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“चोरी या ‘गुम’? आंकड़ों के खेल में दबते अपराध”

  • लेखक की तस्वीर: धन्ना राम चौधरी
    धन्ना राम चौधरी
  • 15 अप्रैल
  • 3 मिनट पठन

भारतार्थ खबर, बेंगलूरु संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com)

बेंगलूरु। शहर में मोबाइल चोरी और जेबकतरी जैसी घटनाओं को “गुमशुदा” शिकायतों के रूप में दर्ज करने का मामला एक गंभीर प्रशासनिक और कानूनी बहस का विषय बनता जा रहा है। स्पष्ट प्रक्रियात्मक दिशा-निर्देशों के बावजूद, कई पुलिस थानों में चोरी के मामलों को कथित तौर पर “लॉस्ट प्रॉपर्टी” के रूप में दर्ज किया जा रहा है, जिससे न केवल अपराध के वास्तविक आंकड़े प्रभावित हो रहे हैं बल्कि पीड़ितों को न्याय मिलने की प्रक्रिया भी कमजोर पड़ रही है।


हाल ही में सिल्क बोर्ड फ्लाईओवर के पास घटी एक घटना ने इस प्रवृत्ति को उजागर कर दिया। 6 अप्रैल 2026 को दोपहर करीब 1:30 बजे एक 23 वर्षीय युवक को एक कार ने टक्कर मार दी। हादसे के बाद मदद के बहाने पहुंचे दो लोगों ने उसकी जेब से मोबाइल फोन चुरा लिया। घटना स्पष्ट रूप से चोरी की श्रेणी में आती है, लेकिन पुलिस ने इसे “गुमशुदगी” की शिकायत के रूप में दर्ज किया। पीड़ित ने बताया, “मैंने बोम्मनहल्ली पुलिस स्टेशन में लिखित शिकायत दी, लेकिन एफआईआर दर्ज नहीं की गई। पुलिस ने कहा कि बिना एफआईआर के भी फोन ढूंढ लिया जाएगा। बाद में मेरा मोबाइल नंबर सीईआईआर पोर्टल पर ब्लॉक कर दिया गया, लेकिन उसके बाद कोई अपडेट नहीं मिला।”


सीईआईआर पर बढ़ती निर्भरता, लेकिन सीमित सफलता

पुलिस के अनुसार, पिछले तीन महीनों में बेंगलूरु में सेंट्रल इक्विपमेंट आइडेंटिटी रजिस्टर (सीईआईआर) पोर्टल पर 13,912 मोबाइल डिवाइस की रिपोर्ट दर्ज की गई है। हालांकि, इन मामलों में रिकवरी दर मात्र 27.2 प्रतिशत रही है, जो इस व्यवस्था की सीमाओं को दर्शाती है।


कानूनी विशेषज्ञों की चिंता

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि चोरी के मामलों को “गुम” के रूप में दर्ज करना एक पुरानी लेकिन चिंताजनक प्रवृत्ति है। इससे न केवल संज्ञेय अपराधों में अनिवार्य एफआईआर दर्ज करने की प्रक्रिया दरकिनार होती है, बल्कि जांच का दायरा भी सीमित हो जाता है। वकीलों के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति से जबरन फोन छीना जाता है तो यह डकैती या चोरी का मामला बनता है, जबकि सामान्य परिस्थितियों में चोरी भी संज्ञेय अपराध है और उसमें एफआईआर दर्ज होना अनिवार्य है। इसके विपरीत, “गुमशुदा” शिकायत को मामूली मानकर अक्सर गहन जांच नहीं की जाती।


आंकड़ों का दबाव या संसाधनों की कमी?

विशेषज्ञों का कहना है कि पुलिस पर बढ़ते कार्यभार और अपराध दर को नियंत्रित दिखाने के दबाव के चलते इस तरह की प्रवृत्तियां सामने आती हैं। चोरी की एफआईआर दर्ज करने का मतलब है विस्तृत जांच, रिपोर्टिंग और आगे की कानूनी प्रक्रिया—जो समय और संसाधन दोनों मांगती है। ऐसे में कई मामलों को “छोटा” मानकर उन्हें गुमशुदगी के रूप में दर्ज कर लिया जाता है।


पीड़ितों के अनुभव भी यही बताते हैं

एक अन्य पीड़ित, जो एक सहायक अभियंता है, ने बताया कि तड़के 3:30 बजे दोपहिया सवार दो लोगों ने उसकी जेब से मोबाइल छीन लिया। बावजूद इसके, उसका मामला भी “गुमशुदा” के रूप में दर्ज किया गया और केवल आईएमईआई नंबर ब्लॉक कर दिया गया। एक अन्य मामले में, एक कॉन्सर्ट के दौरान फोन खोने वाले व्यक्ति को कानूनी सलाह लेने के बाद ही एफआईआर दर्ज कराने में सफलता मिली।


एफआईआर न होने के गंभीर परिणाम

विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि यदि अपराधों को सही तरीके से दर्ज नहीं किया गया, तो न केवल अपराध के आंकड़े भ्रामक बनते हैं बल्कि भविष्य में आरोपी के खिलाफ मजबूत साक्ष्य जुटाना भी कठिन हो जाता है। इससे दोषसिद्धि की संभावना घटती है और अपराधियों को दोबारा अपराध करने का अवसर मिल सकता है।


पुलिस आयुक्त का बयान

शहर के पुलिस आयुक्त ने स्पष्ट किया है कि केवल वास्तव में खोई हुई वस्तुओं के मामलों में ही “लॉस्ट प्रॉपर्टी” शिकायत दर्ज की जानी चाहिए। यदि किसी व्यक्ति से फोन छीना गया है, तो उसे चोरी के रूप में दर्ज करना अनिवार्य है। उन्होंने आश्वासन दिया कि ऐसे मामलों की शिकायत मिलने पर जांच की जाएगी और दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। बेंगलूरु जैसे महानगर में बढ़ते डिजिटल अपराधों और जेबकतरी की घटनाओं के बीच, शिकायतों का सही वर्गीकरण केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था की नींव है। यदि आंकड़ों के दबाव में अपराधों को “गुम” बताकर दबाया गया, तो इसका खामियाजा अंततः आम नागरिकों को ही भुगतना पड़ेगा।

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