top of page

 भारतार्थ खबर, नहीं उसका अर्थ

21अक्टूबर /2026 /बुधवार

बेंगलुरु, 20 अक्टूबर 2026। बेंगलुरु में आयोजित 48वें दशहरा महोत्सव में राज्यसभा सांसद लहर सिंह सिरोया ने मां दुर्गा के दर्शन कर पूजा-अर्चना की और आशीर्वाद प्राप्त किया। सिद्धार्थ सांस्कृतिक समिति एवं राजेंद्र बाबू मेमोरियल ट्रस्ट ‘बिहार भवन’ के तत्वावधान में आयोजित इस महोत्सव में सांसद की उपस्थिति रही। इस अवसर पर समिति के पदाधिकारियों और सदस्यों ने मां भगवती की चुनड़ी ओढ़ाकर उनका स्वागत एवं अभिनंदन किया।

भारतार्थ लोगो: खबर नहीं, उसका अर्थ - राजनीतिक समाचार विश्लेषण

बेंगलुरु, 20 अक्टूबर 2026। बेंगलुरु में आयोजित 48वें दशहरा महोत्सव में राज्यसभा सांसद लहर सिंह सिरोया ने मां दुर्गा के दर्शन कर पूजा-अर्चना की और आशीर्वाद प्राप्त किया। सिद्धार्थ सांस्कृतिक समिति एवं राजेंद्र बाबू मेमोरियल ट्रस्ट ‘बिहार भवन’ के तत्वावधान में आयोजित इस महोत्सव में सांसद की उपस्थिति रही। इस अवसर पर समिति के पदाधिकारियों और सदस्यों ने मां भगवती की चुनड़ी ओढ़ाकर उनका स्वागत एवं अभिनंदन किया।

WhatsApp Video 2026-10-04 at 8.50.36 PM.mp4

इस साइट पर खोजें

1908किसी भी खाली खोज के साथ परिणाम मिले

  • जस्टिस यशवंत वर्मा कैश कांड: जांच में आरोप साबित, नकदी के स्रोत पर नहीं दे सके संतोषजनक जवाब

    बर्न्ट कैश मामले में जांच समिति की रिपोर्ट ने उठाए गंभीर सवाल; न्यायिक जवाबदेही पर फिर बहस तेज भारतार्थ खबर। संवाददाता: धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) नई दिल्ली | 12 अगस्त 2026।पूर्व हाईकोर्ट जज जस्टिस यशवंत वर्मा से जुड़े चर्चित कैश कांड ने एक बार फिर न्यायिक जवाबदेही और संस्थागत पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास में आग लगने के बाद बड़ी मात्रा में अधजली नकदी मिलने के मामले की जांच करने वाली संसदीय समिति ने अपनी रिपोर्ट लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को सौंप दी थी। आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार रिपोर्ट 18 मई 2026 को सौंपी गई थी। उपलब्ध जांच निष्कर्षों के अनुसार, मामले में नकदी की मौजूदगी और उससे जुड़े आरोपों को लेकर जस्टिस वर्मा की सफाई समिति को संतोषजनक नहीं लगी। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट की इन-हाउस जांच समिति ने भी उपलब्ध प्रत्यक्ष और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों के आधार पर आरोपों में पर्याप्त आधार पाया था और कथित कदाचार को गंभीर मानते हुए हटाने की कार्रवाई की सिफारिश की थी। क्या है पूरा कैश कांड? यह मामला 14 मार्च 2025 की रात सामने आया, जब दिल्ली स्थित जस्टिस यशवंत वर्मा के सरकारी आवास में आग लगने के बाद दमकलकर्मियों को स्टोररूम में बड़ी संख्या में अधजले नोट दिखाई दिए। मामले ने तत्काल राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित किया और न्यायपालिका में पारदर्शिता, नैतिकता तथा जवाबदेही को लेकर बहस तेज हो गई। बाद में सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश द्वारा गठित इन-हाउस समिति ने मामले की विस्तृत जांच की। समिति ने 55 गवाहों के बयान, तस्वीरों और वीडियो सहित इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों का परीक्षण किया। रिपोर्ट के अनुसार, नकदी जिस स्थान पर मिली, उस पर जस्टिस वर्मा और उनके परिवार का नियंत्रण या प्रभाव था तथा नकदी की मौजूदगी के संबंध में उनकी ओर से संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया। नकदी कहां से आई? सवाल का जवाब नहीं मिला जांच का सबसे महत्वपूर्ण पहलू नकदी के स्रोत और उसके स्वामित्व से जुड़ा रहा। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, जस्टिस वर्मा ने नकदी की मौजूदगी से संबंधित आरोपों से इनकार किया और मामले में साजिश की आशंका भी जताई थी। हालांकि जांच समिति ने उनके स्पष्टीकरण को पर्याप्त नहीं माना। सुप्रीम कोर्ट की इन-हाउस समिति के निष्कर्षों में कहा गया कि प्रत्यक्ष एवं इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों के आधार पर नकदी के स्टोररूम में पाए जाने का तथ्य स्थापित हुआ और जस्टिस वर्मा इस संबंध में संतोषजनक बचाव प्रस्तुत नहीं कर सके। यही बिंदु इस पूरे जस्टिस यशवंत वर्मा कैश कांड को गंभीर बनाता है। हालांकि किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक दोषसिद्धि और संसदीय/न्यायिक जांच में कदाचार पाए जाने की प्रक्रिया अलग-अलग कानूनी प्रक्रियाएं हैं। इसलिए रिपोर्ट में कदाचार या आरोप साबित होने को सीधे आपराधिक अदालत की दोषसिद्धि के समान नहीं माना जाना चाहिए। सबूतों को संभालने पर भी उठे सवाल मामले में सिर्फ नकदी की मौजूदगी ही जांच का विषय नहीं रही। घटनास्थल और वहां मौजूद साक्ष्यों को संरक्षित करने के तरीके पर भी सवाल उठे। आग के बाद घटनास्थल पर लोगों की आवाजाही और नकदी से जुड़े साक्ष्यों के संरक्षण को लेकर जांच में गंभीर प्रश्न सामने आए। ऐसे संवेदनशील मामले में घटनास्थल को सुरक्षित रखना और उपलब्ध साक्ष्यों का वैज्ञानिक तरीके से संरक्षण करना अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। न्यायिक पद से जुड़े व्यक्ति के मामले में यह आवश्यकता और भी बढ़ जाती है, क्योंकि इससे न्यायपालिका की संस्थागत विश्वसनीयता सीधे जुड़ी होती है। संसदीय जांच समिति का गठन कैसे हुआ? जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ हटाने की प्रक्रिया के तहत लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने 12 अगस्त 2025 को Judges (Inquiry) Act, 1968 के तहत तीन सदस्यीय जांच समिति गठित की थी। आधिकारिक अधिसूचना के अनुसार समिति में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस अरविंद कुमार, तत्कालीन मद्रास हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस मनिंदर मोहन श्रीवास्तव और वरिष्ठ अधिवक्ता बी.वी. आचार्य शामिल थे। बाद में समिति का पुनर्गठन किया गया। पुनर्गठित समिति में जस्टिस अरविंद कुमार के साथ बॉम्बे हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस श्री चंद्रशेखर और वरिष्ठ अधिवक्ता बी.वी. आचार्य शामिल हुए। समिति ने अपनी रिपोर्ट 18 मई 2026 को लोकसभा अध्यक्ष को सौंप दी। लोकसभा सचिवालय ने स्पष्ट किया था कि रिपोर्ट वैधानिक प्रक्रिया के अनुरूप प्रस्तुत की गई है और इसे नियमानुसार दोनों सदनों के समक्ष रखा जाना था। जस्टिस वर्मा ने अप्रैल 2026 में दिया इस्तीफा इस मामले में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम यह भी रहा कि जस्टिस यशवंत वर्मा ने 9 अप्रैल 2026 को इस्तीफा दे दिया। इसके बाद उनके खिलाफ चल रही पद से हटाने की प्रक्रिया के व्यावहारिक प्रभाव को लेकर संवैधानिक और कानूनी बहस शुरू हुई। हालांकि उनकी ओर से संसदीय जांच की प्रक्रिया और उसके आधार पर उठाए गए सवालों पर आपत्ति दर्ज की गई थी। अप्रैल 2026 में उन्होंने समिति को लिखे पत्र में आरोप लगाया था कि उनके खिलाफ जांच प्रत्यक्ष प्रमाणों के बजाय अनुमानों और आरोपों पर आधारित थी। उन्होंने जांच प्रक्रिया से स्वयं को अलग करने की बात भी कही थी। पहले भी इन-हाउस समिति ने माना था आरोपों में पर्याप्त आधार जस्टिस यशवंत वर्मा मामले में संसदीय समिति से पहले सुप्रीम कोर्ट की इन-हाउस जांच समिति ने भी विस्तृत जांच की थी। जून 2025 में सामने आए निष्कर्षों के अनुसार समिति ने कहा था कि उपलब्ध प्रत्यक्ष और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य आरोपों में पर्याप्त आधार स्थापित करते हैं। समिति ने कथित कदाचार को इतना गंभीर माना था कि उनके खिलाफ हटाने की कार्रवाई शुरू करने की जरूरत बताई गई थी। इस जांच में 55 गवाहों के बयान दर्ज किए गए थे। समिति ने घटनास्थल का निरीक्षण किया तथा उपलब्ध फोटो और वीडियो साक्ष्यों का भी परीक्षण किया। न्यायपालिका की विश्वसनीयता का सवाल जस्टिस यशवंत वर्मा कैश कांड ने एक व्यापक सवाल को जन्म दिया है—न्यायपालिका जैसे संवैधानिक संस्थान से जुड़े किसी व्यक्ति पर गंभीर आरोप लगने के बाद जवाबदेही सुनिश्चित करने की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी और प्रभावी होनी चाहिए? न्यायपालिका लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण स्तंभ है। इसलिए न्यायिक पद पर आसीन व्यक्ति से उच्चतम स्तर की नैतिकता, निष्पक्षता और सार्वजनिक विश्वास की अपेक्षा की जाती है। जांच समिति की रिपोर्ट और उसके निष्कर्ष इसी व्यापक संदर्भ में महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। हालांकि, इस मामले में समाचार प्रकाशित करते समय यह अंतर स्पष्ट रखना जरूरी है कि जांच समिति द्वारा कदाचार के आरोपों को साबित माना जाना और किसी आपराधिक अदालत द्वारा अपराध सिद्ध किया जाना दो अलग कानूनी प्रक्रियाएं हैं।

  • सुप्रीम कोर्ट का बड़ा एक्शन: अवैध निर्माण पर सर्वे, सीलिंग और कार्रवाई तेज

    दिल्ली, पटना और लखनऊ में नियम तोड़कर बने भवनों व रिहायशी संपत्तियों के व्यावसायिक इस्तेमाल पर सख्त रुख; पटना में 26,746 मामले सामने आए भारतार्थ खबर। संवाददाता: धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) नई दिल्ली | 12 अगस्त 2026 सुप्रीम कोर्ट ने अवैध निर्माण और रिहायशी संपत्तियों के व्यावसायिक इस्तेमाल के मामलों में सख्त रुख अपनाते हुए संबंधित नगर निकायों और विकास प्राधिकरणों को कार्रवाई तेज करने के निर्देश दिए हैं। दिल्ली, पटना, लखनऊ और अन्य क्षेत्रों से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान अदालत ने सर्वे, सुरक्षा जांच और नियमों के उल्लंघन पर कार्रवाई को गंभीरता से लेने को कहा है। ऐसे में नियमों के विपरीत बने या असुरक्षित पाए गए निर्माणों पर सीलिंग और ध्वस्तीकरण जैसी कार्रवाई का रास्ता खुल सकता है। मामला केवल अवैध निर्माण तक सीमित नहीं है। अदालत ने उन रिहायशी संपत्तियों के व्यावसायिक इस्तेमाल पर भी चिंता जताई है, जहां भवनों का उपयोग स्वीकृत मानकों से अलग तरीके से किया जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अधिकारियों की जवाबदेही और जमीनी स्तर पर नियमों के पालन का मुद्दा भी प्रमुखता से उठा। हादसों के बाद सुप्रीम कोर्ट सख्त सुप्रीम कोर्ट की पीठ में न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और न्यायमूर्ति आर. महादेवन शामिल हैं। अदालत ने दिल्ली और लखनऊ में सामने आए गंभीर अग्निकांड तथा असुरक्षित भवनों से जुड़े घटनाक्रमों को देखते हुए नगर निकायों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। जुलाई में अदालत ने दिल्ली के कुछ क्षेत्रों में अवैध एवं असुरक्षित निर्माण की जमीनी स्थिति जांचने के लिए आईआईटी दिल्ली के विशेषज्ञों वाली विशेष टीम के सर्वे का निर्देश दिया था। अदालत का रुख स्पष्ट है कि केवल कागजी कार्रवाई या रिपोर्ट तैयार करना पर्याप्त नहीं होगा। संबंधित अधिकारियों को जमीन पर वास्तविक स्थिति की जांच करके आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित करनी होगी। दिल्ली में सर्वे को लेकर नाराजगी दिल्ली के लाजपत नगर, साकेत और आसपास के क्षेत्रों में नियमों के उल्लंघन और भवनों की सुरक्षा से संबंधित जांच को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने नगर निकायों से जवाब मांगा। अदालत ने आईआईटी दिल्ली के वरिष्ठ प्रोफेसरों और ड्राफ्ट्समैन को शामिल कर समयबद्ध सर्वे कराने का निर्देश दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने अधिकारियों को यह भी स्पष्ट संकेत दिया कि असुरक्षित अथवा नियमों का उल्लंघन करने वाली संरचनाओं की पहचान के बाद कार्रवाई में अनावश्यक देरी स्वीकार नहीं की जाएगी। इसका सीधा अर्थ यह है कि अवैध निर्माण और असुरक्षित भवनों पर अब स्थानीय स्तर पर जांच और कार्रवाई की गति बढ़ सकती है। हालांकि किसी विशेष भवन को गिराने या सील करने का निर्णय संबंधित रिकॉर्ड, नियमों, जांच और सक्षम प्राधिकारी की कार्रवाई पर निर्भर करेगा। पटना में सामने आए 26,746 मामले पटना का मामला इस पूरे घटनाक्रम में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। पटना नगर निगम की ओर से दाखिल हलफनामे में सर्वे के बाद 26,746 ऐसे मामले सामने आने की जानकारी दी गई, जिनमें रिहायशी संपत्तियों का इस्तेमाल व्यावसायिक गतिविधियों के लिए किया जा रहा था। सुप्रीम कोर्ट ने इस संख्या को गंभीरता से लेते हुए संबंधित नगर अधिकारियों की भूमिका और जवाबदेही पर सवाल उठाए। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि इतने बड़े पैमाने पर नियमों के उल्लंघन का पता अदालत के हस्तक्षेप के बाद सामने आना नगर प्रशासन की निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है। मामले में पूर्व नगर आयुक्त पराशर द्वारा दाखिल हलफनामे का भी उल्लेख हुआ। इसमें उनके कार्यकाल के दौरान भवन निर्माण नियमों के उल्लंघन से जुड़े मामलों में की गई कार्रवाई का विवरण दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने उपलब्ध आंकड़ों पर संतोष व्यक्त करने के बजाय अधिकारियों की जिम्मेदारी और निगरानी व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल उठाए। अदालत ने पूर्व नगर आयुक्त को कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए पूछा कि उनके कार्यकाल में कथित लापरवाही के लिए उनके विरुद्ध कार्रवाई क्यों न की जाए। लखनऊ में भी सर्वे और कार्रवाई लखनऊ में भी सुप्रीम कोर्ट ने लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) को नियमों के विपरीत हुए निर्माण और रिहायशी क्षेत्रों में चल रही व्यावसायिक गतिविधियों की पहचान के लिए सर्वे करने का निर्देश दिया है। एलडीए की ओर से अदालत को बताया गया कि 51 संपत्तियों की पहचान की जा चुकी है और उनके संबंध में कार्रवाई शुरू कर दी गई है। प्राधिकरण ने पूरे अधिकार क्षेत्र में फॉलोअप कार्रवाई जारी रखने तथा निर्धारित समय में प्रक्रिया पूरी करने की बात कही। इससे स्पष्ट है कि सुप्रीम कोर्ट केवल एक शहर या एक नगर निकाय तक सीमित होकर मामले को नहीं देख रहा, बल्कि भवन सुरक्षा, भूमि उपयोग और निर्माण नियमों के पालन को व्यापक सार्वजनिक सुरक्षा के मुद्दे के रूप में देख रहा है। क्या हर अवैध निर्माण पर बुलडोजर चलेगा? सुप्रीम कोर्ट के रुख के बाद सोशल मीडिया और सार्वजनिक चर्चा में यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि क्या पूरे देश में बड़े पैमाने पर बुलडोजर कार्रवाई शुरू होने वाली है? यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी अंतर समझना जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का मतलब यह नहीं है कि देशभर की हर इमारत को तत्काल गिराने का आदेश दे दिया गया है। अदालत ने संबंधित मामलों में सर्वे, जांच, अनुपालन और नियमों के उल्लंघन पर कार्रवाई सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं। किसी भवन पर ध्वस्तीकरण या सीलिंग की कार्रवाई संबंधित स्थानीय कानून, स्वीकृत नक्शे, भूमि उपयोग, निर्माण अनुमति, उल्लंघन की प्रकृति, नोटिस और अन्य कानूनी प्रक्रियाओं के आधार पर की जा सकती है। इसलिए केवल किसी खबर या सोशल मीडिया पोस्ट के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा कि किसी खास शहर में सभी घर या दुकानें टूटने वाली हैं। सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही के संदर्भ में मुख्य चिंता उन निर्माणों और संपत्तियों को लेकर है जो: - स्वीकृत भवन मानचित्र या निर्माण नियमों का उल्लंघन करते हैं। - रिहायशी संपत्ति में नियमों के विपरीत व्यावसायिक गतिविधियां संचालित करते हैं। - सुरक्षा मानकों के लिहाज से असुरक्षित पाए जाते हैं। - अनधिकृत तरीके से अतिरिक्त निर्माण या व्यावसायिक मंजिलें बनाई गई हैं। - ऐसे भवन हैं जिनके संबंध में सक्षम प्राधिकरण पहले ही कार्रवाई का आदेश दे चुका है और कोई वैध न्यायिक रोक नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के पुराने आदेशों में भी ऐसे मामलों में अनधिकृत निर्माण पर सीलिंग और demolition orders के अनुपालन को लेकर निर्देश दिए गए हैं। आम लोगों के लिए क्या जरूरी है? यदि कोई व्यक्ति घर, दुकान, ऑफिस या अन्य संपत्ति का मालिक है तो उसे अपने भवन से जुड़े स्वीकृत नक्शे, निर्माण अनुमति, ऑक्युपेंसी/कम्प्लीशन संबंधी दस्तावेज और भूमि उपयोग की स्थिति की जानकारी रखना महत्वपूर्ण है। विशेष रूप से रिहायशी संपत्ति में व्यावसायिक गतिविधि चलाने वालों को यह जांच लेना चाहिए कि स्थानीय नियमों के तहत ऐसी गतिविधि की अनुमति है या नहीं। इसी तरह किसी संपत्ति को खरीदने से पहले भवन की वैधता और स्थानीय प्राधिकरण से संबंधित रिकॉर्ड की जांच करना भविष्य के विवाद से बचने में मदद कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट का व्यापक संदेश इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू केवल संभावित बुलडोजर कार्रवाई नहीं, बल्कि नगर प्रशासन की जवाबदेही और सार्वजनिक सुरक्षा है। अदालत ने अधिकारियों को यह संदेश दिया है कि भवन निर्माण नियमों का उल्लंघन और असुरक्षित संरचनाएं केवल प्रशासनिक कागजी मामला नहीं हैं। दिल्ली, पटना और लखनऊ से सामने आए मामलों ने यह सवाल भी खड़ा किया है कि यदि नगर निकाय नियमित निगरानी करें और निर्माण नियमों का समय पर पालन सुनिश्चित करें तो बड़े हादसों और बाद की कठोर कार्रवाई से बचा जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में चल रही यह प्रक्रिया आने वाले समय में स्थानीय निकायों के लिए भी एक महत्वपूर्ण परीक्षा होगी। अब सर्वे की गुणवत्ता, रिपोर्ट के आधार पर कार्रवाई और अधिकारियों की जवाबदेही पर नजर रहेगी। सुप्रीम कोर्ट ने अवैध निर्माण और रिहायशी संपत्तियों के नियम विरुद्ध व्यावसायिक इस्तेमाल के खिलाफ सख्त संदेश दिया है। दिल्ली में सर्वे और सुरक्षा जांच, पटना में सामने आए 26,746 मामलों तथा लखनऊ में चिन्हित 51 संपत्तियों ने समस्या के बड़े पैमाने को उजागर किया है। हालांकि इसे पूरे देश में तत्काल बुलडोजर चलाने का blanket order समझना सही नहीं होगा। कार्रवाई संबंधित शहर, संपत्ति, उल्लंघन और लागू कानूनों के अनुसार होगी। लेकिन इतना स्पष्ट है कि अनधिकृत निर्माण, असुरक्षित भवन और नियमों के विपरीत भूमि उपयोग अब प्रशासन की प्राथमिक जांच के दायरे में हैं।

  • उडुपी में राजारामजी महाराज की 83वीं पुण्यतिथि पर गूंजा शिक्षा-संस्कार का संदेश

    महापुराण दिवस पर भव्य जागरण, मेधावी विद्यार्थियों का सम्मान; हरीश चौधरी ने कहा—शिक्षा के साथ संस्कार ही व्यक्तित्व की असली पहचान भारतार्थ खबर। संवाददाता: धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) उडुपी | 12 अगस्त 2026 उडुपी में श्री राजारामजी आँजणा पटेल संघ, उडुपी जिला के तत्वावधान में संत श्री राजारामजी महाराज की 83वीं पुण्यतिथि (महापुराण दिवस) श्रद्धा, भक्ति और सामाजिक एकजुटता के साथ मनाई गई। कार्यक्रम में समाज के पदाधिकारियों, समाजबंधुओं और व्यापारियों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की। धार्मिक आयोजन के साथ शिक्षा और संस्कार को केंद्र में रखकर नई पीढ़ी को बेहतर दिशा देने का प्रेरक संदेश भी दिया गया। पुण्यतिथि समारोह के दौरान रात्रि जागरण एवं प्रसादी का आयोजन किया गया। भक्ति और श्रद्धा से ओतप्रोत वातावरण में समाजबंधुओं ने संत राजारामजी महाराज को श्रद्धापूर्वक नमन किया तथा उनके बताए आदर्शों को जीवन में अपनाने का संकल्प लिया। आयोजन के अगले चरण में बच्चों में शिक्षा के प्रति उत्साह और प्रतिस्पर्धात्मक भावना बढ़ाने के उद्देश्य से मेधावी विद्यार्थियों का सम्मान किया गया। प्रतिभाशाली छात्रों को मोमेंटो भेंट कर उनकी उपलब्धियों का उत्साहवर्धन किया गया। कार्यक्रम में अखिल भारतीय आँजणा समाज महासभा के शिक्षा प्रभारी हरीश चौधरी ने विद्यार्थियों और युवाओं को संबोधित करते हुए शिक्षा के साथ संस्कारों की अनिवार्यता पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि शिक्षा और संस्कार एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। शिक्षा मनुष्य के जीवन का अनमोल उपहार है, जबकि संस्कार जीवन का सार हैं। दोनों का संतुलित विकास ही व्यक्ति के व्यक्तित्व को मजबूत और समाज को सशक्त बनाता है। हरीश चौधरी ने कहा कि जब व्यक्ति में शिक्षा और संस्कार दोनों का विकास होता है, तभी वह अपने परिवार, समाज और देश के विकास में सार्थक योगदान दे सकता है। उन्होंने अभिभावकों और युवाओं से अपील की कि बच्चों को केवल अच्छी शिक्षा दिलाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके चरित्र, व्यवहार, नैतिक मूल्यों और सामाजिक जिम्मेदारियों के विकास पर भी समान रूप से ध्यान देना आवश्यक है। उन्होंने शिक्षा के व्यापक अर्थ को स्पष्ट करते हुए कहा कि शिक्षा का मतलब केवल किताबों में दर्ज विषयों का ज्ञान प्राप्त करना नहीं है। वास्तविक शिक्षा वह है, जो व्यक्ति को सही और गलत में अंतर समझने, विवेकपूर्ण निर्णय लेने, दूसरों के प्रति सम्मान रखने और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझने की क्षमता प्रदान करे। शिक्षा के साथ संस्कार क्यों जरूरी? हरीश चौधरी ने वर्तमान दौर की तेज रफ्तार जिंदगी का उल्लेख करते हुए कहा कि आधुनिक समय में परिवार और समाज के सामने बच्चों को संस्कारों से जोड़कर रखना एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। अभिभावक बच्चों को अच्छे विद्यालयों में पढ़ाकर अक्सर यह मान लेते हैं कि उनकी जिम्मेदारी पूरी हो गई, लेकिन यह शिक्षा की तस्वीर का केवल एक हिस्सा है। उन्होंने कहा कि केवल किताबी ज्ञान से व्यक्ति शिक्षित तो हो सकता है, लेकिन विवेकशील और जिम्मेदार नागरिक बनने के लिए संस्कारों की आवश्यकता होती है। आज जरूरत ऐसे युवाओं को तैयार करने की है, जिनके पास आधुनिक शिक्षा के साथ नैतिकता, अनुशासन, संवेदनशीलता, विनम्रता और समाजसेवा की भावना भी हो। उन्होंने कहा कि शिक्षा व्यक्ति को ज्ञान देती है और संस्कार उस ज्ञान का सही उपयोग करना सिखाते हैं। यदि ज्ञान के साथ विवेक नहीं है तो शिक्षा का उद्देश्य अधूरा रह जाता है। इसी प्रकार संस्कारों के साथ शिक्षा का जुड़ाव व्यक्ति को बदलते समय की चुनौतियों का सामना करने के लिए सक्षम बनाता है। मेधावी विद्यार्थियों का सम्मान बना आकर्षण राजारामजी महाराज की 83वीं पुण्यतिथि के अवसर पर विद्यार्थियों के सम्मान का आयोजन विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा। मेधावी छात्रों को मोमेंटो भेंट कर उनकी मेहनत और उपलब्धियों को प्रोत्साहित किया गया। इस पहल से विद्यार्थियों में आगे बढ़ने का उत्साह पैदा करने के साथ समाज में शिक्षा को प्राथमिकता देने का सकारात्मक संदेश गया। कार्यक्रम में युवाओं को यह संदेश भी दिया गया कि शिक्षा केवल व्यक्तिगत सफलता का माध्यम नहीं, बल्कि समाज के विकास की मजबूत नींव है। शिक्षित और संस्कारित युवा ही भविष्य में समाज का नेतृत्व करते हुए सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं। धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक जिम्मेदारी राजारामजी महाराज की पुण्यतिथि केवल धार्मिक स्मरण का अवसर नहीं रही, बल्कि इस आयोजन ने समाज में शिक्षा, संस्कार और सामाजिक जिम्मेदारी के महत्व को भी रेखांकित किया। समाजबंधुओं की सहभागिता ने आयोजन को सामूहिक एकता और सामाजिक चेतना का स्वरूप दिया। आयोजन में उपस्थित समाज के पदाधिकारियों, व्यापारियों और समाजबंधुओं ने धार्मिक कार्यक्रमों में भाग लेते हुए संत राजारामजी महाराज के आदर्शों को याद किया। समाज की नई पीढ़ी को अपनी धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक विरासत से जोड़ने की भावना भी कार्यक्रम में दिखाई दी। आयोजकों का मानना रहा कि ऐसे आयोजन समाज के बीच आपसी संपर्क और एकजुटता को मजबूत करने के साथ बच्चों और युवाओं को अपनी परंपराओं से परिचित कराने का प्रभावी माध्यम बनते हैं। धार्मिक आयोजनों के साथ शिक्षा और संस्कार जैसे विषयों को जोड़ने से समाज में सकारात्मक सोच को बढ़ावा मिलता है। नई पीढ़ी को दिशा देने का संकल्प कार्यक्रम में दिए गए संदेश का केंद्रीय भाव यही रहा कि समाज की प्रगति केवल आर्थिक समृद्धि से नहीं, बल्कि शिक्षित, संस्कारित और जिम्मेदार नई पीढ़ी के निर्माण से होती है। बच्चों की शिक्षा में निवेश के साथ उनके व्यक्तित्व और चरित्र निर्माण पर ध्यान देना समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता है। राजारामजी महाराज की पुण्यतिथि पर आयोजित यह कार्यक्रम श्रद्धा और भक्ति के साथ-साथ समाज के भविष्य को लेकर चिंतन का अवसर भी बना। मेधावी विद्यार्थियों का सम्मान और शिक्षा-संस्कार पर दिया गया संदेश समाज में सकारात्मक दिशा का संकेत माना गया। आयोजन के माध्यम से समाजबंधुओं ने संत राजारामजी महाराज के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनके आदर्शों को आगे बढ़ाने और समाज में सेवा, शिक्षा, संस्कार तथा सद्भाव की भावना मजबूत करने का संदेश दिया। उडुपी में आयोजित राजारामजी महाराज की 83वीं पुण्यतिथि ने धार्मिक आस्था के साथ शिक्षा और संस्कार की महत्वपूर्ण भूमिका को सामने रखा। रात्रि जागरण, प्रसादी और मेधावी विद्यार्थियों के सम्मान ने आयोजन को भावनात्मक एवं सामाजिक रूप से सार्थक बनाया। कार्यक्रम में हरीश चौधरी का शिक्षा-संस्कार पर दिया गया संदेश विशेष रूप से महत्वपूर्ण रहा। उन्होंने स्पष्ट किया कि आधुनिक शिक्षा के साथ चरित्र निर्माण और संस्कारों का विकास भी उतना ही जरूरी है। यही संतुलन परिवार, समाज और राष्ट्र के उज्ज्वल भविष्य की आधारशिला बन सकता है।

  • श्री राजेश्वर भगवान की 83वीं पुण्यतिथि पर गूंजा भक्तिरस

    भजन संध्या, जागरण और महाप्रसादी के साथ श्रद्धापूर्वक हुआ पुण्य स्मरण; संतों के सान्निध्य में उमड़ा समाज फोटो: श्री राजेश्वर भगवान की पुण्यतिथि समारोह की भक्ति संध्या, संतों का सान्निध्य एवं महाप्रसादी कार्यक्रम भारतार्थ खबर। संवाददाता: धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) चेन्नई | 11 अगस्त 2026 चेन्नई। साहूकारपेट स्थित श्री राजेश्वर भवन में श्री राजेश्वर भगवान की 83वीं पुण्यतिथि श्रद्धा, भक्ति और सामाजिक एकजुटता के साथ मनाई गई। पुण्यतिथि के अवसर पर आयोजित भव्य भजन संध्या एवं जागरण में संतों के पावन सान्निध्य के बीच देर रात तक भक्तिमय वातावरण बना रहा। समाजबंधुओं, महिलाओं और बच्चों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता करते हुए श्री राजेश्वर भगवान के चरणों में श्रद्धा अर्पित की। श्री राजेश्वर भगवान की 83वीं पुण्यतिथि के उपलक्ष्य में सोमवार रात्रि श्री राजेश्वर भवन में विशेष भजन संध्या एवं जागरण का आयोजन किया गया। शिकारपुरा धाम से पधारे संतश्री विष्णुजी एवं श्री ज्ञानप्रकाशजी महाराज के पावन सान्निध्य ने कार्यक्रम को आध्यात्मिक गरिमा प्रदान की। भक्ति जागरण का शुभारंभ प्रसिद्ध भजन गायक सोहनजी कलबी डोली ने गणेश वंदना से किया। इसके बाद श्री राजारामजी की महिमा, उनके प्रेरक उपदेश एवं भविष्यवाणियों से जुड़े भजनों की भावपूर्ण प्रस्तुतियां दी गईं। सावन मास की आध्यात्मिक भावना को ध्यान में रखते हुए शिव भक्ति से ओत-प्रोत मधुर भजनों की प्रस्तुतियों ने श्रद्धालुओं को देर रात तक भक्तिरस में सराबोर रखा। कार्यक्रम के दौरान श्रद्धालुओं ने सामूहिक रूप से भक्ति गीतों में सहभागिता की और गुरु एवं आराध्य के प्रति अपनी आस्था व्यक्त की। श्री राजारामजी की महिमा एवं उनके संदेशों पर आधारित भजनों ने उपस्थित समाजबंधुओं में आध्यात्मिक चेतना और श्रद्धा का संचार किया। मध्यरात्रि आरती के बाद विशेष धार्मिक आयोजन जागरण के दौरान मध्यरात्रि में गुरुदेव की विशेष आरती की गई। आरती के समय पूरा श्री राजेश्वर भवन भक्तिमय वातावरण से गूंज उठा। श्रद्धालुओं ने सामूहिक रूप से आरती में भाग लेकर सुख, शांति, समृद्धि और समाज के कल्याण की मंगलकामना की। मध्यरात्रि आरती के पश्चात अगले वर्ष के चढ़ावे की घोषणा एवं संबंधित धार्मिक परंपराएं पूरी की गईं। इसके बाद प्रभाती आरती के साथ रात्रि के धार्मिक कार्यक्रम का समापन हुआ। कार्यक्रम में संतों के प्रवचन, भक्ति संगीत और धार्मिक परंपराओं का सुंदर समन्वय देखने को मिला। आयोजन का उद्देश्य केवल पुण्य स्मरण तक सीमित नहीं रहा, बल्कि समाज को धार्मिक मूल्यों, गुरु भक्ति और सामाजिक एकता से जोड़ने का संदेश भी दिया गया। मंगलवार को पूजा-अर्चना के बाद महाप्रसादी पुण्यतिथि के मुख्य धार्मिक कार्यक्रम के अगले चरण में मंगलवार को श्रावण वदी चौदस के अवसर पर श्री राजेश्वर भगवान की विधिवत पूजा-अर्चना की गई। श्रद्धालुओं ने भगवान के दर्शन कर आराधना की और परिवार एवं समाज की सुख-समृद्धि की कामना की। पूजा-अर्चना के पश्चात महाप्रसादी का आयोजन किया गया। इसमें चेन्नई के विभिन्न क्षेत्रों से पहुंचे समाजबंधुओं ने भाग लिया। महिलाओं और बच्चों की भी उल्लेखनीय सहभागिता रही। महाप्रसादी के दौरान समाजबंधुओं ने एक-दूसरे से आत्मीय मुलाकात की और धार्मिक आयोजन को सामाजिक मिलन का स्वरूप प्रदान किया। श्रद्धा के साथ सामाजिक एकजुटता का संदेश श्री राजेश्वर भगवान की 83वीं पुण्यतिथि का यह आयोजन धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक एकता का भी प्रभावशाली उदाहरण बना। विभिन्न क्षेत्रों से आए समाजबंधुओं की सहभागिता ने आयोजन को व्यापक स्वरूप दिया। आयोजन में समाज के पदाधिकारियों, कमेटी सदस्यों और कार्यकर्ताओं ने सक्रिय भूमिका निभाई। सभी के सामूहिक सहयोग से भजन संध्या, जागरण, पूजा-अर्चना और महाप्रसादी सहित विभिन्न कार्यक्रम व्यवस्थित एवं सफलतापूर्वक संपन्न हुए। समाज के पदाधिकारियों ने कहा कि ऐसे धार्मिक आयोजन समाज की नई पीढ़ी को अपनी आध्यात्मिक परंपराओं और सांस्कृतिक मूल्यों से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं। जब बच्चे और युवा धार्मिक कार्यक्रमों में परिवार के साथ सहभागी बनते हैं, तो उनमें संस्कार, सेवा, अनुशासन और सामाजिक जिम्मेदारी की भावना मजबूत होती है। भक्ति गीतों ने बांधा समां भजन गायक सोहनजी कलबी डोली की प्रस्तुतियां कार्यक्रम का प्रमुख आकर्षण रहीं। गणेश वंदना से शुरू हुई भक्ति यात्रा में श्री राजारामजी की महिमा, उपदेश और भविष्यवाणियों से जुड़े भजनों के साथ सावन मास की शिव भक्ति से संबंधित गीत प्रस्तुत किए गए। भक्ति संगीत के दौरान श्रद्धालुओं ने तालियों और जयकारों के साथ अपनी सहभागिता दर्ज कराई। देर रात तक चले जागरण में भक्तिमय वातावरण बना रहा। मध्यरात्रि आरती के दौरान श्रद्धालुओं की आस्था और उत्साह विशेष रूप से देखने को मिला। संतों का सान्निध्य बना आध्यात्मिक आकर्षण शिकारपुरा धाम के संतश्री विष्णुजी एवं श्री ज्ञानप्रकाशजी महाराज की उपस्थिति ने आयोजन को विशेष आध्यात्मिक महत्व प्रदान किया। संतों के सान्निध्य में श्रद्धालुओं ने धर्म, गुरु भक्ति और सदाचार के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा प्राप्त की। धार्मिक आयोजनों में संतों का सान्निध्य श्रद्धालुओं के लिए आध्यात्मिक मार्गदर्शन का अवसर माना जाता है। इसी भावना के साथ समाजबंधुओं ने संतों के प्रति श्रद्धा व्यक्त की और उनके आशीर्वाद प्राप्त किए। नई पीढ़ी को संस्कृति से जोड़ने का प्रयास श्री राजेश्वर भगवान की पुण्यतिथि के अवसर पर बच्चों और महिलाओं की सहभागिता आयोजन की खास विशेषता रही। धार्मिक कार्यक्रमों में परिवार के सभी वर्गों की भागीदारी से सामाजिक परंपराओं को आगे बढ़ाने का अवसर मिलता है। आयोजकों ने कहा कि धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों के माध्यम से बच्चों को अपनी परंपरा, संतों की शिक्षाओं और समाज की विरासत से परिचित कराया जा सकता है। इससे नई पीढ़ी में अपनी संस्कृति के प्रति सम्मान और जुड़ाव मजबूत होता है। सफल आयोजन में सभी का सहयोग भव्य आयोजन को सफल बनाने में समाज के पदाधिकारियों, कमेटी सदस्यों, कार्यकर्ताओं और समाजबंधुओं का विशेष सहयोग रहा। आयोजन की विभिन्न व्यवस्थाओं में सभी ने जिम्मेदारी के साथ योगदान दिया। भजन संध्या से लेकर पूजा-अर्चना और महाप्रसादी तक कार्यक्रमों को सुचारू रूप से संपन्न कराने के लिए कार्यकर्ताओं ने सक्रिय भूमिका निभाई। समाजबंधुओं ने भी अनुशासन और उत्साह के साथ कार्यक्रम में सहभागिता की। पुण्य स्मरण से मिला सेवा और संस्कार का संदेश श्री राजेश्वर भगवान की 83वीं पुण्यतिथि पर आयोजित धार्मिक कार्यक्रम ने श्रद्धालुओं को अपने आराध्य और संत परंपरा के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर दिया। भक्ति, आरती, पूजा-अर्चना और महाप्रसादी के माध्यम से श्रद्धालुओं ने सामूहिक रूप से पुण्य स्मरण किया। यह आयोजन इस संदेश के साथ संपन्न हुआ कि धार्मिक परंपराएं केवल उत्सव तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे समाज में संस्कार, सेवा, सद्भाव और एकता को मजबूत करने का माध्यम भी हैं। चेन्नई के साहूकारपेट स्थित श्री राजेश्वर भवन में आयोजित यह कार्यक्रम श्रद्धा और उल्लास का केंद्र बना रहा। समाजबंधुओं ने श्री राजेश्वर भगवान के प्रति अपनी आस्था व्यक्त करते हुए धार्मिक मूल्यों को जीवन में अपनाने और समाज की एकता को मजबूत करने का संकल्प लिया।

  • रिश्तों की महक, आख़िरी रोटी (अंतिम भाग)

    दिल को छू लेने वाली मौलिक कहानियाँ ,लेखक: अशोक कुमार सिंह आख़िरी रोटी (अंतिम भाग) जिस दिन आख़िरी रोटी माँ की थाली में पहुँची... उसी दिन उस घर में रिश्ते फिर से जीवित हो गए। आँगन में सन्नाटा पसरा हुआ था। तीनों बेटे अब भी अपनी माँ के सामने सिर झुकाए बैठे थे। किसी की हिम्मत नहीं हो रही थी कि उनकी आँखों में आँखें डाल सके। सरस्वती देवी ने धीरे से अपने आँसू पोंछे। फिर उसी ममता भरी आवाज़ में बोलीं— "इतना मत रोओ बेटा... माँ अपने बच्चों के आँसू नहीं देख सकती।" राघव ने काँपते हुए हाथों से माँ की खाली थाली उठाई। उसने रसोई में जाकर वही आख़िरी रोटी उठाई, जिसे अम्मा हमेशा की तरह किसी और के लिए बचाकर रखना चाहती थीं। वह वापस आया... और पहली बार... उसने वह रोटी अपनी माँ की थाली में रख दी। भर्राई हुई आवाज़ में बोला— "अम्मा... आज यह रोटी आप खाएँगी। हम नहीं... पहले आप।" मोहन भी उठ खड़ा हुआ। उसने दाल की कटोरी माँ के सामने रख दी। सुरेश ने पानी का गिलास भरकर उनके हाथों में दिया। तीनों बहुएँ चुपचाप खड़ी थीं। उनकी आँखों से भी आँसू बह रहे थे। छोटी गौरी मुस्कुराते हुए दादी की गोद में बैठ गई। उसने दोनों हाथों से रोटी का छोटा-सा टुकड़ा तोड़ा... और दादी के मुँह तक ले जाकर बोली— "दादी... अब आपकी बारी है।" सरस्वती देवी ने काँपते हुए हाथों से गौरी का चेहरा सहलाया। रोटी का वह पहला कौर उनके मुँह में गया... लेकिन निगलने से पहले ही उनकी आँखों से आँसू छलक पड़े। शायद... वर्षों बाद... उन्होंने पहली बार अपने हिस्से की रोटी बिना किसी चिंता के खाई थी। आँगन में खड़े नीम के पेड़ से पत्तियाँ धीरे-धीरे झर रही थीं। ऐसा लग रहा था... मानो वर्षों से सूखा पड़ा वह घर फिर से हरियाली ओढ़ रहा हो। भोजन समाप्त होने के बाद राघव ने सबके सामने एक निर्णय लिया। "आज से यह घर कभी नहीं बिकेगा।" मोहन ने कहा— "हर महीने नहीं... हर पंद्रह दिन में पूरा परिवार यहीं आएगा।" सुरेश ने माँ का हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा— "अब आपको किसी का इंतज़ार नहीं करना पड़ेगा, अम्मा।" सरस्वती देवी मुस्कुराईं। उनकी मुस्कान में आज संतोष था। उन्होंने धीरे से कहा— "मुझे धन नहीं चाहिए बेटा... बस इतना याद रखना कि जिस दिन घर में माँ की थाली सबसे आखिर में लगने लगे, उसी दिन समझ लेना कि घर से सुख विदा होने लगा है।" पूरा परिवार एक साथ उठकर माँ के चरणों में झुक गया। बरामदे की दीवार पर टँगी रामनाथ जी की तस्वीर पर ढलते सूरज की किरण पड़ी। ऐसा लगा... मानो वह भी मुस्कुरा रहे हों। उस शाम बरईपुर गाँव में किसी ने कोई उत्सव नहीं देखा... लेकिन जिसने भी उस घर की ओर देखा... उसे लगा— आज एक परिवार फिर से जन्म ले चुका है। जीवन संदेश माँ कभी अपने लिए नहीं जीती। वह अपने हिस्से की रोटी, अपनी नींद, अपने सपने और कभी-कभी पूरी ज़िंदगी भी बच्चों के नाम कर देती है। इसलिए... जब भी भोजन करें, एक बार मुड़कर ज़रूर पूछिए— "माँ... आपने खाना खा लिया?" हो सकता है... यही एक प्रश्न किसी माँ के लिए दुनिया का सबसे बड़ा सम्मान बन जाए। ✍️ लेखक: अशोक कुमार सिंह समाप्त अन्य कहानी , मार्गदर्शन एवं प्रेरणादायी ज़रूर पढ़िए https://www.bhaarataarth.com/post/रिश्तों-की-महक-आख-िरी-रोटी-भाग-1 https://www.bhaarataarth.com/post/रिश्तों-की-महक-आख-िरी-रोटी-भाग-2 https://www.bhaarataarth.com/post/रिश्तों-की-महक-आख-िरी-रोटी-भाग-3 https://www.bhaarataarth.com/post/रिश्तों-की-महक-आख-िरी-रोटी-भाग-4 https://www.bhaarataarth.com/post/रिश्तों-की-महक-आख-िरी-रोटी-भाग-5 https://www.bhaarataarth.com/post/माँ-की-आख-िरी-गुल्लक https://www.bhaarataarth.com/post/रिश्तों-की-सबसे-बड-ी-द-लत एक दिल दहलाने वाली कहानी धारावाहिक उपन्यास जरूर पढ़ि भाग 01 भाग 02 भाग 03 भाग 4 भाग 5 भाग 6 भाग 7 भाग 8 भाग 9 भाग 10 भाग 11 नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में इन पोस्ट्स पर अपनी राय ज़रूर दें। आपका नज़रिया ही लोकतंत्र की ताकत है; देश के निर्माण में आपकी अहम भूमिका है। सटीक, वैज्ञानिक और साहित्यिक खबरें पढ़ने के लिए 'भारतार्थ समाचार' से जुड़े रहें। अपना समर्थन दिखाएं—हमें लाइक, शेयर और फ़ॉलो करें—ताकि हर ज़रूरी अपडेट आपको सबसे पहले मिले। ताज़ा खबरों के लिए "भारतार्थ खबर" के साथ बने रहें।

  • परिस्थितियां नहीं, अपनी मनोस्थिति बदलें: मुनि वीरसागर

    कृतज्ञता, प्रतिक्रमण और क्षमा से आत्मपरिवर्तन का मार्ग; अहंकार छोड़ आत्मशुद्धि की ओर बढ़ने का संदेश भारतार्थ खबर। संवाददाता: धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) बेंगलुरु, 11 अगस्त 2026। निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 वीरसागर जी महाराज ने मंगलवार को अपने प्रेरक आध्यात्मिक प्रवचन में कृतज्ञता, आत्मस्वीकार, प्रतिक्रमण, क्षमा और आत्मपरिवर्तन के गहरे सूत्र समझाते हुए कहा कि मनुष्य जीवन की समस्याओं का समाधान अक्सर बाहरी परिस्थितियों और दूसरों को बदलने में खोजता है, जबकि वास्तविक परिवर्तन की शुरुआत स्वयं की मनोस्थिति बदलने से होती है। मुनिश्री ने कहा कि यदि व्यक्ति बार-बार नौकरी, स्थान, संबंध या परिस्थितियां बदलने के बाद भी उन्हीं समस्याओं का सामना करता है, तो उसे एक बार अपने भीतर झांककर देखना चाहिए। समस्या का कारण हमेशा बाहरी दुनिया नहीं होती; कई बार हमारी सोच, प्रतिक्रिया, अपेक्षाएं और भावनाएं ही समस्या को बनाए रखती हैं। उन्होंने श्रद्धालुओं को आत्मनिरीक्षण का संदेश देते हुए कहा कि जीवन बदलने का सबसे प्रभावी मार्ग परिस्थितियों को नियंत्रित करना नहीं, बल्कि अपनी प्रतिक्रिया और दृष्टिकोण को बदलना है। जब व्यक्ति अपनी मनोस्थिति को समझने लगता है, तब धीरे-धीरे शिकायत की जगह कृतज्ञता, क्रोध की जगह क्षमा और अहंकार की जगह विनम्रता जन्म लेने लगती है। 30-40 वर्षों तक बाहर बदलाव खोजता रहता है मनुष्य मुनि श्री वीरसागर जी महाराज ने कहा कि मनुष्य कई बार जीवन के 30 से 40 वर्ष तक अपने आसपास के लोगों और परिस्थितियों को बदलने में लगा देता है। कभी नौकरी बदलने, कभी स्थान बदलने और कभी दूसरे व्यक्ति से अपने अनुसार व्यवहार की अपेक्षा करने के बावजूद यदि जीवन की परेशानियां दोहराती रहें, तो व्यक्ति को अपने भीतर परिवर्तन की आवश्यकता को समझना चाहिए। उन्होंने कहा कि बाहरी वातावरण बदलने से कुछ समय के लिए राहत मिल सकती है, लेकिन स्थायी शांति और संतोष के लिए आंतरिक परिवर्तन आवश्यक है। व्यक्ति की दृष्टि, सोच और भावनाएं बदलती हैं तो वही परिस्थितियां भी अलग दिखाई देने लगती हैं। मुनिश्री के अनुसार आत्मपरिवर्तन का पहला कदम स्वयं को दोष देना नहीं, बल्कि स्वयं को ईमानदारी से समझना है। अपनी कमियों को स्वीकार करना कमजोरी नहीं, बल्कि आत्मसुधार की शक्ति है। अहंकार आत्मपरिवर्तन की सबसे बड़ी बाधाओं में से एक प्रवचन में मुनिश्री ने अहंकार को आत्मिक विकास की प्रमुख बाधाओं में बताते हुए कहा कि अहंकार व्यक्ति को अपनी भूल स्वीकार करने से रोकता है। जब व्यक्ति हर समस्या के लिए दूसरों को जिम्मेदार मानता है, तब वह अपने भीतर सुधार की संभावना को बंद कर देता है। उन्होंने कहा कि केवल औपचारिक रूप से किसी व्यक्ति को धन्यवाद देना कृतज्ञता नहीं है। वास्तविक कृतज्ञता वह आंतरिक भाव है, जो व्यक्ति की सोच और जीवन के प्रति दृष्टिकोण में सकारात्मक बदलाव पैदा करे। कृतज्ञ व्यक्ति शिकायत से सीख की ओर बढ़ता है। वह हर परिस्थिति में केवल यह नहीं देखता कि उसे क्या नहीं मिला, बल्कि यह भी समझने का प्रयास करता है कि उस अनुभव से उसे क्या सीख मिली। मुनिश्री ने कहा कि जब कृतज्ञता हृदय में उतरती है तो व्यक्ति अपेक्षा कम और स्वीकार अधिक करने लगता है। यही भाव धीरे-धीरे मानसिक शांति और आत्मिक संतुलन की दिशा में ले जाता है। प्रतिक्रमण केवल धार्मिक क्रिया नहीं, आत्मनिरीक्षण का माध्यम मुनि श्री वीरसागर जी महाराज ने प्रतिक्रमण की आध्यात्मिक महत्ता को समझाते हुए कहा कि आत्मपरिवर्तन के लिए व्यक्ति का अपने प्रति ईमानदार होना जरूरी है। जैन दर्शन में प्रतिक्रमण को आत्मनिरीक्षण और आत्मशुद्धि की महत्वपूर्ण प्रक्रिया बताते हुए उन्होंने कहा कि व्यक्ति को अपने भीतर झांककर क्रोध, मान, माया, लोभ, आसक्ति और अहंकार जैसे भावों को पहचानना चाहिए। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जिस पात्र को किसी शुद्ध द्रव्य से भरना हो, उसमें पहले से मौजूद अशुद्ध या अनुपयोगी द्रव्य को निकालना आवश्यक होता है। इसी प्रकार आत्मिक विकास के लिए मन में संचित नकारात्मक भावों को पहचानना और उनका परिमार्जन करना जरूरी है। मुनिश्री ने कहा कि अपनी भूल स्वीकार करना आत्महीनता नहीं, बल्कि विनम्रता और आत्मसुधार की पहली सीढ़ी है। जब व्यक्ति अपनी वर्तमान स्थिति को ईमानदारी से स्वीकार करता है, तभी वह अपने शुद्ध स्वरूप की ओर आगे बढ़ सकता है। इसी आत्मबोध की दिशा में “शुद्धोऽहम्, बुद्धोऽहम्” की भावना को उन्होंने केवल शब्दों तक सीमित न रखकर आत्मचिंतन का माध्यम बनाने की प्रेरणा दी। क्षमा से हल्का होता है मन का बोझ मुनि श्री ने क्षमा को आत्मशुद्धि और अहंकार-मुक्ति का महत्वपूर्ण आधार बताते हुए कहा कि क्षमा केवल किसी व्यक्ति की भूल को माफ कर देना नहीं है। क्षमा का वास्तविक अर्थ अपने भीतर संचित राग-द्वेष, कटुता और शिकायत के बोझ को भी छोड़ना है। उन्होंने श्रद्धालुओं को सभी जीवों के प्रति क्षमाभाव रखने की प्रेरणा देते हुए “खामेमि सव्व जीवे” की भावना को आत्मशुद्धि का मार्ग बताया। मुनिश्री के अनुसार जब व्यक्ति अपनी भूलों को स्वीकार करता है और दूसरों के प्रति क्षमा का भाव विकसित करता है, तब उसके भीतर जमा भावनात्मक बोझ धीरे-धीरे कम होने लगता है। इससे व्यक्ति शिकायत से कृतज्ञता, अहंकार से विनम्रता और अशांति से आत्मिक शांति की ओर बढ़ता है। बाहरी सफलता से अधिक जरूरी है आंतरिक विकास प्रवचन में मुनि श्री वीरसागर जी महाराज ने आधुनिक जीवन की चुनौतियों के संदर्भ में कहा कि आज मनुष्य बाहरी उपलब्धियों को जीवन की सफलता का प्रमुख आधार मानता है। नौकरी, व्यवसाय, प्रतिष्ठा, धन और सामाजिक सम्मान महत्वपूर्ण हो सकते हैं, लेकिन इन सबके बावजूद यदि मन अशांत है तो जीवन में वास्तविक संतोष का अभाव बना रहता है। उन्होंने कहा कि व्यक्ति को बाहरी विकास के साथ-साथ आंतरिक विकास पर भी ध्यान देना चाहिए। अपने विचारों, भावनाओं और प्रतिक्रियाओं को समझना आत्मपरिवर्तन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। मुनिश्री का संदेश आधुनिक जीवन और प्राचीन जैन दर्शन के बीच एक सार्थक सेतु के रूप में सामने आया। उन्होंने बताया कि आत्मनिरीक्षण, कृतज्ञता, क्षमा और प्रतिक्रमण जैसे आध्यात्मिक सूत्र आज के तनावपूर्ण और तेजी से बदलते जीवन में भी व्यक्ति को अपने भीतर देखने की प्रेरणा देते हैं। शिकायत से कृतज्ञता की ओर बढ़ने का संदेश मुनिश्री ने कहा कि मनुष्य को अपने जीवन में यह अभ्यास करना चाहिए कि वह केवल कमियों और परेशानियों को न देखे, बल्कि उन लोगों, परिस्थितियों और अवसरों के प्रति भी कृतज्ञ रहे जिन्होंने उसके जीवन को किसी न किसी रूप में समृद्ध किया है। उन्होंने कहा कि कृतज्ञता मनुष्य के दृष्टिकोण को बदलने वाली शक्ति है। यह व्यक्ति को अभाव से उपलब्धि की ओर देखने की दृष्टि देती है। यदि व्यक्ति हर दिन अपने जीवन में प्राप्त छोटी-बड़ी अच्छी चीजों के लिए आभार व्यक्त करना शुरू करे तो उसके विचारों में सकारात्मकता बढ़ सकती है। इसी प्रकार अपनी गलतियों को स्वीकार कर उनसे सीखना और दूसरों के प्रति क्षमा का भाव रखना आत्मपरिवर्तन की प्रक्रिया को मजबूत करता है। आत्मपरिवर्तन ही स्थायी समाधान का मार्ग मुनिश्री वीरसागर जी महाराज के प्रवचन का मूल संदेश यही रहा कि जीवन में हर समस्या का समाधान बाहर खोजने के बजाय व्यक्ति को पहले स्वयं के भीतर झांकना चाहिए। परिस्थितियों को हमेशा अपने अनुसार बदलना संभव नहीं है, लेकिन परिस्थितियों के प्रति अपनी प्रतिक्रिया को बदला जा सकता है। दूसरों का व्यवहार हमारे नियंत्रण में नहीं हो सकता, लेकिन उस व्यवहार के प्रति हमारी प्रतिक्रिया और दृष्टिकोण को हम अपने प्रयास से बदल सकते हैं। इसी आत्मजागरूकता से व्यक्ति अपने भीतर के क्रोध, अहंकार, अपेक्षा और आसक्ति को पहचान सकता है। प्रतिक्रमण उसे अपनी भूलों को देखने का अवसर देता है, क्षमा मन का बोझ हल्का करती है और कृतज्ञता जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करती है। मुनिश्री ने श्रद्धालुओं को प्रेरित किया कि धर्म को केवल धार्मिक आयोजन या उपासना तक सीमित न रखें, बल्कि उसे व्यवहार, विचार और जीवनशैली में उतारें। वास्तविक धर्म वही है जो व्यक्ति के भीतर विनम्रता, संयम, करुणा, क्षमा और आत्मचिंतन को बढ़ाए। निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 वीरसागर जी महाराज का प्रवचन व्यक्ति को बाहरी दुनिया से भीतर की ओर लौटने का प्रेरक संदेश देता है। कृतज्ञता, आत्मस्वीकार, प्रतिक्रमण और क्षमा को आत्मपरिवर्तन के महत्वपूर्ण आधार बताते हुए उन्होंने समझाया कि स्थायी शांति की शुरुआत स्वयं की मनोस्थिति बदलने से होती है। उनका संदेश स्पष्ट है—दुनिया को बदलने से पहले स्वयं को समझें, परिस्थितियों को दोष देने से पहले अपनी प्रतिक्रिया को देखें और दूसरों से क्षमा की अपेक्षा करने से पहले अपने भीतर क्षमाभाव जगाएं। यही आत्मचिंतन व्यक्ति को अहंकार से विनम्रता, शिकायत से कृतज्ञता और अशांति से आत्मिक शांति की ओर ले जाने वाला मार्ग बन सकता है।

  • अल्मोड़ा के रवि टम्टा का उड़ान प्रयोग, HAPIDA SKYNeX ने भरी परीक्षण उड़ान

    भारतार्थ खबर संवाददाता अशोक कुमार सिंह (Bhaarataarth.com) अल्मोड़ा, 11 अगस्त 2026 उत्तराखंड आसमान में उड़ने वाली कार का विचार लंबे समय से विज्ञान और तकनीक की दुनिया में चर्चा का विषय रहा है। अब उत्तराखंड के अल्मोड़ा से जुड़े युवा नवाचारी रवि टम्टा का एक प्रयोग इस चर्चा को जमीन से उठाकर परीक्षण के स्तर तक ले आया है। उनके द्वारा विकसित HAPIDA SKYNeX नामक सिंगल-सीटर इलेक्ट्रिक फ्लाइंग व्हीकल के प्रोटोटाइप का परीक्षण किया गया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार यह वाहन सामान्य सड़क पर चलने वाली कार की पारंपरिक संरचना से अलग है। इसका डिजाइन उड़ान के लिए आवश्यक मोटर और प्रोपेलर आधारित व्यवस्था पर केंद्रित है। इसे ड्रोन तकनीक से प्रेरित व्यक्तिगत उड़ान वाहन के रूप में प्रस्तुत किया गया है। जमीन से आसमान तक पहुंचने की कोशिश पहाड़ी क्षेत्रों में परिवहन हमेशा एक चुनौती रहा है। ऊंचे-नीचे रास्ते, दुर्गम गांव और कई स्थानों पर सीमित सड़क संपर्क भविष्य की वैकल्पिक परिवहन तकनीकों की आवश्यकता को सामने लाते हैं। इसी तरह की संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए व्यक्तिगत हवाई परिवहन पर दुनिया भर में प्रयोग हो रहे हैं। रवि टम्टा का प्रोजेक्ट भी इसी तकनीकी दिशा में एक प्रयोग के रूप में सामने आया है। हालांकि, किसी प्रोटोटाइप का उड़ान भरना और उसका बड़े पैमाने पर सुरक्षित एवं व्यावसायिक इस्तेमाल—दो अलग-अलग चरण हैं। क्या यह वास्तव में ‘उड़ने वाली कार’ है? यहां शब्दों के इस्तेमाल में सावधानी जरूरी है। आम बोलचाल में इसे ‘फ्लाइंग कार’ कहा जा सकता है, लेकिन तकनीकी और पत्रकारिता की भाषा में इसे फिलहाल फ्लाइंग व्हीकल प्रोटोटाइप कहना अधिक सटीक होगा। क्योंकि अभी इसे सामान्य कार की तरह सड़क पर चलाकर और विमान की तरह नियमित रूप से उड़ाकर आम नागरिकों के इस्तेमाल के लिए उपलब्ध वाहन के रूप में प्रमाणित नहीं किया गया है। ‘भारत की पहली फ्लाइंग कार’ का दावा क्यों नहीं? सोशल मीडिया और कुछ रिपोर्टों में ऐसे दावे सामने आए हैं कि यह भारत की पहली उड़ने वाली कार है। लेकिन पत्रकारिता के मूल सिद्धांतों के अनुसार किसी उपलब्धि को ‘भारत की पहली’ कहने के लिए ठोस और आधिकारिक प्रमाण आवश्यक होता है। इसलिए जब तक संबंधित सरकारी अथवा सक्षम तकनीकी संस्था से ऐसा प्रमाण उपलब्ध न हो, भारतार्थ खबर इसे ‘भारत की पहली उड़ने वाली कार’ के रूप में प्रस्तुत नहीं करेगा। यह सावधानी खबर को कमजोर नहीं करती, बल्कि उसकी विश्वसनीयता बढ़ाती है। अभी प्रोटोटाइप, आगे लंबा रास्ता HAPIDA SKYNeX का परीक्षण निश्चित रूप से नवाचार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन इसके बाद कई तकनीकी और नियामकीय चरण सामने आते हैं। उड़ान सुरक्षा, स्थिरता, बैटरी और ऊर्जा क्षमता, आपातकालीन सुरक्षा, पायलट सुरक्षा, शोर, संचालन क्षेत्र और संबंधित विमानन नियमों के अनुरूप प्रमाणन जैसे विषय किसी भी व्यक्तिगत उड़ान वाहन के लिए महत्वपूर्ण होंगे। इसलिए फिलहाल इसे भविष्य के व्यक्तिगत हवाई परिवहन की दिशा में किया गया भारतीय तकनीकी प्रयोग कहना अधिक उचित होगा। भारतार्थ खबर का निष्कर्ष रवि टम्टा का प्रयोग यह दिखाता है कि बड़े तकनीकी विचार केवल महानगरों या बड़ी कंपनियों तक सीमित नहीं हैं। देश के छोटे शहरों और पहाड़ी क्षेत्रों से निकलने वाले नवाचारी भी भविष्य की परिवहन व्यवस्था को लेकर प्रयोग कर रहे हैं। लेकिन किसी भी नई तकनीक के मामले में उत्साह के साथ तथ्य और सावधानी दोनों जरूरी हैं। HAPIDA SKYNeX का परीक्षण एक उल्लेखनीय शुरुआत है; इसे व्यावसायिक उड़ने वाली कार बनने तक अभी कई तकनीकी और नियामकीय पड़ाव पार करने होंगे। भारतार्थ खबर की पड़ताल में फिलहाल सबसे सुरक्षित निष्कर्ष यही है—अल्मोड़ा से जुड़े रवि टम्टा के फ्लाइंग व्हीकल प्रोटोटाइप का परीक्षण हुआ है, लेकिन इसे अभी आम नागरिकों के लिए उपलब्ध उड़ने वाली कार या ‘भारत की पहली फ्लाइंग कार’ कहना जल्दबाजी होगी। भारतार्थ खबर — खबर नहीं, उसका अर्थ।

  • हुब्बल्ली में राजेश्वर भगवान की 83वीं पुण्यतिथि पर उमड़ा आस्था का सैलाब

    राजेश्वर भवन जयकारों से गूंजा, राजस्थानी परिधान में महिलाओं ने दिखाई संस्कृति की झलक भारतार्थ खबर। संवाददाता: धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) हुब्बल्ली | 11 अगस्त 2026। हुब्बल्ली में राजेश्वर भगवान की 83वीं पुण्यतिथि श्रद्धा, भक्ति और सामाजिक एकजुटता के साथ मनाई गई। राजेश्वर भवन में आयोजित धार्मिक कार्यक्रम में बड़ी संख्या में आंजणा (पटेल) समाज के श्रद्धालु परिवार सहित शामिल हुए। सुबह आरती और पूजा-अर्चना के बाद भजन-कीर्तन का आयोजन हुआ, जिसमें जोधपुर से आए कुलदीप ओझा एंड पार्टी ने भक्ति गीतों की प्रस्तुति देकर वातावरण को भक्तिमय बना दिया। श्रद्धालु भजनों पर झूमते हुए राजेश्वर भगवान के जयकारे लगाते नजर आए। पुण्यतिथि समारोह में महिलाओं की विशेष भागीदारी रही। पारंपरिक राजस्थानी परिधान और श्रृंगार में पहुंचीं महिलाओं ने प्रवासी समाज के बीच अपनी मातृभूमि की संस्कृति, परंपरा और संस्कारों की सुंदर झलक प्रस्तुत की। धार्मिक आयोजन के साथ सामाजिक और सांस्कृतिक एकता का यह दृश्य समारोह का प्रमुख आकर्षण रहा। भक्ति और संस्कृति का संगम बना पुण्यतिथि समारोह आंजणा समाज के आराध्य संत राजेश्वर भगवान की पुण्यतिथि समाज के लिए केवल धार्मिक स्मरण का अवसर नहीं, बल्कि सेवा, संस्कार, सद्भाव और सामाजिक एकजुटता को मजबूत करने का महत्वपूर्ण पर्व भी है। समारोह में श्रद्धालुओं ने राजेश्वर भगवान के आदर्शों को जीवन में उतारने तथा नई पीढ़ी को समाज की धार्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का संकल्प लिया। कार्यक्रम की शुरुआत सुबह आरती और पूजा-अर्चना के साथ हुई। इसके बाद भजन-कीर्तन का आयोजन किया गया। जोधपुर से आए कुलदीप ओझा एंड पार्टी की भक्ति प्रस्तुतियों ने श्रद्धालुओं को भाव-विभोर कर दिया। भजनों के दौरान पूरा वातावरण जयकारों और भक्तिभाव से गूंज उठा। दोपहर में श्रद्धालुओं के लिए महाप्रसादी का आयोजन किया गया। बड़ी संख्या में समाजबंधुओं ने प्रसादी ग्रहण की। शाम को आयोजित महाआरती में श्रद्धालुओं ने सामूहिक रूप से भाग लिया। महाआरती के दौरान राजेश्वर भगवान के जयकारों से राजेश्वर भवन भक्तिमय हो उठा। राजस्थानी परिधान में महिलाओं ने मोहा मन समारोह में महिलाओं की सक्रिय सहभागिता विशेष रूप से देखने को मिली। बड़ी संख्या में महिलाएं पारंपरिक राजस्थानी वेशभूषा और पारंपरिक श्रृंगार के साथ कार्यक्रम में पहुंचीं। उनके परिधान और सांस्कृतिक प्रस्तुति ने आयोजन को राजस्थान की लोक परंपराओं से जोड़ दिया। प्रवास में रहने वाले समाजबंधुओं के लिए ऐसे आयोजन अपनी जड़ों, मातृभूमि और पारिवारिक संस्कारों से जुड़े रहने का माध्यम बनते हैं। महिलाओं की भागीदारी ने यह संदेश भी दिया कि संस्कृति और परंपराओं को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने में परिवार और विशेष रूप से महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका है। परिवार सहित शामिल हुए समाजबंधु आयोजक संगठन की ओर से समाज के सभी बंधुओं से परिवार सहित कार्यक्रम में शामिल होने का आह्वान किया गया था। समाज के व्यापारियों और प्रतिष्ठान संचालकों से भी धार्मिक आयोजन में सहभागिता के लिए सहयोग की अपील की गई। इस अपील का सकारात्मक असर देखने को मिला और हुब्बल्ली-धारवाड़ के साथ आसपास के क्षेत्रों से भी समाजबंधु परिवार सहित कार्यक्रम में पहुंचे। बच्चों, युवाओं, महिलाओं और बुजुर्गों की सहभागिता ने आयोजन को व्यापक सामाजिक स्वरूप प्रदान किया। नई पीढ़ी तक पहुंच रहे राजेश्वर भगवान के आदर्श आंजणा (पटेल) समाज सेवा संगठन हुब्बली-धारवाड़ के सचिव वगताराम पारलू ने बताया कि राजेश्वर भगवान की पुण्यतिथि के अवसर पर प्रतिवर्ष धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इस वर्ष भी आयोजन में बड़ी संख्या में समाजबंधुओं ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजनों का उद्देश्य केवल धार्मिक अनुष्ठान करना नहीं, बल्कि समाज को अपनी परंपराओं, संस्कारों और सांस्कृतिक विरासत से जोड़े रखना है। राजेश्वर भगवान के जीवन और संदेश से प्रेरणा लेकर समाज में सेवा, सद्भाव, अनुशासन और संस्कारों को मजबूत करने की दिशा में निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी को अपने आराध्य संतों और महापुरुषों के जीवन से परिचित कराना समय की आवश्यकता है। धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम इस दिशा में प्रभावी भूमिका निभा सकते हैं। सेवा और सहयोग में आगे आए समाजबंधु राजेश्वर भगवान की 83वीं पुण्यतिथि के आयोजन को सफल बनाने में समाज के श्रद्धालुओं, दानदाताओं और सेवाभावी कार्यकर्ताओं ने महत्वपूर्ण सहयोग दिया। अलग-अलग जिम्मेदारियां संभालते हुए समाजबंधुओं ने कार्यक्रम की व्यवस्थाओं को सुचारू बनाने में योगदान दिया। श्रद्धालुओं ने पूजा-अर्चना, दर्शन, भजन-कीर्तन, महाआरती और महाप्रसादी में भाग लेकर पुण्यलाभ प्राप्त किया। आयोजन के दौरान समाज की सामूहिक शक्ति और आपसी सहयोग की भावना भी स्पष्ट रूप से दिखाई दी। सामाजिक और सांस्कृतिक एकता का संदेश राजेश्वर भगवान की पुण्यतिथि के अवसर पर आयोजित समारोह ने धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक एकता का भी मजबूत संदेश दिया। समाजबंधुओं ने एक-दूसरे से मिलकर पारिवारिक और सामाजिक संबंधों को मजबूत किया। आयोजन में यह भावना प्रमुख रही कि समाज की प्रगति केवल आर्थिक विकास से नहीं, बल्कि शिक्षा, संस्कार, सेवा, सामाजिक सहयोग और सांस्कृतिक चेतना से भी होती है। धार्मिक आयोजन समाज को एक मंच पर लाने और नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का प्रभावी माध्यम बनते हैं। गणमान्य समाजबंधुओं की रही मौजूदगी समारोह में आंजणा (पटेल) समाज सेवा संगठन हुब्बली-धारवाड़ के अध्यक्ष सोपाराम काग, दूदाराम कान्दली, खंगाराम कान्दली, केवलराम ठां, किशोर पटेल, मूलाराम कान्दली, तेजाराम मालवी सिनली, पीराराम मालवी, रूपाराम ठां, कानाराम खाखरलाई, चैनाराम काग, ओमाराम सीह, केवलराम ठां, मूलाराम, डूंगराराम काग, विरमराम पोण, जूंजाराम काग, टिकमाराम मालवी, छोगाराम काग, रमेश करड़, कलाराम करड़, हरजीराम, सांवलराम, स्वरूपराम धारवाड़, विरमराम करलू, सोमाराम हारणी, सोमाराम मालवी सिनली, रूगनाथ मालवी, शेराराम ठां, भीमाराम करड़, अणदाराम तरक, नेमाराम काटोतरिया, कृष्णकुमार, जगदीश धुणिया, समर्थराम कुकील, मोहनराम अराबा, केराराम, मकराराम, पीराराम ठां, ओमाराम, तेजाराम बोका, मालाराम सीह, जालाराम मालवी सिनली सहित बड़ी संख्या में समाजबंधु उपस्थित रहे। इसके अलावा कालूसिंह चौहान, सुभाषसिंह जमादार, रमेश बाफना, अभिषेक मेहता, संदीप मेहता, परबतसिंह खींची, वेलाराम घांची, अनोप दर्जी, धर्मेन्द्र माली, उदाराम प्रजापत, घेवरराम पोण, भीमाराम पोण, भीमाराम देवासी, जोगाराम तरक, तरण पटेल चाली, चुन्नीलाल सोलंकी, कैलाश सोलंकी, ओमाराम काग, ताम्बाराम सीह समेत अनेक गणमान्य लोग भी आयोजन में शामिल हुए। राजेश्वर भवन में गूंजे जयकारे पूरे आयोजन के दौरान श्रद्धालुओं में उत्साह और भक्ति का विशेष वातावरण रहा। भजन-कीर्तन, पूजा-अर्चना, महाआरती और महाप्रसादी के माध्यम से समाजबंधुओं ने राजेश्वर भगवान के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त की। महाआरती के समय राजेश्वर भवन राजेश्वर भगवान के जयकारों से गूंज उठा। महिलाओं और पुरुषों के साथ बच्चों एवं युवाओं ने भी कार्यक्रम में उत्साहपूर्वक सहभागिता की। आयोजन के समापन पर समाजबंधुओं ने राजेश्वर भगवान के बताए आदर्शों को जीवन में अपनाने, समाज में आपसी भाईचारा बढ़ाने और धार्मिक-सांस्कृतिक परंपराओं को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने का संकल्प दोहराया। हुब्बल्ली में आयोजित राजेश्वर भगवान की 83वीं पुण्यतिथि श्रद्धा, संस्कृति और सामाजिक एकता का प्रभावशाली संगम बनकर सामने आई। पारंपरिक राजस्थानी परिधान में महिलाओं की भागीदारी, भक्ति संगीत, महाआरती और महाप्रसादी ने समारोह को यादगार बना दिया। आयोजन ने यह संदेश दिया कि प्रवासी समाज अपनी कर्मभूमि में रहते हुए भी अपनी मातृभूमि की संस्कृति, धार्मिक आस्था और सामाजिक संस्कारों को मजबूती से जीवित रख सकता है। राजेश्वर भगवान की पुण्यतिथि का यह आयोजन समाज की एकजुटता और नई पीढ़ी को अपनी विरासत से जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल के रूप में सामने आया।

  • मानवता की मिसाल: ईश्वरप्पा ने बोरा परिवार की शिक्षा-इलाज की जिम्मेदारी उठाई

    मुश्किल वक्त में समाज का मजबूत सहारा—मासिक राशन के लिए भी आगे आए समाजबंधु, सहयोग अभियान में जुटे ₹61 हजार संकटग्रस्त बोरा परिवार से मुलाकात कर सहयोग का भरोसा देते पूर्व उपमुख्यमंत्री के. एस. ईश्वरप्पा एवं समाजबंधु। भारतार्थ खबर। संवाददाता: धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) शिवमोग्गा | 11 अगस्त 2026 शिवमोग्गा। मुश्किल परिस्थितियों से जूझ रहे बोरा परिवार की मदद के लिए समाज ने संवेदनशीलता और मानवीय एकजुटता की मिसाल पेश की है। परिवार की चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों की जानकारी मिलने पर कर्नाटक के पूर्व उपमुख्यमंत्री के. एस. ईश्वरप्पा परिवार के निवास पर पहुंचे और सदस्यों से मुलाकात कर उनकी स्थिति की जानकारी ली। इस दौरान उन्होंने परिवार को हरसंभव सहयोग का भरोसा दिलाते हुए नाबालिग छात्रा टिंगल बोरा की शिक्षा का पूरा खर्च तथा परिवार के वार्षिक चिकित्सा एवं अस्पताल संबंधी खर्च को वहन करने की घोषणा की। परिवार के लिए यह पहल ऐसे समय में सामने आई है, जब स्वास्थ्य और आर्थिक चुनौतियों के कारण दैनिक जीवन कठिन हो गया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार परिवार में श्री ललित बोरा, श्रीमती अश्विनी बोरा, श्री प्रशांत बोरा और 17 वर्षीय टिंगल बोरा शामिल हैं। टिंगल वर्तमान में डीवीएस पीयू (इंड) कॉलेज में द्वितीय पीयूसी की छात्रा हैं और उन्हें मेधावी विद्यार्थी बताया गया है। बोरा परिवार की मदद के इस प्रयास में राजस्थानी विष्णु समाज, शिवमोग्गा की टीम भी पूर्व उपमुख्यमंत्री के साथ परिवार के निवास पर पहुंची। समाज के प्रतिनिधियों ने परिवार की परिस्थितियों को समझते हुए केवल तत्काल राहत तक सीमित रहने के बजाय नियमित जरूरतों में सहयोग का संकल्प भी व्यक्त किया। शिक्षा का खर्च उठाने की घोषणा से परिवार को मिला संबल परिवार की सबसे बड़ी चिंताओं में से एक बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य संबंधी खर्च है। ऐसे में पूर्व उपमुख्यमंत्री के. एस. ईश्वरप्पा द्वारा टिंगल बोरा की संपूर्ण शिक्षा का खर्च उठाने की घोषणा को परिवार के लिए महत्वपूर्ण राहत के रूप में देखा जा रहा है। टिंगल एक छात्रा हैं और वर्तमान में द्वितीय पीयूसी की पढ़ाई कर रही हैं। आर्थिक संकट के बीच शिक्षा जारी रखना परिवार के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता था। ऐसे समय में शिक्षा की जिम्मेदारी उठाने की घोषणा ने सामाजिक सहयोग की सकारात्मक तस्वीर पेश की है। इसी तरह परिवार के वार्षिक मेडिकल एवं हॉस्पिटल खर्च में सहयोग का आश्वासन भी परिवार को भविष्य की चिंता से कुछ राहत देने वाला कदम है। हालांकि चिकित्सा संबंधी सभी निर्णय संबंधित चिकित्सकों की सलाह के अनुसार ही होने चाहिए। मासिक राशन की जिम्मेदारी के लिए भी आगे आए समाजबंधु परिवार की आर्थिक स्थिति को देखते हुए मासिक राशन यानी किराना खर्च की जिम्मेदारी उठाने के लिए समाज के कई लोग आगे आए। उपलब्ध जानकारी के अनुसार श्री दिनेश दासजी वैष्णव, श्री राजेंद्र जी सीरवी, श्री गोपाल राम जी सीरवी क्षेत्र, श्री रामदेव जी इलेक्ट्रिकल, श्री पारस जी माली, श्री हनुमान जी माली, श्री शंकर लाल जी माली, श्री ओमाराम जी माली और श्री गोविंद भारती जी गोस्वामी ने सहयोग की जिम्मेदारी स्वीकार की। समाजबंधुओं की यह पहल बताती है कि किसी परिवार को संकट से उबारने के लिए केवल बड़ी आर्थिक सहायता ही जरूरी नहीं होती, बल्कि नियमित छोटी-छोटी जरूरतों में निरंतर सहयोग भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। सहयोग अभियान में जुटे करीब ₹61 हजार बोरा परिवार की सहायता के लिए समाज स्तर पर सहयोग अभियान भी चलाया गया। उपलब्ध जानकारी के अनुसार श्री उत्तम भाटी और श्री दिनेश दास वैष्णव की अगुवाई में बैंक अकाउंट/QR कोड तथा वीडियो के माध्यम से सहयोग राशि जुटाने का प्रयास किया गया। इस अभियान के तहत अब तक करीब ₹61,000 की राशि एकत्रित होने की जानकारी दी गई है। यह राशि समाज के विभिन्न लोगों द्वारा स्वेच्छा से दिए गए सहयोग का परिणाम बताई गई है। इस पहल ने यह भी संदेश दिया कि डिजिटल माध्यमों के जरिए समाज के लोग जरूरतमंद परिवारों तक सहायता पहुंचाने के लिए तेजी से संगठित हो सकते हैं। बैंक खाते या QR कोड के माध्यम से सहयोग एकत्र करने वाले किसी भी अभियान में पारदर्शिता और सत्यापन को प्राथमिकता देना आवश्यक है। मानवीय संवेदना बनी सबसे बड़ी ताकत बोरा परिवार की मदद का यह अभियान केवल आर्थिक सहायता तक सीमित नहीं है। इसके पीछे समाज की संवेदनशीलता, सामूहिक जिम्मेदारी और जरूरतमंद परिवार के साथ खड़े रहने की भावना दिखाई देती है। जब किसी परिवार के सामने एक साथ स्वास्थ्य, शिक्षा और आर्थिक चुनौतियां खड़ी हो जाती हैं, तब सामाजिक सहयोग उसके लिए मनोबल का बड़ा आधार बन सकता है। ऐसे समय में परिवार को यह एहसास होना कि समाज उसके साथ खड़ा है, अपने आप में बड़ी राहत है। राजस्थानी विष्णु समाज, शिवमोग्गा की ओर से सभी सहयोगकर्ताओं के प्रति आभार व्यक्त करते हुए इसे मानवता और सामाजिक एकता का प्रेरणादायक उदाहरण बताया गया। समाज की भागीदारी ने दिया एकजुटता का संदेश इस सहायता अभियान में अलग-अलग लोगों की भागीदारी ने सामाजिक एकता का संदेश दिया। किसी ने मासिक राशन की जिम्मेदारी ली, किसी ने आर्थिक सहायता में योगदान दिया और किसी ने अभियान को लोगों तक पहुंचाने में भूमिका निभाई। इस तरह की सामूहिक पहल समाज में जरूरतमंद परिवारों की पहचान और सहायता के लिए एक सकारात्मक मॉडल प्रस्तुत करती है। शिक्षा, स्वास्थ्य और भोजन जैसी बुनियादी जरूरतों में समय पर सहायता मिलने से संकटग्रस्त परिवार को कठिन दौर से निकलने में मदद मिल सकती है। पर्व उपमुख्यमंत्री के. एस. ईश्वरप्पा की परिवार से मुलाकात और सहयोग की घोषणा ने भी इस अभियान को व्यापक सामाजिक संदेश दिया। कार्यक्रम से जुड़े लोगों ने सभी सहयोगकर्ताओं के प्रति आभार जताते हुए भविष्य में भी मानवीय कार्यों को आगे बढ़ाने की भावना व्यक्त की। बोरा परिवार के लिए आगे भी सहयोग की उम्मीद परिवार के सामने स्वास्थ्य और आर्थिक चुनौतियां बनी हुई हैं। ऐसे में शुरुआती सहायता के साथ निरंतर और व्यवस्थित सहयोग भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। समाज की ओर से मासिक राशन की जिम्मेदारी उठाने की पहल इसी दिशा में एक कदम है। संकट के समय सहायता का सबसे प्रभावी स्वरूप वही होता है, जिसमें जरूरतमंद व्यक्ति की तत्काल जरूरतों के साथ उसकी शिक्षा और भविष्य को भी ध्यान में रखा जाए। इस दृष्टि से टिंगल बोरा की शिक्षा का खर्च उठाने की घोषणा विशेष महत्व रखती है। यह पहल समाज के अन्य लोगों को भी प्रेरित कर सकती है कि वे अपनी क्षमता के अनुसार जरूरतमंद परिवारों की सहायता के लिए आगे आएं। हालांकि किसी भी आर्थिक सहायता अभियान में योगदान करने से पहले संबंधित संस्था, बैंक विवरण और राशि के उपयोग की पुष्टि करना जरूरी है।

  • नाका क्षेत्र में अतिक्रमण से बिगड़ी यातायात व्यवस्था, कार्रवाई के बावजूद नहीं मिल रहा स्थायी समाधान

    भारतार्थ खबर संवाददाता अशोक कुमार सिंह (Bhaarataarth.com) अयोध्या, 12 अगस्त 2026 उत्तर प्रदेश अयोध्या के प्रमुख नाका क्षेत्र में अतिक्रमण और बेतरतीब पार्किंग के कारण यातायात व्यवस्था लगातार प्रभावित होने की समस्या सामने आ रही है। सड़क किनारे दुकानों, अस्थायी ठेलों तथा वाहनों के खड़े होने से कई स्थानों पर सड़क की उपयोगी चौड़ाई कम हो गई है। इसका सीधा असर राहगीरों और वाहन चालकों की आवाजाही पर पड़ रहा है। नाका क्षेत्र शहर के व्यावसायिक रूप से सक्रिय इलाकों में शामिल है। यहां बड़ी संख्या में लोग खरीदारी और विभिन्न कार्यों के लिए पहुंचते हैं। वाहनों की बढ़ती संख्या के बीच सड़क किनारे होने वाला अतिक्रमण समस्या को और गंभीर बना देता है। व्यस्त समय में यातायात का दबाव बढ़ने पर जाम जैसी स्थिति बनने से लोगों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ता है। कार्रवाई के बाद फिर लौट आती है समस्या क्षेत्र में अतिक्रमण हटाने के लिए प्रशासन और नगर निगम की ओर से समय-समय पर अभियान चलाए जाने की बात सामने आती रही है। हालांकि, कार्रवाई के बाद कुछ समय तक स्थिति सुधरने के बावजूद दोबारा सड़क किनारे कब्जे और अव्यवस्थित पार्किंग की स्थिति बनने की शिकायतें सामने आती हैं। यही वजह है कि समस्या का स्थायी समाधान केवल अभियान चलाने से नहीं, बल्कि नियमित निगरानी और निरंतर कार्रवाई से संभव माना जा रहा है। पैदल यात्रियों के लिए भी बढ़ी परेशानी सड़क के किनारे पर्याप्त जगह नहीं बचने के कारण पैदल चलने वालों को कई बार मुख्य सड़क के किनारे से होकर गुजरना पड़ता है। इससे यातायात के बीच पैदल यात्रियों की सुरक्षा का सवाल भी खड़ा होता है। विशेषकर बुजुर्गों, बच्चों और महिलाओं के लिए व्यस्त मार्ग पर सुरक्षित पैदल आवागमन की व्यवस्था महत्वपूर्ण है। पार्किंग की बेहतर व्यवस्था जरूरी अतिक्रमण की समस्या के साथ व्यवस्थित पार्किंग का अभाव भी यातायात को प्रभावित करने वाला महत्वपूर्ण कारण है। सड़क पर वाहन खड़े होने से पहले से सीमित स्थान और कम हो जाता है। ऐसे में प्रशासन को क्षेत्र में उपलब्ध भूमि और यातायात की वास्तविक जरूरत का आकलन कर व्यवस्थित पार्किंग की संभावनाओं पर काम करना चाहिए। इसके साथ ही नो-पार्किंग क्षेत्रों में नियमित निगरानी और नियम तोड़ने वालों पर कार्रवाई भी जरूरी है। प्रशासन के सामने चुनौती नाका क्षेत्र की समस्या केवल अतिक्रमण हटाने तक सीमित नहीं है। स्थायी समाधान के लिए अतिक्रमण नियंत्रण, पार्किंग व्यवस्था, पैदल यात्रियों के लिए सुरक्षित स्थान और यातायात प्रबंधन को एक साथ लागू करना होगा। भारतार्थ खबर का मानना है कि शहर के महत्वपूर्ण व्यावसायिक क्षेत्र में यातायात व्यवस्था सुचारु रखना प्रशासन के साथ-साथ व्यापारियों और आम नागरिकों की भी साझा जिम्मेदारी है। यदि नियमित निगरानी और स्थायी व्यवस्था पर गंभीरता से काम किया जाए तो नाका क्षेत्र में जाम और आवागमन की परेशानी को काफी हद तक कम किया जा सकता है। भारतार्थ खबर का सवाल क्या नाका क्षेत्र में बार-बार अतिक्रमण हटाने के बजाय ऐसी स्थायी व्यवस्था बनाई जाएगी, जिससे सड़क पर अतिक्रमण वापस न लौटे और राहगीरों को सुरक्षित एवं सुगम आवागमन मिल सके? भारतार्थ खबर — खबर नहीं, उसका अर्थ।

  • बेंगलुरु में राजारामजी महाराज की 83वीं पुण्यतिथि पर उमड़ा आस्था का सैलाब

    भव्य जागरण में पूरी रात गूंजे गुरु गुणगान; शिक्षा, महिला सशक्तिकरण और समाज सुधार के संकल्प के साथ संपन्न हुआ दो दिवसीय महोत्सव बेंगलुरु में श्री राजारामजी महाराज की 83वीं पुण्यतिथि महोत्सव के दौरान भजन संध्या, पूजा-अर्चना एवं समाज सम्मान समारोह भारतार्थ खबर। बेंगलुरु संवाददाता: धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) बेंगलुरु | 11 अगस्त 2026। श्री श्री 1008 श्री राजारामजी महाराज की 83वीं पुण्यतिथि महोत्सव बेंगलुरु में श्रद्धा, भक्ति और सामाजिक एकजुटता के साथ भव्य रूप से मनाया गया। श्री राजाराम आंजणा पटेल संघ, बेंगलुरु के तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय कार्यक्रम में विशाल भजन संध्या, रात्रि जागरण, पूजा-अर्चना, आमसभा, महाप्रसादी और समाज के प्रतिभावान विद्यार्थियों का सम्मान प्रमुख आकर्षण रहे। राजस्थान से पहुंचे भजन कलाकारों की प्रस्तुतियों ने श्रद्धालुओं को देर रात तक भक्तिरस में डुबोए रखा। श्री राजारामजी महाराज को आंजणा पटेल समाज के आराध्य संत के रूप में श्रद्धा से स्मरण करते हुए समाजबंधुओं ने उनके जीवन, संदेश और आदर्शों को अपने आचरण में उतारने का संकल्प लिया। कार्यक्रम में धार्मिक आस्था के साथ शिक्षा, महिला सशक्तिकरण, समाज सुधार और नई प्रतिभाओं को आगे बढ़ाने पर भी विशेष जोर दिया गया। पैलेस ग्राउंड में सजा भव्य धार्मिक मंच श्री राजारामजी महाराज की 83वीं पुण्यतिथि महोत्सव के तहत 10 अगस्त 2026 की रात्रि बेंगलुरु के पैलेस ग्राउंड स्थित प्रिन्स एकेडमी, गेट नंबर 9 में भव्य जागरण एवं भजन संध्या का आयोजन किया गया। रात 10 बजे शुरू हुआ धार्मिक कार्यक्रम मंगलवार सुबह करीब 5:30 बजे तक चला। कार्यक्रम की शुरुआत चढ़ावे के लाभार्थियों द्वारा श्री राजारामजी महाराज की पूजा-अर्चना से हुई। पंडित अखिलेश दवे ने आगंतुक अतिथियों एवं भक्तगणों का राजेश्वर भगवान की आरती-दर्शन और तिलक के साथ स्वागत किया। इस अवसर पर राजस्थान से पहुंचे प्रसिद्ध भजन कलाकार गजेन्द्र राव एंड पार्टी तथा संजू राव, पाली सहित अन्य कलाकारों ने गणेश वंदना से भजन संध्या का शुभारंभ किया। इसके बाद गुरु महिमा और राजेश्वर भगवान की भक्ति से जुड़े अनेक लोकप्रिय भजनों की प्रस्तुतियां दी गईं। भजनों पर रातभर झूमे श्रद्धालु भजन संध्या में प्रस्तुत भक्तिगीतों ने ऐसा आध्यात्मिक वातावरण बनाया कि बड़ी संख्या में श्रद्धालु पूरी रात भक्ति में झूमते और नृत्य करते नजर आए। सुप्रसिद्ध देशी भजन कलाकार नरसारामजी ने भी भावपूर्ण भजनों की प्रस्तुति देकर कार्यक्रम में भक्तिरस घोल दिया। भक्ति गीतों के साथ प्रसिद्ध नृत्य कलाकार अंकित मोदी और कल्पना पटेल ने भी आकर्षक नृत्य प्रस्तुतियां दीं। उनकी प्रस्तुतियों ने कार्यक्रम में उत्साह और उमंग का रंग भर दिया। भजन संध्या का संचालन नरसिंह पटेल समदड़ी ने किया। कार्यक्रम की तकनीकी एवं मीडिया व्यवस्था में छगनाराम चौधरी, आंजणा यूट्यूब चैनल एवं फिल्म स्टूडियो भीनमाल, तामरा साउंड सिस्टम, कैमरा टीम और भजन मंडली का सहयोग रहा। मागड़ी रोड मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना 11 अगस्त 2026 मंगलवार को मागड़ी रोड स्थित श्री राजारामजी मंदिर परिसर में सुबह 9 बजे से 10:30 बजे तक विशेष पूजा-अर्चना एवं आरती का आयोजन हुआ। श्रद्धालुओं ने श्री राजारामजी महाराज के दर्शन कर सामूहिक रूप से पूजा-अर्चना की और समाज एवं देश की सुख-शांति की मंगलकामना की। इसके बाद सुबह 10:30 बजे आमसभा का आयोजन किया गया, जिसमें समाज के पदाधिकारियों, गणमान्य नागरिकों, राजस्थान से आए अतिथियों और बड़ी संख्या में समाजबंधुओं ने सहभागिता की। अध्यक्ष दुर्गाराम पटेल ने दिया समाज एकता का संदेश आमसभा में आंजणा पटेल समाज के अध्यक्ष दुर्गाराम पटेल ने समाजबंधुओं का स्वागत करते हुए संत परंपरा के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि संत किसी एक व्यक्ति, समाज या समुदाय तक सीमित नहीं होते, बल्कि उनके आदर्श और मार्गदर्शन सभी के लिए प्रेरणादायी होते हैं। उन्होंने समाज से संतों द्वारा बताए गए मार्ग पर चलने और सामाजिक कुरीतियों को समाप्त करने की दिशा में एकजुट प्रयास करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि समाज की प्रगति केवल आर्थिक विकास से नहीं, बल्कि शिक्षा, संस्कार, सामाजिक सद्भाव और युवाओं की भागीदारी से संभव है। महिला शक्ति और शिक्षा पर विशेष जोर आमसभा में वक्ताओं ने समाज के विकास में महिलाओं की भूमिका को महत्वपूर्ण बताते हुए महिला शिक्षा और बालिका शिक्षा को प्राथमिकता देने की आवश्यकता पर जोर दिया। वक्ताओं ने कहा कि आंजणा पटेल समाज की महिलाओं ने अपनी संस्कृति और सभ्यता को पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रखने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। समाज की प्रगति के लिए महिलाओं को सामाजिक गतिविधियों में और अधिक अवसर देने की आवश्यकता है। सभा में महिला मंडल के गठन पर भी चर्चा की गई। साथ ही समाज की नई प्रतिभाओं को पहचानकर उन्हें आगे बढ़ाने और शिक्षा के क्षेत्र में प्रोत्साहन देने की जरूरत पर सहमति व्यक्त की गई। होनहार विद्यार्थियों का सम्मान कार्यक्रम में समाज की ओर से कक्षा 1 से लेकर डिग्री स्तर तक शिक्षा प्राप्त कर रहे एवं उत्कृष्ट उपलब्धियां हासिल करने वाले होनहार विद्यार्थियों को सम्मानित किया गया। विद्यार्थियों को सम्मानित कर शिक्षा के प्रति समाज की प्रतिबद्धता का संदेश दिया गया। आयोजकों ने कहा कि समाज की वास्तविक शक्ति उसकी नई पीढ़ी है। यदि बच्चों और युवाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, संस्कार और उचित मार्गदर्शन मिले तो वे समाज और राष्ट्र के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। चढ़ावे के लाभार्थियों एवं अतिथियों का सम्मान कार्यक्रम के दौरान विभिन्न चढ़ावों के लाभार्थियों का संघ की ओर से माला, साफा एवं स्मृति-चिह्न देकर सम्मान किया गया। राजस्थान से पहुंचे गणमान्य अतिथियों का भी परंपरागत रूप से माला एवं साफा पहनाकर बहुमान किया गया। समाजबंधुओं ने आयोजन में सहयोग देने वाले भामाशाहों और कार्यकर्ताओं के प्रति आभार व्यक्त किया। आगामी कार्यक्रमों के लिए चढ़ावे की बोलियां भी लगाई गईं। सचिव भीमाराम भूरिया ने प्रस्तुत की प्रगति रिपोर्ट संघ के सचिव भीमाराम भूरिया पहाड़पुरा ने समाज में चल रही गतिविधियों और विकास कार्यों की प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत की। उन्होंने संगठन की ओर से किए जा रहे सामाजिक एवं सामुदायिक कार्यों की जानकारी समाजबंधुओं के सामने रखी। मंच का संचालन भीमाराम भूरिया पहाड़पुरा ने किया। उपकोषाध्यक्ष मांगीलाल पटेल ने आय-व्यय का लेखा-जोखा प्रस्तुत किया। इससे समाज में पारदर्शिता और संगठनात्मक जवाबदेही का संदेश गया। समाज सुधार और सांस्कृतिक संरक्षण पर मंथन आमसभा में अनेक वक्ताओं ने समाज सुधार, सामाजिक एवं सांस्कृतिक विकास तथा शिक्षा के महत्व पर विचार व्यक्त किए। वक्ताओं ने कहा कि बदलते दौर में समाज की परंपराओं और संस्कृति को सुरक्षित रखने के साथ नई पीढ़ी को आधुनिक शिक्षा और अवसर उपलब्ध कराना भी जरूरी है। श्री राजारामजी महाराज की शिक्षाओं और संत परंपरा का स्मरण करते हुए समाजबंधुओं ने सामाजिक बुराइयों को दूर करने, आपसी भाईचारा मजबूत करने और जरूरतमंदों की सहायता करने की भावना को आगे बढ़ाने का आह्वान किया। राजेश्वर सेवा मंडल और महिला मंडल ने संभाली व्यवस्थाएं दो दिवसीय श्री राजारामजी महाराज की 83वीं पुण्यतिथि महोत्सव को सफल बनाने में राजेश्वर सेवा मंडल, राजेश्वर महिला मंडल, संघ के कमेटी सदस्यों और समाजबंधुओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। भव्य आयोजन की विभिन्न व्यवस्थाओं को सुचारू रूप से संचालित करने के लिए कार्यकर्ताओं ने तन-मन-धन से सहयोग किया। महिलाओं और युवाओं की सक्रिय सहभागिता भी कार्यक्रम की खास विशेषता रही। राजस्थान से पहुंचे समाजबंधुओं की रही विशेष सहभागिता पुण्यतिथि महोत्सव में राजस्थान से भी अनेक गणमान्य अतिथि और समाजबंधु बेंगलुरु पहुंचे। प्रवासी समाजबंधुओं ने अपने आराध्य संत श्री राजारामजी महाराज के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हुए आयोजन में भाग लिया। बेंगलुरु और राजस्थान के बीच सामाजिक एवं सांस्कृतिक जुड़ाव को मजबूत करने में ऐसे आयोजन महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। कार्यक्रम ने प्रवासी समाज को अपनी जड़ों और परंपराओं से जोड़ने का अवसर प्रदान किया। भक्ति से लेकर समाज सेवा तक दिखी एकजुटता दो दिवसीय आयोजन में एक ओर जहां रात्रि जागरण में भक्ति का उल्लास देखने को मिला, वहीं दूसरी ओर आमसभा में समाज के भविष्य को लेकर गंभीर चर्चा हुई। शिक्षा, महिला सशक्तिकरण, समाज सुधार और नई प्रतिभाओं को प्रोत्साहन देने जैसे विषयों ने कार्यक्रम को धार्मिक आयोजन से आगे बढ़ाकर सामाजिक चिंतन का मंच बना दिया। श्री राजारामजी महाराज की 83वीं पुण्यतिथि पर श्रद्धालुओं ने उनके आदर्शों को याद करते हुए समाज में सद्भाव, सेवा, संस्कार और एकता को मजबूत करने का संदेश दिया। भव्य आयोजन का हुआ समापन कार्यक्रम के अंत में उपाध्यक्ष कलाराम चौधरी ने सभी अतिथियों, समाजबंधुओं, कलाकारों, कार्यकर्ताओं और सहयोगियों का आभार व्यक्त किया। उन्होंने आयोजन को सफल बनाने में प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से सहयोग देने वाले सभी लोगों के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया। इसके साथ ही श्री राजारामजी महाराज की 83वीं पुण्यतिथि महोत्सव का भव्य एवं श्रद्धापूर्ण समापन हुआ। पूरे आयोजन में छोगाराम आकोदिया, समर्थाराम ओड, नाथूराम पटेल, लक्ष्मण पटेल, नरसाराम पटेल, केवलराम आकोदिया, खीमाराम, गोंगाराम, गोमाराम, लखमाराम बाला, मूलाराम, कूंपाराम, जोगाराम, मानाराम, प्रेमराज, अचलाराम खागड़ा, केवलराम काग, वालाराम, पीराराम, छोगाराम कोदली, टीकमाराम, गणेशाराम, बगदाराम, भंवरलाल आकोदिया, भूराराम, वीरमाराम काग, दूदाराम, लीलाराम, महादेवाराम, पूनाराम फक, भगाराम, चेलाराम, जुठाराम, खुशाल पटेल, ठाकराराम, राजाराम, रतनराम, राजाराम भूरिया, रूपाराम, सोनाराम, बुधराम मालवी, अशोक, कपूराराम सोलंकी सहित बड़ी संख्या में समाज के गणमान्य बंधुओं की सहभागिता रही। श्री राजारामजी महाराज की 83वीं पुण्यतिथि का यह महोत्सव भक्ति, संस्कार और सामाजिक एकता के साथ शिक्षा एवं समाज सुधार का प्रभावशाली संदेश छोड़ गया। आयोजन ने यह स्पष्ट किया कि संत परंपरा केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं, बल्कि समाज को सकारात्मक दिशा देने वाली प्रेरक शक्ति भी है।

  • रिश्तों की महक आख़िरी रोटी (भाग–5)

    . दिल को छू लेने वाली मौलिक कहानियाँ लेखक: अशोक कुमार सिंह माँ की खाली थाली... और तीन बेटों की आँखों से बहते वर्षों पुराने आँसू गौरी के मासूम प्रश्न के बाद पूरे आँगन में ऐसा सन्नाटा छा गया, मानो समय अचानक ठहर गया हो। सरस्वती देवी अब भी मुस्कुरा रही थीं। उन्होंने आख़िरी रोटी के छोटे-छोटे टुकड़े किए और धीरे से कहा— "लो बिटिया... इसे तुम लोग बाँटकर खा लो। मैं बाद में खा लूँगी।" लेकिन इस बार उनकी आवाज़ में वही दृढ़ता नहीं थी, जो बरसों पहले हुआ करती थी। राघव धीरे-धीरे उठा। उसकी नज़र पहली बार माँ की थाली पर गई। वहाँ... कोई रोटी नहीं थी। सिर्फ़ एक कटोरी दाल... थोड़ा-सा नमक... और एक गिलास पानी। राघव का हाथ काँप गया। उसके मन में बचपन का एक दृश्य बिजली की तरह कौंधा। उसे याद आया... एक बरसाती रात। घर में केवल पाँच रोटियाँ बनी थीं। चार बच्चों और बाबूजी के बाद जब उसकी बारी आई तो अम्मा ने अपनी थाली की रोटी उसके हाथ में रख दी थी। उसने पूछा था— "और तुम क्या खाओगी, अम्मा?" अम्मा हँसकर बोली थीं— "अरे... मैं तो रसोई में खा चुकी हूँ।" आज... इतने वर्षों बाद... उसे समझ आया... उस रात अम्मा झूठ बोली थीं। उन्होंने खाया नहीं था... उन्होंने खिलाया था। मोहन की आँखों से आँसू टपक पड़े। उसे वह दिन याद आया जब उसकी बोर्ड परीक्षा की फीस जमा करने के लिए अम्मा ने अपनी चाँदी की पायल बेच दी थी। उन्होंने कभी यह बात बच्चों को नहीं बताई। बस इतना कहा था— "पुरानी हो गई थी... पहनने लायक नहीं रही।" आज वही मोहन करोड़ों का कारोबार संभाल रहा था... लेकिन माँ के त्याग का हिसाब कभी नहीं रख पाया। सबसे छोटा सुरेश अब तक चुप बैठा था। अचानक वह उठकर माँ के पास आया। घुटनों के बल बैठ गया। उसने काँपते हाथों से माँ की खाली थाली उठाई। उसकी आँखों से आँसू लगातार गिर रहे थे। भर्राई हुई आवाज़ में बोला— "अम्मा... क्या हर बार ऐसा ही होता था?" सरस्वती देवी मुस्कुरा दीं। उन्होंने बेटे के सिर पर हाथ रखा। "बेटा... माँ की थाली कभी खाली नहीं होती। बच्चों का पेट भर जाए... वही उसका भोजन है।" यह सुनते ही तीनों भाइयों का धैर्य टूट गया। राघव ने माँ के चरण पकड़ लिए। मोहन फूट-फूटकर रोने लगा। सुरेश ने पहली बार बिना किसी संकोच के माँ को गले लगा लिया। आँगन में बैठी बहुओं की आँखें भी नम हो चुकी थीं। छोटी गौरी यह सब देख रही थी। उसे शायद पूरी बात समझ नहीं आई... लेकिन इतना ज़रूर समझ आ गया... कि दादी की रोटी सबसे कीमती है। उधर चूल्हे की आँच धीरे-धीरे बुझने लगी... लेकिन उसी पल तीनों बेटों के भीतर माँ के प्रति प्रेम की बुझती हुई लौ फिर से जल उठी। क्रमशः... अंतिम भाग में पढ़िए... "जब आख़िरी रोटी माँ की थाली में रखी गई... और उस घर में वर्षों बाद रिश्तों ने फिर से जन्म लिया।" अन्य कहानी , मार्गदर्शन एवं प्रेरणादायी ज़रूर पढ़िए https://www.bhaarataarth.com/post/रिश्तों-की-महक-आख-िरी-रोटी-भाग-1 https://www.bhaarataarth.com/post/रिश्तों-की-महक-आख-िरी-रोटी-भाग-2 https://www.bhaarataarth.com/post/रिश्तों-की-महक-आख-िरी-रोटी-भाग-3 https://www.bhaarataarth.com/post/रिश्तों-की-महक-आख-िरी-रोटी-भाग-4 https://www.bhaarataarth.com/post/माँ-की-आख-िरी-गुल्लक https://www.bhaarataarth.com/post/रिश्तों-की-सबसे-बड-ी-द-लत एक दिल दहलाने वाली कहानी धारावाहिक उपन्यास जरूर पढ़ि भाग 01 भाग 02 भाग 03 भाग 4 भाग 5 भाग 6 भाग 7 भाग 8 भाग 9 भाग 10 भाग 11 नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में इन पोस्ट्स पर अपनी राय ज़रूर दें। आपका नज़रिया ही लोकतंत्र की ताकत है; देश के निर्माण में आपकी अहम भूमिका है। सटीक, वैज्ञानिक और साहित्यिक खबरें पढ़ने के लिए 'भारतार्थ समाचार' से जुड़े रहें। अपना समर्थन दिखाएं—हमें लाइक, शेयर और फ़ॉलो करें—ताकि हर ज़रूरी अपडेट आपको सबसे पहले मिले। ताज़ा खबरों के लिए "भारतार्थ खबर" के साथ बने रहें।

bottom of page