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बेंगलूरु में जनगणना ड्यूटी में ‘वैज्ञानिक आवंटन’ की मांग, शिक्षकों का प्रदर्शन

  • Writer: धन्ना राम चौधरी
    धन्ना राम चौधरी
  • Apr 15
  • 2 min read

भारतार्थ खबर, बेंगलूरु संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com)

बेंगलूरु। 2027 की जनगणना को लेकर ड्यूटी आवंटन में व्यावहारिकता और पारदर्शिता की मांग करते हुए शहर के सैकड़ों सरकारी और अनुदानित स्कूलों के शिक्षक तथा प्री-यूनिवर्सिटी कॉलेज के व्याख्याता सोमवार को सड़कों पर उतर आए। एनआर स्क्वायर स्थित ग्रेटर बेंगलूरु अथॉरिटी (जीबीए) मुख्यालय के सामने हुए इस प्रदर्शन में शिक्षकों ने मुख्य आयुक्त एम. महेश्वर राव से ‘वैज्ञानिक आधार’ पर जनगणना क्षेत्रों के आवंटन की मांग की।


कर्नाटक राज्य पूर्व-विश्वविद्यालय कॉलेज व्याख्याता संघ के नेतृत्व में आयोजित इस विरोध में शामिल शिक्षकों ने आरोप लगाया कि उन्हें उनके निवास या कार्यस्थल से तीस किलोमीटर से अधिक दूर जनगणना कार्य सौंपा जा रहा है, जिससे न केवल समय और संसाधनों की बर्बादी हो रही है, बल्कि उनकी नियमित शैक्षणिक जिम्मेदारियां भी प्रभावित हो रही हैं। संघ के अध्यक्ष निंगेगौड़ा ए.एच. ने कहा, “केंगेरी के शिक्षकों को येलाहांका और बैनरघट्टा के व्याख्याताओं को दूरस्थ क्षेत्रों में भेजा जा रहा है। यह व्यवस्था न तो व्यावहारिक है और न ही न्यायसंगत। हम जनगणना कार्य से छूट नहीं मांग रहे, बल्कि आवंटन में तार्किकता चाहते हैं।” प्रदर्शन में शामिल एमएलसी पुट्टन्ना ने भी शिक्षकों की मांगों का समर्थन करते हुए कहा कि पहले से ही परीक्षा मूल्यांकन, प्रशासनिक कार्यों और शिक्षण दायित्वों में व्यस्त शिक्षकों पर इस तरह का अतिरिक्त बोझ डालना उचित नहीं है। उन्होंने सुझाव दिया कि जनगणना कार्यस्थल शिक्षकों के घर या कार्यस्थल के नजदीक ही निर्धारित किए जाएं। शिक्षकों ने यह भी मांग उठाई कि साठ वर्ष से अधिक आयु के शिक्षकों तथा गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे कर्मचारियों को जनगणना ड्यूटी से छूट दी जाए।


इस बीच, मुख्य आयुक्त एम. महेश्वर राव ने प्रदर्शनकारियों को आश्वस्त करते हुए कहा कि वे अपने पुनः आवंटन संबंधी अनुरोध संबंधित नगर निगम आयुक्तों को लोक शिक्षा उप निदेशक (डीडीपीआई) के माध्यम से प्रस्तुत करें। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि स्वास्थ्य संबंधी मामलों में शिक्षक वैध चिकित्सा प्रमाण पत्र प्रस्तुत कर छूट प्राप्त कर सकते हैं। हालांकि, शिक्षकों का कहना है कि जब तक आवंटन प्रक्रिया में ठोस और व्यावहारिक बदलाव नहीं किए जाते, तब तक उनका विरोध जारी रहेगा। यह मुद्दा अब प्रशासन और शिक्षकों के बीच समन्वय की परीक्षा बनता जा रहा है, जिसमें संतुलन स्थापित करना आवश्यक होगा।

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