अधूरा वादा बनकर रह जाता है।” बेंगलूरु की प्रशासनिक व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी अब एक गंभीर मुद्दा बन चुकी है। यदि समय रहते सुधार नहीं किए गए, तो इसका सीधा असर शहर के विकास और नागरिक सुविधाओं पर पड़ना तय है।

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